कोरोना वायरस, लॉकडाउन

विज्ञान-तकनीक | कोरोना वायरस

क्यों कुछ लोग इस बात पर ही शक करते हैं कि कोरोना वायरस एक महामारी है

कोरोना वायरस से निपटने से जुड़ी तमाम असफलताओं और हमारी असावधानियों के बावजूद दुनिया के हालात बदतरीन न होना, उम्मीद और संशय दोनों ही पैदा करते हैं

अंजलि मिश्रा | 10 सितंबर 2020 | फोटो: ट्विटर/एएनआई

कोविड-19 जैसी घातक और अतिसंक्रामक बीमारियों के लिए हिंदी में महामारी शब्द का इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन अंग्रेजी में इस तरह की संक्रामक बीमारियों के लिए एक नहीं तीन शब्द हैं – एंडेमिक, एपिडेमिक और पैन्डेमिक. एंडेमिक (Endemic) ग्रीक शब्दों एन (En या In यानी में) और डेमोस (demos यानी लोग) शब्दों से बना है. एंडेमिक उस बीमारी को कहा जाता है जो किसी एक समाज, समुदाय या देश के लोगों में फैलती है. उदाहरण के लिए, मच्छरों से फैलने वाला मलेरिया एक ऐसी ही बीमारी है. इससे ज्यादातर अफ्रीकी देश प्रभावित रहते हैं इसलिए यह इन देशों के लिए एंडेमिक है. एंडेमिक के कुछ और उदाहरणों पर गौर करें तो ब्रिटेन में चिकनपॉक्स, पनामा क्षेत्रों में शागस डिजीज और कुछ कैरेबियन देशों के लिए डेंगू को भी एंडेमिक घोषित किया गया है. एंडेमिक कई बार उस क्षेत्र विशेष में हमेशा मौजूद रहने वाली बीमारी होती है.

कुछ इसी तरह के अर्थों में इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द एपिडेमिक (Epidemic) पर आएं तो यह भी ग्रीक शब्द एपि (Epi या above यानी ऊपर) के साथ डेमोस को जोड़कर बना है. एपिडेमिक उस बीमारी को कहा जाता है जो बहुत थोड़े समय में बहुत सारे लोगों पर अपना असर डालती है. उदाहरण के लिए, साल 2016-17 में अमेरिका में कहर ढाने वाले ज़ीका वायरस, 2014-16 में पश्चिमी अफ्रीका में फैलने वाले इबोला वायरस और साल 2003 में एशिया के कुछ इलाकों में कोरोना वायरस (सार्स) से फैली बीमारियों को भी एपिडेमिक की श्रेणी में रखा गया है. यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि एपिडेमिक शब्द सिर्फ संक्रामक बीमारियों के लिए ही नहीं, बल्कि समाज पर व्यापक नकारात्मक प्रभाव डालने वाली चीजों या चलनों के संदर्भ में भी इस्तेमाल किया जाता है. जैसे कि दुनिया भर में लोगों में बढ़ रहे मोटापे को ओबेसिटी एपिडेमिक कहा जाता है.

संक्रामक बीमारियों के सबसे घातक संस्करण को पैन्डेमिक (Pandemic) कहा जाता है. पैन्डेमिक भी ग्रीक शब्दों पैन (Pan या All यानी सभी) और डेमोस से मिलकर बना है. यानी शाब्दिक अर्थों पर जाएं तो सभी लोगों तक पहुंचने वाली बीमारी को पैन्डेमिक कहा जाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की परिभाषा के मुताबिक वह संक्रामक बीमारी जो दुनिया भर में फैलती है और अधिक से अधिक लोगों को प्रभावित करती है, पैन्डेमिक कहलाती है. अगर हम यहां पर पैन्डेमिक के लिए महामारी शब्द का इस्तेमाल करें तो कोई संक्रामक बीमारी तब महामारी मानी जा सकती है जब वह –

1. बड़े पैमाने पर, ज्यादातर मामलों में वैश्विक स्तर पर, लोगों को प्रभावित करे

2. किसी ऐसे नए वायरस या पुराने/ज्ञात वायरस के उस संस्करण से उपजी हो जिसे सालों तक निष्क्रिय समझा गया हो

