भारतीय कोबरा

समाज | स्वास्थ्य

क्या हमें पता है कि बीते दो महीनों में हमारे यहां सांपों के काटने से 20 हजार लोग मर चुके हैं

और इनमें से हजारों लोगों की जान इस तरह से बचाई जा सकती थी कि कई जनजातीय समुदायों को रोजगार भी मिल जाता

अश्वनी कबीर | 09 सितंबर 2020 | फोटो: विकीमाडिया कॉमन्स

कुछ बीमारियां तो मौसमी हैं जो खास समय और जलवायु में फैलती हैं. और कुछ कोविड-19 की तरह अचानक ही हमारे सामने आ जाती हैं. लेकिन क्या तमाम मौसमी बीमारियों और कोरोना महामारी के बीच किसी को इस बात की भी सुध है कि बीते दो महीनों में 20 हज़ार से ज्यादा लोग ‘सर्पदंश’ के शिकार होकर हमारे बीच नहीं हैं.

पिछले पखवाड़े राजस्थान के बूंदी ज़िले की बालचंदपाड़ा तहसील में रहने वाले राजकुमार धोबी को सांप ने काट लिया. वे अपने खेत में जा रहे थे तभी यह घटना हुई. सूचना मिलते ही राजकुमार के परिजन उन्हें तेजाजी के थान पर ले गए. तेजाजी एक स्थानीय लोक देवता हैं जिन्हें शिव का अवतार या सांपों का देवता भी माना जाता है. वहां उन्हें करीब दो घंटे तक रखा गया. जब राजकुमार की स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो उन्हें दूर जिला अस्पताल ले जाया गया. वहां उनका इलाज शुरु हो पाता तब तक उनकी मौत हो चुकी थी. राजस्थान में अकेले बीकानेर ज़िले में ही बीते 15 दिनों में करीब 500 से ज्यादा सांप द्वारा काटे जाने के मामले सामने आये हैं.

दूसरे राज्यों की बात करें तो सात अगस्त को उत्तर-प्रदेश के सीतापुर ज़िले के सदरपुर थाना क्षेत्र में तीन सगे भाइयों की मौत सांप के काटने से हो गई. वहीं बहराइच ज़िले के रुपईडीहा थाना क्षेत्र में बीते 15 दिनों में 30 से ज्यादा लोगों को सांप ने डसा हैं. बिहार में जहां एक तरफ तो बाढ़ का तांडव है, वहीं दूसरी ओर पानी के साथ सांपों ने भी घरों में डेरा जमाया हुआ है. छत्तीसगढ़ में एक कवारन्टीन सेन्टर में कोरोना से ज्यादा सांपों के काटने से मौत हुई हैं. मीडिया रिपोर्टों की मानें तो जुलाई के महीने तक यहां 40 से ज्यादा लोगों की मौत सर्पदंश से हो चुकी थी.

सर्पदंश के आंकड़ों की कहानी

डब्ल्यूएचओ के मुताबिक पूरी दुनिया में हर वर्ष सवा लाख के करीब लोग सांप के काटने से मर जाते हैं. इन मरने वाले लोगों में करीब आधे भारतीय होते हैं. हमारे यहां हर वर्ष करीब 60 हज़ार लोग सर्पदंश के कारण अपनी जान गंवा देते हैं. इनमें से 60 फ़ीसदी मौतें अकेले जून से सितंबर के महीनों में होती हैं. इनमें से भी 97 फीसदी मौतें ग्रामीण क्षेत्रों में जबकि तीन फीसदी मौतें शहरी क्षेत्रों में होती हैं. लेकिन यह सर्पदंश का केवल एक ही पहलू है. पूरी दुनिया में हर साल इतने लोगों की मौत के अलावा यह करीब साढ़े तीन लाख लोगों के अपाहिज होने की वजह भी बनता है.

