धर्म और राजनीति

समाज | कभी-कभार

धर्म और साम्प्रदायिकता की राजनीति यह मानती है कि हिंदू कुल मिला कर मूढ़मति हैं

मनुष्य और भारतीय सदियों से अनेक पाखण्डों से घिरा रहा है, लेकिन हमारे समय में खुलकर पाखण्ड करना बहादुरी का काम माना जाने लगा है

अशोक वाजपेयी | 02 मई 2021 | चित्र: राजेंद्र धोड़पकर

क्रूरता का युग

मानवीय सभ्यताओं के इतिहास को यों भी देखा जा सकता है कि उन्होंने क्रमशः क्रूरता और यंत्रणा के अधिक प्रभावशाली, सूक्ष्म और व्यापक क्षति करने वाले उपकरण और विधियां विकसित कीं और उन्हें अमल में लाकर निरन्तर परिष्कृत किया. सभ्यता का इतिहास, एक स्तर पर, क्रूरता के परिष्कार का इतिहास भी है. क्रूरता का परिसर हमेशा व्यापक रहा है और उसमें राज्य, धर्म, समूह और समाज, जातियां और वर्ग, राजनीति और हमारे समय में मीडिया भी शामिल है. यों तो निजी मानवीय संबंधों और प्रकृति के साथ हमारे संबंधों में हमेशा क्रूरता का तत्व सक्रिय रहा है. कहा तो यहां तक गया है कि बिना कुछ क्रूरता के सच्चा प्रेम संभव नहीं है.

साहित्य और कला में क्रूरता की क्या स्थिति है, इस पर कुछ विचार किया जा सकता है. हमारी अपनी परम्परा में हमारे दो महाकाव्य ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ युद्ध पर केन्द्रित रचनाएं हैं और दोनों में युद्धजनित और युद्ध में अनिवार्य क्रूरता का वर्णन है. ‘महाभारत’ में यह क्रूरता अधिक तीक्ष्ण और कई बार वीभत्स तक है. दोनों में जो युद्ध लड़े गये हैं वे धर्मयुद्ध हैं पर ‘महाभारत’ युद्ध की अन्ततः विफलता का बखान है. उसका स्पष्ट संकेत यह है, कम से कम मेरे निकट, कि कोई भी युद्ध नहीं जीतता और युद्ध से हुई तबाही अनिवार्य नहीं है.

अगर हम ऐन अपने समय की व्यापक रूप से प्रगट क्रूरता याद करें तो छवियों के चार समूह उभरते हैं. पहला है सवर्ण हिन्दूओं के समूहों द्वारा दलितों के प्रति की गयी, कई बार मरणान्तक, क्रूर हिंसा. दूसरा है साम्प्रदायिक दंगों के दौरान की गयी हिंसा और क्रूरता जिसे बरतने में पुलिस भी पीछे नहीं रहती. तीसरी क्रूरता का महादृश्य हमारी आंखों के सामने बहुत दारुण होकर गुज़रा है जब एक करोड़ से अधिक प्रवासी मज़दूर एक अविचारित कार्रवाई के फलस्वरूप अपने गांव-घरों की ओर भागने पर विवश हुए थे और जिन्हें राज्यों की हृदयहीनता ने यातायात, राहत, मदद आदि के साधन देने में हफ़्तों कोताही की. चौथा है स्त्रियों पर की जा रही दैनंदिन हिंसा, बलात्कार आदि.

मानवीय क्रूरता के इन उदाहरणों में से किसी में यह क्रूरता अनिवार्य नहीं ठहरायी जा सकती अगर आप में कुछ नैतिक बोध और मानवीयता अब भी बचे हुए हैं. देश के बंटवारे के समय स्वयं समुदायों ने, कुल मिलाकर, एक-दूसरे के प्रति अमानवीय क्रूरता बरती. साहित्य में, किसी हद तक उसका वर्णन है जैसे कि दोनों और के कुछ समूहों द्वारा क्रूरता को रोकने-थामने, शरण देने की कोशिश का भी. दलितों के प्रति की जा रही क्रूरता का आख्यान अकसर दलित लेखकों ने किया है, सवर्ण लेखकों ने नहीं, या बहुत कम. साम्प्रदायिक दंगों की क्रूरता पर सदाशयी टिप्पणियां ज़रूर मिल जाती हैं पर उनमें सन्निहित क्रूरता का खुला बखान कम देखने में आता है. कोरोना महमारी के आवरण में राज्य और कुछ समूहों ने, राजनीति-धर्म-मीडिया के गठबन्धन ने क्रूरता पूरी निर्लज्जता से दिखायी है उसका पूरा सर्जनात्मक अन्वेषण होना अभी बाक़ी है. क्रूरता के जिस युग में हम, दुर्भाग्य से, आज हैं, उसमें क्रूरता का सामना या बखान न करना भी क्रूरता में शामिल माना जायेगा.

धर्म का दुरुपयोग

हमारा समय ही ऐसा है कि उसमें लगभग सभी सदाशयी वृत्तियों का खुलकर दुरुपयोग हो रहा है. इसमें लोकतंत्र, न्यायालय, संवैधानिक संस्थाएं और प्रक्रियाएं, धर्म, मीडिया आदि शामिल हैं. कथनी और करनी के बीच कुछ दूरी तो हमेशा रहती है पर हमारे यहां तो दोनों के बीच भयानक बैर फैल गया है. मनुष्य और भारतीय सदियों से अनेक पाखण्डों से घिरा रहा है पर हमारे समय में खुलकर पाखण्ड करना बहादुरी का काम माना जाने लगा है. नीचता-अधमता-संकीर्णता का हर राज़ तमाशा होता रहता है और हम सभी तमाशाई बने जा रहे हैं. हमें इसमें नीच क़िस्म का मज़ा आने लगा है. गालियां देने, बेवजह और बेबुनियाद लांछन लगाने, झगड़ने आदि का दैनिक टूर्नामेंट, स्पर्धा सी होती रहती है और हम मुदित मन यह देखते रहते हैं.

