विरोध प्रदर्शन

राजनीति | सोशल मीडिया

क्या बीजेपी की आईटी सेल अपना असर खोने लगी है?

सोशल मीडिया पर हर तरह के जोड़-तोड़ के लिए मशहूर बीजेपी की आईटी सेल इस समय वहां पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ही बचाव नहीं कर पा रही है

अंजलि मिश्रा | 19 सितंबर 2020 | फोटो: ट्विटर

साल 2014 में आकाशवाणी पर शुरू हुआ ‘मन की बात’ एक लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम है जिसे खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी होस्ट करते हैं. हर महीने के आखिरी इतवार को प्रसारित किए जाने वाले इस कार्यक्रम में पीएम मोदी, राजनीति और सरकार से जुड़े मुद्दों से इतर बातचीत करते हैं. इसे न सिर्फ उनके समर्थक और आलोचक काफी ध्यान से सुनते रहे हैं बल्कि इसमें कही गई बातें कई दिनों तक मीडिया और सोशल मीडिया पर सुर्खियों का हिस्सा बनी रहती हैं. इसका ताजा (68वां) एपिसोड बीते अगस्त की 30 तारीख को प्रसारित हुआ था. लेकिन इस बार मन की बात कार्यक्रम अपने विषय या प्रधानमंत्री के विचारों-सुझावों के चलते नहीं बल्कि किसी और ही वजह से चर्चा का विषय बना. वह वजह थी, यूट्यूब पर मन की बात कार्यक्रम के वीडियो को लाखों की संख्या में डिसलाइक किया जाना.

भारतीय जनता पार्टी के यूट्यूब चैनल से लाइव स्ट्रीम किए गए इस वीडियो पर महज 24 घंटों में सवा पांच लाख से अधिक डिसलाइक आ चुके थे. जबकि तब तक इस पर आए लाइक्स की गिनती महज 79 हजार ही थी. यहां पर चौंकाने वाली बात यह रही कि डिसलाइक्स कैंपेन से अचकचाकर बीजेपी ने अपने इस वीडियो पर लाइक और कॉमेन्ट का ऑप्शन ही कई दिनों के लिए बंद कर दिया. भाजपा के अलावा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के यूट्यूब चैनल पर भी इसे अपलोड किया गया था. इस पर भी महज 13 घंटों में 40 हजार से ज्यादा डिसलाइक्स किए जा चुके थे. इन वीडियोज से जुड़ी ध्यान खींचने वाली बात यह रही कि बीच में डिसलाइक्स की गिनती हजारों की संख्या में कम भी हो गई. ऐसा क्यों और कैसे हुआ, इसका पता अभी तक नहीं चल पाया है. फिलहाल, बीजेपी के चैनल पर प्रतिक्रियाओं के सभी विकल्प खोल दिए गए हैं और वहां मन की बात के वीडियो पर लगभग 12 लाख और नरेंद्र मोदी के चैनल पर दो लाख 86 हजार डिसलाइक्स देखे जा सकते हैं.

मन की बात कार्यक्रम के वीडियो पर आए डिसलाइक

मन की बात कार्यक्रम का वीडियो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ऐसा इकलौता वीडियो नहीं था जिस पर डिसलाइक्स की भरमार रही. हाल ही में वे हैदराबाद में आयोजित राष्ट्रीय पुलिस अकादमी के दीक्षांत परेड समारोह में भी वर्चुअली शामिल हुए थे. इस आयोजन के उनके वीडियो पर भी कुछ इसी तरह की प्रतिक्रिया देखी गई. भारतीय जनता पार्टी के यूट्यूब चैनल पर इस वीडियो को एक दिन पहले ही प्रीमियर कर दिया गया था. यानी जो लाइव वीडियो कुछ घंटे बाद आने वाला था, उसे लोग पहले ही शेयर कर सकते थे या उस पर अपनी प्रतिक्रिया दे सकते थे. यहां पर देखने वाली बात यह रही कि स्ट्रीमिंग के 13 घंटे पहले ही वीडियो पर एक हजार लाइक्स के मुकाबले 11 हजार डिसलाइक्स आ चुके थे. नतीजतन, इस वीडियो पर भी प्रतिक्रियाओं और टिप्पणियों का विकल्प बंद कर दिया गया. वीडियो जारी होने के बाद जब इसे फिर शुरू किया गया तो कुछ ही घंटों में 88 हजार डिसलाइक्स दर्ज हो चुके थे. इसके बाद से रिपोर्ट लिखे जाने तक इस वीडियो पर ये विकल्प डिसेबल ही रखे गए हैं. प्रतिक्रियाओं का यही क्रम प्रधानमंत्री के उस वीडियो पर भी रहा जिसमें वे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और राज्यों के राज्यपालों के साथ नई शिक्षा नीति पर चर्चा करते दिखाई दे रहे थे.