जून से सितंबर का समय मानसून (बारिश) या उसके तुरंत बाद का होता है. इस दौरान बारिश का पानी सांपों के बिलों और बाम्बियों में भर जाता है जिससे सांप सुरक्षित स्थान की तलाश में बाहर निकलता है. यही समय सांप की मेटिंग का भी होता है. इसके कारण भी उसका व्यवहार थोड़ा आक्रामक रहता है. और इसी बारिश के मौसम में किसान और मजदूर धान, सोयाबीन ओर बाजरे की फसल की बुवाई करते हैं जिसकी वजह से इस दौरान सर्पदंश की घटनाएं और भी ज्यादा होती हैं.

टोरंटो विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर ग्लोबल हेल्थ रिसर्च ने यूनाइटेड किंगडम के ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय और कुछ भारतीय संस्थानों के साथ मिलकर इसी साल जुलाई में एक शोध के नतीजे सार्वजनिक किए हैं. इसमें कहा गया है कि वर्ष 2000 से 2019 के दौरान भारत में करीब 12 लाख लोग सर्पदंश से मौत के मुंह में समा गए. इन मौतों में से 70 फ़ीसदी केवल आठ राज्यों – बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड, ओडिशा, राजस्थान, गुजरात ओर आंध्र प्रदेश – के ग्रामीण इलाकों में हुईं.

सांपों की दुनिया

धरती पर पाया जाने वाला बगैर पैर और पुतलियों का यह प्राणी बड़ा ही अजीब है. पूरी दुनिया में करीब 2500 प्रजातियों के सांप पाये जाते हैं. इनमें से केवल 40 फीसदी सांपों में ही विष पाया जाता है. इनमें भी मात्र 10 फीसदी सांप ऐसे होते हैं जिनके काटने से इंसान की मौत हो सकती है. अकेले भारत में 270 से ज्यादा प्रकार के सांप पाये जाते हैं जिनमें महज 50 प्रजातियां ही जहरीली हैं और इनमें से भी पांच ही ऐसी हैं जो ज्यादातर जगहों पर पाये जाने की वजह से इंसानी मौत का कारण बनती हैं.

जिन सांपों के काटने से इंसान की मौत होती हैं उनमें ‘कोबरा’ सबसे आगे है. इसे नाग भी कहा जाता है. इसके फन से इसे पहचानना बहुत आसान होता है. ‘कॉमन करैत’ नाम का सांप अधिकांश रात में ही काटता है. इस सांप को इंसानी गंध पसंद हैं. रसेल वाइपर ओर सो-स्केल वाइपर को सबसे आक्रामक सांप माना जाता है और इसकी आवाज दूर से ही सुनाई पड़ती है. ये दोनो सांप अजगर से मिलते -जुलते हैं. इनके अलावा पश्चिमी पठार, दलदली एवं वन क्षेत्र में किंग कोबरा सांप भी मिलता हैं. यह सांप करीब 15 से 18 फीट लंबा होता हैं. पहले ये चारों तरह के सांप पूरे भारत में पाए जाते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है. इन चारों सांपों को बिग-4 के नाम से जाना जाता है.

सांपों की प्रकृति के बारे में भारत में जो कुछ समुदाय सबसे ज्यादा जानकारी रखते हैं उनमें से एक है राजस्थान का कालबेलिया समुदाय. सांप एक तरह से इस समुदाय का एक सदस्य ही होता है. डूंगरपुर के कालबेलिया समुदाय से आने वाले 70 वर्षीय जोरानाथ हमें बताते हैं कि नुगरा (कोबरा) सांप अधिकांश सुबह या शाम को ही काटता है. जबकि थुगरा (कॉमन करैत) सांप के काटने का अक्सर पता ही नहीं चल पाता. इसके काटने पर न के बराबर दर्द होता है और यह अक्सर रात को ही काटता है इसलिए इसके द्वारा काटे जाने पर अधिकांश लोग नींद में ही मर जाते हैं. जबकि फुगरा (वाइपर) सांप सबसे ज्यादा तेज और चालक होता है. उसको गुस्सा भी बहुत ज्यादा आता है.

