गुलशन कुमार

समाज | जन्मदिन

गुलशन कुमार ने मैनेजमेंट की पढ़ाई के बिना ही जान लिया था कि ‘ग्रोथ इज एट द बॉटम ऑफ द पिरैमिड’

छोटी सी शुरुआत से टी-सीरीज जैसा साम्राज्य खड़ा करने वाले गुलशन कुमार ने बॉलीवुड को कई ऐसे संगीतकार और गायक दिए हैं जो रोज उन्हें याद करते होंगे

अनुराग भारद्वाज | 05 मई 2020 | फोटो: यूट्यूब स्क्रीनशॉट

दिल्ली के दरियागंज इलाक़े में जूस की दूकान पर बैठने वाले गुलशन कुमार की न तो तालीम और न ही परिवारिक पृष्ठभूमि ऐसी थी जो उनके म्यूज़िक इंडस्ट्री का बादशाह बनाने में उनकी मदद करती. फिर भी वे बने तो चंद कारणों से. 1980 के दशक में गुलशन कुमार के पिता ने कैसेट्स रिकॉर्डिंग और रिपेयरिंग की दुकान खोली थी. वहीं से उन्हें संगीत से लगाव पैदा हो गया. जूस की दूकान से ज्यादा रस उन्हें संगीत के कारोबार में नज़र आया और उन्होंने इस ओर कदम बढ़ा दिए. उत्तर प्रदेश के ज़िले नोएडा में उन्होंने छोटा सा रिकॉर्डिंग स्टूडियो खोला और सुपर कैसेट्स कंपनी की स्थापना की. शुरुआत में गुलशन कुमार भजन और भक्ति गीत स्थानीय गायकों की आवाज़ में रिकॉर्ड करते और इनके कैसेट सस्ते दामों पर बेचते. धीरे-धीरे व्यापर बढ़ने लगा तो उन्होंने फ़िल्म संगीत के व्यवसाय में उतरने का फ़ैसला किया.

भारतीय संगीत के कारोबार जगत में उन दिनों एचएमवी (अब सारेगामा) का बोलबाला था, या कहें कि उसका एकाधिकार. एचएमवी का लोगो- माइक्रोफ़ोन के सामने बैठा हुआ कुत्ता ऐसा लगता था जैसे सभ्रांत लोगों के घरों के दरवाजों पर लिखा होता है – कुत्ते से सावधान. गुलशन कुमार ने इस श्वान को बहकाकर एचएमवी का एकाधिकार ख़त्म कर दिया.

दरअसल, कॉपीराइट के तहत एक कंपनी के पास किसी फ़िल्म या किसी कलाकार के संगीत या प्रोगाम के अधिकार होते हैं. दूसरी कंपनियां पूर्व में प्रदर्शित फ़िल्म या किसी कलाकार के प्रोगाम के कैसेट्स नहीं बना सकती हैं. सो उस दौर में एचएमवी के ही कैसेट्स बिकते थे और वह भी उसके मनमाने दामों पर. 1990 की शुरुआत से कुछ पहले कैसेट्स रिकॉर्डरों के बाजार में ज़बरदस्त उछाल आया जिससे प्री-रिकार्डेड कैसेट्स की मांग इतनी बढ़ गई कि इसे एचएमवी जैसी कंपनियां पूरा नहीं कर पा रही थीं. दूसरे कुछ नहीं कर सकते थे क्योंकि कॉपीराइट का मसला था. कुल मिलाकर बाज़ार में ज़बरदस्त संभावनाएं थीं और विकल्प बिल्कुल नहीं.

