एपल माइक्रोसॉफ्ट

अर्थ जगत | कारोवॉर

माइक्रोसॉफ्ट और एपल की इस ऐतिहासिक जंग का अंतिम अध्याय अभी बाकी है

आज एपल दुनिया की सबसे मूल्यवान कंपनी है तो माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स सबसे अमीर शख्स

अनुराग भारद्वाज | 24 अक्टूबर 2017

पुरानी कहावत के बदलने का समय आ गया है. ‘जर, जोरू, ज़मीन पर दुनिया लड़ती आई है’ में तकनीक को भी जोड़ना होगा. लड़ाई अब डॉलर की नहीं है. डॉलर सह-उत्पाद है. तकनीक है, तो डॉलर है. कुछ समय पहले गूगल कंपनी ने मोटोरोला को सिर्फ़ इसलिए खरीदा था कि इसके 20 हज़ार पेटेंट उसकी झोली में आ जाएं. टेस्ला के एलन मस्क और फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर लड़ रहे हैं तो गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और एमेज़ॉन क्लाउड कंप्यूटिंग पर दो-दो हाथ कर रहे हैं.

कुछ ऐसा ही माइक्रोसॉफ्ट और एपल कंपनी के दरमियान हुआ था और आज भी हो रहा है. उनके बीच हुआ ‘कारोव़ॉर’ कभी तीखी प्रतिस्पर्धा के रूप में देखा गया तो कभी दोस्ती के रूप में. इसने पर्सनल कंप्यूटर से लेकर स्मार्टफ़ोन तक हमारी दुनिया ही बदल दी. अपने-अपने ऑपरेटिंग सिस्टम को दुनिया भर के कंप्यूटरों और मोबाइल फ़ोन में डाल देने की यह जंग बेहद दिलचस्प है.

शुरुआत

माइक्रोसॉफ्ट की शुरुआत अमेरिका में नहीं हुई थी.70 के शुरूआती दशक में पर्सनल कंप्यूटर प्रचलन में कम थे. तब मेनफ्रेम यानी सिर्फ बड़ी-बड़ी कंपनियों के दफ्तरों में मौजूद विशाल कंप्यूटरों का जमाना था. इन्हें चलाने वाले तकनीक के जानकार होते थे. बिल गेट्स बेहद होशियार कम उम्र नौजवान थे जो उस वक़्त मेनफ्रेम कंप्यूटर पर काम कर लेते थे. अपनी आत्मकथा ‘दा रोड अहेड’ में गेट्स ने लिखा है कि हॉवर्ड यूनिवर्सिटी में पढाई के दौरान उन्होंने ‘पॉपुलर इलेक्ट्रॉनिक्स’ नाम की मैगज़ीन में एमआईटीएस कंपनी द्वारा ‘अल्टेयर 8800’ नाम के पर्सनल कंप्यूटर के लॉन्च होने के बारे में पढ़ा था. उन्हें अहसास हो गया था कि पर्सनल कंप्यूटर का युग शुरू होने वाला है. बिल गेट्स ने बस ठान लिया और कॉलेज छोड़कर अपने दोस्त और सहकर्मी पॉल एलन के साथ मिलकर उन्होंने इस कंपनी के लिए पहला सॉफ्टवेयर प्रोग्राम लिखा. एमआईटीएस का दफ्तर मेक्सिको के अल्बकर्की शहर में था. लिहाज़ा, वहां अप्रैल 1975 में माइक्रोसॉफ्ट की स्थापना हुई.

उधर, अध्यात्म की खोज में हिंदुस्तान आने वाले और एक समय पर ड्रग्स के आदी रहे स्टीव जॉब्स और उनके दोस्त स्टीव वोज्नीयेक ने ‘अल्टेयर 8800’ जैसा ही माइक्रोप्रोसेसर युक्त कंप्यूटर बनाया. इसमें दो चीज़ें नई थीं- की-बोर्ड और मॉनिटर. प्रोग्राम पहले कागज़ पर मशीन द्वारा पंच कार्ड की मदद से टाइप किया जाता था, वोज्नीयेक की मशीन में सीधे लिखा जाने लगा था. यह दंग कर देने वाली मशीन थी. स्टीव जॉब्स ने जब इसे देखा तो वे इसे बेचने की रणनीति बनाने लग गए.

अप्रैल 1976 में कैलिफ़ोर्निया में एपल कंपनी की स्थापना हुई. स्टीव जॉब्स और वोज्नीयेक ने मिलकर ‘एपल 1’ और फिर ‘एपल 2’ बनाया. वोज्नीयेक मशीन बनाने के जादूगर थे और जॉब्स डिजाइन और बेचने में माहिर.

