अर्णब गोस्वामी

समाज | स्वास्थ्य

अर्णब गोस्वामी को इतना गुस्सा क्यों आता है?

बीते कुछ महीनों से रिपब्लिक टीवी के एडिटर अर्णब गोस्वामी के गुस्से का पारा हर दिन, बीते दिन से कुछ डिग्री ऊपर चढ़ा हुआ नज़र आता है

अंजलि मिश्रा | 26 सितंबर 2020 | फोटो: रिपब्लिक टीवी

वैसे तो हर बात पर गुस्सा करने के लिए अल्बर्ट पिंटो नाम का एक फिल्मी किरदार मशहूर है. लेकिन बीते कुछ समय से जाने-माने पत्रकार अर्णब गोस्वामी इसकी मकबूलियत को चुनौती देते दिख रहे हैं. मतलब यह कि आजकल वे जब भी नज़र आते हैं, उनके सुदर्शन चेहरे पर हर समय गुस्से वाली भंगिमाएं ही दिखाई देती हैं. हालांकि गोस्वामी पहले से ही अपने कथित तेज-तर्रार रवैये के लिए जाने जाते रहे हैं. अक्सर ही वे अपने टीवी-शो पर आने वाले प्रतिभागियों पर बरसने के लिए, उनकी बोलती बंद करवाने के लिए या उन तुक-बेतुक सवालों की बौछार के लिए चर्चा में बने रहते हैं जिन्हें उनके मुताबिक उनके जरिये पूरा भारत पूछ रहा होता है. लेकिन बीते कुछ महीनों से इन सवालों को पूछते हुए उनके गुस्से का पारा हर दिन, बीते दिन से कुछ डिग्री ऊपर चढ़ा हुआ नज़र आता है. यह भी दिलचस्प है कि कुछ समय पहले तक तो अर्णब के गुस्से का शिकार केवल वे लोग ही होते थे जो उनके शो में शिरकत करते थे लेकिन अब यह ज़रूरी शर्त भी खत्म हो गई है. हाल ही में वे सिनेमा और राजनीति की अनगिनत मशहूर हस्तियों को उनकी गैरमौजूदगी में ही फटकारते नज़र आ चुके हैं.

अर्णब गोस्वामी का गुस्सा या उनका आक्रामक रवैया बीते कई सालों से मीडिया रिपोर्टोंसोशल मीडिया की टिप्पणियों से लेकर कॉमेडी स्पूफ तक का हिस्सा बनता रहा है. टीवी मीडिया से जुड़ी चर्चाओं में चिंतक अक्सर ही यह अंदाज़ा लगाते भी दिख जाते हैं कि गुस्से और जोर-जोर से बोलने (यानी चिल्लाने) का उनकी सफलता में कितना हाथ है. दरअसल उनके बढ़ते हुए गुस्से के साथ उनके चैनल की टीआरपी भी हर दिन नए आंकड़े छू रही होती है. यहां तक कि सवाल-जवाबों की वेबसाइट कोरा डॉट कॉम पर भी यह सवाल पूछा जा चुका है कि अर्णब गोस्वामी हर समय गुस्से से भरे क्यों दिखाई देते हैं? दूसरी तरह से कहें तो उनका गुस्सा ही इस समय एक ऐसा मुद्दा बन गया है जिसके बारे में देश सचमुच जानना चाहता है यानी होल नेशन वांट्स टू नो अबाउट दिस. इसीलिए, इस आलेख में हम उन संभावित कारणों पर चर्चा करेंगे जिसके चलते अर्णब गोस्वामी को गुस्सा आ सकता है. अगर आपको भी ज्यादा गुस्सा आता है तो नीचे लिखी कई बातें आपके मामले में भी लागू हो सकती हैं.

विज्ञान कहता है कि गुस्सा किसी के प्रति नाराज़गी, आक्रोश या शत्रुता जैसी अनुभूतियों से भरी एक तीव्र भावना है जो तब बाहर आती है, जब व्यक्ति को लग रहा हो कि उसके साथ या उसके आसपास कुछ गलत हुआ है. दूसरे शब्दों में कहें तो गुस्सा मर्जी के मुताबिक काम न होने पर होने वाली बेहद स्वाभाविक प्रतिक्रिया है. सामान्य तौर पर तो यह भावना बाहरी परिस्थितियों के चलते पैदा होती है लेकिन कई बार इसके कारण भीतरी भी हो सकते हैं. यानी, कई बार बगैर किसी अप्रिय स्थिति के भी कुछ मानसिक या शारीरिक प्रक्रियाएं और उनमें होने वाले बदलाव गुस्सा महसूस करने की वजह बन सकते हैं.

