इंदौर

समाज | विशेष रिपोर्ट

इंदौर के सबसे साफ शहर होने की कीमत कौन अदा कर रहा है?

इंदौर के बीते चार सालों से सबसे स्वच्छ शहर बने रहने की कोशिशें सराहनीय तो हैं लेकिन इनका आर्थिक और व्यवहारिक पक्ष कई सवालों की गुंजायश भी छोड़ देता है

अंजलि मिश्रा | 01 अप्रैल 2021 | फोटो: फेसबुक/स्वच्छ इंदौर

मिनी बॉम्बे या मध्य प्रदेश की औद्योगिक राजधानी कहे जाने वाले इंदौर की नई और सबसे मुखर पहचान अब स्वच्छता बन गई है. बीते चार सालों से लगातार स्वच्छता सर्वेक्षण में अव्वल आने वाला इंदौर शहर अक्सर इससे ही जुड़ी बातों को लेकर चर्चा में रहता है, फिर चाहे सुर्खियों में सफाई से जुड़ी अनोखी-रचनात्मक कोशिशों का जिक्र हो या फिर विवादों का. इनके उदाहरण देखें तो कुछ हफ्ते पहले शहर जहां एक तरफ ट्रेंचिंग ग्राउंड पर कचरे से सीएनजी प्लांट लगाने की तैयारियों को लेकर चर्चा में था, वहीं दूसरी तरफ दीवार पर पोस्टर-बैनर लगाने वालों के खिलाफ एफआईआर जैसी सख्त कार्रवाइयां किए जाने को लेकर आलोचनाओं का शिकार भी बन रहा था.

दीवार पर पोस्टर बैनर लगाने से जुड़ी खबर का जिक्र करते हुए, इंदौर के विजय नगर इलाके से आने वाले ललित नेमा कहते हैं कि ‘देखिए, पिछले चार-पांच सालों में हमने सीखा है कि शहर हमारे साफ रखने से ही साफ होगा. आप सड़क पर एक कागज़ का टुक्ड़ा फेंककर देखिए, कोई इंदोरी बरदाश्त नहीं करेगा. नगर निगम स्पॉट फाइन लगाएगा सो अलग. शहर की दीवारों को साफ-सुथरा और सुंदर रखना भी बेशक इसमें शामिल तो है. लेकिन इतने के लिए रिपोर्ट दर्ज करना कुछ ज्यादा हो जाता है!’ पेशे से व्यापारी ललित आगे चुटकी लेते हुए जोड़ते हैं कि ‘शहर तो सुधर रहा है लेकिन कुछ लोगों के दिमाग खराब हो गए हैं. आप यहां आए दिन सफाई कर्मचारियों को आम लोगों से उलझते देख सकते हैं. बाकी नगर निगम से तो लोगों को वैसे ही डर लगने लगा है, रोज नई कड़ाई, नया नियम देखने मिलते हैं. कुछ हद तक ये ज़रूरी भी है लेकिन एफआईआर अति जैसी बात हो जाती है.’

इंदौर नगर निगम के जिस आतंकित करने वाले रवैये का जिक्र ललित नेमा करते हैं, उसका एक उदाहरण बीती जनवरी में वायरल हुआ एक वीडियो भी है. मीडिया और सोशल मीडिया पर खूब चर्चित हुए इस वीडियो में कुछ लोग कई उम्रदराज़ लोगों को एक गाड़ी में बिठाते दिखाई देते हैं. मौके पर मौजूद लोगों का कहना था कि वे नगर निगम के कर्मचारी थे जो निगम की कचरा गाड़ी में वृद्ध भिखारियों को भरकर लाए थे. आम लोगों के मुताबिक, उनका इरादा इन लोगों को शहर के बाहर क्षिप्रा नदी के किनारे छोड़ने का था लेकिन लोगों के विरोध करने पर वे इन्हें वापस ले गए. इस वीडियो को ध्यान से देखें तो इसमें कई वृद्धजन ऐसे भी दिखते हैं जो खुद से उठ-बैठ पाने की हालत में भी नहीं लगते. वीडियो बाहर आने के बाद कार्रवाई करते हुए नगर निगम के डिप्टी सुपिरिटेंडेंट को निलंबित और दो अन्य कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया गया.

