अरिजीत सिंह

समाज | जन्मदिन

अरिजीत सिंह: हमारे दौर की एक ऐसी प्रतिभा जो हर अच्छे गायक की जगह ले सकती है

अरिजीत सिंह की आवाज गाने के भाव की नकल करती हुई नजर नहीं आती बल्कि ऐसा लगता है जैसे कोई ठीक वैसी ही जिंदगी जीने के बाद गा रहा है

शुभम उपाध्याय | 25 अप्रैल 2021 | फोटो: फेसबुक/अरिजीत सिंह

अनेकों फिल्मों और निर्देशकों के लिए अरिजीत सिंह वह मशीन बन चुके हैं जिसमें सिक्का डालते ही हिट संगीत निकलता है. गुणवत्ता में बेहद साधारण मगर हिट का चमकदार मुलम्मा चढ़ा हुआ संगीत. अगर ‘तुम बिन 2’ और ‘वजह तुम हो’ जैसी कुछ फिल्मों में उनके गाए गीत याद करें तो आप इस एहसास से बोझिल हो जाएंगे कि अद्भुत आवाज का धनी एक गायक कैसे अपनी आवाज कौड़ियों के दाम बेच रहा है. कहीं अंकित तिवारी के रुदन की दहलीज छू रहा है तो कहीं खुद के ही पुराने हिट गीतों की एक और धुंधली जिरॉक्स कॉपी बना रहा है. और यह कुफ्र वह 2011 में शुरू हुए अपने 9-10 साल के छोटे से करियर में 2014 से ही कर रहा है.

हर महान गायक – मुकेश, किशोर कुमार, मोहम्मद रफी, आशा-लता ताई – से लेकर सोनू निगम तक ने सैकड़ों अच्छे गीत गाने के साथ-साथ अनेकों ऐसे कामचलाऊ गीत गाए हैं जिनका स्मरण करने से संगीत प्रेमी हमेशा बचते हैं. कुछ साल पहले तक अगर हर महान गायक के बेमिसाल गीतों की एक सीडी बनाई जाती – हालांकि अब सीडी कल की बात हो चुकी है – तो एक दूसरी सीडी उनके गाए साधारण और बेकार गीतों की भी बनती. लेकिन अरिजीत सिंह के संदर्भ में यह एनॉलाजी प्रयोग करते वक्त हर एक अच्छी सीडी के पीछे साधारण गानों की दो सीडी बनती हैं.

यही अरिजीत सिंह के संगीत को लेकर एकमात्र ऐसी आलोचना है जो हरदम चुभती है – कि ढेरों अच्छे गायकों से लदे हमारे समय का सर्वश्रेष्ठ गायक अपने गानों को चुनते वक्त गुणवत्ता का ध्यान नहीं रखता. वह सबकुछ गाता है और इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह धन का चुंबकीय आकर्षण हो सकता है. सूफी मिजाज भी हो सकता है, जैसा कि रफी साहब का था. वे निर्माता-निर्देशक द्वारा गाने की दरख्वास्त करने पर ना नहीं किया करते थे और बहुत बार इसी बैरागी फितरत की वजह से उस तरह के बेजा गाने गा जाते जिस तरह के गाने उनकी आवाज की नकल करने वाले किसी अनवर या मोहम्मद अजीज या शब्बीर कुमार के लायक तो थे, लेकिन किसी मोहम्मद रफी लायक बिलकुल भी नहीं.

इसी दौरान – अरिजीत द्वारा गाए ढेर सारे निम्न स्तर के गानों को याद करते वक्त – उनके द्वारा गाकर बनाए गए पुराने फिल्मी गीतों के इस कोलाज पर नजर पड़ी. यह करीब 12 मिनट लंबा है, लेकिन सुघड़ गायकी में भीगा हुआ न भूला जा सकने वाला अनुभव है.

यही अरिजीत की विशेषता है. हर आलोचना का जवाब उनकी गायकी खुद है. और जब वे खुद अपने गाए बढ़िया गीतों का कोलाज बनाते हैं, आलोचना भी लजाती है, दम साधकर उन्हें दुनिया को सम्मोहित करते हुए देखकर हैरान होती है. सुनिए, करीब पांच साल पहले वाली उनकी गायकी की एक बानगी.