नरेंद्र मोदी के वीडियोज पर एकतरफा प्रतिक्रियाओं की भरमार होना कोई नई बात नहीं है लेकिन इस बार इनका पलड़ा उनके पक्ष में न होना ज़रूर नई और अनोखी बात है. अनोखी इसलिए कि इससे पहले सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री के लिए इस तरह की आलोचनात्मक टिप्पणियां या ट्रेंड्स पहले तो सामने आते नहीं थे और अगर ऐसा होता भी था तो भाजपा की आईटी सेल समय रहते इनमें से ज्यादातर से निपट लेती थी. लेकिन अब वह इस मामले में उतनी प्रभावी नज़र नहीं आ रही है. बीते कुछ हफ्तों से चल रहे छात्रों और युवाओं के सोशल मीडिया अभियान से जुड़ी कई बाते हैं जो इसकी तरफ इशारा करती हैं. इसे चलाने वालों में मेडिकल और इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा (नीट और जेईई) को आगे बढ़ाने की मांग कर रहे छात्र और तमाम बेरोजगार युवा शामिल हैं. इनमें ऐसे लोग भी हैं जो किसी प्रतियोगी परीक्षा की तिथि, किसी के नतीजे या ये सब हो जाने के बाद अपने जॉइनिंग लेटर का इंतज़ार कर रहे हैं.

अगर युवाओं के इस कैंपेन को ध्यान से देखें तो यह बीजेपी की आईटी सेल को उसी की भाषा में जवाब देता दिखाई देता है. उदाहरण के लिए, पीएम मोदी के वीडियो पर आई डिसलाइक्स की यह भरमार पिछले दिनों सड़क-2 के ट्रेलर पर आए रिकॉर्ड डिसलाइक्स से प्रेरित थी. सोशल मीडिया पर सक्रिय और निष्पक्ष मौजूदगी रखने वाले कई लोगों का मानना है कि सड़क-2 के खिलाफ चला यह अभियान बीजेपी आईटी सेल का भी कारनामा था. इन लोगों का मानना था कि असली मुद्दों से ध्यान भटकाने, बिहार और महाराष्ट्र में अपने राजनीतिक हितों को साधने और ऐसा करने में कथित तौर पर भाजपा की मदद करने वालीं कंगना रनोट को मदद करने के उद्देश्य से आईटी सेल इस अभियान में शामिल थी. कैंपेन चला रहे युवा आईटी सेल से उसी के तरीके से निपटने की तैयारी में थे, इसका अंदाजा इस बात से भी लग जाता है कि जब मन की बात वाले वीडियो पर आने वाले डिसलाइक्स को बीजेपी आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय ने तुर्की से आने वाले बॉट्स बताया तो अगले वीडियो में छात्रों ने अपने शहर-कस्बों के नाम लिख भी लिख दिये. कई छात्रों ने व्यंग्य करते हुए अपने शहरों को तुर्की या कनाडा बता डाला.