सांप का खेल दिखाता एक सपेरा | फोटो: अश्वनी कबीर

सांप के विष का गणित

सांपों के जहर को न्यूरोटॉक्सिक और हीमोटॉक्सिक वर्ग में विभाजित किया जाता है. जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है न्यूरोटॉक्सिक जहर हमारे मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है और हीमोटॉक्सिक रक्त और हृदय से जुड़े शरीर के क्रियाकलापों को. कोबरा व करैत जैसे सांपों का जहर न्यूरोटॉक्सिक होता है और वाइपर का हीमोटॉक्सिक. सांप का ज़हर असल में प्रोटीन और एनजाइम्स से बना होता है. यह सांप के ऊपरी जबड़े में स्थित थैलियों में मौजूद रहता है. ऊपरी जबड़े के दोनों ओर स्थित एक-एक थैली ज़हरीले दांतों की जड़ों में खुलती है.

वाइपर के ज़हरीले दांत अंदर से नलीनुमा होते हैं (इन्जेक्शन की सुई की तरह) इसलिए ज़हर ठीक शरीर के अंदर चला जाता है. और कुछ कोबरा जैसे सांप जिस जगह पर काटते हैं वहां जहर की एक पिचकारी सी छोड़ते हैं.

यहां सर्प दंश का इलाज

सांप के विष के प्रभाव को रोकने के लिये उसके जहर से ही दवा बनाई जाती है. इस दवा को एंटीवेनिन या एंटीवेनम सीरम कहा जाता है. सरकारी दावों के मुताबिक यह दवा हमारे यहां के सभी जिला अस्पतालों, प्राइमरी हेल्थ सेंटर्स (पीएचसी) एवं कम्युनिटी हेल्थ सेंटर्स (सीएचसी) पर निशुल्क उपलब्ध है. इसलिए जब कोई व्यक्ति सर्पदंश का शिकार बन जाता है तो उसको नजदीक के इन केंद्रों पर ले जाया जाता है.

लेकिन एंटीवेनम सीरम की उपब्धता एवं आपूर्ति पर सवाल उठाते हुए राजस्थान समग्र सेवा संघ के सदस्य अनिल गोस्वामी बताते हैं, “कहने को तो एंटीवेनम सीरम पीएचसी एवं सीएचसी पर उपलब्ध हैं, किंतु हकीकत में जिला अस्पतालों में भी इसकी ठीक आपूर्ति नहीं हैं. पीएचसी एवं सीएचसी केंद्रों पर जब फ्रिज की सुविधा ही नहीं हैं तो फिर इसे वे रखेंगे कहां पर?’

राजस्थान के स्वास्थ्य विभाग के एक कर्मचारी अनिल गोस्वामी की आधी बात से सहमत होते हुए बताते हैं कि ट्रेंड स्टाफ ओर सीरम की पर्याप्त उपलब्धता होने की वजह से यहां के जिला अस्पतालों की स्थिति बाकी स्वास्थ्य केंद्रों के मुकाबले अलग है.

लेकन अनिल गोस्वामी का यह तर्क भी सही है कि अगर ऐसा कुछ जगहों पर है भी तो “सांप के काटने से मरता कौन हैं? गांव-देहात में रहने वाले लोग. यदि उन्हें अपने पास के स्वास्थ्य केंद्रों पर सीरम मिल भी गई तो वहां ट्रेंड स्टाफ नहीं होता. यदि एंटीवेनम सीरम ज्यादा मात्रा में दे दी जाए तो व्यक्ति की वैसे ही मौत निश्चित है.’ शायद यह भी एक वजह है कि सांप काटने के बाद पीएचसी ओर सीएचसी पहुंचने वाले अधिकांश मरीजों के बचने की संभावना काफी कम होती है.