गेट्स और जॉब्स की साझेदारी की शुरुआत

एपल मशीन बना रही थी. माइक्रोसॉफ्ट उस पर चलने वाले प्रोग्राम. दोनों ही कंपनियां तेज़ी से आगे बढ़ते हुए एक दूसरे की ज़रूरत महसूस कर रही थीं. ‘एपल 2’ के प्रोग्राम में कुछ सीमाएं थीं, मसलन, यह व्यापार की ज़रूरत को पूरा नहीं कर पा रहा था.

बिल गेट्स ने स्टीव जॉब्स से मुलाकात कर इस कमी को पूरा करने का प्रोग्राम दिखाया तो जॉब्स समझ गए कि साझेदारी करने में दोनों का फ़ायदा होगा. जब ‘एपल 2’ के अन्दर माइक्रोसॉफ्ट का प्रोग्राम डाल दिया गया तो वह सही मायने में पर्सनल कंप्यूटर बन गया.

बिल गेट्स यहीं नहीं रुके. इत्तेफ़ाक से उन दिनों आईबीएम कंपनी भी पर्सनल कंप्यूटर बनाने के क्षेत्र में उतरना चाहती थी और उसे ऑपरेटिंग सिस्टम की दरकार थी. माइक्रोसॉफ्ट ने सिएटल कंप्यूटर प्रोडक्ट्स कंपनी से 86-डीओएस (ऑपरेटिंग सिस्टम) ख़रीदकर और फिर उसमें तब्दीली कर उसे आईबीएम की ज़रूरतों के माफ़िक बना दिया. एमएस डीओएस का उदय हो गया था.

बिल गेट्स किसी एक कंपनी के साथ बंधना नहीं चाहते थे. जब उन्होंने आईबीएम के साथ करार किया तो शर्त रख दी कि वे ऑपरेटिंग सिस्टम को अन्य कंपनियों को भी बचेंगे. वहीं, स्टीव जॉब्स का नज़रिया थोड़ा अलग था. वे अपने अन्वेषण को लेकर इतने जुनूनी थे कि इसे अपनी मशीनों तक ही सीमित करके रखना चाहते थे. आज भी एपल के आईफोन में सिर्फ आईओएस ऑपरेटिंग सिस्टम ही काम करता है. बिल गेट्स इस नज़रिए से सहमत नहीं थे.

विंडोज 85, एपल का मैकिन्टॉश और ज़ेरॉक्स

ज़ेरॉक्स कंपनी उत्पाद और कस्टमर सर्विसेज की दुनिया में एक अलग ही स्थान रखती है. एक ज़माने में कंपनी के प्रोसेस और कर्मचारी बेहद डिमांड में रहते थे. ज़ेरोक्स कंप्यूटर हार्डवेयर के क्षेत्र में कुछ नया ही गढ़ रही थी. आज जो ‘माउस’ हम इस्तेमाल करते हैं, वह इसी का बनाया हुआ है. ज़ेरॉक्स के कर्मचारी उस समय पर ग्राफ़िकल इंटरफ़ेस पर काम कर रहे थे. इससे आम इंसान भी कंप्यूटर चला सकता था.

ज़ेरॉक्स कंपनी एपल में निवेश करना चाहती थी. स्टीव जॉब्स राज़ी थे. बताते हैं कि वे ज़ेरॉक्स कंपनी को देखने के बहाने कुछ नया आइडिया पाना चाहते थे. वहीं उन्हें एक दिन ‘ग्राफ़िकल इंटरफ़ेस’ के बारे में मालूम हुआ. इसे देखते ही वे भांप गए कि यह कंप्यूटिंग की दुनिया ही बदल देगा! इस ताकाझांकी से मिले ग्राफ़िकल इंटरफ़ेस, माउस, दोस्त वोज्नीयेक की इंजीनियरिंग और खुद की कल्पना शक्ति के संयोग ने दुनिया की सबसे सुन्दर मशीन ‘मैकिन्टॉश’ को जन्म दिया.

स्टीव जॉब्स को अब एक सॉफ्टवेयर प्रोग्राम की ज़रूरत थी. उन्हें फिर बिल गेट्स की याद आई. उन्होंने गेट्स को जब अपनी नयी मशीन दिखायी तो वे सन्न रह गए. उनकी उंगलियां ‘माउस’ पर चल रही थी, आंखें मॉनिटर पर एक साथ खुलती हुई कई स्क्रीनों को देख रही थीं और दिमाग़…, दिमाग़ कहीं और चल रहा था.

बिल गेट्स ने आइडिया उठा लिया था. उन्होंने भी ग्राफ़िकल इंटरफ़ेस को बीच में रखकर नया प्रोग्राम बनाया. जिसका नाम था– विंडोज 85.