पुलिस दीक्षांत कार्यक्रम के वीडियो पर आई छात्रों की टिप्पणियां

छात्रों के विरोध प्रदर्शन का अगला चरण बीजेपी आईटी सेल से आगे बढ़कर सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुटकी लेता हुआ भी दिखाई दिया और यहां पर भी आईटी सेल कुछ भी करने में अक्षम ही दिखी. पांच सितंबर को युवाओं ने जहां छात्र कर्फ्यू आयोजित कर पांच बजे पांच मिनट तक थाली बजाई वहीं नौ सितंबर को वे रात 9 बजे 9 मिनट के लिए दिए जलाकर रोजगार की मांग करते दिखाई दिए. युवाओं ने सितंबर के तीसरे हफ्ते को बेरोजगार सप्ताह की तरह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन यानी 17 सितंबर को राष्ट्रीय बेरोजगार दिवस की तरह मनाया. इस दिन सोशल मीडिया पर हैशटैग बेरोजगार सप्ताह और राष्ट्रीय बेरोजगार दिवस के साथ लाखों की संख्या में ट्वीट किए गए. इसके जवाब में अगले दिन आईटी सेल हैशटैग राष्ट्रीय बार डांसर दिवस ट्रेंड करवाती दिखाई तो दी लेकिन तमाम लोगों ने इसे न सिर्फ गैरज़रूरी बल्कि आईटी सेल की खिसियाहट भी कहा.

आईटी सेल के बेअसर दिखने की वजहों पर गौर करें तो पहला कारण यही समझ में आता है कि इस बार उसकी भिड़ंत ऐसे युवाओं से हुई हैं, जो न सिर्फ सोशल मीडिया का हर तरह से इस्तेमाल करना जानते हैं बल्कि इस पर चलने वाले दांव-पेचों से भी भली तरह वाकिफ हैं. वे इसके लिए पीएम मोदी से ही प्रेरित होकर सृजनात्मक तरीकों का सहारा लेते हैं और बिना ज्यादा गाली-गलौज या भद्दी भाषा का प्रयोग किए आईटी सेल के हमलों का मुंहतोड़ जवाब भी देते हैं. वे अपने अभियान को राजनीतिक रंग देने की कोशिश करने वालों से भी बचते दिखते हैं. इसके अलावा, प्रधानमंत्री तक अपनी अलग-अलग मांगें पहुंचाने की कोशिश कर रहे इन युवाओं की संख्या भी लाखों में है. आईटी सेल और उसके सहयोगी समूहों को मिलाकर भी इसके सदस्यों की संख्या अधिकतम कुछ हजार ही बैठेगी. ऐसे में सेल के लिए इन युवाओं की आवाज़ को किसी जवाबी हैशटैग या ट्रोल्स के जरिये दबा पाना मुश्किल हो रहा है.

यह बात भी ध्यान देने लायक है कि रोजगार की मांग कर रहे इन युवाओं में एक बड़ी संख्या उनकी भी होगी जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट दिया था या अब तक उनका समर्थन करते रहे थे. आम तौर पर सोशल मीडिया पर आईटी सेल द्वारा चलाए जाने वाले किसी प्रोपगैंडा कैंपेन को युवा वर्ग का समर्थन भी हासिल रहा करता था जिसके चलते उनके ट्वीट या ट्रेंड्स बड़े-बड़े आंकड़े हासिल करते दिखाई पड़ते थे. लेकिन न केवल युवा इस समय आईटीसेल के प्रोपगैंडा को कम समर्थन दे रहे हैं बल्कि अन्य लोगों द्वारा उसे मिलने वाला समर्थन भी इन दिनों कम हो गया लगता है.

‘आम दिनों में, आम यूजर अपनी आंखों पर धर्म-संस्कृति की पट्टी लगाए बैठा रहता था लेकिन कोरोना त्रासदी ने उनकी आंखें कुछ हद तक खोल दी हैं. कुछ हद तक शब्द का इस्तेमाल मैं कोई अतिरिक्त सावधानी बरतते हुए नहीं कर रहा हूं बल्कि लोगों में आई जागरुकता की मात्रा को देखकर कर रहा हूं. दरअसल, कई लोग इस बात से प्रभावित हुए कि उनके किसी करीबी की नौकरी गई, कई इससे कि उनका कोई जानने वाला जब कोरोना संक्रमण का शिकार हुआ तो अस्पतालों ने खून के आंसू रुला लिए, वहीं कई अपने आसपास मची बाकी अफरा-तफरी को देखकर मीडिया और सोशल मीडिया दोनों से विरक्त हो रहे हैं’ सोशल मीडिया पर खासे सक्रिय और एक स्थापित मीडिया संस्थान में काम करने वाले आशीष मिश्रा आगे कहते हैं, ‘इसका फायदा ये हुआ है कि अब वे व्हाट्सएप फॉरवर्ड को क्रॉसचेक करने लगे हैं या घर के बच्चों से पूछते हैं कि यह सच है क्या. इन सब ने मिलाकर आईटी सेल की रफ्तार कम की है. मैं फिर से कहूंगा रोकी नहीं है, बस कम की है.’

