दंगा

राजनीति | कभी-कभार

पृथ्वी को अब और सफल लोगों की ज़रूरत नहीं है

एक ऐसे माहौल में जिसमें जैसे भी हो सफल होने की होड़ लगी है, असल में नीचता, अश्लीलता, अन्याय और साम्प्रदायिकता ही सफल हुए हैं

अशोक वाजपेयी | 18 अप्रैल 2021 | इलस्ट्रेशन : मनीषा यादव

भविष्य की अपेक्षा

दिल्ली की कुछ कला-वीथिकाएं मिलकर एक कला-सप्ताह मना रही हैं जिसके अन्तर्गत ‘आगामी कल के लिए प्रस्ताव’ शीर्षक से आयोजित श्रृंखला में भाग लेने का सुयोग हुआ. भविष्य के बारे में कुछ भी सोचना बिना वर्तमान को हिसाब में लिये सम्भव नहीं है. हमारा वर्तमान कई विफलताओं से अंटा पड़ा है. अन्तरराष्ट्रीय यात्रा और यातायात की बड़ी सुखद सुविधा कोरोना वायरस भारत ले आयी. हम सब पर ज़बरिया एकान्त लाद दिया गया और भौतिक दूरी सामाजिक दूरी में बदल गयी. हर व्यक्ति हमारे जीवन में पहली बार, हर दूसरे व्यक्ति के लिए, संभावित ख़तरा बन गया. दूसरों की भौतिक अनुपस्थिति ने हमें जताया कि हमारे जीवन और मनुष्यता का कितना बड़ा हिस्सा दूसरों पर निर्भर है.

संसार में सत्ताओं ने लॉकडाउन आदि का लाभ उठाते हुए अभूतपूर्व नीचता और संवेदनहीनता से अपने को और अधिकार-सम्पन्न और हमारी कई स्वतंत्रताओं को और कम कर दिया. हमारे यहां अतार्किक हड़बड़ी में इसी दौरान किसानों और श्रमिकों के हितों को कारपोरेट जगत् की समृद्धि और सुगमता में इज़ाफ़ा करने के लिए क़ानून पास करा लिये गये. एक करोड़ से अधिक लोग हृदयहीन नगरों से अपने गांव-घरों को लौटने पर मजबूर हुए और उन्हें यातायात, राहत, सहायता आदि देने में सत्ताओं ने अद्भुत क्रूरता और अमानवीयता से काम लिया. उन्हें राहत और मदद साधारण लोगों, परोपकारी संस्थाओं, कई धार्मिक संस्थाओं आदि ने स्वतः स्फूर्त ढंग से उपलब्ध कराई. कोविड प्रकोप के दूसरे दौर में वैक्सीन के सम्यक् वितरण और उपलब्धि में फिर घटिया क़िस्म की राजनीति खेली जा रही है. चुनाव कुछ राज्यों में धनबल और बाहुबल, साम्प्रदायिकता का अश्लील खेल बन गये हैं. संवैधानिक संस्थाओं की कोताही, उदासीनता और पक्षपात दैनिक दुर्घटनाएं हैं. जो ज़रूरी और सच है उसे छिपाना और जो ग़ैरज़रूरी और अकसर झूठ है उसे बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना मीडिया की नयी आचरण-संहिता है.

इस बेहद निराशाजनक परिदृश्य में हम किस भविष्य की कल्पना कर सकते हैं? एक ऐसे माहौल में जिसमें जैसे भी हो सफल होने की होड़ लगी है, असल में तो नीचता, अभद्रता, अश्लीलता, अन्याय, विषमता, साम्प्रदायिकता ही सफल हुए हैं. रहे हम तो हम इन सबको सफल होने से रोक न पा सकने वाले विफल लोग हैं. हमारे आसपास राजनीति, सत्ता, राज्य, धर्म, मीडिया आदि सभी हमसे लगातार विश्वासघात कर रहे हैं. हमारा स्वयं अपने पर विश्वास तेज़ी से घट रहा है.