इंदौर नगर निगम के जिस ताज़ा कदम की चर्चा आजकल शहर में है, वह घरों में छह डस्टबिन रखने का है. तमाम चौराहों के होर्डिंग, सोशल मीडिया और बाकी संचार माध्यम इसके फायदे गिनवाते देखे जा सकते हैं. शहर में फिलहाल घर-घर से इकट्ठा किए जाने वाले कचरे में गीले और सूखे कचरे के अलावा बायो वेस्ट (सैनिटरी या मेडिकल वेस्ट) को भी अलग ही रखा जाता है. यानी, लोगों ने घरों पर तीन डस्टबिन पहले ही रखे हुए हैं जिनकी संख्या अब जल्दी ही दोगुनी होने वाली है. निगम बीते कुछ महीनों से इस मुहिम पर है कि किस तरह लोगों को इन तीन तरह के कचरों के अलावा इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट, प्लास्टिक वेस्ट और घरों से निकलने वाले बाकी हानिकारक कचरे (टूटा हुआ कांच वगैरह) को भी अलग करना सिखाया जाए.

वैशाली नगर इलाके में रहने वाली, गृहिणी चित्रा पारे कहती हैं ‘गीले, सूखे और बाथरूम वेस्ट को छोड़ दो तो बाकी तीन तरह का कचरा रोज-रोज घर से नहीं निकलता है. इतने के लिए अलग डस्टबिन रखने की क्या ज़रूरत है, समझ नहीं आता. मैंने जब अपनी हाउस हेल्प को छह डस्टबिन के बारे में बताया तो वो कहने लगी कि फिर तो घर पर केवल डस्टबिन ही रहेंगे, हमें बाहर रहना पड़ेगा. मार्च में अभी ये भी हुआ है कि जिस इलाके में सर्वेक्षण टीम गई है उसमें लोगों के घरों में डस्टबिनों पर छह अलग-अलग स्टीकर्स भी चिपकाए गए हैं.’ इसके आगे चित्रा बताती हैं कि ‘पिछले दिनों मैंने अपने घर में लगे कुछ पेड़ों की काट-छांट करवाई थी. इसमें 2-3 टोकरी टहनियों और पत्तियों का कचरा निकला था जो वजन में 20 किलो भी नहीं रहा होगा. इस तरह का कूड़ा गीले कचरे में चला जाता है लेकिन कचरा गाड़ी ने उसे लेने से मना कर दिया. बाद में मुझे उसे हटवाने के लिए हजार रुपए देने पड़ गए. इस कचरे को उठाने वो गाड़ी आई थी जो मलबा वगैरह उठाने के लिए आती है. ये एक्स्ट्रा चार्ज मुझे तब देना पड़ा है जब पहले की तुलना में अब वेस्ट कलेक्शन चार्ज दो-गुने हो गए हैं और एक अप्रैल से और बढ़ रहे हैं. आप कह लीजिए सफाई रखना ज़रूरी तो है लेकिन महंगा भी है.’

फरवरी 2021 की बात करें तो इंदौर में घरों के लिए कचरा संग्रहण शुल्क 60 रुपए से लेकर 150 रुपए तक और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए 100 रुपए से 180 रुपए तक था (नीचे दिये गये दस्तावेज़ को देखें). 2017 से पहले तक इन सभी के लिए यह शुल्क मात्र 60 रुपए ही था. अगर होटल, स्कूल, कॉलेज जैसी ऐसी संस्थाओं की बात करें जिनके लिए कचरा शुल्क वज़न के हिसाब से दिया जाता है, तो उनके लिए 2017 में इसे डेढ़ गुना कर दिया गया. लेकिन 31 अप्रैल 2021 को अखबारों में यह खबर आई कि इन सभी बढ़ी हुई दरों को एक बार फिर बढ़ाकर दोगुना कर दिया गया है. यानी कि 2017 में इंदौर के पहली बार सफाई में नंबर एक शहर बनने के बाद से यहां का कचरा संग्रहण शुल्क तीन से लेकर छह गुना तक बढ़ाया जा चुका है. इसके अलावा, हालिया आदेश में सीवरेज टैक्स लगाए जाने की बात भी कही गई है जिसकी दरें 240 रुपए प्रतिमाह से लेकर 1308 रुपए तक जाती हैं. वहीं, सीवरेज लाइन ना होने की सूरत में टैंक की सफाई के लिए अलग शुल्क निर्धारित किया गया है.

