एपल और सैमसंग

अर्थ जगत | कारोवॉर

क्या एपल से मुकाबले में सैमसंग की रणनीति ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ जैसी है?

स्मार्टफोन बाजार पर प्रभुत्व को लेकर बीते कुछ समय से सैमसंग और एपल के बीच गलाकाट होड़ चल रही है

अनुराग भारद्वाज | 21 नवंबर 2017

यह बात चार अगस्त, 2010 की है. सैमसंग के सियोल स्थित दफ़्तर में एपल के कुछ अधिकारी धड़धड़ाते हुए पहुंचे. शफ्फाक़ शीशे की 44 मंज़िला बिल्डिंग में बना सैमसंग का दफ्तर दक्षिण कोरिया के इस औद्योगिक शहर की शान है. मीटिंग का मुद्दा पहले से ही तय था, पर उस दिन के बाद जो हुआ वह स्मार्टफोन व्यापार के इतिहास में अनदेखा और अनसुना युद्ध था-एक ऐसा कारोवॉर जिसमें दोनों कंपनियों को खासा नुकसान उठाना पड़ा.

किस्सा आगे बढाने से पहले फ्लैशबैक में चलते हैं और देखते हैं कि आख़िर ऐसा क्या हुआ कि एपल के अधिकारियों को अपने कैलिफोर्निया वाले दफ़्तर से सीधे सियोल आना पड़ गया?

मार्च, 2010 में सैमसंग ने ‘गैलेक्सी एस’ श्रृंखला का नया स्मार्टफ़ोन बाज़ार में उतारा था. एपल की कोर टीम ने जब इस फ़ोन को देखा तो उन्हें यकीन नहीं हुआ. उन्हें वह हुबहू आई फ़ोन की नक़ल लग रहा था! डिब्बे से लेकर उसके फ़ीचर्स, आइकॉन और रबर बैंडिंग जैसे एपल के कुछ पेटेंटेड उत्पाद तक सैमसंग ने नक़ल करके गैलेक्सी में दे दिए थे. एपल के स्टीव जॉब्स और टिम कुक हैरान रह गए. आख़िरकार उन्होंने इतने बरस आई फ़ोन की तकनीक विकसित करने में बिताए थे और किसी ने बड़ी आसानी से उसकी नक़ल कर ली थी!

जुलाई में स्टीव ने सैमसंग के प्रेसिडेंट जे वाई ली से जब इस बारे में बात की तो उन्हें कोई भरोसेमंद जवाब नहीं मिला. लिहाज़ा अगले महीने, यानी अगस्त में एपल की टीम सिओल जा पहुंची.

तब एपल ने महज़ कुछ डॉलर मांगे थे

एपल और सैमसंग उस वक़्त के बिज़नेस पार्टनर भी थे. सैमसंग के कुछ पेटेंट एपल भी इस्तेमाल करती थी और इसके लिए तयशुदा रकम भी साझा करती थी. लिहाज़ा, एपल नहीं चाहती थी कि वह सैमसंग से कोई रार ठाने. मीटिंग की शुरुआत ठीक ठाक रही पर कुछ देर के बाद एपल के अधिकारियों ने सैमसंग की टीम से कहा कि उन्होंने अपने स्मार्टफोन और टैब में एपल के पेटेंटेड उत्पाद चुराए हैं और इसके लिए उन्हें कंपनी एक निश्चित राशि दे. प्रति फ़ोन 30 और प्रति टैब 40 डॉलर.

सैमसंग के अधिकारियों ने इस बात को सिरे से नकार दिया. उन्होंने दलील दी कि वे ख़ुद एक बहुत बड़े हैंडसेट निर्माता हैं लिहाजा ऐसा नहीं कर सकते. उनका यह भी कहना था कि यह महज़ इत्तेफ़ाक भी हो सकता है क्योंकि उनके पास भी प्रोडक्ट डेवलपमेंट एंड रिसर्च टीम है और क्या यह संभव नहीं कि एपल ने उनकी नक़ल की हो.

एपल की टीम भौचक्की रह गयी! ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’, वाली कहावत हो गई थी उसके साथ. एपल के अधिकारी समझ गए थे कि उनका सियोल आना बेकार हो गया. अब क़ानूनी लड़ाई ही एकमात्र सहारा बचा था.

सैमसंग पर ‘कट-कॉपी-पेस्ट’ की रणनीति के आरोप

अमेरिकी पत्रकार और मैगज़ीन ‘न्यूज़वीक’ के वरिष्ठ लेखक कुर्त आइकनवल्ड लिखते हैं कि सैमसंग के लिए यह नई बात नहीं है. उनके मुताबिक यह कंपनी की सोची साझी साज़िश है. सैमसंग किसी कंपनी का उत्पाद उठा लेती है, बाजार में उतार देती है और जब वह कंपनी विरोध करती है तो सैमसंग उल्टा विरोध करके मामले को और पेचीदा बना देती है. मामला क़ानूनी दांवपेंच में फस जाता है और जब सैमसंग हार जाती है तो वह पुनर्विचार याचिका दायर करके मामले को अंतहीन बना देती है. अंततः जब तक सैमसंग केस हारने के कगार पर आती है तो वह कुछ हर्ज़ाना देकर कोर्ट के बाहर उस कंपनी से सुलह कर लेती है. तब तक काफ़ी देर हो चुकी होती है. आइकनवल्ड के मुताबिक उसका उत्पाद बाज़ार में अपनी जगह बना लेता है और दूसरी कंपनी केस जीतकर भी हार जाती है.

