उद्धव और आदित्य ठाकरे के साथ सोनिया गांधी

राजनीति | भारत

क्या भारत जैसे लोकतंत्र के लिए राजनीतिक वंशवाद जरूरी है?

राजनीतिक वंशवाद के नुकसान तो जगजाहिर हैं, लेकिन क्या इससे लोकतंत्र को कुछ फायदे भी हो सकते हैं?

विकास बहुगुणा | 14 मई 2021 | फोटो: www.inc.in

पश्चिम बंगाल में भाजपा को पटखनी देकर तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी लगातार तीसरी बार राज्य की मुख्यमंत्री बन चुकी हैं. केंद्र में सत्ताधारी भाजपा ने इस विधानसभा चुनाव में सारा जोर लगा दिया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह सहित तमाम पार्टी नेताओं ने कोरोना वायरस को ताक पर रखकर राज्य में ताबड़तोड़ रैलियां कीं. लेकिन आखिर में तृणमूल कांग्रेस बड़े अंतर से चुनाव जीत गई.

इस जीत को कई नेता और विश्लेषक लोकतंत्र की जीत बता रहे हैं. खुद ममता बनर्जी ने भी चुनाव नतीजों के बाद यही कहा. तृणमूल कांग्रेस की मुखिया का कहना था, ‘बंगाल ने देश को बचा लिया.’

लेकिन इस जीत को लोकतंत्र की जीत बताने वाली तृणमूल कांग्रेस पर आरोप लगते हैं कि उसके भीतर ही लोकतंत्र नहीं है. जिस तरह से थोड़े ही समय में ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी पार्टी के सर्वेसर्वा बन गए हैं उसे देखते हुए कई जानकारों को ये आरोप गलत नहीं लगते. बीते कुछ समय के दौरान तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने वाले कई बड़े नेता भी यह बात कहते रहे हैं. किसी दौर में ममता बनर्जी के सबसे करीबी कहे जाने वाले और अब भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, ‘टीएमसी को अब ममता नहीं बल्कि अभिषेक ही चला रहे हैं.’ दूसरे कई नेता भी मानते हैं कि बाकी दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों की तरह तृणमूल कांग्रेस भी वंशवाद की शिकार हो चुकी है.

भाजपा इस मुद्दे को लेकर इन पार्टियों को घेरती रही है. कुछ समय पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजनीतिक वंशवाद को लोकतंत्र में तानाशाही का एक नया रूप बताया था. उनका कहना था, ‘राजनीतिक वंशवाद ‘नेशन फर्स्ट’ के बजाय मैं और मेरा परिवार, इसी भावना को मजबूत करता है. ये भारत में राजनीतिक और सामाजिक करप्शन का भी एक बहुत बड़ा कारण है.’ प्रधानमंत्री का आगे कहना था कि जब तक देश का सामान्य युवा राजनीति में नहीं आएगा, वंशवाद का जहर लोकतंत्र को कमजोर करता रहेगा.

राजनीतिक वंशवाद की आलोचना कोई नई बात नहीं है. कई कारण हैं जिनके चलते इसे लोकतंत्र की सेहत के लिए खराब माना जाता है. वंशवादी राजनीति सबको समान अवसर के बुनियादी लोकतांत्रिक सिद्धांत को धता बताती है. इसके चलते अक्सर प्रतिभाओं को हाशिए पर जाना पड़ता है. यानी वे विकल्प जनता के सामने नहीं आ पाते जो उसके लिए बेहतर हो सकते थे.

वंशवाद के चलते कई बार शासन की डोर अयोग्य शासकों के हाथ में चली जाती है. जब ऐसा होता है तो दुष्प्रचार, चाटुकारिता, धनबल और भ्रष्टाचार का बोलबाला हो जाता है और लोकतांत्रिक संस्थाओं की ताकत घटने लगती है. कई अध्ययन बताते हैं कि वंशवाद के सहारे आगे आए राजनेताओं के निर्वाचन क्षेत्रों के सामाजिक-आर्थिक मानकों पर पिछड़े होने की संभावनाएं ज्यादा होती हैं. विश्लेषकों के मुताबिक वंशवाद राजनीतिक क्षेत्र में एक तरह की गैरबराबरी है जो समाज में आर्थिक गैरबराबरी का भी कारण बनती है.