जब यह बात स्टीव जॉब्स को मालूम हुई तो तलवारें खिंच गईं. उन्होंने बिल गेट्स पर चोरी का इल्ज़ाम लगाया. गेट्स ने बेहद शांत रहकर जवाब दिया जो बड़ा मशहूर हुआ. उनका कहना था, ‘जॉब्स, इसे कुछ यूं समझो. ये कुछ यूं है कि मानो हम दोनों का कोई रईस पड़ोसी हो जिसका नाम ज़ेरॉक्स है. मैं उसके घर टीवी चोरी करने गया तो देखा कि तुम पहले ही उसे ले जा चुके हो.’

ज़ुबानी जंग

स्टीव जॉब्स को अपनी दो साल की मेहनत पर पानी फिरता दिखने लगा. वे विचलित हो उठे. उन्होंने गेट्स को बेशर्म कहा. तो जवाब में गेट्स ने स्टीव जॉब्स को विकृत मानसिकता का शिकार बताया.

एक इंटरव्यू में स्टीव जॉब्स ने कहा कि बिल गेट्स अड़ियल और छोटी मानसिकता रखते हैं हैं और उन्हें अपने बचपन के दिन किसी आश्रम में गुज़ारने चाहिए थे. गेट्स ने जॉब्स पर प्रहार करते हुए कहा कि वे तकनीक के बारे में कुछ नहीं जानते बस एक अच्छे डिज़ाइनर और सुपर सेल्समैन हैं.

माइक्रोसॉफ्ट अर्श परएपल फ़र्श पर

विंडोज 85 दुनिया भर में हाथों हाथ बिका. उस साल कंपनी ने दस लाख कंप्यूटरों में विंडोज 85 स्थापित किया. माइक्रोसॉफ्ट की कुल आय 14 करोड़ अमेरिकी डॉलर हुई थी. मैकिन्टोश बहुत ज़्यादा सफल नहीं हुआ. एपल कंपनी के डायरेक्टर स्टीव जॉब्स की मनमानी और रवैये से नाराज़ हो रहे थे और एक दिन जॉब्स द्वारा नियुक्त किये गए सीईओ, जॉन स्क्ली ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया. जॉब्स अपनी ही कंपनी से निकाले जा चुके थे!

एपल से बाहर निकलकर स्टीव जॉब्स ने ‘नेक्स्ट’ नाम की कंपनी की स्थापना की जिसने विभिन्न प्रकार के ऑपरेटिंग सिस्टम इजाद किये. उधर, उनके बिना एपल धीरे-धीरे नुकसान की ओर बढ़ने लगी. एक समय ऐसा भी आया जब एपल दिवालिया होने के कगार पर आ खड़ी हुई. तब फिर कंपनी को स्टीव जॉब्स की याद आई

बिल गेट्स ने स्टीव जॉब्स को दोबारा एपल में आने से रोकने की कोशिश की

जानकार बताते हैं कि बिल गेट्स ने तमाम कोशिशें की जिनसे स्टीव दोबारा एपल में ना आ सकें. यहां तक कि उन्होंने एपल के तत्कालीन सीईओ गिल अमेलिओ से कहा कि वे स्टीव को वापस लाकर बहुत बड़ी ग़लती करने वाले हैं जिन्हें इंजीनियरिंग के बारे में कुछ पता नहीं है. गेट्स ने कहा कि स्टीव की नेक्स्ट के रूप में एपल कूड़ा ख़रीद रही है.पर गिल अमेलिओ अपने फ़ैसले पर डटे रहे और 12 साल बाद, यानी 1997 में, जॉब्स फिर एपल के सीईओ नियुक्त हो गये.

फिर दोस्ती का हाथ बढ़ाया

1997, माइक्रोसॉफ्ट हॉटमेल ख़रीद चुका था. दो साल पहले जारी किया गया विंडोज 95 कंपनी को नयी ऊंचाइयों पर ले गया था. उस साल माइक्रोसॉफ्ट की शुद्ध आय 400 करोड़ अमेरिकी डॉलर थी. उधर, एपल घाटे में चल रही थी. माल बिक तो रहा था, मुनाफ़ा नहीं हो रहा था. स्टीव जॉब्स जानते थे कि क्या करना है. आख़िर उनकी कंपनी ही तो थी. उन्होंने बिना समय गंवाए बिल गेट्स से मदद मांगी.

गेट्स उस समय भंवरजाल में फंसे हुए थे. अमेरिकी और यूरोप के कोर्ट उन्हें मोनोपॉलिस्ट यानी एकाधिकारवादी करार दे चुके थे. दरअसल, इंटेल के माइक्रोप्रोसेसर चिप वाले कंप्यूटरों पर माइक्रोसॉफ्ट अपने ऑपरेटिंग सिस्टम की मंजूरी तभी दे रही थी, जब उस पर कंपनी ही का ब्राउडर यानी इंटरनेट एक्स्प्लोरर (आईई) इंस्टाल किया जाता. आईई तब फ्री नहीं था. दूसरी आईई कंपनियों ने शिकायत की और माइक्रोसॉफ्ट केस हार गयी.

