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केरल में लेफ्ट कांग्रेस से मजबूत क्यों नज़र आ रहा है?

राहुल गांधी

केरल की राजनीति में 1980 के बाद से एक परंपरा चली आ रही है. यहां किसी भी पार्टी ने लगातार दो बार सत्ता का सुख नहीं भोगा है. राज्य में बीते 40 सालों के दौरान हुए विधानसभा चुनावों में बारी-बारी से कांग्रेस की अगुवाई वाले गठबंधन – यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) – और सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) ने जीत दर्ज की है. इस परंपरा के लिहाज से अगर देखें तो इस बार के विधानसभा चुनाव में यूडीएफ की जीत होनी चाहिए क्योंकि पिछले चुनाव में एलडीएफ गठबंधन विजयी रहा था. लेकिन मतदान से पहले आए लगभग सभी सर्वेक्षणों में यूडीएफ की जगह एलडीएफ की सरकार बनते दिखाई जा रही है. राज्य के कई राजनीतिक विश्लेषक भी इस बार लेफ्ट गठबंधन का ही पलड़ा भारी बताते हैं.

केरल में दो साल पहले हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ गठबंधन को 20 में से 19 सीटों पर जीत मिली थी. उस समय एलडीएफ गठबंधन के हाथ महज एक सीट ही लगी थी. बीते डेढ़ साल में मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली एलडीएफ सरकार पर भ्र्ष्टाचार के भी कई आरोप लगे. बीते साल सोने की तस्करी के रैकेट का भंडाफोड़ हुआ जिसमें मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव का नाम सामने आया [1] था. साथ ही केरल में सीपीआई (एम) के सचिव कोडिएरी बालकृष्ण के बेटे की मनी लॉन्डरिंग मामले में कथित संलिप्तता का मामला भी काफी चर्चा में रहा. इस सब के बाद भी इस विधानसभा चुनाव में एलडीएफ का पलड़ा भारी होना कई लोगों को चौंकाता है.

सरकार की योजनाओं ने पासा पलट दिया

केरल की राजनीति पर नजर रखने वाले जानकारों के मुताबिक अगर आज लेफ्ट गठबंधन बेहतर स्थिति में नजर आ रहा है तो इसकी सबसे बड़ी वजह मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन खुद हैं. विजयन ने 2019 लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद सरकार और संगठन दोनों मोर्चों पर कई बड़े फैसले लिए. उन्होंने समाज के हर कमजोर तबके के लिए पेंशन योजना शुरू की, जिसकी पूरे राज्य में सराहना हुई. बीते साल भारत में कोरोना वायरस की शुरुआत केरल से ही हुई थी, लेकिन पिनाराई विजयन की सरकार ने जिस तरह कोरोना संक्रमण को नियंत्रित किया, वह दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गया. कोरोना के दौरान उनके द्वारा चलाई गयी योजनाओं ने भी सरकार को लेकर लोगों का नजरिया बदल दिया. मार्च 2020 के अंत में पूरे देश में लॉकडाउन लगा दिया गया [2] था. इसके हफ्ते भर बाद ही केरल सरकार ने एक ऐसी योजना चलाई जिसके बारे में देश के किसी अन्य राज्य ने सोचा भी नहीं. उसने एक अप्रैल 2020 से राज्य के 88 लाख राशन कार्ड धारक परिवारों के लिए उनके घरों में भोजन की किट पहुंचाईं.

केरल के अलपुझा जिले में रहने वाले टैक्सी ड्राइवर बाबू सत्याग्रह से बातचीत में सरकार की योजनाओं के बारे में कहते हैं, ‘केरल में एक बड़ी आबादी का गुजारा पर्यटन से चलता है. कोरोना के चलते बीते पूरे साल घर पर ही बैठना पड़ा, बिलकुल कमाई नहीं हुई, सरकार की भोजन किट वितरण योजना से हम जैसे लोगों को बड़ी राहत मिली.’ बाबू यह भी बताते हैं कि कोरोना के दौरान ऐसी खबरें आयीं कि सरकार पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है जिसके चलते पेंशन योजनाएं रोकी जा सकती हैं. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बल्कि कोरोना महामारी के दौरान इनमें और नए लोग जोड़ दिये गए. साथ ही सरकार ने हर महीने मिलने वाली पेंशन को बढ़ाकर 1400 प्रति महीने [3] कर दिया. राज्य सरकार के आंकड़ों को देखें तो कोरोना वायरस महामारी से पहले तकरीबन 50 लाख लोग इस तरह की पेंशन पाते थे, लेकिन माहमारी के दौरान यह आंकड़ा 60 लाख के करीब पहुंच गया.