ये दोनों ही लंबे वीडियो अरिजीत की लाइव परफार्मेंस के हैं और आप तो जानते ही हैं कि हमारे फिल्मी गायक जितनी सुघड़ता के साथ माइक्रोफोन के पीछे जाकर गीत रिकॉर्ड करने में उस्ताद रहे हैं, लाइव परफार्मेंस देते वक्त उतने ही कमतर नजर आते हैं. बात उदित नारायण के दौर वाले कई गायक-गायिकाओं की कर लें या उनके बाद की. मुक्ताकाश में सजे मंच पर ज्यादातर के सुर गिरते-भटकते-लड़खड़ाते हैं और वे ओरिजनल कंपोजिशन में बदलाव कर, तरह-तरह के तरीकों से अपनी आवाज की कमियां छिपाते हैं. कुछ नये-पुराने फिल्मी गायक-गायिकाएं अंतरराष्ट्रीय गायकों द्वारा स्थापित मानकों का मान रखने की कोशिश जरूर करते हैं लेकिन उनमें से भी कोई उस गायक को टक्कर नहीं दे पाते जिनका नाम सोनू निगम है. सोनू निगम जैसा अद्भुत स्टेज परफॉर्मर हमारे फिल्मी संगीत के पास शायद ही दूसरा कोई हो. लेकिन उनकी इस खासियत पर हमारे यहां ज्यादा बात नहीं की जाती.

लेकिन यहां उनका जिक्र छेड़ने का मकसद यह याद दिलाना है कि अरिजीत सिंह सोनू निगम बिलकुल नहीं हैं. स्टेज पर सोनू जैसा हो जाना उनके बिलकुल बस का नहीं और न ही उनमें किसी रॉकस्टार वाला आकर्षण है, न ही दुनिया के लिए सज-संवरकर परफॉर्म करने वाला सलीका. लेकिन अरिजीत उन गायकों में भी शामिल नहीं हैं जिनके सुर स्टेज पर बिखरते हैं और जो बीच-बीच में जोक्स सुनाकर सुरों की कमी को पूरा करने की कोशिश करते हैं. अरिजीत का कोई भी स्टेज शो हो (जिसे आप लाइव देखने की किस्मत रखें या यूट्यूब पर सुनें) खुद में और संगीत में खोए रहने वाला यह गायक गाते वक्त उसी परिपक्वता की उंगली पकड़कर चलता है, जिसका हाथ सोनू निगम हरदम कसकर थामे रहते हैं. उनके सुर कभी नहीं बिखरते. वे अनियंत्रित वातावरण में भी अपनी सांसों पर नियंत्रण रखते हैं और ऐसे गाते हैं मानो स्टूडियो के अंदर इत्मीनान से बैठकर रिकार्डिंग कर रहे हों. वे पुराने जमाने के शुद्धतावादियों की ही तरह गले में गिटार टांगकर एक जगह बैठे-बैठे या खड़े-खड़े ही दो से तीन घंटे लंबे शोज सिर्फ अपनी आवाज के दम पर मकबूल बना देते हैं. गिमिक्री ही जिस दौर का स्वादिष्ट मक्खन हो, उस समय में उससे कोसों दूर रहना और सिर्फ अपनी गायकी के दम पर एक के बाद एक सफल स्टेज शोज करते जाना, एक गायक के अपनी आवाज के प्रति आत्मविश्वास को ही तो दर्शाता है.

2005 में, जवानी की शुरुआत वाले सालों में, अरिजीत ने पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद से मुंबई आकर एक संगीत रियलिटी शो – फेम गुरुकुल – में भाग लिया था. यहां उन्हें सभी जजों ने पसंद किया लेकिन वे यह रियलिटी शो जीत नहीं पाए. वे अंतिम पांच में भी जगह नहीं बना पाए. लेकिन उनके एलीमिनेशन वाले इस वीडियो (नीचे) को देखिए और याद करिए कि 18 वर्षीय अरिजीत को पीछे छोड़कर उस वक्त जो पांच सिंगर फाइनल फाइव का हिस्सा बने थे, वे आज कहां हैं. प्रतिभाओं को परखने का दावा करने वाले हमारे रियलिटी शोज अकसर ऐसा ब्लंडर हमारे देश के बच्चों के साथ करते ही रहते हैं और हम बड़े चाव से उन्हें रात के भोजन के साथ मिठाई की तरह अपने जीवन का हिस्सा बनाये रहते हैं.

इसी रियलिटी शो में शंकर महादेवन को अरिजीत की गायकी भा गई और उन्होंने अपने एक प्राइवेट एलबम हाई स्कूल म्यूजिकल 2 के एक गाने आजा नचले में उन्हें मौका दे दिया. गाड़ी लेकिन फिर भी नहीं दौड़ी और अरिजीत ने एक दूसरे रियलिटी शो ‘दस के दस ले गए दिल’ में न सिर्फ भाग लिया बल्कि इस बार उसे जीता भी. जीतने पर 10 लाख रुपए मिले और इंडस्ट्री के एक पुराने तकनीशियन के कहने पर उन्होंने इन पैसों से मुंबई में अपना रिकॉर्डिंग सेटअप तैयार किया. फिर 2009 में संगीतकार मिथुन के लिए उन्होंने एक गीत गाया – मोहम्मद इरफान के साथ ‘मर्डर 2’ का ‘फिर मोहब्बत’ – जो 2011 में जाकर ही रिलीज हो पाया और अरिजीत के करियर का पहला फिल्मी गीत कहलाया. इस बीच बतौर गायक उन्हें मौके नहीं मिले. मौके की नजाकत को भांपते हुए अरिजीत ने गायक बनने का मोह तकिए तले रखा और म्यूजिक प्रोड्यूसर बनकर प्रीतम से लेकर शंकर-एहसान-लॉय, मिथुन और विशाल-शेखर तक के लिए बतौर एक फ्रीलांस म्यूजिक प्रोग्रामर काम करने लगे. विडम्बना देखिए, अमिताभ भट्टाचार्य गायक बनने मुंबई आए थे और गीतकार बन गए. अरिजीत भी गायक बनने आए थे और प्रोग्रामर बनकर संगीत की ग्रामर खोजने में जुट गए.

