पिनाराई विजयन

राजनीति | केरल

केरल में लेफ्ट की जीत को सिर्फ पिनाराई विजयन की जीत कहना गलत क्यों नहीं होगा

पिछले कुछ समय में केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने कुछ ऐसे फैसले भी लिए जिन्हें शायद ही लेफ्ट का कोई अन्य मुख्यमंत्री ले सकता था

अभय शर्मा | 03 मई 2021 | फोटो : पिनाराई विजयन/फेसबुक

केरल में लगातार दूसरी बार लेफ्ट गठबंधन की सरकार बनना तय हो गया है. मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन इस बार पहले से ज्यादा ताकत के साथ सत्ता में लौट रहे हैं. राज्य की कुल 140 विधानसभा सीटों में सत्ताधारी लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) 99 सीटें जीत ली हैं, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) महज 41 सीटें ही जीत सका है. केरल की राजनीति में 1980 के बाद से एक परंपरा चली आ रही है. यहां किसी भी पार्टी ने लगातार दो बार सत्ता का सुख नहीं भोगा है. ऐसे में इस बार एलडीएफ ने लगातार दूसरी बार सत्ता में आकर 40 साल का इतिहास बदल दिया है. केरल के ये नतीजे लेफ्ट पार्टियों – सीपीआई और सीपीआई (एम) – के लिए बहुत बड़ी राहत जैसे हैं क्योंकि पश्चिम बंगाल में इन दोनों का पूरी तरह सूपड़ा साफ़ हो गया है.

राजनीति के जानकारों के मुताबिक अगर आज केरल में लेफ्ट गठबंधन बेहतर स्थिति में नजर आ रहा है तो इसका श्रेय सीपीआई (एम) को नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन को जाता है. विजयन ने सरकार और संगठन दोनों मोर्चों पर कई ऐसे फैसले लिए जो चुनाव में गेमचेंजर साबित हुए. पिनाराई विजयन की सरकार ने समाज के हर कमजोर तबके के लिए पेंशन योजनायें शुरू कीं जिनकी पूरे राज्य में सराहना हुई. बीते साल भारत में कोरोना वायरस के संक्रमण की शुरुआत केरल से ही हुई थी, लेकिन पिनाराई विजयन की सरकार ने जिस तरह इसे नियंत्रित किया, वह दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गया. कोरोना महामारी की पहली लहर के दौरान उनके द्वारा चलाई गयी योजनाओं ने सरकार को लेकर लोगों का नजरिया बदल दिया. मार्च 2020 के अंत में पूरे देश में लॉकडाउन लगा दिया गया था. इसके एक हफ्ते भर बाद ही केरल सरकार ने एक ऐसी योजना चलाई जिसके बारे में देश के किसी अन्य राज्य ने सोचा भी नहीं. उसने एक अप्रैल 2020 से राज्य के 88 लाख राशन कार्ड धारक परिवारों के घरों में भोजन की किट पहुंचाईं.

कोरोना महामारी के दौरान ऐसी खबरें भी आईं कि राज्य सरकार पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है जिसके चलते पेंशन योजनाएं रोकी जा सकती हैं. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बल्कि महामारी के दौरान इनमें और नए लोग जोड़ दिये गए. साथ ही सरकार ने हर महीने मिलने वाली पेंशन को 1300 से बढ़ाकर 1400 रुपये प्रति महीने कर दिया. राज्य सरकार के आंकड़ों को देखें तो कोरोना महामारी से पहले तकरीबन 50 लाख लोग इस तरह की पेंशन पाते थे, लेकिन महामारी के दौरान यह आंकड़ा 60 लाख के करीब पहुंच गया.

मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने राजनीतिक स्तर पर भी कई ऐसे फैसले लिए जिससे एलडीएफ गठबंधन को मजबूती मिली. इसमें सबसे बड़ा फैसला केरल कांग्रेस (मणि) को सत्ताधारी एलडीएफ गठबंधन में शामिल करने का था. केरल कांग्रेस (मणि) हमेशा से कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ गठबंधन का हिस्सा थी, इसे राज्य के कद्दावर राजनीतिज्ञ केएम मणि ने बनाया था. 2019 में केएम मणि के निधन के बाद पार्टी में आंतरिक कलह सामने आयी जिसके बाद यह दो धड़ों में बंट गयी. एक धड़ा केएम मणि के पुत्र ‘जोस के मणि’ का था और दूसरा पार्टी के वरिष्ठ नेता पीजे जोसफ का. यूडीएफ गठबंधन का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस ने पीजे जोसफ वाले धड़े को ज्यादा महत्व दिया जिससे नाराज होकर जोस के मणि ने यूडीएफ को छोड़ दिया. इस घटनाक्रम के तुरंत बाद ही पिनाराई विजयन ने जोस के मणि को एलडीएफ गठबंधन में शामिल करने के प्रयास शुरू कर दिए. सीपीआई (एम) के नेताओं ने इसका विरोध भी किया, लेकिन विजयन ने अक्टूबर 2020 में उन्हें एलडीएफ में शामिल करा दिया. केरल की राजनीतिक विश्लेषक सरिता बालन के मुताबिक केरल कांग्रेस (मणि) का केरल के मध्य और दक्षिण के ईसाई बाहुल्य कोट्टायम, पठानमथिट्टा और इडुक्की आदि जिलों की करीब 32 विधानसभा सीटों पर अच्छा खासा दबदबा है. इसके चलते ही यूडीएफ की पकड़ इन जिलों में बेहद मजबूत थी और एलडीएफ इन सीटों पर हमेशा कमजोर था. लेकिन जोस के मणि के पाला बदलते ही इन इलाकों में यूडीएफ की पकड़ कमजोर हो गयी.

