दवाएं

विज्ञान-तकनीक | स्वास्थ्य

जब कोविड के मरीज पर एजिथ्रोमाइसिन और आइवरमेक्टिन असर नहीं करतीं तो उन्हें दिया क्यों जा रहा है?

कई राज्यों में कोविड-19 के इलाज के लिए बनाई गई सरकारी मेडिकल किटों में भी इन दवाओं को शामिल किया गया है

अंजलि मिश्रा | 01 मई 2021 | फोटो: पिक्साबे

22 अप्रैल, 2021 वह तारीख है जब भारत में रोज़ाना आने वाले कोविड मामलों के आंकड़े ने एक नई ऊंचाई छुई. इस दिन देश भर में 3.14 लाख कोविड मामले दर्ज किए और इसी के साथ दुनिया भर में एक दिन में सबसे अधिक मामले दर्ज करने का रिकॉर्ड भारत के नाम हो गया. इसके बाद से अब तक हर दिन यह आंकड़ा लगभग रोज ही थोड़ा बढ़कर सामने आ रहा है. स्वाभाविक है कि भारत क्या दुनिया के किसी भी देश के पास इतने मामलों से एक साथ निपटने के  लिए स्वास्थ्य संसाधन नहीं हो सकते हैं. ऐसे में रोज़ाना आने वाले इन लाखों लोगों में से ज्यादातर लोग उनके घरों में ही क्वारंटीन किए जा रहे हैं जहां वे ज़रूरी या बहुत बार सिर्फ कामचलाऊ डॉक्टरी देख-रेख में संक्रमण का मुकाबला रहे हैं. ऐसे लोगों में बड़ा तबका उन लोगों का है जिन्हें डॉक्टरी देख-रेख के नाम पर दवाओं का नाम लिखी सिर्फ एक सरकारी पर्ची भर मिल पाती है.

अब अगर यह पूछा जाए कि इस कोरोना वायरस का स्टैंडर्ड प्रेस्क्रिप्शन कही जाने वाली इस सरकारी पर्ची पर किन दवाओं के नाम लिखे होते हैं तो इसका जवाब होगा – पैरासीटामॉल, एजिथ्रोमाइसिन, डॉक्सी (डॉक्सीसाइक्लिन), आइवरमेक्टिन और विटामिन बी, सी और डी जैसे कुछ सप्लीमेंट्स. पैरासीटामॉल और विटामिन स्पलीमेंट्स को छोड़ दें तो बाकी तीन दवाओं से कोरोना वायरस के इलाज में कोई मदद मिलती है, इस बात के कोई वैज्ञानिक साक्ष्य मौजूद नहीं हैं.

तमाम चिकित्कीय शोधों में बार-बार यह कहा जा चुका है कि कोरोना संक्रमण के इलाज में एजिथ्रोमाइसिन और डॉक्सीसाइक्लिन की कोई भूमिका नहीं है. बीते साल नवंबर में ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा शुरू किए गए एक शोध में 50 साल से अधिक उम्र वाले कोरोना संक्रमितों के एक समूह को तीन दिनों तक एजिथ्रोमाइसिन और दूसरे समूह को छह दिनों तक डॉक्सीसाइक्लिन दी गई. जनवरी, 2021 में आए इस शोध के नतीजे बताते हैं कि इन दवाओं के इस्तेमाल से न तो मरीज की रिकवरी में तेज़ी आई और न ही इन्हें इलाज की शुरूआत में देने पर लक्षणों को नियंत्रित करने में कोई खास मदद मिल सकी. लेकिन फिर भी इन्हें दिया जा रहा है, क्यों?