3. कम रोगप्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को बहुत आसानी से अपनी जद में ले सकती हो

4. बहुत सारे लोगों की मौत की वजह बन रही हो

5. इन सभी वजहों से बड़े सामाजिक और आर्थिक बदलावों की वजह बन रही हो

डब्ल्यूएचओ ने इन पैमानों के आधार पर नए कोरोना वायरस सार्स-कोव-2 (SARS-CoV2) के चलते फैल रही बीमारी कोविड-19 को महामारी घोषित किया है. लेकिन अगर हम अपने आसपास के माहौल, उसमें बरती जा रही असावधानियों, इससे निपटने के लिए अब तक अपनाये गये तरीकों और हर दिन आने वाले संक्रमण के आंकड़ों पर गौर करें तो उसके इस आकलन को एक बार फिर परख लेने की ज़रूरत महसूस होती है.

मार्च के तीसरे हफ्ते में पूरे देश में तालाबंदी कर बचाव का रास्ता खोज रहे भारत में यह रिपोर्ट लिखे जाने तक अनलॉक-4.0 की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. यानी अर्थव्यवस्था, सामाजिक आयोजनों और यातायात के साधनों को दोबारा शुरू करने का काम अब अपने चौथे चरण में पहुंच चुका है. अब 169 दिनों से बंद पड़ी दिल्ली मेट्रो भी चल पड़ी है, सामाजिक और राजनीतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाने की छूट मिल चुकी है, यहां तक कि अभिभावकों की लिखित अनुमति मिलने पर कक्षा 9 से 12 तक के छात्रों को अब स्कूल में भी बुलाया जा सकता है. मॉल, बाज़ार, दुकानें जहां अनलॉक के शुरूआती चरण में ही खुल चुके हैं. वहीं, लगभग आधी से अधिक अंतरराज्यीय रेलगाड़ियां भी चलने लगी हैं. कुल मिलाकर, कहा जा सकता है कि अगर सुरक्षा उपायों को अपनाकर घर से बाहर निकला जाए तो कंटनेमेंट ज़ोन के अलावा देश के किसी भी कोने में अब बेरोक-टोक जाया जा सकता है.

और ये सुरक्षा उपाय हैं क्या? एक अदद मास्क, सैनिटाइजर का उपयोग और एक-दूसरे से थोड़ी सी दूरी. अब जरा अपने आसपास किसी सार्वजनिक स्थान पर थोड़ी सी नजर दौड़ाएं. वहां पर आपको काफी लोग (सब नहीं) मास्क तो लगाए दिखाई देंगे लेकिन इनमें से कई या तो उसे गले में लटकाए होंगे या फिर उनकी नाक इससे बाहर निकली होगी. अगर वहां पर बच्चों वाले कुछ परिवार मौजूद होंगे तो किसी परिवार में माता-पिता के चेहरे पर मास्क होगा तो बच्चे यूं ही घूमते दिखाई देंगे. कहीं बच्चा मास्क लगाए दिख जाएगा तो माता-पिता नहीं लगाए होंगे या आधे-अधूरे तरीके से लगाए होंगे. इसके अलावा मॉल या दुकानों पर मास्क या सैनिटाइजर्स के इस्तेमाल के लिए उस तरह से बाध्य नहीं किया जा रहा है जैसा किसी कोरोना जैसे संक्रमण से निपटने के लिए जरूरी होना चाहिए. अगर किसी जगह लोगों के इस्तेमाल के लिए सैनिटाइजर रखा हुआ है तो लोग उसे ठीक से इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं. और अगर कहीं कोई व्यक्ति उसे आपके हाथों में लगा रहा है तो वह सही मात्रा में उसे नहीं दे रहा है. और इसके बावजूद हम दुकानों पर रखी हर चीज को खूब छू-छू कर देख रहे हैं. सार्वजनिक जगहों पर असावधानी से बात करने, छूने-टकराने, यहां तक कि खुले मुंह खांसने-छींकने के दृश्य भी कोई अपवाद नहीं हैं. और अब लोग उन रेस्टरॉन्टों में जाकर खाना भी खाने लगे हैं जिनमें वही लोग काम कर रहे हैं जो सार्वजनिक जगहों पर इस तरह का आचरण करते हैं.

