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भारतीय विमानन कंपनियां इतने बुरे हाल में हैं फिर भी सरकार उनकी मदद क्यों नहीं करती?

देश-विदेश के ज्यादातर जानकारों का मानना है कि भारतीय विमानन कंपनियों में अब बिना सरकारी मदद के खड़े रहने की सामर्थ्य नहीं बची है

अभय शर्मा | 28 जुलाई 2020 | फोटो: फ्लिकर

कोरोना वायरस महामारी के चलते दुनिया भर की विमानन कंपनियों को गहरी चोट पहुंची है. आर्थिक बोझ कम करने के लिए विमानन कंपनियों ने अपने कर्मचारियों की छंटनी शुरू कर दी है. बीते हफ्ते भारत की सबसे बड़ी विमानन कंपनी इंडिगो ने भी अपने दस फीसदी यानी करीब 2700 कर्मचारियों को निकालने की घोषणा कर दी. कंपनी के सीईओ रोनोजॉय दत्ता ने कर्मचारियों को लिखे एक पत्र में इसकी जानकारी दी. उन्होंने यात्रियों की अनिश्चितता, कमजोर अर्थव्यवस्था और यात्रा प्रतिबंधों को इसका कारण बताया. दत्ता ने कहा, ‘मौजूदा हालात में कंपनी को चलाते रहने के लिए कुछ त्याग किए बगैर इस आर्थिक संकट से निपट पाना असंभव हो गया है… इंडिगो के इतिहास में इतना दुखद कदम पहली बार उठाया जा रहा है. महामारी के दौर में हरसंभव उपाय पर गौर करने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि हमें अपने कर्मचारियों की संख्या में दस फीसदी की कटौती करने का पीड़ादायक फैसला लेना ही पड़ेगा.’

इंडिगो ने मार्च तक की तिमाही के अपने आंकड़े बीते महीने जारी किए थे जिनके मुताबिक उसे इस दौरान 870.80 करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ा है. यह नुकसान उस समय से पहले का है जब भारत में कोरोना वायरस की शुरुआत ही हुई थी. उस समय तक ज्यादा लोग हवाई यात्रा करने से नहीं कतरा रहे थे. इंडिगो सहित किसी भी विमानन कंपनी ने उस तिमाही के अपने आंकड़े अभी जारी नहीं किए हैं, जिस दौरान दो महीने – अप्रैल और जून में – उड़ानों पर पूरी तरह रोक लगी रही थी. लेकिन विमानन कंपनियों के वित्तीय मामलों पर नजर रखने वाली चर्चित ब्रोकरेज फर्म सेंट्रम ब्रोकिंग ने इंडिगो और स्पाइस जेट से जुड़े इस तरह के आंकड़े जारी किए हैं. कंपनी का मानना है कि 2020 वित्त वर्ष की पहली तिमाही में कोरोना वायरस महामारी के चलते इंडिगो को 2670 करोड़ रुपए और स्पाइस जेट को 1000 करोड़ रुपए के आसपास का नुकसान हुआ है.

देश की अन्य विमानन कंपनियों का हाल

विमानन क्षेत्र की अन्य भारतीय कंपनियों की बात करें तो उनकी स्थिति और भी खराब होने की संभावना जताई जा रही है. क्योंकि ये सभी बीते कई सालों से लगातार घाटे में ही चल रही थीं. देश की सभी विमानन कंपनियों ने कर्मचारियों के वेतन में कटौती, उन्हें बिना वेतन छुट्टी पर भेजने, कर्मचारियों को निकालने सहित खर्चों में कटौती के तमाम उपाय किए हैं. एयर इंडिया ने अपने कर्मचारियों को बिना वेतन के पांच साल तक की छुट्टी पर भेजने का फैसला लिया है. गो एयर ने भी अप्रैल से अपने अधिकतर कर्मचारियों को बिना वेतन के अनिवार्य अवकाश पर भेज दिया है. साथ ही उसने अन्य कर्मचारियों के वेतन में कटौती भी की है. इसके अलावा इसी महीने की शुरूआत में टाटा संस की हिस्सेदारी वाली विमानन कंपनी विस्तारा ने दिसंबर तक अपने करीब 40 फीसदी कर्मचारियों के वेतन में पांच से बीस फीसदी की कटौती की घोषणा की है. कई सालों से लगातार घाटे से जूझ रही टाटा संस और एयर एशिया एयरलाइंस की संयुक्त कंपनी ‘एयर एशिया इंडिया’ को भी भारी नुकसान होने की बात कही जा रही है. ऐसी खबरें भी आई हैं कि कोरोना महामारी के चलते हुए नुकसान की वजह से टाटा संस अब इसमें अपनी पूरी (51 फीसदी) हिस्सेदारी बेचने पर विचार कर रही है.