ऐसे माहौल में लोग उस संकरी गली से निकलकर आगे बढ़ने का रास्ता खोजने का प्रयास करते हैं. यही गुलशन कुमार ने किया. उन्होंने इंडियन कॉपीराइट एक्ट को बारीकी से समझा और उसका तोड़ निकाल लिया. कॉपीराइट एक्ट मूल प्रोग्राम को किसी और कंपनी को जारी करने की इजाज़त तो नहीं देता पर उसकी नक़ल करने से नहीं रोकता. यानी, अगर किसी फ़िल्म के म्यूज़िक राइट्स एचएमवी के पास थे तो अन्य कंपनियां उस म्यूज़िक को जारी तो नहीं कर सकतीं पर उसकी नक़ल बना सकती हैं. गुलशन कुमार ने संघर्षरत कलाकारों की आवाज़ में पुरानी फ़िल्मों के गाने रिकॉर्ड किये और एचएमवी से लगभग एक तिहाई दामों पर उनके कैसेट्स निकाल दिए. लोगों को लता मंगेशकर की आवाज़ तो सुनने को नहीं मिली, पर उनसे मिलती-जुलती आवाज में उनके गाये हुए गाने उपलब्ध हो गए. बस, फिर क्या? टी-सीरीज़ की गाड़ी निकल पड़ी.

बड़ी और स्थापित कंपनियां अभी भी अपनी ख़ुमारी में थीं. अक्सर ऐसी कंपनियां बदलाव की प्रक्रिया को हिकारत की नज़रों से देखती हैं या फिर उस हवा को ही पहचानने से इंकार कर देती हैं. एचएमवी ने भी यही किया. कंपनी के अधिकारियों को लगता था कि मौलिक संगीत सुनने वाले इस भोंडी नकल को पसंद नहीं करेंगे. पर गुलशन कुमार ने मैनेजमेंट की पढ़ाई के बिना ही यह जान लिया था कि ‘ग्रोथ इज़ एट द बॉटम ऑफ़ द पिरैमिड’. और उस तबके को क्वालिटी नहीं क्वांटिटी चाहिए थी.

‘बॉटम ऑफ़ द पिरामिड’ का मतलब है. आबादी का वह तबका जिसकी आय बेहद कम है. अक्सर कंपनियां इस तबके को ध्यान में रखकर उत्पाद नहीं बनातीं. वे भूल जाती हैं कि पिरामिड के सबसे निचले हिस्से में ठुंसे हुए लोग ही क्रांति लाते हैं. इस सिद्धांत को मशहूर मैनेजमेंट गुरु सीके प्रह्लाद ने 2004 में दुनिया के सामने रखा था. पर गुलशन कुमार इसे 1990 के दौर में ही काम में ला चुके थे. इसलिए कहते हैं कि ‘मार्केटिंग इज नथिंग बट रोबस्ट कॉमन सेंस’. जब तक एचएमवी यह समझती या अपने कैसेट्स के दाम गिराती, टी-सीरीज़ ने अपने पैर जमा लिए.

वैसे हिंदुस्तान की आधी से ज़्यादा आबादी जानती ही नहीं थी कि एचएमवी कौन सी कंपनी है. संगीत से उन्हें टी-सीरीज़ ने ही पहली बार मिलवाया तो वह उनकी नज़र और जुबान पर चढ़ी रही. धीरे-धीरे यह हुआ कि मौलिक गानों की कैसेट्स से ज़्यादा नक़ल की गई कैसेट्स बिकने लगीं और टी-सीरीज़ बाज़ार में छा गई. उसके साथ-साथ अनुराधा पौडवाल, कुमार सानू, उदित नारायण, सोनू निगम और विपिन सचदेव जैसे गायकों की एक नई फौज भी उभरी. वहीं संगीतकारों में नदीम-श्रवण और आनंद-मिलिंद जैसी जोड़ियां बॉलीवुड में आईं. ये तमाम लोग आज भी रोज गुलशन कुमार को याद करते होंगे.

गुलशन कुमार अब एक नाम बन चुका था और टी-सीरीज़ संगीत की दुनिया के सबसे बड़े ब्रांड्स में से एक. पर वे यहीं नहीं रुके. उनका कॉमन सेंस उन्हें बार-बार समझा रहा था कि यह सब क्षणिक और तात्कालिक है. टिके रहने और आगे का सफ़र तय करने के लिए कुछ नया, साहसिक और मौलिक करना होगा. उन्होंने अपने जीवन का सबसे बड़ा जुआ खेला और रिलीज़ होने वाली कंपनियों के म्यूज़िक राइट्स ऊंचे दामों पर खरीदने शुरू कर दिए. इससे एचएमवी, टिप्स और वीनस जैसी स्थापित कंपनियों के पैरों तले ज़मीन खिसक गई. म्यूज़िक इंडस्ट्री पर टी-सीरीज़ का राज हो गया. एक समय आया जब सुपर कैसेट्स ने लगभग 65 फीसदी बाजार पर कब्ज़ा कर लिया था.