तब क्या हम विफलता के एक नये सौन्दर्यशास्त्र की कल्पना कर सकते हैं? क्या हम हिंसा और विनाश के अभियान में शामिल होने से इनकार कर सकते हैं; क्या हम विस्मृति फैलाने की मुहीम का मोहरा बनने या शिकार होने अपने को बचा सकते हैं; क्या संस्कृति मात्र को, शिक्षा और कलाओं को निरा उपकरण मानने की वृत्ति का प्रतिरोध कर सकते हैं? यह करते हुए हम विफल माने जाएंगे, ज़माने की रफ़्तार से पिछड़ गये भी, पर क्या हम इसी तरह अपनी मानवीयता, ऊष्मा, लोकमंगल-दृष्टि बचा और सम्हाल नहीं पायेंगे?

दलाई लामा ने कहा है: ‘पृथ्वी को और सफल लोगों की ज़रूरत नहीं है. वह शिद्दत से चाहती है और अधिक शान्ति स्थापित करने वाले, आरोग्यदाता, मरम्मत करने वाले, क़िस्सागो और हर तरह के प्रेमी’. हम पर जो गुज़री है, जिस नीचता-क्रूरता-बेरहमी-हिंसा-हत्या के दारुण दृश्य हमने देखे-सहे हैं, उन सबको हमें दर्ज़ करना चाहिये, अपने साहित्य, अपनी कलाओं में. मुक्तिबोध ने तो आत्मा के गुप्तचर की बात की थी हमें आत्मा के लेखापाल बनना होगा तभी हम अन्तःकरण के रक्षक होने का दावा कर पायेंगे. हमें क़िस्सागो, रफूगर, विदीर्ण आत्माओं के आरोग्यदाता होना होगा. इसका कोई एक ढंग नहीं हो सकता, न होना चाहिये.

निपट साधारण लोगों ने हमेशा की तरह, इस दौरान, आगे बढ़कर, कष्ट और जोखिम उठाकर मदद-राहत-सहानुभूति-सहारा आदि देकर मानवीयता को सजग रखा है. हमें साधारण की महिमा को फिर से पहचानने की ज़रूरत है. साहित्य और कलाएं सभी आत्मसंबोधित होने के साथ-साथ दूसरों को संबोधित भी होते हैं. राजनीति, धर्म, बाज़ार, मीडिया लगातार नये दूसरे गढ़ रहे और उन्हें लांछित-दंडित कर रहे हैं. हमें दूसरों के दूसरेपन को गरिमा और विनय, सहानुभूति के साथ आत्मसात् करना चाहिये. दूसरों को जो यातना दी गयी और जा रही है उसमें हम उनकी सहभागिता ऐसे ही कर सकते हैं. दूसरों को अकेला छोड़ना अनैतिक होगा.

विफलता के नये सौन्दर्यशास्त्र के साथ-साथ हमें उम्मीद का नया स्थापत्य गढ़ना होगा. अगर राजनीति ने हमारे साथ विश्वासघात कर हमें एक ध्रुव पर ला दिया है तो न्याय-समता-सौन्दर्य, अन्तःकरण-बहुलता-सृजनशीलता-जटिलता के पक्ष में नयी वैकल्पिक सत्ताविरत राजनीति के रूप में साहित्य और कलाओं को खड़ा और सक्रिय करना होगा. क्या यह निरा एक बूढ़े का दिवास्वप्न है, निपट अरण्यरोदन या सकर्मकता के लिए एक विचारणीय प्रस्ताव?

राग की खोज में

अमित चौधरी की ख्याति एक भारतीय अंग्रेज़ी साहित्यकार के रूप में ऊँची है. वे उपन्यासकार, कहानी-लेखक, निबन्धकार, डीएच लारेन्स की कविता के व्याख्याता और देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों में सर्जनात्मक लेखन के अध्यापक रहे हैं. उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार और कामनवेल्थ पुरस्कार के अलावा रायल सोसायटी आव् लिटरेचर की सदस्यता भी प्राप्त है. वे संगीतकार भी हैं. उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत बाक़ायदा सीखा है और वे अपने शास्त्रीय गायन की कई प्रस्तुतियां दे चुके हैं. पेंगुइन रेण्डम हाउस से उनकी नयी पुस्तक आयी है – ‘फ़ाइण्डिंग द राग’. लेखक-संगीतकार की ऐसी दूसरी पुस्तक याद नहीं आती. यह एक सुलिखित पुस्तक है जो आख्यान है, एक लम्बा विनिबन्ध है, जिसमें आत्मकथात्मक अंश हैं और शास्त्रीय गुरुओं की कहानी भी कही गयी है.