इन आम लोगों में वे लोग भी शामिल हैं जिनके बच्चे सालों तैयारी करने के बाद भी प्रवेश परीक्षाओं को टालने की मांग कर रहे थे या जो परीक्षाएं पास करने के बाद भी नौकरी के बुलावे के इंतज़ार में बैठे हैं. इंदौर की मनीषा शुक्ला जो बीते दो सालों से नीट की तैयारी कर रही एक टीनएजर बेटी की मां हैं, पिछले दिनों नीट-जेईई का विरोध कर रहे बच्चों और पालकों के व्हाट्सएप ग्रुप का हिस्सा रहीं थी. वे बताती हैं कि ‘इस व्हाट्सएप ग्रुप पर मैंने कई अंध-भक्त अभिभावकों को 180 डिग्री पलटते देखा. क्योंकि बच्चे साथ ही पढ़ते हैं इसलिए इनमें से कइयों को मैं पहले से भी जानती थी. मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि सूर्य को अर्घ्य देने और किसी खास मंत्र का जाप करने से कोरोना का नाश होने का दावा करने वाले ये लोग, आजकल तुर्की के बॉट्स और पेड ट्रेंड्स की बात करने लगे हैं. शायद नीट-जेईई आगे नहीं बढ़ा तो लोगों का पेशेंस खत्म हो गया क्योंकि मिडिल क्लास आदमी कुछ भी सह सकता है लेकिन अपने बच्चों पर बात आएगी तो वह बोलेगा ही.’

मनीषा शुक्ला की यह बात इन परिस्थितियों पर बिल्कुल सटीक बैठती हुई इसलिए भी लगती है क्योंकि मोदी समर्थकों में एक बड़ा हिस्सा निम्न मध्य वर्ग से आता है. इस वर्ग से आने वाले, खास कर छोटे शहरों और कस्बों के ज्यादातर लोग, ही फेसबुक और व्हाट्सएप को ज़रूरत से ज्यादा गंभीरता से लेते दिखते हैं. कहना नहीं होगा कि यही समूह प्रोपगैंडा मशीनरी का शिकार और टूल दोनों ही बनता है. यानी, आम तौर पर होता यह है कि आईटी सेल कोई झूठ रचती है जिसे उसके सदस्य व्हाट्सएप ग्रुपों में फैलातें है. इन ग्रुपों पर मिलने वाले संदेशों को यही मध्यवर्गीय तबका आगे बढ़ाता है. इस समय यह तबका, अगर सीधी तरह से प्रभावित नहीं है तो आसपास की बिगड़ी हुई परिस्थितियों को देखकर उदासीन हो गया है और अगर प्रभावित है तो जैसा कि मनीषा कहती हैं, अपने बच्चों के भविष्य को देखते हुए पहली बार सच को टटोलने की कोशिश कर रहा है.

इन आम लोगों तक सच पहुंचने और बीजेपी आईटी सेल का प्रभाव कम होने में एक छोटी भूमिका फेक-न्यूज की पोल खोलने वाली वेबसाइटों की भी मानी जा सकती है. आल्ट न्यूजबूम लाइव और सोशल मीडिया हॉक्स स्लेयर जैसी तमाम वेबसाइटों के अलावा अब लगभग हर मीडिया ऑर्गनाइजेशन में एक फैक्ट चेकर टीम रखी जाती है. हालांकि इनकी भूमिका अभी तक सीमित ही है क्योंकि इनके द्वारा बताया गया सच सिर्फ इंटरनेट के माध्यम से ही लोगों तक पहुंच पाता है जबकि फेक न्यूज के लोगों तक पहुंचने की रफ्तार और साधन कहीं ज्यादा है. लेकिन इसके बावजूद लगातार बीजेपी आईटी सेल के झूठ पकड़े जाने की वजह से सोशल मीडिया पर मौजूद आम जनता पहले से ज्यादा जागरूक हो रही है.