लेकिन हमेशा के लिए नहीं. फिर 2010 आया और उस वक्त बेहद व्यस्त चल रहे प्रीतम को आने वाले दो-तीन सालों में रिलीज होने वाली 16 से ज्यादा फिल्मों के लिए संगीत देने का मौका मिला. इस अति व्यस्त समय में उनके साथ काम कर रहे अरिजीत ने साल भर में तकरीबन 160 गानों पर काम किया और कई दिन तो ऐसे भी रहे जब वे एक दिन में तकरीबन चार या पांच गीतों के रफ कट गाने लगे (डमी सॉन्ग जिस पर बाद में मुख्य गायक अपनी आवाज देकर उसे संपूर्णता देता है).

एक साल बाद प्रीतम ने उन्हें फाइनल कट गाने का भी मौका दिया और ‘एजेंट विनोद’ का ‘राब्ता’ वो पहला गीत बना जो अरिजीत ने दुनिया के लिए तीन साल के बाद गाया. ‘राब्ता’ (2012) के चार वर्जन मार्केट में आए और आज भी मुख्य वर्जन सुनने पर यकीन करना मुश्किल है कि यह गीत किसी गायक के फिल्मी करियर का दूसरा गीत था. इसी गीत ने अरिजीत का समय बदला और 2012 ने अरिजीत को ‘शंघाई’ का ‘दुआ’, ‘कॉकटेल’ का ‘यारियां’, ‘बर्फी’ का ‘फिर ले आया दिल’ व ‘सांवली सी रात’ भी दिया. और फिल्मी संगीत के दीवाने इस देश में करोड़ों अजनबी कानों को याद रह जाने वाली एक नई आवाज मिल गई.

2013 में ‘आशिकी 2’ आई और ‘तुम ही हो’ के साथ-साथ एलबम के बाकी गीतों ने अरिजीत को वह सबकुछ दिया जिसके मिलने के कोई भी गायक सपने देखता है. नाम, पैसा, शोहरत वगैरह-वगैरह. इसी ‘आशिकी 2’ ने आने वाले भविष्य में अरिजीत को हमेशा के लिए टाइपकास्ट भी किया. जिस अरिजीत ने 2012 और 2013 में अलग-अलग जॉनर और अंदाज के कई सारे गीत दिल खोलकर गाए थे, उसी अरिजीत ने 2014 से लेकर 2016 तक प्रेम में डूबे हुए व दर्द भरे एक जैसे गीतों की भीड़ लगा दी. इसके बाद उन पर एक टैग हमेशा के लिए चस्पा हो गया – रोमांटिक ही गीत गाने वाले गायक का.

लेकिन किसी स्थापित छवि को विपरीत दिशा से जाकर देखो तो कई गिरहें खुलती हैं. यह सच बदलेगा नहीं कि अपने करियर के उफान पर रहते हुए सिर्फ तीन सालों में (2014 से 2016 तक) अरिजीत ने बिना गुणवत्ता परखे ताबड़तोड़ तकरीबन 120 गीत गाए हैं लेकिन, कई सारे कम अच्छे गीतों के बीच कुछ कोहिनूर के नूर वाले ऐसे गीत भी उन्होंने हमें दिए हैं जो प्रेम गीत नहीं हैं. वह भी अपनी छवि को ठेंगा दिखाकर, बाजार से विपरीत दिशा में जाकर. उनके करियर के शुरुआती दौर का ‘कबीरा’ सुन लीजिए, ‘इलाही’, ‘दुआ’, ‘बर्फी’ का ‘सांवली सी रात’, ‘सिटीलाइट्स’ का ‘मुस्कुराने की वजह तुम हो’, ‘इक चिरैय्या’ व ‘सोने दो’, ‘किल दिल’ का कव्वाली-नुमा ‘सजदे’, ‘बदलापुर’ का रेखा भारद्वाज के साथ त्रासदी के भरपूर ‘जुदाई’, ‘एबीसीडी 2’ का ‘चुनरिया’, ‘एनएच 10’ का ‘ले चल मुझे’, ‘हुतूतू’ के गीतों की याद दिलाता ‘दृश्यम’ का ‘क्या पता’, ‘जय गंगाजल’ का ‘सब धन माटी’ और ‘तलवार’ का ‘शाम के साये’. प्रेम पर बात नहीं करने वाले गीतों में भी यह गायक जिंदगी के अलग-अलग रंग बखूबी भरना जानता है, इन गीतों को सुनकर आसानी से समझ आता है.

