नोकिया सैमसंग

अर्थ जगत | कारोवॉर

नोकिया, जो सैमसंग से नहीं ख़ुद से हार गई

आज से लगभग एक दशक पहले मोबाइल बाजार में 40 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाली नोकिया हर मोर्चे पर बदलती हवा का रुख भांपने में नाकाम रही

अनुराग भारद्वाज | 22 फरवरी 2018

बहुत पुरानी बात नहीं है. 2011 में विक पॉल के एक ट्वीट ने सिलिकॉन इंडस्ट्री में हलचल मचा दी. इस ट्वीट में कहा गया था, ‘टू टर्की डोंट मेक एन ईगल’. हिंदी में कहें तो, ‘कभी-कभी एक और एक ग्यारह नहीं होते’. आप सोच रहे होंगे यह कौन शख्स है? जनाब, ये हैं एक मशहूर सॉफ्टवेयर इंजीनियर. आपका अगला प्रश्न होगा ‘ये ट्वीट क्यों?’ तो साहब, यह ट्वीट दुनिया की दो बड़ी कंपनियों के साथ न आ पाने पर किया गया था. अगला प्रश्न आपका यही है न कि वे कौन सी कंपनियां थीं?’ जवाब है- ‘नोकिया’ और ‘गूगल’. इसके पहले आप और पूछें, मैं बता दूं कि विक पॉल माइक्रोसॉफ्ट और गूगल में काम कर चुके थे. अब आगे बढ़ते हैं.

दरअसल उस समय नोकिया और गूगल के अधिकारियों के बीच एक बैठक हुई थी. गूगल चाहता था कि नोकिया उसके एंड्राइड प्लेटफार्म को आधार बनाकर स्मार्टफोन बनाये. अब जो सबसे अहम बात आपके ज़ेहन में आ रही है कि मीटिंग का परिणाम क्या रहा? तो बता दें कि मीटिंग असफल रही थी. पर, जो बात आपने नहीं पूछी वह बात यह है कि विक पॉल का पूरा नाम है विवेक पॉल गुन्दोत्रा. वे भारतीय अमेरिकी हैं. यह शख्स इस किस्से में अहम नहीं है, अहम है तो वह असफल मीटिंग. फिर उसके बाद जो हुआ वह टेलिकॉम के इतिहास का सबसे बड़ा उलटफेर था.

2012 में सैमसंग ने नोकिया की बादशाहत महज 10 साल ही में ही ख़त्म कर दी थी. आख़िर नोकिया से ग़लती कहां हुई और सैमसंग ने कहां आकर बाज़ी मार ली? आइये देखते हैं.

नोकिया का बदलाव की हवा महसूस न कर पाना

फ़िनलैंड को नोकिया कंपनी का अहसान मानना चाहिए कि एक समय पर उसके कुल सकल घरेलू उत्पाद में चार फीसदी नोकिया की भागेदारी थी. नोकिया जब फीचर फ़ोन की दुनिया में नंबर एक था, तो स्थानीय बाज़ारों की ज़रूरतें बदल रही थीं. मसलन, हिंदुस्तान में मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियों के बीच मचे घमसान से कॉल दरें ज़मीन पर आ गयी थीं, ऐसे में लोगों के लिए दो सिम रखना सुलभ हो गया. इससे दो सिम वाले हैंडसेट का नया बाज़ार खड़ा हो गया. चीनी कंपनियां इस बदलाव को भांप गयी थीं और 2006 तक आते आते उनके दो सिम वाले हैंडसेट बाज़ार में धूम मचा रहे थे.

नोकिया ने इस ज़रूरत को ही नकार दिया. उसने काफ़ी अरसे तक एक सिम वाले हैंडसेटों से ही बाज़ार चलाने की कोशिश की. पर जब ज़मीन खिसकती दिखी तो उसने 2010 में जाकर पहला दो सिम वाला हैंडसेट जारी किया. इसके जारी होने के आठ महीने के भीतर ही नोकिया दो सिम बनाने वाली सबसे बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी बन चुकी थी. तब इसका ज़ोर शोर से प्रचार भी किया गया कि देखिये नोकिया, देर से ही सही, जब भी जो कुछ करती है, उसमें नंबर एक बन जाती है.