शरीर में शुगर (ग्लूकोज) लेवल की घट-बढ़ भी इसी तरह का एक बदलाव है. अक्सर मधुमेह (डायबिटीज) के मरीजों के साथ ऐसा होता है कि अच्छा-भला आदमी जो आधे घंटे पहले हंस-बोल रहा होता है, वह अचानक या तो चिड़चिड़ाने लगता है या अपने आप में ही बेचैन-परेशान होने लगता है. दरअसल शरीर में ग्लूकोज का लेवल बढ़ या घट जाना मूड स्विंग की वजह बनता है. चिकित्सकों के मुताबिक खाना खाए बगैर स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में ग्लूकोज का लेवल 80 से 130 मिलीग्राम/डेसीलीटर और खाना खाने के कुछ घंटों बाद तक 180 मिलीग्राम/डेसीलीटर होना चाहिए. दोनों ही स्थितियों में इससे कम लेवल होने पर कोई भी व्यक्ति भ्रमित, बेचैन या चिड़चिड़ा महसूस करेगा और इससे अधिक होने पर चिंतित, दुखी या गुस्से से भरा हुआ महसूस करने लगेगा. कई बार ठीक तरह से खाना न खाने पर या नियमित रूप से संतुलित भोजन न लेने पर भी ऐसा हो सकता है. अर्णब गोस्वामी पर लौटें तो हालांकि ये तमाम लक्षण उनके व्यवहार में नज़र आते हैं लेकिन ईश्वर से प्रार्थना है कि इसके पीछे ऐसी कोई स्वास्थ्य समस्या न हो और उनका शुगर लेवल, उनकी पत्रकारिता के ठीक उलट यानी संतुलित रहता हो.

शुगर लेवल फ्लक्चुएशन की तरह ही कोलेस्ट्रॉल का बढ़ना भी एक ऐसी समस्या है जिस पर तब तक ध्यान नहीं जाता जब तक यह हमारी जीवनचर्या को ना प्रभावित करने लगे. हालांकि कोलेस्ट्रॉल में बढ़ोतरी सीधे तौर पर तो मूड स्विंग के लिए जिम्मेदार नहीं होती लेकिन इसके इलाज के लिए दी जानी वाली दवा इसकी वजह जरूर बन सकती है. हाल के बरसों में हुए कई शोधों में पाया गया है कि कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली स्टैटिन नाम की दवा अग्रेसिव बिहेवियर की वजह बन सकती है. हालांकि कई मामलों में इसका उल्टा भी हो सकता है यानी स्टैटिन का इस्तेमाल करने वाले लोग अपेक्षाकृत शांत व्यवहार भी दिखा सकते हैं लेकिन इसके असर के चलते चिड़चिड़ाहट और गुस्सा दिखाने के मामले कहीं ज्यादा हैं. खास कर, महिलाओं के व्यवहार पर इसका असर पुरुषों की तुलना में कहीं ज्यादा और बुरा देखने को मिलता है. इससे प्रभावित होने वालों के साथ एक समस्या यह भी होती है कि कई बार उन्हें पता ही नहीं चल पाता है कि उनके व्यवहार में कोई महसूस किया जा सकने वाला बदलाव आ चुका है. जैसा कि इस समय न सिर्फ अर्णब गोस्वामी बल्कि मीडिया के एक बड़े हिस्से के साथ हो रहा है.

अंसतुलित जीवनशैली से उपजी बीमारियों के अलावा बेवजह गुस्सा आने की सबसे बड़ी और साधारण वजह हॉर्मोन्स का असंतुलन भी है. इनमें भी सबसे ज्यादा थायराइड का नाम लिया जाता है. कई बार अति-सक्रिय थायराइड ग्रंथि भी व्यवहार में असंतुलन का कारण बन सकती है. इसे चिकित्सा की भाषा में हाइपरथायराइडिज्म कहते हैं और इस स्थिति में थायराइड ग्रंथि ज़रूरत से ज्यादा हॉर्मोन का स्त्राव करती है. थायराइड हॉर्मोन सीधे तौर पर मूड चेंज के लिए जिम्मेदार होता है.

हॉर्मोन असंतुलन की ही थोड़ी और बात करें तो महिलाओं में प्री-मेंस्ट्रुअल सिंड्रोम (पीएमएस) और मेनोपॉज भी बेवजह गुस्सा आने का कारण बन सकते हैं. मासिक चक्र से पहले के 6-7 दिन महिलाओं में पीएमएस के लक्षण होते हैं. ये लक्षण एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरॉन और सेरोटोनिन जैसे हॉर्मोन्स का लेवल नीचे गिर जाने के कारण दिखाई देते हैं. इसके कारण उन्हें कई शारीरिक-मानसिक तकलीफों का सामना करना पड़ता है. इन्हीं हॉर्मोन्स की उपस्थिति मेनोपॉज की उम्र में पहुंच चुकी महिलाओं के शरीर में भी कम होने लगती है जिसके कारण वे भी हर समय चिड़चिड़ाती रहती हैं. लेकिन, चूंकि हम इस आलेख में अर्णब गोस्वामी को गुस्सा आने की संभावित वजहों को टटोल रहे हैं और वे महिला नहीं हैं, इसलिए इस कारण को खारिज किया जा सकता है.