गुलशन कुमार ने कई फिल्मों का निर्माण भी किया. इनमें ‘लाल दुपट्टा मलमल का’, ‘आशिक़ी’ और ‘दिल है कि मानता नहीं’ प्रमुख थीं. 1990 के दौर में संगीतकार नदीम-श्रवण की जोड़ी सबसे ज़्यादा डिमांड में थी. इसको बनाने वाले गुलशन कुमार ही थे. नदीम ने ‘हाय ज़िंदगी’ नाम से एक म्यूज़िक अल्बम निकाला जिसके अधिकार टी-सीरीज़ के पास थे. इस अल्बम में नदीम ने कुछ गाने भी गाए थे. यह खास नहीं चला. बताया जाता है कि नदीम को लगा कि गुलशन कुमार ने इसकी मार्केटिंग सही तरह से नहीं की.

पर यह विशुद्ध व्यापारिक निर्णय था क्यंकि अल्बम का संगीत और नदीम की आवाज़ औसत दर्ज़े की थी. बताते हैं कि नदीम के कई बार कहने के बाद भी गुलशन कुमार ने अपना रुख नहीं बदला, जिससे नदीम उनसे खफ़ा हो गए. गुलशन कुमार की एक ख़ास बात थी कि वे नए चहरे और नाम को प्रमोट करते थे. नदीम-श्रवण अब स्थापित जोड़ी थी, सो उन्होंने अन्य जोड़ियों को मौका देना शुरू कर दिया. कहा जाता है कि इससे मनमुटाव और बढ़ गया. फिर, जिन फ़िल्मों में नदीम-श्रवण संगीत देते थे, उनके म्यूज़िक राइट्स गुलशन कुमार ने लेने बंद कर दिए. चूंकि सुपर कैसेट्स 65 फीसदी बाजार पर कब्ज़ा जमाये बैठी थी, इसलिए नदीम को लगा कि उनका संगीत एक बड़े तबके तक नहीं पहुंचेगा.

कहते हैं कि इसी मनमुटाव और घबराहट के चलते, नदीम ने अंडरवर्ल्ड के अबू सलेम से संपर्क साधा और गुलशन पर उन्हें प्रमोट करने का दवाब बनाया. बताया जाता है कि अबू सलेम ने गुलशन कुमार से जान की सलामती की कीमत मांगी जिसकी उन्होंने सिर्फ़ एक किश्त दी. अबू सलेम ने जब और पैसों के लिए उन पर दबाव बनाया और धमकी दी तो गुलशन ने इसे संजीदगी ने नहीं लिया और न ही पुलिस को इसकी जानकारी दी. कहते हैं कि इसी बात से खफ़ा होकर उसने गुलशन कुमार की दिन दहाड़े हत्या करवा दी. इस हत्या का आरोप नदीम और टिप्स कंपनी के मालिक रमेश तौरानी पर भी लगा. नदीम तो भागकर इंग्लैंड चले गए और वहीं की नागरिकता ले ली पर तौरानी को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया. भारत ने कई बार नदीम के प्रत्यर्पण की कोशिश की पर इंग्लैंड की अदालतों ने उनके ख़िलाफ़ सुबूतों को नाकाफ़ी मानते हुए उन्हें भारत भेजने से मना कर दिया. आज तक हत्या की यह गुत्थी नहीं सुलझी है. सिर्फ़ एक शूटर, जिसने गोलियां चलाई थीं, उसके अलावा कोई भी पकड़ा नहीं जा सका.

यह सही है कि गुलशन कुमार ने कॉपीराइट एक्ट के एक झोल का फायदा उठाकर अपना सफ़र शुरू किया था. पर उसके बाद जो कुछ उन्होंने किया वह वाकई में मिसाल है. उन्होंने छोटी ज़िंदगी जी, पर काम बड़े किये. वह कहते हैं न, ‘बाबू मोशाय, ज़िंदगी लंबी नहीं, बड़ी होनी चाहिए’

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