कैसे पिनराई विजयन ने एलडीएफ गठबंधन को और मजबूत कर दिया

मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने संगठन के स्तर पर भी कई ऐसे फैसले लिए जिससे एलडीएफ गठबंधन को मजबूती मिली. इसमें सबसे बड़ा फैसला केरल कांग्रेस (मणि) को सत्ताधारी गठबंधन में शामिल करने का था. केरल कांग्रेस (मणि) हमेशा से कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ गठबंधन का हिस्सा थी, इसे राज्य के कद्दावर राजनीतिज्ञ केएम मणि ने बनाया था. 2019 में केएम मणि के निधन के बाद पार्टी में आंतरिक कलह सामने आयी जिसके बाद यह दो धड़ों में बंट गयी. एक धड़ा केएम मणि के पुत्र ‘जोस के मणि’ का था और दूसरा पार्टी के वरिष्ठ नेता पीजे जोसफ का. यूडीएफ गठबंधन का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस ने पीजे जोसफ का साथ दिया. इससे नाराज होकर जोस के मणि ने यूडीएफ गठबंधन छोड़ दिया. इस घटनाक्रम के तुरंत बाद ही पिनाराई विजयन ने जोस के मणि को एलडीएफ गठबंधन में शामिल करने के प्रयास शुरू कर दिए. सीपीआई (एम) के नेताओं ने इसका विरोध भी किया, लेकिन विजयन ने अक्टूबर 2020 में जोस के मणि को एलडीएफ में शामिल करा दिया. केरल की राजनीतिक विश्लेषक सरिता बालन के मुताबिक [4] केरल कांग्रेस (मणि) का केरल के मध्य और दक्षिण के ईसाई बाहुल्य कोट्टायम, पठानमथिट्टा और इडुक्की आदि जिलों की करीब 32 विधानसभा सीटों पर अच्छा खासा दबदबा है. इसके चलते ही यूडीएफ की पकड़ इन जिलों में बेहद मजबूत थी और एलडीएफ इन सीटों पर हमेशा कमजोर था. लेकिन जोस के मणि के पाला बदलते ही इन इलाकों में यूडीएफ की पकड़ कमजोर हो गयी.

केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए | फोटो : पिनाराई विजयन/फेसबुक

कोरोना वायरस महामारी के दौरान पिनाराई विजयन की सरकार के बेहतर कामों और केरल कांग्रेस (मणि) के एलडीएफ गठबंधन में आने की वजह से बीते दिसंबर में हुए स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों में एलडीएफ को बड़ी जीत मिली. 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ गठबंधन ने 47.5 फीसदी वोट हासिल किया था, जबकि एलडीएफ को महज 31 फीसदी वोट ही मिले थे. लेकिन दिसंबर में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में एलडीएफ को 40.2 फीसदी और यूडीएफ को 37.9 फीसदी वोट ही मिले. साथ ही केरल कांग्रेस (मणि) के चलते निकाय चुनावों में मध्य केरल के कई ऐसे जिलों में एलडीएफ को फतह मिली, जिनमें कई दशकों से कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ गठबंधन सत्ता में था.

इस साल के बजट में योजनाओं को और बेहतर किया

दक्षिण भारत के राजनीतिक विश्लेषक एन रामाकृष्णन की मानें तो निकाय चुनाव से कुछ महीने पहले ही सोने की तस्करी का मामला सामने आया था जिसके घेरे में राज्य के प्रधान सचिव थे. ऐसे में विपक्षी पार्टियां चुनाव के दौरान पिनाराई विजयन की सरकार पर जमकर भ्र्ष्टाचार के आरोप लगा रहीं थी. लेकिन इसके बाद भी निकाय चुनावों में एलडीएफ की एकतरफा जीत ने कई लोगों को चौंका दिया. रामकृष्णन अपनी एक टिप्पणी में लिखते हैं, ‘इन नतीजों से पिनाराई विजयन की सरकार को साफ़ संदेश मिला की वह सही रास्ते पर है और उसकी पेंशन योजनाओं और कोरोना के दौरान किये गए काम पब्लिक को पसंद आये हैं… इसीलिए विजयन सरकार ने 2021-22 के बजट में पेंशन योजनाओं को और ज्यादा फंड आवंटित किया. सरकार ने गरीबी रेखा से नीचे के लोगों दी जाने वाली पेंशन को बढ़ाकर [5] 1600 रुपए प्रतिमाह कर दिया.’ कुछ जानकारों के मुताबिक इस समय पिनाराई विजयन की सरकार से राज्य के किसान भी संतुष्ट नजर आ रहे हैं. बीते जनवरी माह में केरल सरकार ने किसानों को साधने के लिए कई बड़े फैसले लिए. उसने धान और नारियल के समर्थन मूल्य में बढ़ोत्तरी की. देश में केरल एक ऐसा राज्य है जहां के सबसे ज्यादा किसान रबड़ का उत्पादन करते हैं. इस साल केरल सरकार ने रबड़ का समर्थन मूल्य बाजार की कीमत से भी ज्यादा कर दिया.