इन दवाओं के इस्तेमाल के पीछे दिया जा रहा पहला तर्क यह है कि जब इन्हीं एंटीबायोटिक और एंटीवायरल दवाओं का इस्तेमाल साधारण सर्दी-बुखार यानी फ्लू से निपटने के लिए किया जा रहा है तो फिर कोरोना संक्रमण का इलाज करते हुए इन्हें देने में क्या बुराई है. लेकिन ऐसा कहते हुए जिस पक्ष की तरफ आम तौर पर ध्यान नहीं जाता है, वह यह है कि एजिथ्रोमाइसिन या डॉक्सी जैसी दवाओं का इस्तेमाल फ्लू के इलाज के लिए किया तो जाता है, लेकिन तब भी मरीज के लक्षणों के मुताबिक इनका इस्तेमाल करने या न करने की सलाह दी जाती है. वहीं, कोरोना वायरस के संदर्भ में तथ्य यह है कि चाहे मरीज में संक्रमण के लक्षण गंभीर हों या फिर हल्के-फुल्के, सभी को यही दवाएं दी जा रही हैं.

इन दवाओं के इस्तेमाल के पीछे दूसरा तर्क यह दिया जा सकता है कि किसी भी रेस्पिरेटरी (श्वसन संबंधी) वायरल इंफेक्शन के मरीजों में दूसरे अन्य संक्रमण होने की संभावना हमेशा रहती है, इन्हें सेकंडरी या को-इंफेक्शन कहा जाता है. इस तरह के इंफेक्शन आम तौर पर बैक्टीरिया के चलते होते हैं और ये अक्सर मरीज की स्थिति गंभीर होने या कुछ मौकों पर मौत का कारण भी बन सकते हैं. 1918 में आई इन्फ्लुएंजा महामारी और 2009 में हुए एन1एच1 इन्फ्लुएंजा के कहर के दौरान भी हुई ज्यादातर मौतें इसी तरह के बैक्टीरियल को-इंफेक्शन के चलते ही हुई थीं. इसलिए अक्सर वायरल संक्रमणों का इलाज करते हुए एंटीबायोटिक्स और एंटीवायरल दवाएं भी दी जाती हैं.

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में निजी प्रैक्टिस करने वाली डॉक्टर आस्था पाठक इसे लेकर कहती हैं कि ‘कोरोना वायरस के संक्रमितों को सेंकडरी इंफेक्शन से बचाने के लिए उन्हें ये एंटीबायोटिक्स दिए जा रहे हैं. हालांकि कोविड के मामले में इस तरह के सेकंडरी इंफेक्शन होने या उससे मौत के आंकड़े मौजूद नहीं है लेकिन फिर भी ये दवाएं दी जा रही हैं. मलेरिया, फ्लू वगैरह के इलाज में ये हमेशा दी जाती हैं इसलिए दिए चले जा रहे हैं. इनसे तुरंत कोई नुकसान तो नहीं होगा लेकिन मरीज के एंटीबायोटिक रेजिस्ट होने के कारण भविष्य में किसी और तरह की बीमारी का इलाज करवाने में उन्हें दिक्कत आ सकती है.’

स्टैंडर्ड कोविड प्रेस्क्रिप्शन

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में दिए जा रहे कोरोना वायरस के स्टैंडर्ड प्रेस्क्रिप्शन में ये एंटीबायोटिक दवाएं बिना झिझक दी जा रही हैं. उत्तर प्रदेश में दिए जाने वाले पर्चे (ऊपर तस्वीर) में आइवरमेक्टिन भी शामिल है. जबकि बीते महीने ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एडवाइज़री जारी कर स्पष्ट निर्देश दिए थे कि आइवरमेक्टिन का इस्तेमाल केवल क्लीनिकल ट्रायल में ही किया जाना चाहिए.