बेजा गुस्सा आना कुछ मानसिक समस्याओं का लक्षण भी हो सकता है. इनमें से सबसे कॉमन समस्या डिप्रेशन है जब व्यक्ति बेवजह इतना निराश महसूस करता है कि वह अपने आसपास के माहौल से ही कटकर रहना चाहता है. ऐसे में कोई छोटी असफलता या किसी का उचित आग्रह भी उसके गुस्से के बाहर आने की वजह बन सकता है. लेकिन डिप्रेशन के अलावा ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिसऑर्डर (ओसीडी), बाईपोलर डिसॉर्डर या अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसॉर्डर (एडीएचडी) समेत कई बीमारियों में इस तरह के लक्षण देखने को मिल सकते हैं. ओसीडी से ग्रस्त व्यक्ति गैरमौजूद खतरे से डरता है और लगातार उससे बचने के लिए कोशिश करता दिखाई देता है. वहीं बाईपोलर डिसॉर्डर से पीड़ित कोई व्यक्ति कभी तो बहुत अच्छी तरह पेश आता है तो कभी एकदम उलट. एडीएचडी की बात करें तो इससे प्रभावित होने वाले लोग हर समय सक्रिय दिखाई देते हैं. वे लंबे समय तक किसी एक ही चीज पर फोकस कर पाने में अक्षम होते हैं इसलिए जल्दी-जल्दी अपनी गतिविधियों में बदलाव करते रहते हैं. इन तमाम तरह के मानसिक आज़ारों में चिड़चिड़ापन, गुस्सा और छोटी-छोटी बातों पर बहुत दुखी महसूस करना भी शामिल होता है.

चूंकि ऊपर बताए गए तमाम कारण बेवजह गुस्से की वजह तो हो सकते हैं लेकिन शारीरिक और मानसिक तौर पर इनसे गुज़रना बहुत त्रासद हो सकता है इसलिए हम एक बार फिर दुआ करेंगे कि अर्णब गोस्वामी के संबंध में इनमें से कोई भी बात सही साबित न हो. ऐसा होने पर नीचे बताए गए शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से नहीं जुड़ने वाले कुछ कारण भी उनके गुस्से की वजह हो सकते हैं –

हो सकता है कि वे जान गए हों कि आजकल समाचार चैनलों को कोई भी समाचार देखने के लिए नहीं देखना चाहता है इसलिए वे इसे मनोरंजन चैनल बनाने की कोशिश में लगे हों. चूंकि मनोरंजन चैनल पर सबसे ज्यादा पॉपुलर किरदार कोकिला बेन हैं जो हमेशा ही गुस्से में रहती हैं, उन्हें देखकर अर्णब गोस्वामी ने प्रेरणा ली हो और अब वे हर समय गुस्से में दिखाई देते हैं.

एक दूसरी संभावना इस बात की भी है कि सही तरीके से न्यूज चैनल चलाने के लिए ग्राउंड रिपोर्टर्स और स्ट्रिंगर्स के नेटवर्क की ज़रूरत होती है जो इस समय शायद अर्णब गोस्वामी के चैनल के पास हैं नहीं. ऐसे में वे शायद दस रिपोर्टरों के बराबर का शोर अकेले मचाकर इसकी भरपाई कर लेना चाहते हैं.

टीवी मीडिया की इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टों की तरह, हवा में ही उपजी एक अन्य संभावना कहती है कि हो सकता है कि बचपन में उन्हें उनके सौम्य चेहरे को लेकर बहुत चिढ़ाया गया हो. इसके चलते उन्हें स्कूल में होने वाले आयोजनों या मोहल्ले की रामलीला में बचकाने किस्म के रोल दिए गए हों. या शायद लड़की-महिला बना दिया गया हो. अब इसकी भरपाई शायद वे अपने न्यूज चैनल पर नकारात्मक या खल-भूमिका निभाकर करना चाहते हैं. या फिर, यह भी हो सकता है कि अर्णब गोस्वामी, एंग्री-यंगमैन अमिताभ बच्चन के बहुत बड़े फैन हों. इसलिए उन्हें लगता हो कि नायक वही है जो हर समय गुस्से और एटीट्यूड के साथ बात करता और हाथ-पांव झटककर एक्शन दिखाता है.

बगैर सूत्र या सबूत के जताई जा सकने वाली अंतिम संभावना यह है कि हो सकता है उन्हें पत्रकारिता करने के दौरान कभी यह समझ आया हो कि मीडिया को अपनी आवाज बुलंद रखनी चाहिए क्योंकि सरकारें आम तौर पर बहरी होती हैं. लेकिन फिर कुछ समय बाद उनकी प्राथमिकताएं बदल गईं. लेकिन एक बार पड़ चुकी आदत तो आदत है. सो वे अपना चिल्लाना छोड़ नहीं पा रहे हैं.

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