हार्ड कम्युनिस्ट वाली छवि को बदला

दक्षिण भारत की राजनीति के विश्लेषक वरिष्ठ पत्रकार नीलेश द्विवेदी एक और बात बताते हैं. ‘केरल के लोग लेफ्ट की सरकार को पहले एक अलग नजरिये से देखते थे, लेकिन पिनाराई विजयन की सरकार ने इस नजरिये को बदला है. इस सरकार ने दिखाया है कि वह पिछली वामपंथी सरकारों से अलग है. इस सरकार ने खुद को हार्ड कम्युनिस्ट लाइन से थोड़ा अलग करने की कोशिश की है और वह इसमें सफल भी हुई है’ नीलेश आगे कहते हैं, ‘इसका सबसे बड़ा उदाहरण सबरीमला का मुद्दा है.’

सबरीमला मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में हर उम्र की महिलाओं को मंदिर में जाने की अनुमति दे दी थी. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में कई लोगों ने फिर पुनर्विचार याचिकाएं दायर कर दीं, जिसके बाद यह मसला नौ सदस्यों वाली संवैधानिक बेंच को भेज दिया गया है. लेकिन, पिनाराई विजयन की सरकार ने इस मसले पर अभी से जो रुख अख्तियार किया है, वह ‘वामपंथी सोच’ से बिलकुल मेल नहीं खाता है. सरकार ने अभी से यह घोषणा कर दी है [6] कि सुप्रीम जो भी निर्णय सुनाएगा, उसे मंदिर से जुड़े सभी पक्षों से बातचीत के बाद ही लागू किया जाएगा. केरल के कुछ पत्रकार बताते हैं कि सबरीमला पर पिनाराई विजयन सरकार के इस फैसले के चलते हिंदू वोटरों ने सीपीआई (एम) और एलडीएफ से दूरी नहीं बनाई. निकाय और पंचायत चुनाव में एलडीएफ की बड़ी जीत से इसका पता चलता है.

कांग्रेस से एक के बाद एक गलतियां हुईं

केरल के कुछ पत्रकारों की मानें तो इस विधानसभा चुनाव में लेफ्ट गठबंधन के मजबूत दिखने की पहली वजह पिनाराई विजयन की सरकार के बेहतर काम हैं तो दूसरी वजह प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस का कमजोर होना है. केरल के हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों पर अगर नजर डालें तो 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद जहां लेफ्ट का एलडीएफ गठबंधन मजबूत होता रहा, वहीं कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ गठबंधन लगातार कमजोर होता गया. जानकार कहते हैं कि लोकसभा चुनाव में बड़ी जीत के बाद कांग्रेस के नेता यह सोचने लगे कि राज्य की जनता पिनाराई विजयन की एलडीएफ सरकार से नाराज है और इसलिए उसने कांग्रेस के यूडीएफ गठबंधन को वोट दिया है. उन्हें लगने लगा कि अब कांग्रेस आसानी से 2021 का विधानसभा चुनाव भी जीत लेगी और यह मानकर कांग्रेस नेता ढ़ीले पड़ गए. जबकि जानकारों की मानें तो 2019 के लोकसभा चुनाव में केरल के लोगों ने कांग्रेस को इसलिए वोट दिया था क्योंकि वे भाजपा को रोकना चाहते थे और उस समय केंद्रीय स्तर पर भाजपा के मुकाबले में उन्हें कांग्रेस ही नजर आ रही थी.

इसके बाद कांग्रेस के नेताओं से एक बड़ी गलती यूडीएफ गठबंधन के घटक दल केरल कांग्रेस (मणि) को लेकर हुई. कांग्रेस के नेता यह आकलन ही नहीं कर पाए कि केरल कांग्रेस (मणि) में टूट के बाद कौन-सा पक्ष ज्यादा मजबूत है. उन्होंने केरल कांग्रेस (मणि) के उस पक्ष को एलडीएफ के साथ जाने दिया जिसका मध्य केरल के जिलों में ईसाई आबादी और चर्चों पर ज्यादा बड़ा असर था.

पांच साल तक ओमन चांडी के सक्रिय न होने का नतीजा

2016 के विधानसभा चुनाव में यूडीएफ गठबंधन की हार का ठीकरा तत्कालीन मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ओमन चांडी के सिर पर फोड़ा गया था और तब से ही वे पार्टी में सक्रिय भूमिका में नहीं थे. हालांकि, चांडी की तरफ से बीमारी को इसकी वजह बताया जाता रहा. कुछ जानकारों के मुताबिक 77 वर्षीय ओमन चांडी केरल में कांग्रेस के सबसे अनुभवी और काबिल नेता हैं और कई सालों से राज्य में कांग्रेस की राजनीति वही संभाल रहे थे. लेकिन उनके सक्रिय भूमिका में न होने का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा. इस वजह से पार्टी बीते पांच साल में कोई मुद्दा बेहतर तरीके से उठा नहीं पायी. सबरीमला का मुद्दा हो या सोने की तस्करी का मामला, कांग्रेस लेफ्ट सरकार को कठघरे में खड़ा करने में पूरी तरह असफल रही.