इन तमाम निर्देशों को दरकिनार करते हुए आइवरमेक्टिन का इस्तेमाल क्यों किया जा रहा है, इस सवाल का जवाब देते हुए उत्तर प्रदेश के एक जिला अस्पताल में कार्यरत डॉक्टर विवेक जायसवाल अपने शहर का नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि ‘आइवरमेक्टिन एक बहुत सस्ती दवा है जो एंटी-पैरासिटिक के तौर पर हमेशा ही मलेरिया, डेंगू, मौसमी बुखार से लेकर तमाम तरह की छोटी-बड़ी बीमारियों में दी जाती रही है. लेकिन दवाओं की, दवाओं के व्यवसाय की और सरकारी तौर पर दवाओं के रिकमंडेशन या यूजेज की अपनी पॉलिटिक्स होती है. खास कर जिन एंटीबायोटिक दवाओं का आप जिक्र कर रहे हैं चाहे वो डॉक्सी हो या एजिथ्रोमाइसिन, ये बहुत कॉमन दवाएं हैं. लेकिन बाज़ार में इन्हें लेकर प्रतिस्पर्धा बहुत है. सबको दवा बेचना है, सबको मुनाफा कमाना है. कोरोना ऐसे लोगों के लिए एक मौका भी बन गया है.’

कोरोना संक्रमितों के इलाज के लिए सुझाई गई दवाइयों से संबंधित सरकारी आदेश

विवेक आगे जोड़ते हैं कि ‘जिन मरीजों के प्रेस्क्रिप्शन हम हाथ से लिख रहे हैं, उन्हें उनके लक्षणों के हिसाब से ही दवा देने की कोशिश कर रहे हैं. आज अगर मैं किसी के आगे कह दूं कि एक साल बाद भी हमें नहीं मालूम है कि कोरोना वायरस से बचाने में कौन सी दवाएं कारगर हैं या सिर्फ पैरासीटामॉल और मल्टीविटामिन्स भर लेने की ज़रूरत हैं तो लोग मेरे डॉक्टर होने पर ही सवाल उठा देंगे. यहां पांच-छह दवाइयों के नाम वाला कागज मिल जाता है तो मरीज को भी लगता है कि हां उसका इलाज हो रहा है और सिस्टम की खाना-पूर्ति भी हो जाती है. एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस भी कोई चीज होती है, उससे कुछ नुकसान भी होता है, ये न लोगों को पता है और न बताने वाले बताना चाहते हैं. बहुत बार तो ये भी होता है कि लोग हमारे पास आते हैं कि क्या इन एंटीबायोटिक्स को हम कोविड से बचने के लिए प्रोफिलेक्टिक मेडिसिन (बचाव करने वाली दवा) की तरह ले सकते हैं. मैं एक शब्द में जवाब देता हूं, नहीं!’

डॉक्टर विवेक की तरह कई अन्य स्वास्थ्यविद भी आइवरमेक्टिन या एजिथ्रोमाइसिन को प्रोफिलेक्टिक दवा की तरह इस्तेमाल करने से मना करते हैं. डॉक्टर की सलाह पर भी इन दवाओं को तीन या अधिक से अधिक पांच दिनों तक ही दिया जा सकता है. वे लोग जो लंबे समय तक इन दवाओं को सेवन करते हैं, उनमें कई तरह की एलर्जी, पेट से संबंधित परेशानियां और कमजोरी के जैसे साइडइफेक्ट्स देखने को मिल सकते हैं.

आइवरमेक्टिन पर थोड़ी और बात करें तो डब्ल्यूएचओ के निर्देश से पहले, यूरोपियन मेडिसिन्स एजेंसी समेत कई देशों की स्वास्थ्य संस्थाओं ने अपने शोधों के हवाले से कहा था कि कोविड-19 के इलाज में आइवरमेक्टिन कोई भूमिका नहीं अदा करता है. किन्हीं खास प्रयोगशाला परिस्थितियों को छोड़ दिया जाए तो आइवरमेक्टिन न ही तात्कालिक रूप से और न ही लंबे समय के लिए कोरोना वायरस से बचाव में किसी तरह की मदद करता है. यही वजह रही कि इन सभी संस्थाओं ने केवल क्लीनिकल ट्रायल के दौरान ही इनके इस्तेमाल की सिफारिश की थी जिसके बाद डब्ल्यूएचओ ने इस पर रोक जैसा कदम उठाया था.

