बाल गंगाधर तिलक

समाज | इतिहास

जब सरकार की निंदा पर माफ़ी मांगने के बजाय सज़ा काटकर तिलक ने प्रेस की आज़ादी की लड़ाई छेड़ी थी

यह मामला 1897 का है और तब तक बाल गंगाधर तिलक ‘लोकमान्य’ नहीं कहलाए थे

अनुराग भारद्वाज | 23 जुलाई 2020 | फोटो: mystampsandf

1897 में महाराष्ट्र में प्लेग की बीमारी ने पूना और आसपास के इलाकों में आफ़त मचा दी थी. बाल गंगाधर तिलक पूना में रहकर इस महामारी से निपटने में सरकार की मदद कर रहे थे. लेकिन साथ-साथ वे सरकार की बेरुखी और उसके बदइंतज़ामात पर ‘केसरी’ में बेहद तल्ख़ लफ़्ज़ों में उसकी आलोचना भी कर रहे थे. उन्होंने अख़बार में ‘शिवाजी उवाच’ नाम से लेख लिखा. इसके सार में शिवाजी के हाथों अफ़ज़ल खां की मौत को गीता के ‘कर्म कर, फल की इच्छा मत कर’ वाले सिद्धान्त से समझाने की कोशिश की गई थी. तिलक ने लिखा था, ‘चोर घर नें घुस आये और आप के पास इतनी हिम्मत नहीं है कि उससे लड़ सकें तो उसे घर में बंद करके आग लगा दो. भगवान ने हिंदुस्तान किसी तश्तरी में रखकर विदेशियों को नहीं दिया है. डरो मत, अपराध बोध से बाहर निकलो और कर्म करो.’

इस लेख से हंगामा खड़ा हो गया. थी. ब्रिटिश सरकार का कहना था कि तिलक ने अपने अखबार में भड़काऊ बातें लिख कर सरकार के ख़िलाफ़ विद्रोह किया है. इसको अंग्रेज़ी में ‘सेडीशन’ और हिंदी में राजद्रोह कहते हैं. सरकार का मानना था कि इस लेख से लोग भड़क गए और इसी की वजह से चापेकर बंधुओं ने 27 जून 1897 को प्लेग कमेटी के चेयरमैन रैंड (अंग्रेज़ अफसर) और लेफ्टिनेंट अयेर्स्ट की हत्या कर दी. सरकार ने तिलक को इसके लिए ज़िम्मेदार माना और भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए के तहत उन्हें गिरफ़्तार कर लिया.

पर हक़ीक़त कुछ और थी. 1870 में जब भारत में अखबार ने अपने पैर जमाने शुरू किए थे तभी से हिंदी और स्थानीय भाषाओ के अखबार अंग्रेज़ सरकार की आलोचना करने लगे थे. तब अखबारों में अर्थ, खेल, संपादकीय आदि विषयों पर लेख नहीं होते थे. बस सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ लिखकर मोर्चाबंदी की जाती थी. जिन्हें पढ़कर लोग उद्वेलित होते, नाफ़रमानी करते या हिंसक हो उठते.

सरकार ने इसे रोकने के लिए 1878 में गुपचुप तरीके ‘वर्नाकुलर प्रेस एक्ट’ की स्थापना की जिसके तहत कोई भी हिंदी या देशज या प्रांतीय भाषा का अख़बार अगर राजद्रोह करता हुआ पाया गया तो उसे बंद कर दिया जायेगा. ये बात अंग्रेज़ी रिसालों पर लागू नहीं होती थी. सरकार का तिलक को पकड़ने के पीछे मकसद था कि इस एक्ट के तहत किसी नामी गिरामी शख्स के ख़िलाफ़ कार्यवाही कर मिसाल कायम की जाये.

तो क्या लोग तिलक के अखबार से ही भड़के थे? नहीं. लोग पहले ही भड़के हुए थे. टैक्स, मुद्रा और अकाल राहत पर सरकारी नीतियों से लोगों के दिलों में गुस्सा भरा हुआ था. ‘केसरी’ में लेखों के ज़रिये तिलक किसानों को टैक्स न भरने के लिए प्रेरित करते थे. वे बेहद राष्ट्रवादी और निर्भीक पत्रकार थे. वे पहले नेता भी थे जिन्होंने किसानों और निम्न वर्ग को कांग्रेस के साथ जोड़ने की बात की थी. उन्होंने लिखा था कि किसानों को देश की आज़ादी के मुद्दे से जुड़ना होगा और अगर कांग्रेस उन्हें अपने साथ जोड़ लेती है, तो सरकार द्वारा कांग्रेस की अनदेखी, किसानों की अनदेखी होगी. तिलक ने बस लोगों के गुस्से को रास्ता दिखाया था. रैंड और लेफ्टिनेंट अयेर्स्ट की हत्या इस गुस्से की परिणिति थे, न कि उनके लेखों की.