लेकिन लोकतंत्र के लिए राजनीतिक वंशवाद के नुकसान पर एकराय होने के बावजूद जमीनी हकीकत देखें तो लगभग सभी लोकतंत्रों में यह किसी न किसी रूप में दिख जाता है. दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र अमेरिका में आज भी बुश, क्लिंटन, रूजवेल्ट और कैनेडी जैसे नामों की अलग ठसक है. उधर, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में गांधी से लेकर अब्दुल्ला और ठाकरे परिवार तक राजनीतिक वंशवाद के तमाम उदाहरण दिखते हैं.

वंशवाद के कारण तलाशने पर हम पाते हैं कि इसकी शुरुआत व्यक्तिपूजा की बुनियादी प्रवृत्ति से होती है जो हर समाज में किसी न किसी मात्रा में पाई ही जाती है. राजनीतिक क्षेत्र में देखें तो अपनी क्षमताओं के चलते जब कोई व्यक्ति महान शख्सियत के रूप में स्थापित होता है तो उसके साथ उसका परिवार भी एक खास महत्व अर्जित कर लेता है. ऐसे में अगर वह व्यक्ति अपनी संतानों या दूसरे परिजनों को आगे बढ़ाने लगे तो वंशवाद की नींव पड़ जाती है. इसमें उसकी मदद दरबारियों का एक ऐसा वर्ग करता है जिसकी शक्ति का आधार वह खुद ही होता है. धीरे-धीरे पार्टी में एक ऐसी संस्कृति बन जाती है कि कोई भी नेतृत्व या इसके करीबी लोगों को नाराज करने का जोखिम मोल नहीं ले पाता. इस तरह पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र खत्म और राजनीतिक वंशवाद प्रगाढ़ होने लगता है. इस प्रवृत्ति का समाज से भी गहरा रिश्ता है. समाज में धर्म, जाति और परिवार का महत्व जितना ज्यादा होता है उसी अनुपात में राजनीतिक वंशवाद को मजबूती मिलती जाती है.

लेकिन क्या वंशवाद का लोकतंत्र को कोई फायदा भी हो सकता है?

इस सवाल के जवाब से पहले भारत में वंशवाद को समझने की कोशिश करते हैं. देश में छह राष्ट्रीय और 43 राज्य स्तरीय पार्टियों सहित ढाई हजार से ज्यादा दल हैं. यह तथ्य भारतीय लोकतंत्र को एक ऐसी विविधता देता है जो दुनिया के किसी दूसरे लोकतंत्र में नहीं है. कुछेक अपवाद छोड़ दें तो भारत की ज्यादातर बड़ी पार्टियों में वंशवाद की मौजूदगी है. मार्च 2019 में आए एक अध्ययन में बताया गया था कि 1999 से लेकर तब तक कांग्रेस के टिकट पर 36 ऐसे लोग लोकसभा आये थे जिन्हें वंशवादी राजनीति की उपज कहा जा सकता है. भाजपा के लिए यह आंकड़ा 31 था. 2009 में कांग्रेस के कुल लोकसभा सांसदों में 11 फीसदी राजनीतिक परिवारों से थे जबकि भाजपा के लिए यह आंकड़ा 12 फीसदी था. 2019 के आम चुनाव में लोकसभा पहुंचने वाले 542 सांसदों में से 162 यानी करीब 30 फीसदी किसी न किसी राजनीतिक परिवार से हैं जो एक रिकॉर्ड है.

यहां पर एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि राजनीतिक परिवारों से आने वाले उम्मीदवारों को टिकट देने के मामले में राष्ट्रीय दल राज्य स्तर के दलों के मुकाबले आगे दिखते हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव को लें तो उसमें राष्ट्रीय दलों के लिए यह आंकड़ा 27 फीसदी था जबकि राज्य स्तर के दलों के लिए यह इसके आधे से भी कम 12 फीसदी ही था. यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही कहें कि अब सरनेम से चुनाव जीतने के दिन गए, लेकिन जमीन पर स्थिति ऐसी नहीं है.