केरल के पूर्व मुख्यमंत्री ओमन चांडी | फोटो : ओमन चांडी/फेसबुक

कुछ राजनीतिक जानकार बताते हैं कि विधानसभा चुनाव से चार महीने पहले निकाय और पंचायत चुनाव में अपने मजबूत (ईसाई बहुल) क्षेत्रों में मिली करारी हार ने कांग्रेस हाईकमान की नींद उड़ा दी. बीते फरवरी में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तारिक अनवर के नेतृत्व वाली टीम की रिपोर्ट के बाद पार्टी प्रमुख सोनिया गांधी ने केरल के नेताओं के बीच मतभेद सुलझाने की कोशिश की. उनके हस्तक्षेप के बाद केरल कांग्रेस के सबसे बड़े नेता ओमन चांडी की सक्रिय राजनीति में वापसी हुई. कांग्रेस हाईकमान का मानना है कि केरल कांग्रेस (मणि) के यूडीएफ से जाने के बाद गठबंधन को ईसाई वोटों का जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई ओमन चांडी कर सकते हैं. ओमन चांडी का केरल के लगभग सभी ईसाई समूहों और चर्चों पर अच्छा प्रभाव माना जाता है.

कांग्रेस में गुटबाजी

केरल में कांग्रेस पार्टी के अंदर गुटबाजी किसी से छिपी नहीं है. पार्टी में तीन खेमों में बटी हुई है, पहला पूर्व मुख्यमंत्री ओमन चांडी का, दूसरा विधानसभा में विपक्ष के नेता रमेश चेन्नीथला का और तीसरा खेमा केरल कांग्रेस के अध्यक्ष मुल्लापल्ली रामचंद्रन का है. ये तीनों खेमे एक-दूसरे को दबाने की कोशिश में लगे रहते हैं. हालांकि, इस विधानसभा चुनाव से पहले सोनिया गांधी के दखल के चलते राज्य के ये तीनों बड़े नेता एक साथ चुनाव प्रचार कर रहे हैं. लेकिन इसके बाद भी इनके बीच दांव-पेंच देखने को मिल जाते हैं. बीते महीने राज्य कांग्रेस के प्रमुख मुल्लापल्ली रामचंद्रन ने दावा किया [7] कि ओमन चांडी इस बार नेमोम सीट से चुनाव लड़ सकते हैं. लेकिन चांडी ने स्पष्ट किया कि वे अपनी पारंपरिक पुथुपल्ली सीट को नहीं छोड़ेंगे जिसका वे पिछले 50 वर्षों से प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. कांग्रेस आलाकमान द्वारा नाराजगी जताए जाने के बाद, रामचंद्रन ने मीडिया पर इसका दोष मढ़ दिया. जानकारों की मानें तो रामचंद्रन ने यह दांव बहुत सोच-समझकर चला था था क्योंकि नेमोम को भाजपा का गढ़ माना जाता है और ऐसे में ओमन चांडी यहां से चुनाव हार भी सकते थे.

अगर एलडीएफ जीता तो कांग्रेस में टूट के आसार

नीलेश द्विवेदी की मानें तो अगर इस विधानसभा में लेफ्ट की अगुवाई वाले एलडीएफ गठबंधन की जीत होती है तो मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन का कद सीपीआई (एम) में बहुत बड़ा हो जाएगा. वे देश में पार्टी के सबसे बड़े नेता भी बन सकते हैं क्योंकि सरकार से लेकर संगठन तक केवल उन्हीं की कोशिशों की बदौलत एलडीएफ लगातार दूसरी बार केरल की सत्ता का सुख भोगेगी. नीलेश सत्याग्रह से बातचीत में आगे कहते हैं, ‘दूसरी ओर अगर कांग्रेस यह चुनाव हारती है तो संगठन के स्तर पर केरल में उसकी हालत बहुत बुरी हो सकती है और पार्टी टूट की कगार पर भी पहुंच सकती है… केरल कांग्रेस में पहले से ही कई गुट बने हुए हैं, ऐसे में इस बात की पूरी संभावना है कि भाजपा केरल में राजनीतिक जगह बनाने के लिए इस गुटबाजी का फायदा उठा ले. साफ़ शब्दों में कहें तो केरल में कांग्रेस की हार के बाद बड़ी संख्या में उसके नेता भाजपा का रुख करते हुए दिखाई दे सकते हैं.’