जब मास्क पहनने, संभव होने पर भी छोड़ी सी दूरी बरतने और फ्री के सैनिटाइजर को सार्वजनिक स्थानों पर ही इस्तेमाल करने के प्रति लोगों का यह रवैया है तो व्यक्तिगत जगहों पर कोरोना वायरस से सावधान रहने के मामले में लोग कैसे होंगे अंदाज़ा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है. और जब बड़े शहरों का यह हाल है तो ग्रामीण इलाकों का क्या हाल होगा? और फिर भारत में तो एक बड़ा तबका सरकार और वैश्विक संस्थाओं द्वारा किए जा रहे तमाम विज्ञापनों के बावजूद अब भी कोरोना वायरस को गंभीरता से लेने को तैयार नहीं है. कुछ के लिए यह राजनीतिक पार्टियों की चाल है तो कइयों के लिए चीन की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए खड़ा किया गया बेवजह का हौवा. ऐसे में, आश्चर्य होता है कि इतनी लापरवाहियों के बाद भी अब तक की सबसे संक्रामक महामारी कहा जाने वाला कोरोना वायरस, एक दिन में अधिकतम (केवल) 90 हजार लोगों को ही संक्रमित कर पा रहा है!

आंकड़ों की बात करें तो यह रिपोर्ट लिखे जाने तक दुनिया भर में करीब दो करोड़ 70 लाख (27 मिलियन) लोग कोरोना संक्रमण का शिकार हो चुके हैं और इससे होने वाली कुल मौतों का आंकड़ा आठ लाख 80 हजार है. भारत के मामले में संक्रमणों की संख्या जहां 42 लाख है, वहीं लगभग 72 हजार लोगों की कोविड-19 से मृत्यु हो चुकी है. हालांकि महज 10 महीने के थोड़े से समय में किसी बीमारी से इतनी मौतें होना भयावह और चिंताजनक बात है लेकिन मानव सभ्यता के इतिहास में आई पिछली महामारियों के संदर्भ में देखें तो यह नुकसान उतना असामान्य भी नहीं लगता है.

उदाहरण के लिए, 21वीं सदी में आई पहली महामारी – एनफ्लुएंजा वायरस (एच1एन1) – से केवल 2009 में मरने वालों का आंकड़ा डब्ल्यूएचओ के मुताबिक डेढ़ से चार लाख के बीच था. इससे पीछे चलें तो साल 1968 में कहर ढाने वाली महामारी हांगकांग फ्लू (एच2एन2) से मरने वालों का आंकड़ा दस लाख था तो 1957-58 में आई महामारी एशियन फ्लू ने पंद्रह से बीस लाख लोगों की जान ले ली थी. वहीं, बीती सदी की सबसे घातक महामारी कहे जाने वाले स्पैनिश फ्लू (1918-1920) के चलते लगभग पांच करोड़ लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे थे. किसी बीमारी में मृत्यु दर कम होना राहत की बात तो है लेकिन इसके साथ यह बीमारी की भयावहता को आंकने का एक ज़रूरी घटक भी है. और इन पर ध्यान देने पर पता चलता है कि बीती सदी में आई कई महामारियों की तुलना में कोविड-19 कम घातक है.

अगर कुछ आम लेकिन घातक मानी जाने वाली बीमारियों जैसे ट्यूबरक्लोसिस (टीबी), न्यूमोनिया और डायरिया से कोविड-19 की तुलना करें तो उन वैज्ञानिकों की बात भी समझ में आने लगती है जो कहते हैं कि अब कोरोना वायरस हमेशा हमारे साथ रहने वाला है. यह कैसे रहेगा, इसका सबसे सटीक उदाहरण टीबी है जो कभी महामारी समझी जाती थी. अब इसका इलाज तो मिल चुका है लेकिन इसे पूरी तरह से खत्म नहीं किया जा सका है. टीबी से जुड़े डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों पर गौर करें तो अकेले साल 2018 में लगभग एक करोड़ लोग टीबी का शिकार हुए थे जिनमें से पंद्रह लाख लोगों ने अपनी जान गंवा दी.

