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महिलाएं अपने शरीर में हो सकने वाले कैंसरों को कैसे पहचानें?

सिर्फ महिलाओं में होने वाले ये कैंसर अगर शुरुआत में पकड़ में न आ पाएं तो बाद में इनका इलाज बहुत मुश्किल हो जाता है

ज्ञान चतुर्वेदी | 28 अगस्त 2021

पिछले आलेख में हमने स्तन कैंसर के बारे में चर्चा की थी. यह अमूमन औरतों में ही होता है, लेकिन कभी-कभार पुरुषों को भी हो सकता है. अब हम उन कैंसरों के बारे में बात करेंगे जो सिर्फ महिलाओं में पाए जाते हैं. जैसे ओवरी (अंडाशय), बच्चेदानी (यूटेरस) और फैलोपियन ट्यूब या बच्चेदानी के मुंह (सर्विक्स) के कैंसर.

दुर्भाग्यवश, इनकी शुरुआती स्टेज में अधिकतर कभी कोई तकलीफ ही नहीं होती. एक किस्म का साइलेंट वक्फा रहता है इन कैंसरों के शुरूआती दिनों में. कई माह तक ये शरीर में चुपचाप पलते रहते हैं. इनका पता बाद में प्रायः तब चलता है जब बीमारी फैलकर दूसरे अंगों तक पहुंच जाती है और तब तक बड़ी देर हो चुकी होती है.

यदि हम इन्हें शुरू में पकड़ पायें तो इनका पूरा इलाज संभव है, लेकिन इनको शुरू में पकड़ा जा सके इसके लिये डॉक्टर से पहले आपको कुछ बुनियादी बातें पता होनी चाहिए. इन कैंसरों के बारे में यदि हम थोड़ा-थोड़ा भी जान लें तो पर्याप्त है.

इस लेख का बस यही एकमात्र उद्देश्य भी है. चलिए, तीनों तरह के कैंसरों के बारे में कुछ तथ्यों और सवाल-जवाबों के जरिए बुनियादी और बेहद जरूरी बातें जानने की कोशिश करते हैं.

‘ओवरी या अंडाशय का कैंसर’

किन महिलाओं को इस कैंसर का जोखिम ज्यादा होता है?

(1)यह कैंसर प्रायः उम्र बढ़ने के साथ पैदा होता है, सो यह उम्रदराज महिलाओं की बीमारी है. 75- 80 साल की महिलाओं में यह सबसे ज्यादा होता है. कम उम्र की महिलाओं में यह नहीं होता. 40 साल से कम उम्र की महिला में तो इसकी आशंका लगभग नगण्य होती है.

(2) यह उन महिलाओं में ज्यादा होता है जिनमें ओवरी ठीक से काम नहीं कर रही हो. उदाहरण के लिए, जो महिलाएं संतान पैदा करने में सक्षम न हों, या ऐसी महिलाएं में जिनको एकाध ही बच्चा पैदा हुआ हो, फिर वे गर्भवती नहीं हो सकीं, या ऐसी महिलाएं में जिनको बार-बार गर्भपात हो जाता रहा हो – इन सबमें बाद की उम्र में इस कैंसर की ज्यादा आशंका रहती है. इसके ठीक विपरीत, यह भी माना जाता है कि हर बार प्रेगनेंसी होने पर इसकी आशंका लगभग 10 परसेंट कम हो जाती है . इसी तरह, स्तनपान तथा ‘ओरल कंट्रासेप्टिव’ भी इस कैंसर की आशंका को कम करते हैं.

(3) दस फीसदी ओवेरियन कैंसर खानदानी (आनुवांशिक) भी हो सकते हैं. जिन परिवारों में दो या दो से ज्यादा उसी पीढ़ी के रक्त संबंधियों में यह कैंसर हुआ हो (जैसे मां और मौसी में) तब तो इसका जोखिम तथा आशंका 50 फीसदी तक बढ़ जाती है.

इस कैंसर के लक्षण क्या हैं?

इसमें सबसे खतरनाक बात यही है कि यह काफी दिनों तक कोई भी तकलीफ पैदा नहीं करता. बाद में जब कैंसर फैलकर आसपास के अंगों तक पहुंच जाता है (पेल्विस में, पेशाब की थैली तक या वहां से गुजरती नसों इत्यादि में) तब कहीं जाकर पेट में दर्द, पेशाब में कुछ तकलीफ, कब्जियत या कमर में दर्द जैसी तकलीफ होने लगती हैं. इसीलिए यह कैंसर हो जाने के बाद भी लंबे समय तक इसके होने का प्रायः पता ही नहीं चलता.