पर यह पहला झटका था. बाद में नोकिया का यह अतिआत्मविश्वास ही उसे ले डूबा. क्योंकि इस बदलाव में फिर भी कुछ समय लगा. बाकी तो इतनी जल्दी हुए कि किसी भी कंपनी को सांस लेने की मोहलत नहीं मिली. सैमसंग तो संभल गयी, नोकिया औंधे मुंह गिर पड़ी.

एक समय पर नोकिया इंडिया के हेड रहे डी शिवकुमार ने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘नोकिया जैसी बड़ी कंपनी के लिए स्थानीय बाज़ारों के हिसाब से बदलना अक्सर मुश्किल होता है’. यह बात सही भी है पर भारत के बाज़ार को ‘स्थानीय’ बाज़ार मानना नोकिया की भूल थी. महज़ 10 सालों में भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल का बाज़ार बन गया है.

अपने नीचे स्टाफ की न सुनना

1965 और 1999 में कारगिल में घुसपैठ की सबसे पहली ख़बर देने वाले कुछ गड़रिये थे. कहते हैं कि 1965 में तो इस जानकारी पर तुरंत फौजी कार्रवाई हो गयी थी पर 1999 में देर लगी.

किसी भी संस्था के आंख और कान उसका फील्ड स्टाफ होता है. अकसर बड़ी कंपनियां इस हकीक़त से दूर हो जाती हैं. वह पहली खबर, मार्केट की खुफिया जानकारी, प्रतिद्वंदी का अगला कदम, सब फील्ड स्टाफ़ की मदद से मालूम किया जाता है. नोकिया कंपनी के भूतपूर्व सीईओ जोरमा ओल्लिला ने एक इंटरव्यू में माना था कि नीचे से आ रही आवाज़ों को वे सुन नहीं पाए और कंपनी अगले एक या डेढ़ साल के प्लान पर काम करती रही.

वहीं सैमसंग के साथ ऐसा नहीं था. उसने भांप लिया था कि आने वाले समय में हैंडसेट सिर्फ कॉल करने या सुनने की मशीन न रहकर सौ तालों की एक चाबी बनने जा रहा है. उसने ज़रूरी बदलाव कर लिए.

एंड्राइड बनाम माइक्रोसॉफ्ट

नोकिया और गूगल की मुलाकात तो हुई थी, जैसा ऊपर लिखा गया है, पर बात नहीं बनी. तब कंपनी के सीईओ स्टीफ़न ईलोप ने एंड्राइड के बनिस्बत माइक्रोसॉफ्ट के विंडोज प्लेटफार्म को नोकिया फ़ोन का ऑपरेटिंग सिस्टम चुना और कई मीटिंगों में अपने निर्णय को सही ठहराया. उधर सैमसंग और गूगल मिल गए और बाज़ार एंड्राइड के ओपन प्लेटफार्म होने की वजह से एकतरफ़ झुक गया.

बाद में एक इंटरव्यू में स्टीफ़न ईलोप ने कहा कि सैमसंग एंड्राइड के साथ क़रार करके काफी आगे निकल चुका था. उन्हें डर था कि अगर नोकिया ने भी एंड्राइड चुना तो सैमसंग का प्रभुत्व उसे पनपने नहीं देगा. यानी वे पहले ही हार मान चुके थे.

नोकिया की स्मार्टफोन उतारने में देरी जो सैमसंग के काम आई

एंड्रू ग्रोव ने अपनी किताब ‘ओनली दा पैरानॉयड सर्वाइव’ यानी ‘सिर्फ पागल ही बचेंगे’ में लिखा है कि अगर कंपनियों को आगे तक जाना है तो उन्हें अपने उत्पादों में निरंतर बदलाव लाने होंगे. पागलपन की हद सोचना होगा और उत्पाद के चरम को समझ कर वहां बदलाव करना होगा, वरना असफलता निश्चित है. नोकिया ने सब कुछ किया, बस जैसा ग्रोव कहते हैं, वैसा नहीं किया. उसने स्मार्टफोन उतारने में देर की. वहीं सैमसंग ने गैलेक्सी सीरीज़ से बाज़ार में धमाका कर दिया. नोकिया के असफल होने को आप इन आंकड़ों से भी समझ सकते हैं.