इसकी एक वजह वंशवाद से होने वाला लाभ भी है. स्थापित राजनीतिक परिवारों से ताल्लुक रखने वाले उम्मीदवारों का एक जमा-जमाया आधार होता है. जैसा कि एक समाचार वेबसाइट से बातचीत में दिल्ली स्थित सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज के निदेशक संजय कुमार कहते हैं, ‘इससे पार्टियों को यह फायदा होता है कि उन्हें चुनावी जीत के लिए ज्यादा कोशिश नहीं करनी पड़ती.’ उनके मुताबिक कांग्रेस और भाजपा अगर राजनीतिक परिवारों से आने वाले लोगों को टिकट देती हैं तो इसकी वजह यही होती है कि उनके जीतने की संभावना ज्यादा होती है. वंशवाद राजनीतिक दलों और नेताओं के ऊपर जवाबदेही का बोझ भी कम करता है. यानी उन्हें पता होता है कि अगर इन नेताओं ने कोई बड़ी गलती नहीं की तो उनका कोर वोटर उनके साथ ही रहेगा जिससे एक बार सत्ता खोने पर भी भविष्य में उनकी वापसी की संभावना बनी रहेगी.

इसे कांग्रेस के उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं जिसकी वंशवाद को लेकर सबसे ज्यादा आलोचना होती है. इसके तीन नेता – जवाहरलाल नेहरू, उनकी बेटी इंदिरा गांधी और इंदिरा के बेटे राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री रह चुके हैं. राजीव की पत्नी सोनिया गांधी को यूपीए की सरकार के समय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भी ज्यादा शक्तिशाली माना जाता था. कांग्रेस लंबे समय तक नेहरू-गांधी परिवार पर निर्भर रही क्योंकि उसका मानना था कि इस परिवार का करिश्मा सत्ता तक पहुंचने की चाबी है. लंबे समय तक ऐसा ही रहा भी. उधर, गांधी परिवार का गढ़ कहे जाने वाला अमेठी आज भी उत्तर प्रदेश के सबसे पिछड़े जिलों में शुमार होता है जबकि यहां से ज्यादातर मौकों पर संजय गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी जैसे दिग्गजों समेत कांग्रेस के ही नेता संसद जाते रहे हैं.

कांग्रेस का एक लंबे समय तक देश में एकछत्र राज रहा. आजादी के बाद करीब चार दशक तक केंद्र में उसे जो चुनौतियां मिलीं उनमें जनता पार्टी और जनता दल मुख्य थीं. जनता पार्टी ने 1977 में इंदिरा गांधी को पटखनी देकर केंद्र में सरकार बनाई. लेकिन यह तीन साल ही चल पाई और 1980 में आंतरिक मतभेदों के कारण इसका बिखराव हो गया. इसी तरह 1989 जनता दल की अगुवाई में केंद्र में राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार बनी. लेकिन यह भी एक साल में ही खेत रही. 1996 में एक बार फिर जनता दल की अगुवाई में केंद्र में संयुक्त मोर्चे की सरकार बनी, लेकिन यह भी बमुश्किल दो साल चल सकी. आज की जेडीयू, आरजेडी, जेडीएस, सपा और बीजेडी उसी जनता दल के ही टुकड़े हैं. इनमें से ज्यादातर भाजपा के राजनीतिक एकाधिकार की कोशिशों को चुनौती दे रहे हैं.

दिलचस्प बात यह है कि वंशवाद से रहित जनता पार्टी और जनता दल तो कुछ साल भी नहीं टिक सके, लेकिन अब इनके जो टुकड़े हैं वे लंबे समय से टिके हुए हैं. यही बात भारत के बाकी क्षेत्रीय दलों के बारे में भी कही जा सकती है जिनमें शिवसेना से लेकर डीएमके तक तमाम नाम शामिल हैं. कई जानकार मानते हैं कि इन दलों की उत्तरजीविता का कारण वंशवाद ही है. उनके मुताबिक भारतीय समाज का मानस कुछ इस तरह का है कि इन पार्टियों में मुखिया की संतानों या दूसरे परिजनों को स्वाभाविक उत्तराधिकारी की तरह देखा जाता है. इन पार्टियों के कर्ता-धर्ता भी यह बात समझते हैं इसलिए वे अपनी संतानों को ही आगे बढ़ाते हैं. शेख अब्दुल्ला-फारुख अब्दुल्ला-उमर अब्दुल्ला, बाल ठाकरे-उद्धव ठाकरे-आदित्य ठाकरे, लालू यादव-तेजस्वी यादव, करुणानिधि-स्टालिन, मुलायम सिंह-अखिलेश यादव और एचडी देवेगौड़ा-एचडी कुमारस्वामी-निखिल कुमारस्वामी जैसी तमाम कड़ियों में हम यही सिलसिला देख सकते हैं.