इस हिसाब से यह बड़ा खतरनाक है. वैसे मेडिकल साइंस में यह कोशिश लगातार जारी है कि किसी जांच द्वारा समय रहते इस बीमारी का पता चल जाए, हालांकि अभी तक बात बन नहीं पाई है.

फिर इन स्थितियों में क्या किया जाए? यानी फिलहाल ओवेरियन कैंसर के लिए कौन-सी स्क्रीनिंग मेथड अपनाई जानी चाहिए?

स्टेज वन और स्टेज टू के समय पर ही यदि ओवेरियन कैंसर का पता चल जाए तो उसे पूरी तरह से खत्म किया जा सकता है और संबंधित महिला पूरी तरह तरह स्वस्थ हो सकती है. पर यह पता चले तो चले कैसे? यह बात फिलहाल किसी को पता नहीं. इन हालात में भी कम से कम यह जरूर किया जा सकता है कि जिन महिलाओं में इसकी आशंका ज्यादा है (उदाहरण के लिए वह महिला जिसके करीबी रिश्तेदार महिलाओं में कभी यह कैंसर हुआ हो), उनको यह सलाह दी जाती है कि वे अपने ये तीन टेस्ट नियमित रूप से, हो सके तो हर साल, जरूर कराएं :

(1) किसी सक्षम गायनेकोलॉजिस्ट से आंतरिक चेकअप

(2) किसी अच्छे सोनोलॉजिस्ट से अपना ट्रांस वेजाइनल अल्ट्रासाउंड और

(3) खून की एक विशेष जांच (CA125).

ये जांचें बहुत जरूरी हैं वरना बीमारी पूरी फैल जाने के बाद यह एक बहुत खराब किस्म का कैंसर है.

‘सर्विक्स कैंसर या बच्चेदानी के मुख का कैंसर’

एक जमाने में यह औरतों में, कैंसर से मौत का सबसे महत्वपूर्ण कारण होता था. फिर एक छोटे से स्क्रीनिंग टेस्ट (पैप्स स्मीयर) की खोज आ जाने के बाद अब यह कैंसर बहुत शुरुआती दौर में ही पकड़ में आ जाता है. मेडिकल विज्ञान के क्षेत्र में इस छोटी-सी खोज के कारण अब इस कैंसर से होने वाली मौतें लगभग पचास प्रतिशत कम हो गई हैं.

पैप्स स्मीयर क्या होता है?

यह एक छोटा सा टेस्ट है जो आपका गायनेकोलॉजिस्ट अपने आउटडोर में दो-तीन मिनट में ही कर लेता है. चौबीस घंटे में इसकी रिपोर्ट भी मिल जाती है. इस टेस्ट के द्वारा डॉक्टर को यह पता चल जाता है कि कहीं आप की बच्चेदानी के मुंह पर कोई कैंसर विकसित तो नहीं हो रहा?

किन महिलाओं को इस कैंसर की ज्यादा आशंका होती है?

अब यह जानकारी होने के बाद कि इस कैंसर के होने में सेक्सुअल एक्टिविटी के दौरान सक्रिय होने वाले एचपीवी नामक वायरस का रोल बहुत ज्यादा होता है, इस कैंसर को पूरी तरह से रोक सकने की स्थिति आ पहुंची है. अब इस वायरस के खिलाफ एक मल्टीवैलेंट वैक्सीन भी बन गई है. यदि हम अपनी किशोर बच्चियों में यह वैक्सीन उसी उम्र में ही लगवा लें तब इस कैंसर की और भी सही रोकथाम हो सकेगी.

वैसे, मात्र यह वायरस ही इस कैंसर का एकमात्र कारण नहीं है. यह कैंसर गरीब स्त्रियों में (जिनको पर्याप्त भोजन न मिल पाता हो), उनमें जो कम उम्र में ही सेक्सुअल एक्टिविटी में रत हो गई हों, या जो कई लोगों के साथ सेक्स की आदी हों, जो खूब धूम्रपान करती हों तथा जिनके परिवार में इस बीमारी के होने का इतिहास रहा हो, इन सबमें भी यह कैंसर ज्यादा होता है.

इसमें क्या तकलीफें होती हैं?