और फिर वो गजल भी नफासत के साथ गाता है. ‘बर्फी’ के लिए ‘सांवली सी रात’ जैसे दिल ठहरा देने वाला लोरी-नुमा गीत अपनी अलहदा आवाज में गाने से पहले अरिजीत ने ‘फिर ले आया दिल’ जैसी अभूतपूर्व गजल भी गाई जो उनके फिल्मी करियर का सिर्फ छठवां गीत था. क्या आपको आज के समय का कोई और युवा सिंगर याद है जिसने फिल्मों में एक बार भी गजल अटेंप्ट करने की हिम्मत की हो, क्योंकि अरिजीत ने दो बार यह हिम्मत की है और दोनों ही गजलों को हमेशा के लिए श्रोताओं की प्लेलिस्ट का हिस्सा बना दिया है. छह साल के बेहद छोटे से करियर में उन्होंने दूसरी गजल विशाल भारद्वाज की ‘हैदर’ के लिए गाई और फैज अहमद फैज के लिखे कालजयी ‘गुलों में रंग भरे’ को क्या ही खूब आधुनिक गायकी की नक्काशी बख्शी.

यह भी सच है कि आज के युवाओं को उनके हिस्से के दर्द भरे प्रेम गीत अरिजीत ने ही दिए. ‘तुम ही हो’ हो या फिर ‘लाल इश्क’, ‘मैं तेनू समझावां’ हो या ‘हमारी अधूरी कहानी’, ‘अगर तुम साथ हो’ हो या फिर ‘आयत’ और ‘चन्ना मेरेया’. हिमेश और अंकित तिवारियों से जहां सुनने वालों को सिर्फ शोर मिला, अरिजीत ने वहीं प्रेम के घुमावदार रास्तों से गुजरने वाली आज की युवा पीढ़ी को पड़ावों पर ठहरकर सुनने के लिए गहराई में उतरा हुआ संगीत दिया.

प्रेम के खुशनुमा अहसास को भी युवाओं के अंतरमन में यही गायक इतनी देर तक बैठा पाया. ‘मैं रंग शरबतों का’, ‘तोसे नैना’, ‘सुनो न संगेमरमर’, ‘मस्त मगन’ से लेकर ‘सुईयां’, ‘गेरुआ’, ‘बोलना’, ‘देखा हजारों दफा’ और ‘द ब्रेकअप सॉन्ग’ वो तहरीरें हैं जिन्हें हर रोज अपनी पसंद के गाने बदलने वाला आज का युवा लगातार सुनना पसंद कर रहा है. अरिजीत को सुनते वक्त वह साधारण कंपोजिशन की भी परवाह नहीं कर रहा, बस अरिजीत की आवाज से प्रेम कर रहा है. शायद इसलिए क्योंकि अरिजीत सिंह उस स्तर पर जाकर गाने के इमोशन्स को पकड़ते हैं जैसे कभी रफी पकड़ा करते थे. उनकी आवाज गाने के भाव की नकल करती हुई नजर नहीं आती, लगता है कोई गाने के भावार्थ वाली ठीक वैसी ही जिंदगी जीने के बाद गीत को गा रहा है. तभी उनकी आवाज आवाम के करीब की आवाज बन चुकी है और 21वीं सदी को भी किशोर, रफी, लता वाली पिछली सदियों की तरह अपनी जेनरेशन की नायाब आवाज मिल चुकी है.

विज्ञान की एक थ्योरी कहती है कि इंसान के अंदर मौजूद आत्मा तकरीबन 21 ग्राम की होती है. आप उस सिद्धांत को मानें या न मानें, लेकिन सांसारिक पचड़ों के थपेड़ों के बीच अकसर इंसान खुद को कुछ ग्राम खाली महसूस करता है. वह समझ आता है कि उसकी आत्मा उससे कहीं दूर रही है. ऐसे ही वक्त में गायकी के तीर्थ बन चुके अरिजीत सिंह को एक हिस्से को लगातार सुनना चाहिए. आत्मा के नजदीक आने और शरीर के 21 ग्राम भारी हो जाने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं.

शुरुआत ‘चन्ना मेरेया’ से करके देखिए, या फिर इस लेख में वर्णित गीतों से. निराश नहीं होंगे.

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