2010 में नोकिया कुल हैंडसेट्स का 24 फीसदी स्मार्टफोन बना रहा था और हैरत की बात यह है कि यहीं आंकड़ा 2012 में बढ़ने की बजाए घटकर महज़ 10 फीसदी रह गया था. वहीं सैमसंग 2010 में सिर्फ 10 फीसदी स्मार्टफोन बना रहा था और 2012 स्मार्टफोन का हिस्सा बढ़कर 50 फीसदी हो गया था.

सैमसंग का नायाब डिस्ट्रीब्यूशन और प्रमोटर मॉडल

जब सैमसंग ने गैलेक्सी स्मार्टफ़ोन सीरीज़ शुरू की तो ग्राहकों को स्मार्टफोन के फ़ीचर्स, ऑपरेटिंग सिस्टम और उसकी एप्लीकेशंस के बारे में कम जानकारी थी. इसके लिए सैमसंग ने दुकानदारों के यहां खास प्रमोटर्स लगाये जो ग्राहकों को स्मार्टफोन्स से रूबरू करवाते. यह एकदम नया प्रयोग था.

दुकानदारों के लिए यह बड़ी आश्चर्य की बात थी. उन्हें इतनी तवज्जो तब तक किसी भी कंपनी ने नहीं दी थी. यह उनके यहां पर उनके लिए एक सेल्समैन नियुक्त करने वाली बात थी जो सारी सरदर्दी लेता और कमाकर भी देता. अन्य कंपनियां, जैसे नोकिया, इस पर बिलकुल भी प्रतिक्रिया नहीं दे पाईं.

दूसरी तरफ, नोकिया के डिस्ट्रीब्यूटर्स कंपनी को एंड्राइड से टक्कर देने के लिए नयी सीरीज़ उतारने की गुहार लगा रहे थे, लेकिन कंपनी इन्हें नाकारा मान रही थी. और एक दिन नोकिया ने अपना डिस्ट्रीब्यूशन मॉडल ही बदल दिया. वह बड़े डिस्ट्रीब्यूटर्स के बजाए छोटे-छोटे डिस्ट्रीब्यूटर्स बनाने लग गयी. इसके चलते बड़े डिस्ट्रीब्यूटर्स सैमसंग के पाले में चले गए. उनके पास स्मार्टफोन में निवेश करने के लिए पूंजी थी. यह सैमसंग के काम आ गयी. तब नोकिया का एक फ़ोन बेच कर कोई दुकानदार बमुश्किल 30 रुपये कमाता था. उधर, सैमसंग ज़्यादा मार्जिन दे रहा था. नोकिया ढेर हो गई.

चलते-चलते

कारोबार में किसी की बादशाहत लंबे समय तक क़ायम तभी रहती है जब कि कंपनी ख़ुद में अपने उत्पादों में समयानुसार परिवर्तन करने का साहस हो. हालांकि, यह कोई सफलता की निश्चित गारंटी नहीं है. मोबाइल हैंडसेट के बाज़ार में तो बिलकुल भी नहीं, स्थानीय कारक भी बहुत अहम भूमिका निभाते हैं. कई बार चीजों के होने का एक तरीका होता है और बहुत बार ऐसा नहीं भी होता.

कहते हैं कि हुए नामवर बेनिशां कैसे-कैसे, जमीं खा गई आसमा कैसे-कैसे . नोकिया से लेकर शार्प और जीरॉक्स तक कई नामों का किस्सा कुछ ऐसा ही है. बहरहाल, हिंदुस्तान की बात करें तो अभी-अभी शाओमी ने सैमसंग को पछाड़ दिया है. एक नयी कहानी उग रही है. एक नयी दास्तां बनने को है.

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