अमित कहते हैं कि शास्त्रीय क्लैसिक की हर संस्कृति में विचित्र स्थिति होती है जो प्रभुता और अवैधता के बीच मंडराती रहती है जिसे आदर और उपेक्षा दोनों मिलते हैं. भारत में भी उसकी स्थिति विवादास्पद रही है जिसका जटिल इतिहास है. राग की व्याख्या वह क्या नहीं है इसे बताकर ही की जा सकती है. राग तो राग है. वह संरचना नहीं है, धुन या गीत नहीं है, उतार-चढ़ाव नहीं है, न ही उसके स्वरों का योगफल है. वह आत्मसीमित बन्दिश नहीं है. याद करें भरत ने कहा था – संगीत संसार को सुनने का एक प्रकार है.

हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का सौन्दर्यशास्त्र ऐसा है जिसमें संसार से उसकी प्रतिक्रिया स्तुति से उभरती है, न कि किसी आन्तरिक या बाह्य जीवन के लिए प्रतिरूपात्मक निष्ठा से. यह संगीत भाषा को प्राथमिकता देता है. किसी इबारत या पाठ की तरह, जिसकी शब्द से अधिक कोई परम अस्मिता नहीं. वहां अन्तर या भिन्नता अलगाव से ही पहचानी जाती है. यह एक संसार है जिसमें कोई ट्रैजडी नहीं है. आनन्द अस्तित्व में हिस्सेदारी, बिना अपनी किसी अलग परिभाषा के. वह हर कहीं है. मुग़ल या कांगड़ा कलाकृति में ज़्यादा जीवन, ज़्यादा ब्रह्माण्ड समाया होता है, रेनेसां की किसी विशाल कृति की तुलना में.

अमित का मानना है कि पश्चिमी शास्त्रीय संगीत में जिस तरह की आत्माभिव्यक्ति वाइब्रेतो के माध्यम से व्यक्त होती है जो रोमेण्टिसिज़्म के बाद आयी, उसकी कोई जगह हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में नहीं है. अमित के नज़दीक श्रुति अगले स्वर की प्रत्याशा है और बढ़त एक तरह विलमना. रोलां बाख़्त को याद करते हुए वे कहते हैं कि जैसे फ्रेंच कथाकार फ्लावेयर में भाषा स्वयं कर्म करती, प्रस्तुति करती है, कोई आत्म या लेखक नहीं.

इस संगीत का अभ्यास करते हुए अमित को यह अहसास भी हुआ कि आवाज़ शब्द से विच्छिन्न, संगीत-स्वर से भी विच्छिन्न, अकसर कुछ कह रही होती है. यह भी कि कुछ राग जैसे रामदासी मल्हार गाये जाने के लिए सदियों तक प्रतीक्षा कर सकते हैं. उस्ताद अमीर खां ने सदियों बाद इस राग को गाकर, एक तरह से, पुनर्जीवित किया.

अमित चौधरी ख़याल गायकी को सीधे आधुनिकता से जोड़ते हैं. उनका मानना है कि बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक तक आते-आते ख़याल में एक रैडिकल ग़ैर प्रतिरूपात्मक मोड़ जाता है जो सर्वथा आधुनिक है. 1932 में टीएस ईलियट ने कहा था कि सच्ची कविता समझे जाने के पहले सम्प्रेषित होती है. किसी तरह की बोध्यता को नष्ट करना आधुनिक को प्रतिरूपात्मकता से मुक्ति के लिए ज़रूरी लग रहा था.

ख़याल में आधुनिकता के कई लक्षण पहचाने जा सकते हैं: बन्दिश के शब्दों के अर्थ की उपेक्षा, ख़याल की अपेक्षा कि हम प्रक्रिया और परिणति के बीच भेद को भुला दें, ख़याल का सुर और ताल, प्रदोलन और कालिकता पर इसरार, न कि व्यक्तित्व और मनोविज्ञान पर. यह ऐसी आधुनिकता भी है जिसके केन्द्र में मनुष्य नहीं है.

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