कचरा संग्रहण की दरें

वेस्ट कलेक्शन चार्जेज़ की व्यवस्था से जुड़ा सवाल पूछने पर इंदौर नगर निगम के एक वरिष्ठ अधिकारी सत्याग्रह को बताते हैं कि ‘प्रॉपर्टी टैक्स कलेक्शन के लिए सिटी को पांच ज़ोन में बांटा गया है. इन ज़ोन्स में रेसिडेंशियल और कमर्शियल टैक्स कलेक्शन होता है और इंडस्ट्रियल ज़ोन अलग है. प्रॉपर्टी टैक्सेज के लिए जो अकाउंट है, उसे ही गारबेज़ कलेक्शन के लिए मदर अकाउंट माना गया है. जितने भी लोग प्रॉपर्टी टैक्स दे रहे थे, उनके अकाउंट अपने आप खोल दिए गए हैं. अब जिस ज़ोन में आपकी प्रॉपर्टी है उसी के हिसाब से आपकी बिलिंग होती है. मल्टीज (रेसिडेंशियल सोसायटीज) का हिसाब अलग है, उनसे वज़न के हिसाब से चार्जेज लिए जाते हैं.’ लेकिन बढ़ी हुई दरों को ज़रूरी कदम बताने के अलावा इस पर वे किसी भी तरह की टिप्पणी करने से बचते दिखते हैं.

स्वच्छ भारत अभियान के लिए इंदौर नगर निगम की सलाहकार टीम का हिस्सा रहे एक सदस्य सत्याग्रह से बातचीत में कचरा संग्रहण और अन्य तरह के शुल्क लगाए जाने को सकारात्मक असर डालने वाला ठहराते हैं. वे कहते हैं कि ‘यह एक अच्छी चीज है कि जनता को कुछ भी फ्री में नहीं दिया गया है. इससे लोगों में सहभागिता का भाव आता है और वे शहर के प्रति अपनी जिम्मेदारी महसूस करते हैं. लोग खुशी-खुशी दे भी रहे हैं. इससे ज्यादा पैसा वे बीमारियों पर खर्च करते थे. पिछले दिनों जब घरों की ड्रेनेज लाइन को सीवेज से जोड़ने का अभियान चलाया गया था तो लोगों ने खुद 20-30 हजार रुपए तक खर्च करके यह काम करवाया है.’

स्वच्छता अभियान को सफल बनाने के लिए इंदौर प्रशासन ने जिस तरह का काम किया है, उसके लिए निश्चित रूप से उसकी तारीफ होनी चाहिए, लेकिन इसके हर चरण में आम लोगों से भी अतिरिक्त और कभी-कभी अति के प्रयास करवाए गए हैं, फिर चाहे वे आर्थिक हों या तमाम तरह की गतिविधियों के रूप में. छह डस्टबिन लगाए जाने की मुहिम भी इसी का एक हिस्सा है. दरअसल कचरे की प्रोसेसिंग में समय, धन और संसाधन के लिहाज से सबसे अधिक खर्चीला काम इसकी छंटाई होती है. सलाहकार सदस्य अपनी बातचीत में यह भी बताते हैं कि ‘छंटाई ही वह वजह है कि जिसके चलते तमाम कंपनियां इंदौर में प्रोसेसिंग प्लांट लगाने को उतावली दिखाई दे रही हैं.’ वहीं, दूसरी तरफ यह सब नगर निगम को सरकार की तरफ से भी लगातार अनुदान और प्रोत्साहन मिलने की वजह बन ही रहा है, यानी कचरा कई तरह से निगम के लिए कमाई का जरिया है.

सलाहकार टीम के यह सदस्य, सत्याग्रह से निगम की कमाई के कुछ आंकड़े भी साझा करते हैं. वे बताते हैं कि ‘दो-तीन साल पहले तक कचरा संग्रहण और बाकी तरह के टैक्स के जरिए निगम को हर साल लगभग 60-65 लाख रुपए की कमाई हो रही थी. बीती फरवरी में यह आंकड़ा 48 करोड़ रुपए था जिसमें से 27 करोड़ रुपए एडवांस पेमेंट था. इस साल हमारा टारगेट 58 करोड़ है और मार्च खत्म होते-होते हम इसके 52-53 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद कर रहे हैं. और इस साल कचरे की प्रोसेसिंग से होने वाली कमाई का आंकड़ा छह करोड़ है.’ बेशक, ये आंकड़े इंदौर नगर निगम की उपलब्धियों की तरह पेश किए जाते हैं लेकिन क्या यहां पर यह बात भी ध्यान में रखी जानी चाहिए कि इन्हें वहन करने वाला कौन है?

