समाज | कभी-कभार

भारत में अहिंसा धारणा के स्तर पर भले हो, सामाजिक आचरण में उसकी जगह बहुत कम होती जा रही है

स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान जो मूल्य विकसित और लोकमान्य हुए थे उनमें अहिंसा और निर्भयता केंद्रीय थे लेकिन अब हम इनसे विरत और विरूद्ध होते जा रहे हैं

अशोक वाजपेयी | 16 जनवरी 2022 | फोटो: पिक्साबे

फिर ख़तरा, फिर कोताही

अगर हममें से कुछ को यह भ्रम था कि कोविड-प्रकोप अब समाप्त हो रहा है तो यह भ्रम टूट गया है और हम उसकी तीसरी लहर का सामना कर रहे हैं. इस बार स्थिति शायद बेहतर है, क्योंकि लगभग पचास प्रतिशत भारतीय दोनों टीके लगवा चुके हैं, सरकारें परीक्षण-अस्पताल-बिस्तर-आक्सीजन आदि के मामले में ज़्यादा लैस हैं और अब तक के लक्षण यह बताते हैं कि नया वेरिएण्ट कम घातक है. जगह-जगह बन्दिशें लगना शुरू हो गयी हैं. उनका, जल्दी ही, और सख़्त होना तय है. फिर भी, लोग मास्क लगाने, भौतिक दूरियां रखने आदि का खुलकर उल्लंघन किये जा रहे हैं. मामले हर रोज़ बहुत तेज़ी से बढ़ रहे हैं और लगता है कि लोगों का व्यवहार देखकर सरकारों को लॉकडाउन लगाना पड़ सकता है. यों हमारी नागरिकता का एक बड़ा हिस्सा हर नियम या बन्दिश का उल्लंघन करने में बड़ा सन्तोष पाता है.

इस आपदा की नयी तेज़ लहर के बावजूद सभी राजनैतिक दल आग्रह कर रहे हैं कि कुछ राज्यों में विधानसभा के चुनाव टाले न जायें. इन राज्यों में, विशेषकर उत्तर प्रदेश में, विशाल सभाएं और रैलियां बदस्तूर हो रही हैं और उन्हें, बिना मास्क पहने या भौतिक दूरी बनाये, शीर्षस्थ राजनेता संबोधित कर रहे हैं. उन्हें न तो आत्मसंयम, न ही कोई व्यवस्था नियमित-नियंत्रित कर सकती है. जानकार लोग क़यास लगा रहे हैं कि चुनाव आयोग सत्तारूढ़ राजनैतिक दल की सुविधानुसार मतदान की तारीख़ें तय करेगा.

अभी चुनाव आयुक्त लखनऊ के दौरे पर गये तो उनके लिए निजी मर्सिडीज़ कारें उपलब्ध करायी गयीं: चुनाव आयोग को अपनी घटती साख की कोई चिन्ता नज़र नहीं आती. यह असाधारण परिस्थिति है और इसमें असाधारण कार्रवाई होना चाहिये. न्यायालय या आचरण संहिता लागू करने के पहले चुनाव आयोग सभाओं-रैलियों पर रोक लगाने का क़दम, निश्चय ही असाधारण, उठायेंगे इसकी क़तई उम्मीद नहीं की जा सकती. अन्देशा तो यह है कि बन्दिशें तभी लगायी जायेंगी जब सत्तारूढ़ निज़ाम मनचाही सभाएं और रैलियां कर सन्तुष्ट हो चुका होगा. इस बीच हरिद्वार में एक धर्मविरोधी, संविधान विरोधी जमावड़े में कुछ धर्मनेताओं ने मुसलमानों के नरसंहार का आवाहन किया और उन पर इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कोई कारगर कार्रवाई नहीं हुई है.

उत्तर प्रदेश में विशेषकर सत्तारूढ़ निज़ाम तरह-तरह के झूठ बोलकर हिन्दू-मुस्लिम के बीच दूरी और शत्रुता बढ़ा रहा है. कोविड जो हिंसा करेगा वह एक तरफ़, तरह-तरह की हिंसाएं नियोजित ढंग से की जायेंगी और अगले कुछ महीने हम बढ़ी हुई हिंसा-हत्या-बलात्कार की मानसिकता, जातिद्वेष आदि से, साम्प्रदायिकता और धर्मान्धता से पोसी गयी हिंसा देखने को अभिशप्त हैं. इस दौरान झूठ, नफ़रत और अत्याचार में इज़ाफा होगा और हम कुछ और भयाक्रान्त समाज बन जायेंगे. अभी भी सच अल्पसंख्यक है, वह और अल्पसंख्यक हो जायेगा. हम लाचार और कायर चुप्पी में, अपनी निजी सुरक्षा में क़ैद रहेंगे.

अहिंसा का स्वप्नभंग

दुनिया को हमने कई दशक इस भ्रम में रखा कि भारत एक अहिंसक देश है: पिछले कुछ वर्षों में भारत में ग़रीबों-वंचितों, स्त्रियों, बच्चों, दलितों, अल्पसंख्यकों और आदिवासियों के विरूद्ध लगातार बढ़ती हिंसा ने इस भ्रम को दूर कर दिया है. अब भारत मुफलिसी, ग़रीबी, बेरोज़गारी, अपराध, हिंसा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में कटौती आदि के पैमानों पर दुनिया के सौ से अधिक देशों से नीचे है, क्रम में. लगातार हर बरस बढ़ती इस गिरावट से यह विश्व-धारणा पुष्ट होती गयी है कि भारत में अहिंसा धारणा के स्तर पर भले अभी भी सक्रिय हो, सामाजिक आचरण में उसकी जगह बहुत कम होती जा रही है. यह एक बड़ी सामाजिक और लोकतांत्रिक दुर्घटना है.