भारतीय चिकित्सा विशेषज्ञों की राय पर गौर करें तो इन दवाओं को लेकर वे सुझाते हैं कि यह याद रखा जाना चाहिए कि कोविड-19 कोरोना वायरस के संक्रमण से होता है और कोई भी एंटीबायोटिक वायरल संक्रमण को ठीक नहीं कर सकता है. ऐसे में बड़ी संख्या में कोरोना संक्रमित हो रहे लोगों को ये दवाएं दिया जाना भविष्य में ऐसे लोगों की एक बड़ी संख्या तैयार कर सकता है, जिन पर इस तरह की दवाओं का असर ना हो रहा हो. ऐसा होना जहां कुछ बीमारियों के इलाज को मुश्किल बना सकता है, वहीं कई और नई स्वास्थ्य समस्याओं के पैदा होने की वजह भी बन सकता है.

कोरोना वायरस से लड़ने के सरकारी तरीके में खोट का अंदाज़ा इस बात से भी लगता है कि जब प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहे डॉक्टरों से कोरोना वायरस के इलाज में सलाह ली जाती है तो वे इनमें से कोई भी दवा सुझाते नहीं दिखते हैं. कुल मिलाकर, एक स्वास्थ्य आपदा से निपटने का फिलहाल जो हमारा तरीका है उसे स्वास्थ्य विज्ञानी एक नई स्वास्थ्य आपदा की तरफ बढ़ते हुए कदम के तौर पर भी देखते हैं.

>> सत्याग्रह को ईमेल या व्हाट्सएप पर सब्सक्राइब करें

 

>> अपनी राय हमें [email protected] पर भेजें

 

  • बीमारी की हालत में आपको भी पचासों लोग सलाह देते होंगे, लेकिन क्या इन पर भरोसा करना चाहिए?

    विज्ञान-तकनीक | ज्ञान है तो जहान है

    बीमारी की हालत में आपको भी पचासों लोग सलाह देते होंगे, लेकिन क्या इन पर भरोसा करना चाहिए?

    ज्ञान चतुर्वेदी | 15 घंटे पहले

    कठपुतली का खेल

    समाज | कभी-कभार

    हम ऐसा समाज होते जा रहे हैं जिसे न तो आधुनिक ज्ञान से ज्यादा मतलब है न अपने पारंपरिक ज्ञान से

    अशोक वाजपेयी | 16 घंटे पहले

    नाथू सिंह राठौड़

    समाज | पुण्यतिथि

    जब नाथू सिंह राठौड़ ने जवाहर लाल नेहरू से पूछा, ‘क्या आपके पास प्रधानमंत्री पद का तजुर्बा है’

    अनुराग भारद्वाज | 15 मई 2021

    उद्धव और आदित्य ठाकरे के साथ सोनिया गांधी

    राजनीति | भारत

    क्या भारत जैसे लोकतंत्र के लिए राजनीतिक वंशवाद जरूरी है?

    विकास बहुगुणा | 14 मई 2021

  • लता मंगेशकर के साथ नरेंद्र मोदी

    राजनीति | विचार-विमर्श

    कैसे राजनीति ने हमसे हमारे ज्यादातर नायक छीन लिए हैं

    अंजलि मिश्रा | 11 मई 2021

    कोविड-19 का एक मरीज़

    समाज | कभी-कभार

    आज देश में लोग कोरोना वायरस से नहीं कल्पनाशून्यता और कुप्रबन्ध से मर रहे हैं

    अशोक वाजपेयी | 09 मई 2021

    कोरोना संकट

    राजनीति | कोविड-19

    कोरोना संकट के दौरान आंकड़ों का यह हाल भविष्य में और बड़े खतरे की चेतावनी है

    विकास बहुगुणा | 07 मई 2021

    रबींद्रनाथ टैगोर

    समाज | जन्मदिन

    यह स्कूलों के प्रति रबींद्रनाथ टैगोर का डर ही था जिसने शांति निकेतन के विचार को जन्म दिया

    कविता | 07 मई 2021