सत्याग्रह से बातचीत में इंदौर नगर निगम से जुड़े दोनों अधिकारी इस बात का जिक्र बहुत ज़ोर देकर करते हैं कि सालाना संपत्ति कर (संपत्ति, कचरा संग्रहण और जल शुल्क) एक साथ जमा किए जाने पर नागरिकों को कुल दस फीसदी छूट दी जाती है. लेकिन मार्च के आखिरी हफ्ते में ज़ारी नए आदेश के बाद न सिर्फ कचरा संग्रहण और वाटर टैक्स को दोगुना कर दिया गया है बल्कि इन्हें समय पर ना जमा करने पर जुर्माना लगाए जाने के प्रावधान भी किए गए हैं. अगले वित्तीय वर्ष में कलेक्टर गाइडलाइन के मुताबिक संपत्ति कर जमा किए जाएंगे जिसमें ध्यान खींचने वाली बात यह है कि पहले जहां संपत्ति कर जमा करने की आखिरी तारीख 31 मार्च होती थी, वहीं अब इसे तीन महीने आगे खिसकाकर 31 दिसंबर कर दिया गया है. नए प्रावधानों के मुताबिक एक महीने की देरी होने पर पांच फीसदी, दो महीने की देरी पर 10 फीसदी और तीन महीने की देरी होने पर 15 फीसदी अतिरिक्त शुल्क लिया जाएगा.

इंदौर निवासी और पेशे से कॉन्ट्रैक्टर विशाल शर्मा इस मसले के एक नए पक्ष की तरफ ध्यान खींचते हुए कहते हैं कि ‘इंदौर को सुंदर बनाने के चक्कर में शहर में पार्किंग खत्म कर दी गई है और पार्किंग चार्जेज बढ़ा दिए गए हैं. आप छप्पन दुकान जाकर देख लीजिए. वहां मोटर बाइक लेकर तो आप फिर भी जा सकते हैं, कार से जाने का सोच भी नहीं सकते. बाकी दीवारों का रंग-रोगन आप देखिए, हर जगह लगे होर्डिंग देखिए और शान की आवाज़ में स्वच्छता के गाने सुनिए. ये सब क्या जनता पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव नहीं डालते होंगे!’ विशाल आगे जोड़ते हैं कि ‘चलो एक बार को मान भी लिया जाए कि टैक्सेज बढ़ाना ज़रूरी था लेकिन क्या उसके लिए एक साल का इंतज़ार नहीं किया जा सकता था. हर इंदौरी कह रहा है कि जब बीते एक साल से कोरोना के कारण लोगों की इनकम पहले ही कम है. अब दूसरी लहर के आने के कारण फिर लॉकडाउन होने के आसार हैं, ऐसे में और आर्थिक दबाव बढ़ाने वाले कदमों की क्या दरकार है?’

एक प्रतिष्ठित अखबार में काम करने वाले स्थानीय पत्रकार लोकेश सोलंकी पूछते हैं, ‘नकली गमले, महंगे पेंट से रंगी रंगीन दीवारें, फाइकर्स के पौधे (एक तरह का महंगा सजावटी पौधा) और फुटपाथों पर इंटरलॉक टाइल्स जो हर छह महीने में बदल दिए जाते हैं. ये सब स्वच्छता के लिहाज से कितने ज़रूरी हो सकते हैं?’ सोलंकी, नगर निगम की कोशिशों के बीच पर्यावरण की अनदेखी की तरफ भी ध्यान दिलवाते है, ‘इंदौर नगर निगम का काम बहुत मोर्चों पर सराहनीय होने के बावजूद कई जगह सवालों की गुंजायश छोड़ देता है. पिछले दिनों इंदौर में सारे नाले सुखा दिए गए हैं. उनमें से कुछ जगहों पर सड़क बना दी गई तो कुछ पर खेल का मैदान. अब देखने वाली बात होगी कि जब बारिश आएगी तो क्या सीवर ड्रेनेज लाइन उस पानी के बहाव को बरदाश्त कर पाएगी? कहीं मुंबई जैसा हाल ना हो जाए. इसके अलावा, निगम इस बात पर शायद ही ध्यान दे रहा है कि कचरा कम कैसे हो. डस्टबिन की गिनती बढ़ा कर आप कब तक कचरा निपटाओगे. उसका कुछ हिस्सा तो आपको हमेशा डंप करना ही पड़ेगा, जो अंत में आपके ही हवा-पानी-मिट्टी को प्रदूषित करने वाला है. इसकी कीमत भी कल हम सबको ही चुकानी होगी.’


ध्यान दें: सत्याग्रह की इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने वाले दिन ही इंदौर नगर निगम ने कचरा शुल्क दोगुना करने, सीवरेज टैक्स लगाने और इन्हें समय पर न देने पर जुर्माना लगाने संबंधी अपना आदेश वापस ले लिया है

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