सर्विक्स कैंसर भी शुरू में प्रायः कोई तकलीफ पैदा नहीं करता. परंतु यदि योनि से असामान्य किस्म की ब्लीडिंग हो, ज्यादा ब्लीडिंग हो या सहवास के बाद ब्लीडिंग होती हो या पीले रंग का वैजाइनल डिस्चार्ज हो, लगातार कमर में दर्द हो या पेशाब में कुछ तकलीफ हो तो अपना गायनी चेकअप एक बार जरूर करवा लें.ऐसे में गायनेकोलॉजिस्ट आपका पैप स्मीयर, आंतरिक जांच और जरूरी समझे तो सर्विक्स की बायोप्सी इत्यादि भी सब कर सकता है. करवा लें. स्त्रियों में इस तरह की तकलीफों को कभी-भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए.

क्या सर्विक्स कैंसर की स्क्रीनिंग संभव है?

बिलकुल है. स्त्रियों को सेक्सुअल एक्टिविटी शुरू करने के बाद या 20 साल की उम्र होने पर शुरू के तीन साल तक हर वर्ष अपना पैप्स स्मीयर कराना चाहिए. यदि सब ठीक निकले तो फिर उसे हर तीन साल पर अपना पेप्स स्मीयर कराते रहना चाहिए. हां, यदि उपरोक्त कोई भी तकलीफ पैदा हो जाये तब तो बीच में भी इसे रिपीट करवाना चाहिए. इससे सर्विक्स कैंसर को एकदम शुरूआती स्टेज में पकड़ा जा सकेगा.

‘बच्चेदानी (यूटेरस) का कैंसर’

वैसे यहां इसकी चर्चा सबसे आखिरी में कर रहा हूं परंतु यह आज के समय में औरतों के प्रजनन अंगों में होने वाला सबसे कॉमन कैंसर बन गया है.

किन महिलाओं में इसकी आशंका सबसे ज्यादा होती है?

यूटेरस के लगभग दो तिहाई कैंसर केस उन औरतों में होते हैं जिनको मेनोपॉज हो चुका हो. औसतन यह साठ से सत्तर साल के बीच की महिलाओं में ज्यादा होता है. वैसे इस कैंसर के एक तिहाई केस कम उम्र में भी हो सकते हैं.

यूटेरस के कैंसर के क्या लक्षण होते हैं?

यूटेरस या बच्चेदानी एक बड़ी साइज का अंग होता है. इसके अंदर एक बड़ी खाली जगह भी रहती है. इससे कैंसर को फैलने के लिए काफी जगह मिल जाती है. इसीलिए यह कैंसर देर तक यूटेरस में ही बना रहता है. इससे प्रायः बहुत ज्यादा दूर तक फैलने से पहले ही इसका पता भी चल जाता है. इसीलिए इसका पूरा इलाज भी संभव है. आप तो बस इतना जान लें कि यदि किसी भी महिला को (जो मेनोपॉज के बाद की उम्र में हो), योनि से खराब किस्म का डिस्चार्ज आने लगे या माहवारी बंद होने के बाद कभी एक बार भी फिर से ब्लीडिंग हो जाए, या फिर योनि से बहुत ज्यादा पानी आने लगे तो उसे अपनी गायनी जांच तुरंत करा लेनी चाहिए.

ऐसे में, गायनेकोलॉजिस्ट द्वारा प्रायः ‘एंडोमेट्रियल बायोप्सी’ या, ‘डी एंड सी’ की छोटी सी सर्जरी द्वारा यह कैंसर पकड़ में आ ही जाता है. फिर ऑपरेशन द्वारा पूरी बच्चेदानी, ओवरी इत्यादि निकाल देने पर इसका पूरा भी इलाज संभव है.

तो हमारी इस पूरी चर्चा का कुल हासिल क्या है?

(1) महिलाओं के प्रजनन अंगों के कैंसर प्रायः कोई तकलीफ नहीं देते और इनकी जो भी स्क्रीनिंग सुविधाएं उपलब्ध हैं वे जांचें उन महिलाओं को तो खासकर कराते ही रहना चाहिए जिनमें किसी भी वजह से इनमें से कोई भी कैंसर होने का जोखिम ज्यादा है.

(2) महिलाओं में होने वाले हर पेट दर्द में, पेशाब की समस्या में, योनि से होने वाली किसी तरह की ब्लीडिंग या डिस्चार्ज में, और हर कमर दर्द में, पैरों के दर्द में उसकी पूरी गायनी जांच होना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि ऐसी किसी भी तकलीफ की जड़ में उपरोक्त कोई भी कैंसर मौजूद हो सकता है.

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