सरकारी मदद की जरूरत क्यों?

जब बीते मार्च में भारत में कोरोना वायरस के चलते लॉकडाउन की घोषणा की गयी थी, उसके कुछ रोज बाद ही विमानन मामलों के कई जानकारों और संस्थाओं ने भारत सरकार को विमानन कंपनियों को आर्थिक मदद देने की सलाह दी थी. इनका कहना था कि भारत की कई विमानन कंपनियों में सदी की इस सबसे बड़ी महामारी को झेलने की कुव्वत नहीं है इसलिए सरकार को इनका सहयोग करना चाहिए. उस समय 290 एयरलाइंस कंपनियों के वैश्विक संगठन अंतरराष्ट्रीय हवाई परिवहन संघ (आईएटीए) ने अपने एक आकलन में कोरोना वायरस के कारण भारत के विमानन और उससे जुड़े क्षेत्रों में भारी भरकम नुकसान की बात कही थी.

आईएटीए में कॉरपोरेट कम्युनिकेशंस (एशिया पैसिफिक) के सहायक निदेशक अल्बर्ट तोजेंग का कहना था कि ‘लॉकडाउन से पैदा हुईं स्थितियों से भारतीय एयरलाइन कंपनियों के यात्री सेवा राजस्व में आठ अरब डॉलर से अधिक की गिरावट दर्ज होने की संभावना है. इसके चलते भारतीय एविएशन सेक्टर में 20 लाख से अधिक नौकरियों पर खतरा है. इसमें वे क्षेत्र भी शामिल हैं, जो विमानन पर निर्भर हैं.’ अल्बर्ट ने मोदी सरकार से गुहार लगाते हुए यह भी कहा था कि इस समय भारत सरकार को एयरलाइंस कंपनियों की आर्थिक मदद करनी चाहिए, ताकि इस मुश्किल वक्त से कंपनियां बाहर निकल सकें.

कई जानकारों ने रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के आंकड़ों का हवाला देते हुए भी सरकार से विमानन क्षेत्र की ओर ध्यान देने को कहा. क्रिसिल के आंकड़ों के अनुसार भारतीय विमानन उद्योग को इस वित्त वर्ष में 24,000-25,000 करोड़ रुपये का घाटा. इसमें एयरलाइंस के घाटे की हिस्सेदारी 70 फीसदी से अधिक यानी करीब 17000 करोड़ रुपये होगी. बाकी का नुकसान एयरपोर्ट ऑपरेटर्स और एयरपोर्ट रिटेलर्स को उठाना पड़ेगा.

दमानिया एयरवेज, किंगफिशर एयरलाइंस और एयर सहारा के बोर्ड में रह चुके विमानन मामलों के जानकार परवेज़ दमानिया भी सरकारी मदद की तत्काल जरूरत बताते हैं. उनके मुताबिक सरकार को इसलिए भी विमानन क्षेत्र की मदद करनी चाहिए क्योंकि यह उद्योग देश की जीडीपी में हर साल 70 अरब डॉलर से ज्यादा का योगदान देता है. साथ ही भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा और चार साल से दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाला विमानन बाजार भी है. 2019 में भारतीय विमानन बाजार लगातार चौथे साल 18.6 फीसदी की दर से बढ़ा था.

दमानिया यह भी कहते हैं कि ‘यह सेक्टर पहले से ही घाटे में है और दो महीने के लंबे बंद ने अधिकांश एयरलाइंस की जमा पूंजी को खत्म कर दिया है. अभी आगे जल्द स्थिति सही होने वाली नहीं है… जमीन पर खड़े एयरक्राफ्ट के मेंटिनेंस में बहुत अधिक लागत आती है और यह तब किसी भी एयरलाइन कंपनी को बरबादी के मुंह में धकेलने के लिए काफी है, जब उसका राजस्व शून्य हो.’

सरकार विमानन कंपनियों की किस तरह से मदद कर सकती है

विमानन उद्योग से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा जारी किए गए आंकड़ों को देखें तो भारतीय घरेलू विमानन उद्योग लगातार दुनिया में सबसे तेजी से आगे बढ़ तो रहा है लेकिन यहां की अधिकांश विमानन कंपनियां काफी अरसे से घाटे में ही चल रही हैं. इसकी वजह ज्यादा खर्च (ऑपरेशनल कॉस्ट) को माना जाता है. विमानन कंपनियों के लिए अन्य देशों की तुलना में भारत में यह दोगुने से भी ज्यादा बैठती है. जानकार कहते हैं कि विमानन कंपनियों का भारत में खर्चा ज्यादा होने के पीछे की सबसे बड़ी वजह यहां ईंधन का महंगा होना है. भारत में विमानों के ईंधन पर इतना ज्यादा टैक्स है कि कंपनियों के कुल खर्च का करीब 50 फीसदी तक ईंधन पर ही खर्च हो जाता है. जबकि अन्य देशों में विमानन कंपनियों को अपने कुल खर्च का केवल 15 से 20 फीसदी ही ईंधन पर खर्च करना पड़ता है. ईंधन के बाद बड़े खर्चों में एयरपोर्ट का किराया और विमानों का मेंटेनेंस आता है.