इसी क्रम में न्यूमोनिया की बात करें तो अकेले साल 2017 में न्यूमोनिया से 25 लाख लोगों की जान गई थी जिसमें एक तिहाई संख्या, पांच साल से कम उम्र के बच्चों की थी. यहां तक कि गंदा पानी पीने से होने वाली डायरिया जैसी सामान्य बीमारी की बात करें तो हर साल 1.7 अरब बच्चे इसकी चपेट में आते हैं और पांस साल से कम उम्र के करीब सवा पांच लाख बच्चों की मृत्यु इसकी वजह से हो जाती है. अगर इनमें पांच साल से बड़ों को भी मिला दें तो डायरिया से मरने वाले कुल लोगों की संख्या 15 लाख से ज्यादा है.

इसी तरह, 2018 में दुनिया भर में मलेरिया से पीड़ित होने वाले लोगों की संख्या लगभग 23 करोड़ (228 मिलियन) थी, जो बीते दस महीनों में हुए कोरोना संक्रमणों की संख्या से लगभग दस गुना है. इससे होने वाली सालाना मौतों का आंकड़ा साढ़े चार लाख से छह लाख है. यहां पर पूछा जा सकता है कि अगर आम मानी जाने वाली ये बीमारियां महामारी नहीं हैं तो कोविड-19 महामारी कैसे हुई?

बेशक, ऊपर बताए गए कुछ उदाहरणों में मृत्यु दर कोरोना वायरस की तुलना में कम है लेकिन इनमें से कुछ बीमारियों में संक्रमण के फैलने की रफ्तार कोरोना वायरस के बराबर या उससे ज्यादा ही है. ऐसी कई बीमारियों की तरह कोविड-19 के बारे में भी ध्यान रखने वाली बात है कि 100 में 98 लोगों को इसके चलते जान का खतरा नहीं होता है. और ज्यादातर लोगों के लिए यह एक सामान्य फ्लू से ज्यादा कुछ भी नहीं होता है. इसके साथ ही हाल ही में आई एक रिपोर्ट कहती है कि कोरोना संक्रमण से होने वाली मौतों के ज्यादातर मामलों में पीड़ित पहले से ही किसी और गंभीर बीमारी के शिकार थे. इन बीमारियों में कैंसर, हायपरटेंशन, डायबिटीज और हृदय संबंधी रोग शामिल हैं.

इन तमाम बातों के अलावा, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और विश्व स्वास्थ्य संगठन का रवैया भी कुछ लोगों को कोविड-19 के महामारी होने पर सवाल उठाने की वजह बन जाता है. मार्च में कोरोना वायरस के दुनिया भर में फैलने के साथ ही ये कॉन्सपिरेसी थ्योरीज भी आने लगी थीं कि चीन ने दुनिया की अर्थव्यवस्था पर अपना दबदबा बढ़ाने के लिए इस बायो-हथियार का इस्तेमाल किया है. इस तरह की बातों को तब और हवा मिली जब अप्रैल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने डब्ल्यूएचओ की दी जाने वाली आर्थिक मदद रोकने की बात कही. अमेरिका ने डब्ल्यूएचओ पर चीन के साथ सांठ-गांठ करने का आरोप लगाया था. अगर डोनाल्ड ट्रंप के इन आरोपों को सिरे से खारिज भी कर दिया जाए तो भी कोरोना वायरस के मामले में विश्व स्वास्थ्य संगठन का रवैया बहुत जिम्मेदाराना नहीं लगता है.

अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार इस बात को संशय की नज़रों से देखते है कि चार महीनों तक कोरोना वायरस को महामारी मानने से इनकार करने वाला डब्ल्यूएचओ अब कई बार यह कह चुका है कि ‘द वर्स्ट इज येट टू कम’ यानी कोविड-19 का सबसे बुरा दौर आना अभी बाकी है. कोरोना वायरस की टाइमलाइन पर गौर करें तो 14 जनवरी तक डब्ल्यूएचओ यह मानने से इनकार करता रहा था कि वायरस एक से दूसरे व्यक्ति तक पहुंच सकता है. वहीं, 11 मार्च आते-आते स्थितियां कुछ इस तरह की बन गईं कि कोविड-19 को पैन्डेमिक घोषित करना पड़ गया. इसीलिए डब्ल्यूएचओ पर अपना काम जिम्मेदारी से न करने के साथ-साथ चीन पर ज़रूरत से ज्यादा भरोसा दिखाने के आरोप भी लगते रहे हैं.

जानकारों के मुताबिक दुनिया के स्वास्थ्य के लिए जिम्मेदार विश्व स्वास्थ्य संगठन ने शुरुआत में ताइवान और हांगकांग जैसी सतर्कता भी नहीं दिखाई. यह कोई पहला मौका नहीं था जब चीन ने किसी वायरस के फैलाव को लेकर झूठ बोला था, साल 2003 में फैले कोरोना वायरस को लेकर भी उसका रवैया यही रहा था. ताइवान और हांगकांग यह बात समझते थे इसलिए उन्होंने चीन के तमाम दावों और डब्ल्यूएचओ के निर्देशों को अनसुना करते हुए शुरूआत में ही यात्रा प्रतिबंध लगा दिए. नतीजतन, ताइवान में जहां 500 से भी कम कोरोना के मामले आए वहीं चीन से सटे उसके ही स्वायत्त हिस्से हांगकांग में यह आंकड़ा अब भी 5000 से नीचे ही है.

लेकिन 31 जनवरी को जब अमेरिका ने यात्रा प्रतिबंध लगाए तो डब्ल्यूएचओ ने इस कदम की यह कहते हुए आलोचना की कि इससे कोरोना वायरस को लेकर घबराहट का माहौल बनेगा. यह और बात है कि फरवरी का दूसरा हफ्ता आते-आते खुद संगठन भी चीन पर धोखेबाज़ी करने और आंकड़े छिपाने का आरोप लगाने लगा. बर्कले के रिसर्च साइंटिस्ट झिआओ क्वियांग अमेरिकी पत्रिका द अटलांटिक से बातचीत करते हुए कहते हैं कि ‘महामारी की शुरूआत में डब्ल्यूएचओ के डायरेक्टर जनरल जिस तरह से मीडिया से बात करते थे, वह मेरे लिए बहुत चौंकाने वाला था. वे हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में चीन के ऑफिशियल स्टेटमेंट की बातें ही दुहरा दिया करते थे.’

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी न केवल डब्ल्यूएचओ बल्कि उसके महानिदेशक डॉ टेड्रोस एडहानम गैब्रिएसेस पर भी चीन का पक्ष लेने का आरोप लगा चुके हैं जिसे वैश्विक मामलों के कई जानकार गलत नहीं मानते हैं. साल 2017 में अमेरिका के बाद चीन के समर्थन के चलते ही वे डब्ल्यूएचओ के प्रमुख बन पाए थे. पद पर आते ही टेड्रोस एडहानम ने चीन की वन चाइना पॉलिसी का समर्थन किया था. इसके अलावा, हाल ही में जारी किए गए दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं के आंकड़ों ने चीन और विश्व स्वास्थ्य संगठन से जुड़ी कॉन्सपिरेसी थ्योरीज को फिर चर्चा में ला दिया है. हालिया आंकड़े कहते हैं कि कोरोना वायरस के चलते बाकी अर्थव्यवस्थाओं को जहां पुरानी स्थिति में आने में कई सालों का वक्त लग जाएगा, वहीं चीनी अर्थव्यपस्था अपने नुकसान की भरपाई इस साल के अंत तक ही चुकी होगी. ऐसे में कुछ लोगों का कहना है कि डब्ल्यूएचओ ने पहले तो इस समस्या को नजरअंदाज कर इसे बढाया और बाद में वह इसे ज्यादा गंभीर बताकर भारत सहित कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं की हालत बिगाड़ने की वजह बन गया.