लेकिन जिन दलों में वंशवाद नहीं है, उनका भविष्य खतरे में रहता है. यह जनता पार्टी और जनता दल जैसे अतीत के उदाहरणों से ही साबित नहीं होता. मौजूदा दौर में भी यह बात दिखती है. बिहार में भाजपा के साथ सत्ता संभाले जेडीयू को ही लें. नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की राजनीति में दिलचस्पी नहीं है. इसके अलावा जिस तरह से बिहार के मुख्यमंत्री ने जेडीयू को अपना पर्याय बना लिया है उसे देखते हुए माना जा रहा है कि उनके जाने के बाद इस पार्टी का बिखरना तय है. कुछ ऐसा ही जयललिता के निधन के बाद गुटबाजी से जूझ रही और हालिया विधानसभा चुनाव में तमिलनाडु की सत्ता गंवा चुकी एआईएडीएमके के बारे में कहा जा सकता है. एक उदाहरण बीजू जनता दल का भी है. पार्टी के सर्वेसर्वा नवीन पटनायक के बाद इसका क्या होगा, कहा नहीं जा सकता. यही आशंका बहुजन समाज पार्टी को लेकर भी जताई जा सकती है.

इसे देखकर एक दिलचस्प दलील दी जा सकती है कि भारतीय लोकतंत्र के मामले में वंशवाद एक लिहाज से फायदेमंद भी है क्योंकि यह किसी एक पार्टी के एकछत्र राज पर लगाम लगाने का काम करता है. अगर वंशवाद न हो तो क्षेत्रीय पार्टियां खत्म हो जाएंगी जिससे एकाधिकार और तानाशाही का खतरा बढ़ सकता है. लोकतंत्र की मजबूती के लिए जिन कारकों को सबसे अहम माना जाता है उनमें से एक राजनीतिक दलों की विविधता भी है और भारतीय परिस्थितियों में वंशवाद एक लिहाज से इस विविधता को बचाने में मदद करता है.

एक वर्ग मानता है कि वंशवादी राजनीति लोकतंत्र को स्थिर स्वरूप देने में भी मदद कर सकती है. शर्त यह है कि उसकी शुरुआत जिस शख्स ने की है वह लोकतांत्रिक मूल्यों का पक्षधर रहा हो. यह दलील देने वाले इसके समर्थन में कांग्रेस का उदाहरण गिनाते हैं. उनके मुताबिक कांग्रेस के वंशवाद ने कई दुर्गुणों के बावजूद देश को वह राजनीतिक स्थिरता दी जिसमें लोकतांत्रिक मूल्य फल-फूल सके.

कुछ विश्लेषकों के मुताबिक लोकतंत्र में उभरने वाले राजनीतिक वंशवादियों में तानाशाही का विरोध करने की प्रवृत्ति अपने दूसरे समकालीनों से ज्यादा होती है. लोकतंत्र के कायम रहने में उनका स्वार्थ होता है क्योंकि इसमें ही वे वंशवाद का लाभ ले सकते हैं. माना जाता है कि इसलिए वंशवादी राजनीतिक परिवारों में लोकतंत्र से लगाव स्वभावगत ज्यादा होता है, फिर भले ही उनकी अपनी पार्टी में लोकतंत्र न हो. लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर आए या फिर लोकतंत्र की स्थापना में भाग लेने वाले राजनेता अपनी संतानों को प्रशिक्षित करते हुए उन्हें लोकतांत्रिक मूल्यों का समर्थन करना भी सिखाते हैं.