ज्यादातर जानकार सरकार से ईंधन पर टैक्स और एयरपोर्ट किराए को तुरंत कम करने की मांग कर रहे हैं. विमानन मामलों के जाने-माने विशेषज्ञ हर्ष वर्धन कहते हैं, ‘भारत में ऑपरेशनल कॉस्ट यानी खर्चा एक बड़ा मुद्दा है, अन्य देशों में तेल (ईंधन) की कीमत 20 डॉलर से शुरू होती है जबकि भारत में यह 110 डॉलर के करीब है… सरकार की प्राथमिकता विमानन कंपनियों के खर्च को कम करना होना चाहिए, अगर सरकार ईंधन की कीमत कम करती है तो निश्चित तौर पर भारतीय विमानन कंपनियां अच्छी स्थिति में आ जाएंगी.’ हर्ष वर्धन के मुताबिक ‘विमानन कंपनियों के पास इस समय नकदी की कमी है, जो इस समय एक और बड़ी समस्या है… इसलिए मेरा मानना है कि इस समय सरकार को देश और विमानन कंपनियों की खातिर (विमानन कंपनियों से होने वाले) अपने फायदे को छोड़ देना चाहिए.’

परवेज दमानिया कहते हैं, ‘ईंधन सस्ता करने के साथ-साथ सरकार को सभी वित्तीय संस्थानों को यह आदेश देना चाहिए कि वे किसी भी विमानन कंपनी को दिए गए लोन पर अगले 12 महीनों तक ब्याज न वसूलें. इसके अलावा अगले एक वर्ष के लिए निजी विमानन कंपनियों को हवाई अड्डों पर स्पेस किराया, लैंडिंग, पार्किंग, मार्ग नेविगेशन और रूट टर्मिनल शुल्क से छूट मिलनी चाहिए.’

उद्योग मंडल फिक्की ने भी सरकार से घरेलू विमानन उद्योग के लिए राहत पैकेज की मांग की है. फिक्की ने सरकार से घरेलू विमानन उद्योग को नकद सहायता, ब्याज मुक्त सस्ता कर्ज और दो साल तक टैक्स में छूट देने की मांग की है. फिक्की की विमानन समिति के चेयरमैन आनंद स्टैनली ने सरकार को लिखे एक पत्र में कहा है, ‘विमानन क्षेत्र को छह माह तक मियादी ऋण भुगतान से छूट, पेट्रोलियम विपणन कंपनियों की ओर से 180 दिन की ऋण सुविधा और विमान के बीमा प्रीमियम की छूट भी दी जानी चाहिए.’

सरकार ने अब तक राहत के क्या ऐलान किए और वे कितने कारगर?

अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और फ्रांस सहित तमाम देशों की सरकारों ने अपने यहां की विमानन कंपनियों को कोरोना वायरस की मार से बचाने के लिए आर्थिक पैकेज की घोषणा की है. दुनिया भर में सरकारें विमानन कंपनियों को डूबने से बचाने के लिए अब तक 123 अरब डॉलर के फंड का ऐलान कर चुकी हैं. इसमें से 26 अरब डॉलर के आर्थिक पैकेज की घोषणा एशियाई देशों ने ही की है. लेकिन भारत सरकार ने अभी तक विमानन कंपनियों के लिए किसी तरह के आर्थिक पैकेज का ऐलान नहीं किया है.

बीते मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना संकट से देश की अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए ‘बीस लाख करोड़ रुपए’ के राहत पैकेज का ऐलान किया था. उस समय विमानन उद्योग को लगा कि इसमें से कुछ हिस्सा उसे भी मिलेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. ऐसा भी नहीं है कि भारत सरकार ने इस पैकेज में विमानन कंपनियों को राहत देने के लिए कोई घोषणा नहीं की हैं. लेकिन जानकारों का मानना है कि इनसे फौरी तौर पर विमानन कंपनियों को कोई ऐसी बड़ी राहत नहीं मिलती दिखाई दे रही है जिसकी इस समय उन्हें सख्त जरूरत है. सरकार ने जो तीन प्रमुख घोषणाएं की हैं, उनमें एयर स्पेस मैनेजमेंट, पीपीपी मॉडल के जरिये हवाई अड्डों का निर्माण और भारत को एमआरओ (मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल) हब बनाना शामिल है.