बिगड़े हुए हालात देखकर, बिल गेट्स ने स्टीव जॉब्स से हाथ मिलाया और एपल में 15 करोड़ डॉलर का निवेश किया. करार के तहत पहली बार मैकिन्टोश पर विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम लोड किया गया. यानी, यारी फिर चल निकली.

माइक्रोसॉफ्ट से मिले पैसों को स्टीव जॉब्स ने दांत से पकडे रखा और सही जगह पर इस्तेमाल किया. जॉब्स ने नयी टीम बनायी और आईमैक, पॉवर बुक, रंगीन बॉडी के मैकिन्टोश कंप्यूटर जैसे सफल प्रोडक्ट्स जारी करके कंपनी को डेढ़ साल से भी कम समय में मुनाफ़े में ला खड़ा किया. इस दौरान और बाद में भी जब-जब स्टीव जॉब्स ने कोई नया उत्पाद बाज़ार में उतारा, बिल गेट्स ने उन्हें बधाई दी.

फिर राहें जुदा हो गईं

एपल मुनाफ़े में आ चुकी थी. उसे अब माइक्रोसॉफ्ट की ज़रूरत नहीं थीस पर माइक्रोसॉफ्ट अब भी एपल से ज़्यादा मुनाफ़ा कमा रही थी. इसी बीच गूगल ने अपने पैर पसारने के लिए माइक्रोसॉफ्ट को धक्का देना शुरू कर दिया था. माइक्रोसॉफ्ट अब दो तरफ़ से घिर चुकी थी.

दोनों ने एक दूसरे के ख़िलाफ़ अपने उत्पाद जारी किये. मसलन ,माइक्रोसॉफ्ट ने एपल के ‘मैकबुक’ के जवाब में ‘सरफेस लैपटॉप’ उतारा. ‘विंडोज 10’ के मुक़ाबले एपल ने ‘मैकओएस’ नाम से ऑपरेटिंग सिस्टम लांच किया. दोनों अपने प्रोडक्ट्स को लेकर एक दूसरे पर छींटाकशी भी करते रहे हैं.

बैलेंसशीट क्या कहती है?

1995 से लेकर 2010 तक माइक्रोसॉफ्ट एपल से आय और मुनाफ़े दोनों ही मोर्चों पर आगे थी. 2004 में माइक्रोसॉफ्ट एपल से चार गुना ज़्यादा ज्यादा कमा रही थी. लेकिन 2008 के बाद एपल काफ़ी तेज़ी से आगे बढ़ी है. यह दौर एपल की आई-सीरीज़ के उत्पादों का था. जिसमें सबसे बड़ा आईफ़ोन था. एपल के आईफ़ोन ने माइक्रोसॉफ्ट से लगभग हारी हुई बाज़ी जीत ली है. 2016 में एपल की कुल आय दो लाख पंद्रह हज़ार करोड़ थी, जबकि माइक्रोसॉफ्ट की 85 हज़ार करोड़. आज एपल दुनिया की सबसे मूल्यवान कंपनी है, तो बिल गेट्स सबसे धनी व्यक्तियों में से एक.

आगे क्या?

बिल गेट्स हमेशा से एपल की नयी सफलता को स्टीव जॉब्स के साथ जोड़ते रहे हैं. उनकें मुताबिक़ यह सब स्टीव की वजह से हुआ है न कि उत्पादों की वजह से. लेकिन 2011 में स्टीव जॉब्स के देहांत के बाद आये आंकड़े गेट्स की बात को झुठला रहे हैं.

दोनों कंपनी के सीईओ बदल गए हैं. एपल को संभालने टिम कुक आगे आये हैं तो माइक्रोसॉफ्ट के सर्वेसर्वा अब सत्या नडेला हैं. नडेला माइक्रोसॉफ्ट की छवि और अन्दर के माहौल को बदलने की कोशिश कर रहे हैं तो टिम कुक के कंधे पर जॉब्स की विरासत आगे बढ़ाने का ज़िम्मा है. जानकारों के मुताबिक आने वाला समय क्लाउड कंप्यूटिंग का रहने वाला है. दोनों ही कंपनियां अपनी अपनी रणनीति को लेकर बड़ी सावधानी से आगे बढ़ रही है. कोई भी एक इंच ज़मीन छोड़ने को तैयार नहीं है. साम-दाम दंड भेद सब इस्तेमाल किये जायेंगे. यह कारोवॉर है और पुरानी कहावत है कि इश्क और जंग में सब जायज है.

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