जयपुर के प्रख्यात स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ राकेश पारिख एंटीवेनम से जुड़ी एक और समस्या की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, ”दवा कंपनियां भी एटीवेनम सीरम कम बनाती हैं. इससे इस सीरम की आपूर्ति कम होती है. इसके पीछे एक बड़ा कारण मुनाफा कम होना हैं. बाजार में एंटीवेनम सीरम की औसत कीमत 5 से 6 हज़ार के बीच है. हमें इसका उत्पादन बढ़ाना होगा जिससे इसकी आपूर्ति बढ़ाई जा सके, अन्यथा हम सर्पदंश से हुई मौत पर रोक नहीं लगा सकेंगे.”

लेकिन सर्पदंश के इलाज में मौजूद जटिलताएं सिर्फ इतनी ही नहीं हैं. एक तो किसी एक सांप के एंटीवेनम का उपयोग दूसरे सांप द्वारा काटने पर नहीं किया जा सकता, और दूसरा यह सोचना भी सही नहीं है कि यदि सांप की प्रजाति एक समान है तो उनका एंटीवेनम एक ही होगा. उदाहरण के तौर पर तमिलनाडु के कोबरा सांप के जहर से बना एंटीवेनम सीरम राजस्थान या झारखंड के कोबरा सांप के सर्पदंश में ज्यादा प्रभावी नहीं होता. ऐसे ही राजस्थान के रसेल वाइपर सांप के जहर से बने एंटीवेनम सीरम का कर्नाटक या पश्चिम बंगाल के रसेल वाइपर के सर्पदंश पर खास असर नहीं होता.

स्थानीय जनजातियां सांप का जहर निकालने में सिद्धहस्त होती हैं

तरह-तरह के भ्रम और धारणाएं

सांप को लेकर बहुत सी गलत धारणाएं भी प्रचलित हैं. जिनमें से एक यह है कि यदि किसी इंसान को सांप ने काट लिया और ओझा मंत्र पढ़ेगा तो वह सांप वापस आकर उस जहर को चूस लेगा. ऐसे अंधविश्वासों के चलते भी सर्पदंश का इलाज करना आसान नहीं होता. दरअसल सांप काटने के बाद के 1-2 घण्टे बहुत महत्वपूर्ण होते हैं. उसमें अगर कोई व्यक्ति ऐसे फालतू के चक्करों में उलझ जाता है तो फिर उसका बचना मुश्किल हो जाता है. ग्रामीण क्षेत्रों में सर्पदंश से होने वाली मौतों के पीछे एक बड़ा कारण यह भी है.

सांपों से जुड़ी एक अजीबोगरीब धारणा यह भी है कि इच्छाधारी नाग या कोबरा के सर पर एक मणि होती है जिसे हासिल करके इंसान अमर हो सकता है. ऐसी कुछ धारणाएं न केवल सांपों के मरने की बल्कि उनके द्वारा काटे जाने की वजह भी बनती रही हैं.

इरुला कोऑपरेटिव सोसाइटी का सफल मॉडल

भारत के सुदूर दक्षिण राज्यों तमिलनाडु और कर्नाटक में इरुला आदिवासी जनजाति रहती है जो सदियों से सांपों के साथ अपना जीवन जीती आई है. इरुला लोग सांप से जहर लेने, सर्पदंश का इलाज करने तथा जड़ी-बूटियों के जानकार लोग माने जाते हैं. भारत सरकार ने 1972 में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम बना दिया जिससे सांप पकड़ने ओर जंगल के गहराई में जाने पर रोक लग गई.इसके बाद एक अमेरिकन प्रकृतिविद रोम व्हाइटेकर ने 1978 में फारेस्ट विभाग से अनुमति प्राप्त करके सांपों से जहर एकत्रित करने का काम शुरु किया. इस काम में इरुला आदिवासी समुदाय को जोड़ा गया. इरुला का काम जंगल से जहरीले सांपों को पकड़ना, उनसे जहर लेना/निकालना फिर उन्हें वापस जंगल में छोड़ देना हैं.