एयर स्पेस मैनेजमेंट के तहत उड़ानों के लिए छोटे हवाई रास्तों का इस्तेमाल करने की बात कही गयी है जिनसे उड़ान गंतव्य तक कम समय में पहुंच जाए, इससे ईंधन की बचत होगी और विमानन कंपनियों का खर्च कम होगा. सरकार की दूसरी घोषणा पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के जरिये विश्व स्तर के हवाई अड्डे बनाने पर ध्यान केंद्रित करने की है. सरकार का मानना है कि बोली लगाकर निजी कंपनियों को निर्माण का काम सौंपा जायेगा जिससे आर्थिक फायदा होगा और रोजगार सृजन में भी मदद मिलेगी.

सरकार की तीसरी घोषणा भारत को विमानों के एमआरओ के लिए एक वैश्विक केंद्र बनाने की है. सरकार का मानना है कि इससे भारतीय विमानन कंपनियों का विमानों के रखरखाव में होने वाला खर्च कम हो जाएगा क्योंकि फिर उन्हें विमानों को रिपयरिंग और मरम्मत के लिए विदेश नहीं भेजना पड़ेगा. सरकार का यह भी मानना है कि भारत के एमआरओ हब बनने के बाद देश में विदेशी निवेश आएगा और इससे रोजगार सृजन में भी मदद मिलेगी.

क्यों सरकार विमानन कंपनियों को सीधे वित्तीय मदद देने से कतरा रही है?

भारत सरकार ने कंपनियों को जिस तरह से राहत देने की घोषणा की है, उसने कई लोगों को हैरान किया है. अंतरराष्ट्रीय हवाई परिवहन संघ (आईएटीए) के महानिदेशक अलेक्जेंडर डी जुनिएक के मुताबिक भारत सरकार ने जो घोषणाएं की हैं उनसे यहां की विमानन कंपनियों को वह मदद नहीं मिलेगी जिसकी उन्हें जरूरत है. अलेक्जेंडर ने भारत सरकार को सुझाव दिया है कि वह जल्द से जल्द कोई ऐसी योजना लेकर आए जिससे विमानन कंपनियों को सीधे वित्तीय मदद मिले, न कि उन पर कर्ज और बढ़ जाए.

बहरहाल, इन सबके बीच यह सवाल उठता है कि आखिर भारत सरकार विमानन कंपनियों को किसी तरह की वित्तीय मदद देने से कतरा क्यों रही है? कुछ अधिकारी इसके पीछे की वजह विमानन कंपनियों में तमाम अनियमितताओं को बताते हैं जिसके चलते सरकार को इन पर भरोसा नहीं हो पा रहा है. ये अधिकारी कहते हैं कि पहले किंगफिशर और फिर जेट एयरवेज जैसी कंपनी में जो हुआ उसने सरकार और कंपनियों के बीच के विश्वास को हिला कर रख दिया है. एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी बिजनेस स्टैंडर्ड से बातचीत में कहते हैं, ‘आप इन दोनों कंपनियों पर गौर कीजिये, दोनों ही दिवालिया हो गयीं, लेकिन इनके मालिकों के पास पैसे की कोई कमी नहीं हुई है.’ कुछ जानकारों की माने तो सरकार को लगता है कि निजी विमानन कंपनियों का काम करने का तरीका जिस तरह का है, उसमें उन्हें वित्तीय मदद देने से कोई सकारात्मक नतीजे सामने आने वाले नहीं हैं.

नागर विमानन महानिदेशक (डीजीसीए) के एक वरिष्ठ अधिकारी भी एक समाचार पत्र को कुछ ऐसा ही बताते हैं. नाम न छापने की शर्त पर वे कहते हैं कि लगभग सभी विमानन कंपनियों की संचालन और प्रबंधन में गड़बड़ी है और इनमें पारदर्शिता का अभाव है. इसी के चलते जेट एयरवेज डूब गयी. वे आगे कहते हैं, ‘स्पाइस जेट और गो एयर जैसी कंपनियों के बोर्ड और मैनेजमेंट की स्थिति काफी दयनीय है. हालत यह है कि बहुत कम कंपनियों ने ही अपने बोर्ड सदस्यों के नाम सार्वजनिक किये हैं.’ अधिकारियों के मुताबिक विमानन कंपनियों की ऐसी स्थिति को देखते हुए सरकार का इन्हें बड़ा वित्तीय पैकेज देने से कतराना स्वाभाविक है.

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