खैर, सरकार इस हत्याकांड में तिलक का हाथ होने में साबित करने में जुट गयी, जबकि उन्होंने इन हत्याओं की निंदा की थी. जब सरकार ऐसा करने में असफल रही, तो उसने तिलक को धारा ‘124 अ’ के तहत 27 जुलाई, 1897 को गिरफ्तार कर लिया. जस्टिस जेम्स स्ट्रेची की अदालत में तिलक पर मुकदमा चलाया गया. उन्होंने अपने पर लगे इल्ज़ामों को मानने से इंकार दिया. तिलक पर ‘असंतोष’ फैलाने का इल्ज़ाम सिद्ध हुआ. सुनवाई के बाद लिखे फ़ैसले में ‘असंतोष’ की परिभाषा करते वक़्त स्ट्रेची ने इसको दुर्भावना, नफरत, और दुश्मनी जैसे लफ़्ज़ों से जोड़कर ज्यूरी को प्रभावित कर दिया और 6:3 के अनुपात में उन्हें दोषी माना गया. जिन ज्यूरी के जिन तीन सदस्यों ने उन्हें निर्दोष माना था वे भारतीय थे. तिलक को 18 महीने की कड़ी सज़ा सुनाई गयी. तब तिलक लेजिस्लेटिव काउंसिल (विधान परिषद) के सदस्य भी थे.

इस फ़ैसले ने तिलक की लोकप्रियता चरम पर पहुंचा दी. उनका जीवन लोगों के लिए नज़ीर की तरह पेश हुआ और उन्हें ‘लोकमान्य’ की उपाधि से नवाज़ दिया गया. देश में ज़बर्दस्त विरोध प्रदर्शन हुए. इसे प्रेस की आजादी के हनन के तौर पर देखा गया. भारतीय राजनीति के पितामह कहे जाने वाले दादाभाई नौरोजी उस वक़्त लंदन में थे. उन्होंने सरकार को यह कहते हुए जमकर कोसा कि प्रेस का गला घोटना अंततः सरकार को ही भारी पड़ेगा.

तो यह क़िस्सा है भारत में प्रेस की आजादी की पहली लड़ाई का. बतौर एडिटर तिलक के लिए बड़ा आसान था सज़ा से बच निकलना. उनके कई संगी-साथियों और लोगों ने उनसे लेखों में अंग्रेज़ सरकार की गई निंदा पर माफ़ी मांगने की सलाह दी. तिलक ने इससे साफ इनकार कर दिया. उनका कहना था, ‘मेरा चरित्र ही लोगों में मुझे बतौर नेता स्थापित करेगा. सरकार का उद्देश्य पूना के लीडरों को नीचा दिखाने का है…सरकार मुझे कच्ची ईख मानने की ग़लती कर रही है.’ उन्होंने यह भी कहा, ‘याद रहे एक सीमा के बाद हम जनता के सेवक हैं. अगर आपने मुश्किल वक़्त में अपने मज़बूत चरित्र का प्रदर्शन नहीं किया तो आप उन्हें धोखा देंगे.’ ‘इंडियास स्ट्रगल फॉर इंडिपेंडेंस’ में चर्चित इतिहास बिपिन चन्द्र लिखते हैं कि प्रेस की आजादी के लिए जितना संघर्ष तिलक ने किया, उतना किसी और ने नहीं.

कुछ साल पहले एक नेता, टीवी चैनल और उसके एडिटर में झगड़ा हुआ था, चैनल के रिपोर्टर पर नेता से फ़िरौती मांगने का इल्ज़ाम था, नेता ने स्टिंग ऑपरेशन कर ये सब दिखाने का दावा भी किया था. फिर चुनाव आए और सुलह हो गई. तीनों ने हाथ मिला लिए. ‘न तुम जीते न हम हारे’ वाली बात हुई . और सत्य, उसका क्या हुआ? एडिटर ने ट्विटर पर पोस्ट किया था, ‘आख़िर सत्य की जीत हुई’. सत्यमेव जयते!

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