इरुला कोऑपरेटिव सोसायटी को हॉपकिंस इंस्टीट्यूट के साथ जोड़ा गया है. यह इंस्टीट्यूट उससे जहर लेकर एंटीवेनम सीरम तैयार करता है. इस प्रक्रिया में वेनम की कम मात्रा को एक घोड़े में इंजेक्ट किया जाता है जिससे उसके शरीर मे एंटीजन बन सकें. उन एंटीजन को बाहर निकाल लिया जाता है, जिससे एंटीवेनम सीरम तैयार होता है.

इरुला कोऑपरेटिव सोसायटी की रिपोर्ट बताती है कि इरुला जनजाति से पहले दवा कम्पनी के लोग ही सांप पकड़ा करते थे. इनमें से अधिकांश जहरीले नहीं होते थे इसलिए उन्हें वापस छोड़ना पड़ता था. जब विषैला सांप मिलता तो वे जिस तरह से उन्हें पकड़ते और उनका जहर निकालते उससे कई सांप जख्मी हो जाते थे और जब उनको वापस जंगल में छोड़ा जाता तो उनमें से कई मर जाते थे. रिपोर्ट बताती है कि यह प्रक्रिया ज्यादा खर्चीली और समयखाऊ थी और सबसे बड़ी बात इससे वन्य जीवों (सांपों) को नुकसान भी पहुचता था.

अब इरुला लोग बगैर नुकसान पहुचाए आसानी से केवल जहरीले सांपों को ही पकड़ते हैं. वे बड़ी सावधानी से कई-कई बार उनका जहर निकालते हैं और फिर उन्हें वापस जंगल में छोड़ देते हैं. रिपोर्ट के अनुसार इस प्रक्रिया का सफलता अनुपात 93 फीसद है. मतलब 100 जहरीले सांपों में से 93 सांप बच जाते हैं केवल सात ही मरते हैं.

इस कोऑपरेटिव सोसायटी के बनने से इरुला समुदाय को स्थाई रोजगार मिल गया है. उनका सदियों का सीखा हुआ ज्ञान/हुनर बच गया. इससे दवा कंपनियों को भी आसानी से कम पैसा खर्च किये सांप का ऐसा जहर मिल गया जिससे एंटीवेनम सीरम तैयार किया जा सकता है. और सबसे बड़ी बात यह कि इससे वन्य जीवन की भी क्षति नहीं हुई.

यह प्रयोग दोहराया क्यों नहीं गया?

केवल इरुला समुदाय ही नहीं है जिसका भारत में सांपों से इतना घनिष्ठ रिश्ता है. इरुला तमिलनाडु और कर्नाटक में रहता है और जैसा कि हम थोड़ा सा ऊपर जान चुके हैं इनकी ही तरह का एक और समुदाय कालबेलिया है जो राजस्थान, गुजरात, दिल्ली और हरियाणा में पाया जाता है. इनके अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार में सपेरा समुदाय है. महाराष्ट्र एवं पंजाब में जोगी समुदाय. और उड़ीसा, छत्तीसगढ़ व झारखंड में मुरिया जनजाति. ये सभी समुदाय सांपों के साथ ही अपने जीवन को जीते आये हैं.

“हम अपने बच्चों को जन्म से ही सांपों के साथ रहना सिखाते हैं’ कालबेलिया समुदाय के सांपों से रिश्ते के बारे में इसी समुदाय से आने वाले जोरानाथ कहते हैं “सांप तो हमारी मोहब्बत हैं. मोहब्बत जितनी पुरानी होती है. उसका नशा उतना ही ज्यादा चढ़ता है. हम तो उसी नशे के साथ ही जीते हैं और उसी के आग़ोश में मरते हैं. ये हमारी मोहब्बत ही है जिसे सदियों से हम अपने कंधों पर डाले गली-गली घूम रहे हैं.”

