समाज | कभी-कभार

क्या दीवाली विजय का एक अनुष्ठान भर है?

क्या मनुष्य कभी अपने अंधेरों से मुक्त हो पायेगा और क्या कभी उजाले का राज्य स्थापित हो सकेगा?

अशोक वाजपेयी | 31 अक्टूबर 2021

समय और पक्षधरता

अपने समय को हम कैसे समझते-सहते और बदलना चाहते हैं, इसके कई पहलू हैं. हम पर पिछले समयों यानी इतिहास का दबाव होता है. उस दबाव में हम अपने समय को उससे निरंतर या अलग या दोनों देख पाते हैं. पर हमारा समय भी अनेक क़िस्म के दबाव और तनाव देता है: उसे समझने में इन दबावों-तनावों की भी भूमिका होती है. फिर हम सबके मन में बेहतर या आदर्श समय की कुछ न कुछ अवधारणा अनिवार्यतः रहती है: हम अपने समय को इस अवधारणा से भी जांचते-परखते हैं. संक्षेप में, यह कि अपने समय को बरतना, समझना, बदलना, सभी कुल मिलाकर जटिल काम है और उसे सरल और सामान्य नहीं बनाया जा सकता.

हमारा समय कैसा-क्या है, इस बारे में अनुभवों और दृष्टियों की बहुलता होना अवश्यम्भावी है. कुछ के लिए अच्छे दिन आ गये हैं, कुछ और को लगता है कि हम अच्छे दिनों की ओर बढ़ रहे हैं, कुछ को लगता है कि अच्छे दिन बहुत दूर हैं और कुछ ऐसे भी हैं जिनके लिए ‘अच्छे दिन’ एक राजनैतिक जुमला भर था, उनके आने के लिए कोई ईमानदार कोशिश वर्तमान निज़ाम कर ही नहीं रहा है. इसमें संदेह नहीं कि ऐसे लोगों की संख्या निरंतर बढ़ रही है जो अच्छे दिनों को बहुत दूर मानते हैं और जो उसके लिए किसी ठोस कोशिश का अभाव देखते हैं. समय के अलग-अलग आकलन अलग-अलग क़िस्म की पक्षधरता का आधार बनते हैं. इनमें आपस में द्वन्द्व भी होता है: अच्छे दिन मानने वाले अच्छे दिन न माननेवालों पर दबाव डालते रहते हैं कि वे अच्छे दिन मानने लगें.

इस द्वन्द्व के चलते, सचाई क्या है यह जानना ज़रूरी हो जाता है. इस समय झूठ का व्यापार इतना फैला दिया गया है कि सच क्या है यह जानना लगातार मुश्किल होता जाता है. लोकतंत्र, मानव अधिकार, अभिव्यक्ति, पोषण, भूख, सहिष्णुता का विश्व सर्वेक्षण करनेवाली अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियां लगातार, अपने वस्तुनिष्ठ और पारदर्शी पैमानों पर, भारत को इनमें से हरेक क्षेत्र में नीचे के दर्ज़े पर और पिछड़ता हुआ पा रही हैं. बढ़ती हुई बेरोज़गारी और मंहगाई, विषमता, ग़रीबी, शिक्षा का गिरता स्तर, सामुदायिक सद्भाव में लगातार कटौती आदि ऐसी हैं कि उनसे इनकार करना सिर्फ़ अंध भक्त, गोदी मीडिया, अपनी आमदनी दिन दूनी रात-चौगुनी करनेवाले और सार्वजनिक सम्पत्तियों को कम दाम देकर हड़पनेवाले उद्योगपति ही कर सकते हैं.

ऐसे समय में आप उन शक्तियों के पक्षधर नहीं हो सकते जो हर दिन इतना कहर बरपा रही हैं, अगर आपको लोकतंत्र, स्वतंत्रता, समता और न्याय की चिन्ता है और आपके मन में सच्चा सर्वधर्मसमभाव है. भारतीयता संकीर्णता, भेदभाव, घृणा, हिंसा-हत्या-बलात्कार पर आधारित नहीं है. यह भारतीयता का अपमान है. साथ ही वह भारतीय परम्परा के उदात्त मूल्यों की अवमानना भी है. यह समय ऐसा नहीं है कि आप तटस्थ रह सकें: दरअसल इस समय तटस्थ होना वस्तुनिष्ठ होना नहीं, सच्ची भारतीयता, सच्ची समरसता, सच्ची भारतीय परम्परा और संस्कृति से विरत होना है. जो कुत्सित-घृणित-विकृत हर रोज़ हो रहा है उससे अपने को अलग रखना और उसका हर तरह से प्रतिरोध करना ही सच्ची निर्भय पक्षधरता है.

युवा झुकाव

युवाओं के बारे में कुछ निश्चात्मक ढंग से कहना इसलिए अक्सर संभव नहीं होता कि वह एक ऐसा वर्ग होता है जो निरंतर गतिशील और परिवर्तनशील होता है. वह अधेड़ों और बुजुर्गों की तरह अपने मूल्यों और दृष्टियों को लेकर स्थिर नहीं होता. उसकी यह अस्थिरता वैचारिक भी होती है. कई बार इसी अस्थिरता के कारण वह स्थापित मान्यताओं को चुनौती दे पाता है. साहित्य और कलाओं में बड़े और निर्णायक परिवर्तन युवाओं ने ही किये हैं. निराला, प्रेमचंद, प्रसाद, महादेवी, अज्ञेय, मुक्तिबोध, रेणु, रामचंद्र शुक्ल, नागार्जुन, त्रिलोचन, धूमिल आदि ने जो परिवर्तन किये वे सभी उनकी युवा अवस्था में किये गये थे. अगर आज के परिदृश्य को देखें तो साफ़ दीखता है कि हमारी अधिक गतिशील कविता स्त्रियों द्वारा लिखी जा रही है जिनमें से अधिकांश युवा हैं.