स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान जो मूल्य विकसित और लोकमान्य हुए थे उनमें अहिंसा और निर्भयता केन्द्रीय थे. स्वतंत्रता की पचहत्तरवीं वर्षगांठ मनाते समय हम इन दोनों मूल्यों से विरत बल्कि सत्ता के स्तर पर इनके विरूद्ध हो गये होंगे. रोज़ बरोज़ की हिंसा के जो आंकड़े और तथ्य सामने आते जाते हैं उनसे ज़ाहिर होता रहता है कि हम निजी और सामाजिक दोनों स्तरों पर पहले के मुक़ाबले कहीं अधिक हिंसक हो रहे हैं. निरपराध निहत्थे व्यक्तियों या समूहों की दिनदहाड़े हत्या सिर्फ़ इसलिए होती है कि वे किसी अन्य धर्म के हैं- इस घृणित कृत्य को वीरता माननेवाला हिंसा-दर्शन तेज़ी से फैल रहा है. इस दर्शन के प्रभाव में धीरे-धीरे प्रशासन, पुलिस, संस्थाएं, मीडिया आदि सभी आ रहे हैं. भारत के बीसवीं शताब्दी में अहिंसा का पाठ सारी दुनिया को सिखाया था और बताया था कि कैसे अहिंसक प्रतिरोध से औपनिवेशिक सत्ता को बेदखल और समाप्त किया जा सकता है. आज उसी भारत में अहिंसक प्रतिरोध को देशद्रोह क़रार दिया जा रहा है. लोकतांत्रिक राज्य अतर्कित ढंग से स्वयं हिंसा का सहारा लेने लगा है.

दूसरा मूल्य निर्भीकता भी अब, लगता है, अधिक से अधिक एक निजी मूल्य बनकर रह गया है, उसकी सामाजिक अभिव्यक्ति अब बहुत कम दिखायी देती है. हमारा लोकतंत्र इस समय भयग्रस्त है और नागरिकों को लगातार डराने का प्रयत्न होता रहता है. मीडिया का, जिसका लोकतांत्रिक धर्म और नैतिक कर्तव्य, पूरी निर्भीकता से, सत्ता की आलोचना करना होता है, अधिकांश हिंसा सत्ता की चापलूसी, उसकी हर गतिविधि को सही ठहराने पर तुला हुआ है. वह सत्ता का प्रवक्ता बन गया है, नागरिकों का प्रवक्ता बनने के बजाय.

हम लेखकों और बुद्धिशील लोगों को इस पर गम्भीरता से विचार करना चाहिये कि भारत में अहिंसा और निर्भीकता के उदात्त मूल्यों का अध:पतन क्यों हुआ. उसमें हमारी अपनी भूमिका और आलिप्ति क्या रही है. सब कुछ के लिए दूसरे ही ज़िम्मेदार नहीं होते- कुछ तो ज़िम्मेदारी है अपनी भी!

इक्यासी वर्ष

इस सोलह जनवरी को मैं इक्यासी वर्ष का हो जाउंगा. मन परिवार-परिजन, अध्यापक, मित्र, सहकर्मी, पाठक-रसिक, आलोचक-समीक्षक, व्यर्थ अपने को शत्रु माननेवाले आदि सबके प्रति कृतज्ञता से भरा है: इन सब दूसरों ने मेरा पथ शुभ बनाया. वे न होते, उनसे मिलनेवाली राहत, सहारा, उत्साह, सहयोग, संवाद, चुनौती आदि न होते तो मैं उतना यत्किंचित् भी न कर पाता जितना कर पाया. इस बार रोमिला थापर, गुलाम मोहम्मद शेख़, आशीष नन्दी और गणेश देवी को 12 खण्डों में प्रकाशित मेरी रचनावली का लोकार्पण करना था जो कोविड के कारण स्थगित है. 70 से अधिक वर्ष साहित्य और कलाओं के साथ बीते: जितने बचे हैं उनमें यह साथ बना रहे यही मंगलकामना करें. इस अवसर पर पिछली जुलाई में लिखी कविता प्रस्तुत करना उपयुक्त होगा:

अलविदा न कह पाऊं

मैं जागा नहीं भोर की पहली चिड़िया के विस्मित स्वर से;
मुझे नहीं लगा पहली किरण का आघात;
मैं सुन नहीं सका
पत्तियों की सरसराहट में स्वरित हो रहा हरा संगीत;
मुझ पर गिरी नहीं कोई निबौली
जब मैं नीम के पेड़ के नीचे से गुज़रा.
मुझे पुकारा नहीं
किसी गिलहरी, गौरेया या कबूतर ने—
धूप की कोमल दस्तक मैंने सुनी नहीं;
बदराये आकाश से कोई सन्देह कभी नहीं आया मेरे पास;
मैंने चन्द्रमा को कोई चिट्ठी नहीं लिखी;
तारों को बीनकर किसी कटोरे में रखने की कोई चेष्टा नहीं की
और पड़ोस की सप्तपर्णी ने मुझे देखा तक नहीं.
मुझ अभागे ने हताश होकर
एक घर बनाया शब्दों का:
हो सकता है कि शब्द भी साथ छोड़ दें
और अलविदा न कह पाऊं!

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