ये समुदाय केवल भावनाओं की वजह से ही नहीं बल्कि ठोस कारणों की वजह से भी सांप को अपने और समाज के लिए उपयोगी मानते हैं. “सांप तो किसान का मित्र होता है जो खेतों में चूहों, कीटों, मेंढकों व छिपकलियों की संख्या को बढ़ने नहीं देता. वो छोटे पक्षियों के अंडे तथा टिड्डियों को भी खाता है” सांप की खूबियों पर प्रकाश डालते हुए जैसलमेर के मिश्रनाथ कालबेलिया कहते हैं.

इरुला कोऑपरेटिव सोयायटी को बने आज 42 वर्ष गुजर गए हैं किन्तु कोई दूसरी इस तरह की सोयायटी फिर नहीं बनाई गई. पिछले 20 वर्षों में जो 12 लाख लोग सांप काटने की वजह से मारे गए हैं. यदि उससे पहले भी 20 वर्षों का आंकड़ा जोड़ दें तो ये संख्या 24 लाख पहुंचती हैं. क्या इनमें से कुछ हजार लोगों को भी कुछ और प्रयास करके हम नहीं बचा सकते थे? या कुछ लाख?

राज्य सरकारों ने सर्पदंश को राज्य आपदा घोषित किया है. इसे भूकम्प, बाढ़, सूखा, बादल फटना, सुनामी इत्यादि की सूची में रखा जाता हैं. राज्य सरकारें इसके लिए मुवावजा देती हैं. मध्य प्रदेश और बिहार सरकार सांप काटने के कारण हुई मौत पर पांच लाख रुपये का मुआवज़ा देती हैं. उत्तर प्रदेश, उड़ीसा व राजस्थान की सरकारें चार लाख रुपये, पंजाब सरकार तीन लाख रुपये, झारखंड 2.5 लाख रुपये, बंगाल दो लाख और केरल एक लाख रुपये. मुआवजा लेने के लिए सर्पदंश से मृत व्यक्ति का पोस्टमार्टम होना और उसकी रिपोर्ट में यह उल्लेखित होना जरूरी है कि उस व्यक्ति की मौत सर्पदंश से हुई. उसी रिपोर्ट व पहचान के अन्य दस्तावेजों के आधार पर क्लेम किया जाता है.

एक वर्ष में सर्पदंश से होने वाली करीब 60 हज़ार मौतों का 2.5 लाख रुपये के औसत मुआवजे के हिसाब से 1500 करोड़ रुपये होते हैं. पिछले 40 साल के लिए यह आंकड़ा 60 हजार करोड़ रुपये हो जाता है. फिर इतने धन और इतने लोगों की जान बचाने और लाखों लोगों को रोजगार देने और उनके परंपरागत ज्ञान को बचाने के लिए इरुला जैसा कोई और प्रयोग क्यों नहीं किया गया?

यह मुद्दा अगर कभी हमारी चिंता की कोई बड़ी वजह नहीं बन सका तो इसका दोषी कौन है? बस सांपों से परंपरागत तरीके से जुड़े रहे समुदायों को कोऑपरेटिव सोसायटी या किसी अन्य तरीके से दवा कम्पनियों से ही तो जोड़ना था ताकि उचित एंटीवेनम सीरम की देश में कमी न हो. ये समुदाय हमें तरह तरह के सांपों से बचाव के लिए उनके ही जहर उपलब्ध करवा सकते थे. और जब हमारे पास 1500 करोड़ रुपये साल में खर्च करने के लिए हैं तो फिर पीएचसी और सीएचसी केंद्रों में फ्रिज का भी इंतजाम किया ही जा सकता था.

लेकिन जब जागो, तभी सवेरा. यदि विभिन्न राज्य सरकारें चाहें तो कभी भी ऐसा कर सकती हैं. ताकि सांपों के काटने से होने वाली मौतों का आंकड़ा नीचे आ सके और देश भर में फैले कई समुदायों का जीवन स्तर बहुत नीचे से थोड़ा ऊपर जा सके.

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