हमारे समय का एक अनिवार्य पक्ष यह है कि उसने हममें से हर किसी को राजनैतिक भी बना दिया है. लोकतंत्र में वैसे भी राजनैतिक अबोधता के साथ किसी सार्थक ढंग से शामिल नहीं हुआ जा सकता. दिलचस्प यह है कि जिस समय में राजनैतिक नागरिकता का विस्तार हो रहा होता है, उसी समय में सत्ताएं इस राजनैतिक बोध को धार्मिकता, साम्प्रदायिकता, उपभोगी नागरिकता में सीमित करने का विराट् उपक्रम भी करती रहती हैं. इसलिए ऐसे में लोगों की संख्या भी बढ़ती जाती है जो ‘हमें राजनीति से मतलब नहीं है’ का स्वांग भरते हैं. ख़ासकर हिन्दी मध्यवर्ग एक और तो ऐसे ही स्वांग भरता है और दूसरी और बराबर साम्प्रदायिक-धार्मिक-उपभोगी राजनीति का लगातार समर्थन करता है. यह वही वर्ग है तो अपनी संकीर्णता, क्षुद्र स्वार्थों और जड़हीनता से हिंसा-हत्या-बलात्कार की मानसिकता को पोस रहा है. उसका अधिकांश युवा हिस्सा गतिशील और परिवर्तनकारी नहीं रह गया है.

हालांकि इस तरह के सामान्यीकरण हमेशा प्रामाणिक या ज़रूरी नहीं होते ऐसा लगता है कि इस समय युवा कवियत्रियों का एक बड़ा हिस्सा परिवर्तनशील राजनीति के प्रति सजग और सचेष्ट है. इस सजगता की अभिव्यक्ति स्वयं कविता की काया में हो रही है, किसी संगठनात्मक गतिविधि या घोषणापत्र में नहीं. हमें उनकी कविता को उसमें अंतर्भूत या अन्तःसलिल राजनैतिक आशयों के लिए सूक्ष्मता से पढ़ना होगा. यह अच्छा है कि वे अपनी राजनीति का ढिंढोरा नहीं पीटतीं हालांकि कुछ में ग़ैर-ज़रूरी मुखरता भी है.

यह कुल मिलाकर उलझा हुआ परिदृश्य है. पर कम से कम इस संदर्भ में, जिसका संक्षिप्त उल्लेख ऊपर है, यह परिदृश्य निरुत्साह या निराश नहीं करता. याद करें कभी ऑस्कर वाइल्ड ने कहा था कि कलात्मक सत्य वह है जिसका विलोम भी सत्य है.

धेरे-उजाले

दीपावली आ रही है और हम एक बार फिर अंधेरे पर उजाले की विजय का उत्सव मनायेंगे. हर बार की तरह यह संशय भी हमें घेरेगा कि क्या यह विजय सिर्फ़ एक अनुष्ठान भर है और दरअसल अंधेरे हारे नहीं हैं और हम उनसे लगातार घिरते जा रहे हैं. यह सचाई भी हमसे छुपी नहीं रह सकती कि इस दौरान ऐसे लोगों की संख्या बहुत बढ़ गयी है जो ग़रीबी के अंधेरों में ढकेल दिये गये हैं. दीपावली पर हम समृद्धि की कामना करते, उसकी पूजा करते हैं जबकि अधिकांश के यहां न तो वह आयी है, और न ही उसके आने की फिलवक़्त कोई उम्मीद है. याद करें कि हमने अभी दशहरे के समय बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव बनाया जबकि हमारे समय में बुराई के दस के बजाय सैकड़ों सिर पर हैं और वह लगभग दिग्विजयी हो गयी है!

इसका एक अर्थ यह निकलता है कि हमारे ज़्यादातर त्योहार हमारी वर्तमान सचाई से बहुत दूर हो गये हैं. यह तर्क दिया जा सकता है और उसमें बल होगा कि ये त्योहार हमारी सचाई नहीं, सपना हैं और हमें सचाई की निर्मम क्रूरता से, कुछ दूर के लिए सही, राहत देते हैं. यह एक यक्ष-प्रश्न है कि क्या मनुष्य कभी अपने अंधेरों से मुक्त हो पायेगा और क्या कभी उजाले का राज्य स्थापित हो सकेगा?

क्या यह सही नहीं है कि उजाले का आश्वासन देनेवाले अनेक अनुशासनों ने जैसे राजनीति, तानाशाही, लोकशाही, धर्म, विज्ञान, तकनालजी आदि ने अगर कुछ उजाले दिये तो साथ ही साथ अंधेरे भी बढ़ाये. मनुष्यता हमेशा गोधूलि में ही निवसती है और साहित्य-कलाओं का एक ज़रूरी काम यह है कि वे उसे याद दिलायें जब वह उजालों में बहुत दमक रही हो या कि अंधेरों में बेहद डूबी हो कि उसकी स्थायी स्थिति और समय गोधूलि हैं. वे अंधेरों में उजालों की दरार और उजालों में अंधेरों की छायाएं खोज लेते हैं. वे शायद मुक्ति नहीं दे पाते पर हमें अपनी मनुष्यता की सीमाओं का तीख़ा अहसास करा देते हैं.

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