इसे फ्रांस के एक उदाहरण से समझा जा सकता है. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी ने फ्रांस पर हमला कर उसका एक बड़ा हिस्सा कब्जा लिया था. इसके बाद फ्रांस सरकार जर्मनी से संधि करने पर विचार करने लगी. लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री पॉल रेनॉद इस संधि के पक्ष में नहीं थे इसलिए उन्होंने इस्तीफा दे दिया. उनकी जगह प्रथम विश्व युद्ध के अनुभवी और लोकप्रिय जनरल मार्शल फिलिप पीटां प्रधानमंत्री बने. जल्द ही उन्होंने जर्मनी के साथ संधि पर दस्तखत कर दिए. यही नहीं, संसद में एक कानून पारित करवाकर उन्होंने सारी शक्तियां अपने हाथ में ले लीं. इसके साथ ही करीब 70 साल पुराने तृतीय फ्रांसीसी गणतंत्र का अंत हो गया और देश एक सैन्य तानाशाह के हाथ में आ गया.

यह कानून फ्रांसीसी संसद में 10 जुलाई 1940 को पारित हुआ था. 80 यानी करीब 12 फीसदी सांसदों ने इसके विरोध में वोट दिए थे. इनमें ऐसे सांसदों की संख्या दूसरों से ज्यादा थी जो लोकतंत्र के दौरान उभरे राजनीतिक वंशवादी परिवारों से ताल्लुक रखते थे. यानी उन्होंने देश में तानाशाही का मार्ग प्रशस्त करने वाले कानून का दूसरों की तुलना में ज्यादा विरोध किया था. यहां याद रखना होगा कि उस समय फ्रांस परिवहन से लेकर संचार व्यवस्था तक तमाम अहम मोर्चों पर अराजकता का शिकार था. लेकिन तमाम मुश्किलों से जूझते हुए ये राजनेता संसद पहुंचे थे और नई सत्ता की नजर में चढ़ने और इसका दंड पाने के जोखिम के बावजूद उन्होंने तानाशाही स्थापित करने वाले कानून के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराया था.

ऐसे उदाहरण भारतीय राजनीति में भी मिल जाते हैं. इतिहास टटोलें तो हम पाते हैं कि मुलायम सिंह और लालू प्रसाद यादव जैसे राजनेताओं ने उस सांप्रदायिकता का डटकर मुकाबला किया जिसे किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए सबसे बड़े खतरों में गिना जाता है. यह अलग बात है कि इसके लिए उन पर विभिन्न समुदायों-समूहों के तुष्टीकरण के आरोप लगते रहे और अपनी पार्टियों को वे निजी जागीर की तरह चलाते दिखते रहे जिनमें उत्तराधिकारी की जगह सिर्फ उनकी संतानों के लिए थी. हालांकि इस पर ऐसे राजनेताओं का तर्क यह रहा है कि जब डॉक्टर के बेटे के डॉक्टर बनने पर कोई सवाल खड़ा नहीं करता तो उनके मामले में ऐसा क्यों होता है और आखिर में फैसला तो जनता ही करती है.

एक वर्ग के मुताबिक वंशवाद राजनीति को समावेशी बनाने में भी मदद करता है और इससे उन समूहों को फायदा मिलता है जो परंपरागत रूप से हाशिये पर रहे हैं – मसलन पिछड़ी जातियां और महिलाएं. इस लोकसभा में 120 सांसद पिछड़ी जातियों से हैं जबकि महिला सांसदों की संख्या 78 है. इनका एक बड़ा हिस्सा राजनीतिक परिवारों से ही ताल्लुक रखता है. कई मानते हैं कि तथाकथित ऊंची जातियों और पितृसत्ता की अब भी ठीक-ठाक जकड़बंदी के बावजूद संसद में इन समूहों की हिस्सेदारी अगर एक तिहाई से ज्यादा हो गई है तो इसमें वंशवाद की भी भूमिका है.

तो कोई निश्चित फैसला देने के बजाय अगर लोकतंत्र में राजनीतिक वंशवाद को एक प्रक्रिया की तरह देखा जाए तो इससे जुड़े विरोधाभास इसे खासा दिलचस्प बनाते दिखते हैं.

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