कोरोना वायरस महामारी के दौरान पिनाराई विजयन की सरकार के बेहतर कामों और केरल कांग्रेस (मणि) के एलडीएफ गठबंधन में आने की वजह से बीते दिसंबर में हुए स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों में एलडीएफ को बड़ी जीत मिली. केरल कांग्रेस (मणि) के चलते निकाय चुनावों में मध्य केरल के कई ऐसे जिलों में भी एलडीएफ को फतह मिली जिनमें कई दशकों से कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ गठबंधन सत्ता में था.

दक्षिण भारत के राजनीतिक विश्लेषक एन रामाकृष्णन की मानें तो निकाय चुनाव से कुछ महीने पहले ही सोने की तस्करी का मामला सामने आया था जिसके घेरे में पिनाराई विजयन के प्रधान सचिव भी थे. ऐसे में विपक्षी पार्टियां चुनाव के दौरान उनकी सरकार पर जमकर भ्र्ष्टाचार के आरोप लगा रहीं थी. लेकिन इसके बाद भी निकाय चुनावों में एलडीएफ की एकतरफा जीत ने विजयन का हौसला बढ़ाने का काम किया. रामकृष्णन के मुताबिक, ‘इन नतीजों से पिनाराई विजयन की सरकार को साफ़ संदेश मिला कि वह सही रास्ते पर है और उसकी पेंशन योजनाओं और कोरोना के दौरान किये गए काम पब्लिक को पसंद आये हैं… इसीलिए विजयन सरकार ने 2021-22 के बजट में पेंशन योजनाओं को और ज्यादा फंड आवंटित किया. सरकार ने गरीबी रेखा से नीचे के लोगों को दी जाने वाली पेंशन को बढ़ाकर 1600 रुपए प्रतिमाह कर दिया.’ कुछ राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक इस विधानसभा चुनाव से पहले पिनाराई विजयन ने राज्य के किसानों को भी साधने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी. बीते जनवरी में उन्होंने किसानों के हित में कई बड़े फैसले लिए. सरकार ने धान और नारियल के समर्थन मूल्य में बढ़ोत्तरी की. देश में केरल एक ऐसा राज्य है जहां के सबसे ज्यादा किसान रबड़ का उत्पादन करते हैं. इस साल केरल सरकार ने रबड़ का समर्थन मूल्य बाजार की कीमत से भी ज्यादा कर दिया.

पिनाराई विजयन ने कुछ ऐसे फैसले भी लिए जो उनकी पार्टी लाइन से बिलकुल ही हटकर थे और शायद ही लेफ्ट का कोई अन्य मुख्यमंत्री इस तरह के फैसले ले पाता. सबरीमला का मामला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमला मंदिर में हर उम्र की महिलाओं को मंदिर में जाने की अनुमति दे दी थी. लेकिन इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में कई लोगों ने फिर पुनर्विचार याचिकाएं दायर कर दीं और यह मसला नौ सदस्यों वाली संवैधानिक बेंच को भेज दिया गया है. लेकिन, पिनाराई विजयन की सरकार ने इस मसले पर जो रुख अख्तियार किया, वह ‘वामपंथी सोच’ से बिलकुल मेल नहीं खाता है. सरकार ने यह घोषणा कर दी कि सुप्रीम जो भी निर्णय सुनाएगा, उसे मंदिर से जुड़े सभी पक्षों से बातचीत के बाद ही लागू किया जाएगा, चुनाव प्रचार के दौरान भी पिनाराई विजयन ने यह बात कई बार कही. केरल के कुछ पत्रकार बताते हैं कि सबरीमला पर पिनाराई विजयन सरकार के इस फैसले के चलते हिंदू वोटरों ने सीपीआई (एम) और एलडीएफ से दूरी नहीं बनाई.

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