उत्तर प्रदेश का चुनाव आने वाला है: वहां की क़ानून-व्यवस्था चरमरायी हुई है और आर्थिक अधोगति में वह काफ़ी ऊंचे नंबर पर है. सो राजनीति ने फिर धर्म का सहारा लेना, उसका दुरुपयोग करने का उपक्रम करना शुरू कर दिया है. ज्ञानवापी मसजिद को लेकर एक अदालत ने पुरातत्व सर्वेक्षण को पता लगाने का निर्देश दिया है कि पहले वहां मंदिर था या नहीं. जल्दी ही मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि के विवाद को फिर ऐसी ही किसी अदालती कार्रवाई से पुनर्जीवित किया जायेगा. धर्म और साम्प्रदायिकता की राजनीति यह मानती है कि हिन्दू कुल मिला कर मूढ़मति हैं. वे अयोध्या में राममन्दिर के निर्माण और बनारस और मथुरा में फिर बदले की कार्रवाई को अपनी पहली प्राथमिकता मानते हैं. उन्हें रोज़गार, अस्पताल, स्कूल-कालेज आदि नहीं, मंदिर चाहिये. अमन-चैन नहीं, बदला चाहिये. यह धर्म का सरासर दुरुपयोग है जिसका नेतृत्व धर्मगुरु कर रहे हैं. उनमें से अधिकांश का हिन्दू धर्मचिन्तन, दर्शन, अध्यात्म आदि का ज्ञान तो संदिग्ध है ही, यही अज्ञान उन्हें दुरुपयोग की ओर आसानी से अग्रसर कर देता है. क्या हिन्दू धर्मगुरुओं का समुदाय इतना बंजर हो गया है कि उसमें कोई असहमति के हिन्दू की कल्याण-दृष्टि के मुखर प्रवक्ता नहीं रह गये हैं? अगर ऐसा है तो यह गहरे धर्म-संकट की बात होना चाहिये.

हमारा समय हिन्दू धर्म के गहन दर्शन, तत्व-चिन्तन के हृास का है. सच्ची हिन्दू आस्था का दमन कोई और धर्म के लोग नहीं, स्वयं हिन्दू कर रहे हैं. यह आकस्मिक नहीं है. लोकतांत्रिक राज्य से हिन्दू धर्म ने शुरू से ही एक असहज संबंध रखा है. उसने कभी खुलकर स्वतंत्रता-समता-न्याय की संवैधानिक मूल्यत्रयी को स्वीकार नहीं किया. कम से कम उत्तर भारत के हिन्दू समाज में सामाजिक सुधार का कोई आन्दोलन हुआ ही नहीं. इसका नतीजा है कि हिन्दू समाज राजनीति को धर्म का दुरुपयोग करने की खुली छूट दे रहा है और उसे लेकर आन्दोलित नहीं है. हिन्दी अंचल में व्याप्त हिंसा-हत्या-बलात्कार-अन्याय की मानसिकता और उसकी व्याप्ति हिन्दू अधःपतन का दुखद साक्ष्य है.

तारे और घर का खेल

… छत के ऊपर तारे
तुम्हारी प्रार्थना के घास वन में
नाचता हुआ
यह तारा
घरों के ढेर
आकाश की तरफ़ छलांग लगाते
तारे को पकड़ने के लिए
आवहमान
तारे और घर का खेल…

कवि हैं असमिया के एम कमालुद्दीन अहमद और दिनकर कुमार के हिन्दी अनुवाद में उनका एक कविता संग्रह रश्मि प्रकाशन से आया है ‘अगर तुम चाहत का खनिज हो’. यह असम की एक दूसरी आवाज़ है जो हमसे बोल रही है. ऊपर की पंक्तियां पढ़ते ग़ालिब याद आये: ‘अर्श के उधर होता काश के मकां अपना’. कमालुद्दीन के यहां तो तारे और घर खेल रहे हैं.

‘शंकर देव’ शीर्षक कविता में ये पंक्तियां ध्यान खींचती हैं:

अरण्य के बीच सरक आयी नीली रोशनी
बेचैन होकर छूते रहना
धूल-मिट्टी के बीच टटोलकर देखना
रौशनी का दबाव

‘उत्तर औपनिवेशिक’ कविता में कवि इसरार करता है:

विजय का पताका
लहराते हो तुम मेरी मिट्टी में
उस मिट्टी को खोदकर
शताब्दी बाद मैं ढूंढूंगा
तुम्हारा अन्तर अस्थि मज्जा.

‘पुस्तक मेले में’ कवि देख पाता है कि ‘ग्रन्थकीट के पंख से निकली स्वच्छ रौशनी/रौशन कर देती है/काले-काले अक्षरों के घरों पेड़ों फलों को’. उनके यहां यह उदास आत्मस्वीकृति भी है कि ‘मैं नहीं जानता/आंधी में क्यों पेड़ की टहनी टूटती है/टहनी टूटने पर जीवन क्यों अंकुरित होता है.’

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