डॉ टेड्रोस एडहानम गैब्रिएसेस का व्यक्तिगत इतिहास भी महामारियों के मामले में बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता है. डॉ टेड्रोस साल 2005 से 2012 तक अफ्रीकी देश इथियोपिया के स्वास्थ्य मंत्री रहे थे और उनके कार्यकाल में इथियोपिया तीन बार कॉलरा एपिडेमिक का शिकार हुआ था. साल 2006, 2009 और 2011 में उभरी इस महामारी को वे लगातार ‘एक्यूट वॉटरी डायरिया’ बताते रहे थे और दूर-दराज के इलाकों में टेस्टिंग-मॉनीटरिंग संभव न होने की शिकायत करते रहे थे. इस दौरान, उसी डब्ल्यूएचओ के प्रतिनिधियों ने जिसके आज वे मुखिया हैं, इथियोपिया सरकार पर आंकड़े छुपाने और सही जानकारी न देने का आरोप लगाया था. ऐसे में कुछ जानकार इस बात की संभावना भी जताते हैं कि हो सकता है डब्ल्यूएचओ कोरोना वायरस के मामले में डॉ टेड्रोस की अदूरदर्शिता का भी शिकार बन गया हो. ये लोग मानते हैं कि हो सकता है कि शुरू में इसे गंभीरता से न लेने की भरपाई बाद में उन्होंने अतिरिक्त सतर्कता दिखाकर करने की कोशिश की हो.

कुल मिलाकर आज ऐसा मानने वालों की कमी नहीं है जो कहते हैं कि कोरोना वायरस को लेकर देर से सक्रिय हुआ विश्व स्वास्थ्य संगठन अब अपनी साख बचाने के लिए इसे अति-घातक बताने और उसके हिसाब से वैश्विक नीतियां बनवाने की कोशिशों में लगा हुआ है.

यह कोई पहला मौका नहीं है जब संयुक्त राष्ट्र की किसी संस्था की साख दांव पर लगी हुई है. इससे पहले भी महामारियों, मानवाधिकारों, वैश्विक शांति और पर्यावरण से जुड़ी अपनी अतार्किक नीतियों से लेकर पक्षपात, खुशामद और नस्लवाद तक के लिए यूएन और उसकी कई संस्थाएं आलोचनाओं के घेरे में आ चुकी हैं. कुछ लोग कोरोना वायरस को संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था इंटरगवर्मेंटल पैनल ऑफ क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की उस अति-चर्चित भविष्यवाणी से जोड़कर भी देखते हैं जो बाद में विवादों की वजह बनी थी. आईपीसीसी ने साल 2007 में जारी एक रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी कई भविष्यवाणियां की थीं. इनमें यह भी शामिल था कि 2035 आते-आते हिमालय की सारी बर्फ पिघल जाएगी. ऐसे में लोगों को थोड़ी उम्मीद इस बात की भी हो जाती है कि हो सकता है, कोरोना वायरस के मामले में भी डब्ल्यूएचओ गलत साबित हो और दुनिया भारी नुकसान उठाने के बाद भी, एक बार फिर वैसी ही बन जाए.

कोरोना वायरस पर लगातार कवरेज कर रहे एक वरिष्ठ पत्रकार एक अनौपचारिक बातचीत में कहते हैं कि ‘हो सकता है कि कई सालों बाद हमें पता चले कि जिस कोरोना वायरस के चलते हम महीनों घरों में बंद रहे और सालों के लिए हमारी अर्थव्यवस्था की हालत खराब हो गई. वह डेंगू-मलेरिया सरीखा कोई रोग भर था जो केवल छिछली अंतरराष्ट्रीय राजनीति, महत्वपूर्ण पदों पर बैठे कुछ अयोग्य लोगों के गलत फैसलों और एक निकम्मी सरकार के चलते लाखों जानें जाने की वजह बन गया.’

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