इनके अलावा, कांग्रेस की आईटी सेल का अपेक्षाकृत सक्रिय हो जाना भी बीजेपी आईटी सेल के लिए थोड़ी मुश्किल बढ़ाने वाला लगता है. हालांकि कांग्रेस की आईटी सेल अभी भी संख्या और उपस्थिति में उतनी प्रभावी नहीं हो पाई है लेकिन इसकी कुछ इकाइयां हैं जो कई बार बीजेपी को मुहंतोड़ जवाब देती दिखाई देती हैं. इसमें सबसे ज्यादा चर्चित आईएनसी छत्तीसगढ़ का ट्विटर अकाउंट है. यह अकाउंट ज्यादातर मौकों पर पर कांग्रेस की उपलब्धियों का प्रचार करने का ही काम करता है लेकिन कई बार अपनी चुटीली और मारक टिप्पणियों के लिए सुर्खियों का हिस्सा भी बन चुका है. इसके अलावा भी कांग्रेस आईटी सेल अपने शीर्ष नेतृत्व पर होने वालों हमलों और रफाल या पीएम केयर्स जैसे मुद्दों को लेकर कई पॉपुलर ट्विटर ट्रेंड्स चलवाती रही है.

आम जनता और कांग्रेस से इतर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी भी आजकल पार्टी की आईटी सेल से नाराज़ चल रहे हैं. हाल ही में उन्होंने ट्वीट कर आरोप लगाया था कि बीजेपी आईटी सेल धूर्तता पर उतर आया है. स्वामी का कहना था कि इसके कुछ सदस्य उनके बारे में अनाप-शनाप बातें फैला रहे हैं. यह ट्वीट करने के दो दिन बाद सुब्रमण्यम स्वामी ने एक ट्वीट और किया था जिसमें उन्होंने आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय को हटाए जाने की मांग की थी. पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा को दिए गए प्रस्ताव का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा था कि ‘अगर मालवीय को नहीं हटाया जाता है तो मैं यह समझूंगा कि मेरा बचाव करने में पार्टी की कोई रुचि नहीं है.’ यह और बात है कि एक तरफ जहां पार्टी उनकी इस बात को कोई वरीयता देती नहीं दिखी. वहीं दूसरी तरफ वे भी, रिपोर्ट लिखे जाने तक इसके बारे में आगे कुछ और कहते या कोई बड़ी घोषणा करते नज़र नहीं आए हैं.

हालांकि यह कोई पहला मौका नहीं था जब कोई बीजेपी नेता ही बीजेपी की आईटी सेल के निशाने पर आ गया हो. इससे पहले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी इसकी ट्रोलिंग का शिकार हो चुके हैं. लेकिन सुब्रमण्यम स्वामी के मामले में विशेष यह है कि वे बीते कुछ दिनों से लगातार कई मुद्दों पर अपनी ही सरकार की आलोचना करते दिख रहे हैं. उदाहरण के लिए, पिछले दिनों उन्होंने जहां गलत आर्थिक नीतियों के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को निशाने पर लिया था. वहीं, नीट-जेईई परीक्षाओं के मसले पर भी वे छात्रों के पाले में ही खड़े दिखाई दिए थे. यहां पर यह बात भी ध्यान खींचने वाली है कि कुछ मीडिया रिपोर्टों में जिक्र किया गया है कि सुब्रमण्यम स्वामी को ट्रोल करने वाले कई ट्विटर खातों को खुद वित्तमंत्री सीतारमण भी फॉलो करती हैं. ऐसे में इस बात के कयास ही लगाए जा सकते हैं कि बीते कुछ समय से आईटी सेल के अप्रभावी होते जाने में पार्टी की अंदरूनी राजनीति का कितना हाथ है.

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