कहते हैं कि सैमसंग ने जापानी कंपनी शार्प के साथ कुछ ऐसा ही किया था. शार्प ने फ्लैट स्क्रीन वाले टेलीविज़न में नयी तकनीक विकसित की थी. उसके उत्पाद की नक़ल कर सैमसंग ने अपने फ्लैट स्क्रीन टीवी बाज़ार में उतार दिए. शार्प कारपोरेशन ने 2007 में मुकदमा दायर किया. 2009 में फ़ैसला आने तक सैमसंग ने लगभग 20 फीसदी बाज़ार हथिया लिया था. वहीं शार्प महज़ पांच फीसदी बाज़ार पर ही पकड़ बना पायी था.

नकल और कारण

इस बात को समझने के लिए आपको कुछ और पीछे चलना होगा और नोकिया को समझना होगा. एक दौर था जब मोबाइल हैंडसेट का मतलब नोकिया होता था. मोटोरोला, सैमसंग, एलजी, पैनासॉनिक आदि सभी कंपनियां सब नोकिया की ओर तकती थीं. दुनिया भर में नोकिया का प्रभुत्व था. जब हैंडसेट की लडाई सिमटकर महज़ दो या तीन कंपनियों तक रह गयी, तो नोकिया और सैमसंग आमने-सामने हो गए. नोकिया सैमसंग से कहीं आगे थी. लिहाज़ा सैमसंग नोकिया को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति बनाती. जब एपल के स्मार्टफ़ोन लोगों की पसंद बनने लगे तो सैमसंग दुविधा में पड़ गई क्योंकि उसके स्मार्टफोन कोई लेने वाला नहीं था. बस फिर क्या था. जानकारों के मुताबिक सैमसंग अपने पुराने रंग में लौट आई और उसने रात-दिन एक करके ‘अपना आईफ़ोन’ बाज़ार में उतार दिया. कंप्यूटर की भाषा में कहते हैं न ‘कट, कॉपी और पेस्ट.’

पहली क़ानूनी लड़ाई से लेकर अब तक

अप्रैल, 2011 में एपल ने सैमसंग पर अपने उत्पादों की नक़ल का मुकदमा दायर कर दिया. महज़ कुछ ही दिनों में सैमसंग ने पलटवार करते हुए एपल पर जापान, जर्मनी और दक्षिण कोरिया की अदालतों में चोरी का इल्ज़ाम लगा दिया. इसको देखते हुए एपल ने भी विदेशी अदालतों में सैमसंग पर उसके आई पैड के डिजाइन की चोरी का केस दायर कर दिया.

कैलिफ़ोर्निया के कोर्ट में जज लूसी कोह ने एपल और सैमसंग की दलीलें सुनीं और सैमसंग पर 100 करोड़ अमेरिकी डॉलर का जुर्माना ठोक दिया. इससे पहले सैमसंग के वकील चार्ल्स वेर्होएवन ने अपनी दलील में कहा था, ‘इसमें क्या ग़लत है कि आप प्रतिद्वंदी से प्रभावित होते हैं?’ सैमसंग ने अपनी रणनीति के तहत, जुर्माना राशि पर पुनर्विचार याचिका दायर कर दी. अपील में कहा गया कि सैमसंग को गैलेक्सी एस से हुए मुनाफे के आधार पर जुर्माना राशि का आकलन करना न्यायोचित नहीं है क्योंकि कि अगर यह भी मान लिया जाए कि उसने एपल के पेटेंटों का इस्तेमाल किया है तो सिर्फ इस्तेमाल किए गए पेटेंट का ही जुर्माना लिया जाए! बाद में जुर्माना राशि घटाकर लगभग 55 करोड़ डॉलर कर दी गई. जुर्माने के साथ-साथ सैमसंग को गैलेक्सी में कुछ बदलाव करने का भी आदेश दिया गया.

जब एपल ने माना कि सैमसंग ने कॉपी नहीं की

उधर, ऐसा नहीं है कि सैमसंग पूरी तरह से दोषी ठहराई गई थी. जुलाई 2012 में लंदन के एक कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि सैमसंग का गैलेक्सी टैब एपल की नक़ल नहीं है क्योंकि गैलेक्सी टैब एपल के आई पैड जैसा बढ़िया डिवाइस नहीं है. दिसम्बर 2012 में जज लूसी कोह ने एपल की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उसने अमेरिका में सैमसंग की गैलेक्सी रेंज को बेचे जाने पर रोक की गुहार लगायी थी. अमेरिकी संस्था ‘इंटरनेशनल ट्रेड कमीशन’ ने माना कि आईपैड बनाने में सैमसंग के पेटेंट किए हुए उत्पाद इस्तेमाल में लाए गए हैं.

एपल ने एक के एक बाद एक केस दायर किए

2013 और 2014 में एपल ने सैमसंग पर कई केस दायर किए जिनमें से ज़्यादातर फ़ैसले उसके हक़ में हुए. पिछले महीने अक्टूबर में जज लूसी कोह ने मई 2018 में फिर सुनवाई का फ़ैसला दिया है. हालांकि, एपल का दावा मज़बूत ही है पर अभी तक उसके हाथ जुर्माने की रक़म नहीं आई है. अंत में एपल के हाथ क्या लगता है यह कहना थोड़ा मुश्किल है पर अमेरिकी पत्रकार और मैगज़ीन ‘न्यूज़वीक’ के वरिष्ठ लेखक कुर्त आइकनवल्ड की बात सही प्रतीत होती नज़र आ रही है. एपल केस जीत भी जाए लेकिन तब तक सैमसंग काफ़ी कुछ हासिल कर चुका होगी.

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