रबीन्द्रनाथ टैगोर

समाज | कभी-कभार

अमर्त्य सेन की नज़र से पश्चिम रवींद्र नाथ ठाकुर को एक नई रोशनी में देख सकता है

अमर्त्य सेन का विवेचन है कि रवींद्र नाथ ठाकुर की पश्चिमी छवि पूर्व के एक रहस्यवादी संदेशवाहक के रूप में रूढ़ हो गई जिससे किसी हद तक वे खुद भी मुक्त नहीं हुए

अशोक वाजपेयी | 22 अगस्त 2021

अमर्त्य कबीर

अमर्त्य सेन विश्वविख्यात अर्थशास्त्री और चिन्तक हैं और हाल ही हमें उनका एक लम्बा आत्म-वृत्तान्त पुस्तकाकार ‘होमइन दि वर्ल्ड’ (संसार में गृहस्थ) एलेन लेन पेंगुइन ने प्रकाशित किया है. बेहद पठनीय और एक भरे-पूरे जीवन की कथा डॉ. सेन ने विस्तार से कही है. डॉ. क्षितिमोहन सेन अमर्त्य जी के पितामह थे जिन्होंने रवींद्र नाथ ठाकुर के आग्रह पर मौखिक परंपरा में जीवन कई कवियों जैसे कबीर, दादू आदि के पद संकलित किये थे. कबीर के सौ पदों का अंग्रेज़ी में रवींद्र-कृत अनुवाद 1915 में लन्दन से प्रकाशित हुआ और यह एक तरह से कबीर के विश्व कविता में प्रवेश का आधार बना.

क्षितिमोहन जी के कबीर-संचयन को लेकर विवाद हुआ क्योंकि उसमें ऐसे कई पद थे जो कि कबीर के अधिक प्रामाणिक माने जानेवाले ‘बीजक’ में नहीं थे. क्षिति बाबू का बचाव यह था कि उन्होंने बीजक देखा था लेकिन अपने संचयन में वही पद शामिल किये जो उस समय मौखिक परम्परा में जीवित और गाये जाते थे. तब तक व्यापक विमर्श में मौखिक के बजाय लिखित को अधिक प्रामाणिक और वरीय मानने की आधुनिक रूढ़ि आकार ले चुकी थी. रवींद्रनाथ को भी इसी आलोचना का सामना करना पड़ा था. यह और बात है कि इन कविताओं के रवींद्र-अनुवाद से उद्वेलित एज़रा पाउण्ड ने कबीर की कविता के अनुवाद की योजना बनायी थी जो पूरी नहीं हुई. फ्रेंच लेखक-चिन्तक रोम्यां रोलां ने क्षितिमोहन द्वारा संकलित दादू की कविताओं को पसन्द करते हुए रवींद्रनाथ को लिखा था: ‘वह अद्भुत दादू, जिसका व्यक्तित्व मुझे आकर्षित करता है.’

भद्र समाज द्वारा लोक में व्याप्त और मौखिक परम्परा में बड़ी जगह घेरे हुए कवियों को उनकी ग्रामीणता के कारण स्वीकार करने में हिचक का उल्लेख अमर्त्य जी करते हैं. फिर वे बताते हैं कि उनका शान्ति निकेतन में उस समय पढ़ानेवाले ‘एक महान् विद्वान्’ हजारी प्रसाद द्विवेदी से अच्छा परिचय था जिन्होंने क्षितिमोहन का बचाव किया और अपना यह विश्वास व्यक्त किया कि ग्रामीण कवियों में परिष्कार है, भले ही उनकी सर्जनात्मकता को भद्र समाज कितना ही अवमूल्यित क्यों न करे. वे कहते हैं कि द्विवेदी जी ने इसकी विशेष भर्त्सना की जो साधारण जन को परिष्कृत विचार करने में अक्षम मानते थे. उन्होंने क्षितिमोहन जी के चयन की अप्रामाणिकता का तर्क खारिज किया और 1942 में कबीर पर अपनी आधिकारिक पुस्तक में क्षितिमोहन चयन को शामिल किया और लिखा: ‘क्षितिमोहन सेन द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘कबीर के पद’ नये क़िस्म का काम है. उन्होंने वे पद संकलित किये हैं जो उन्होंने कबीर के अनुयायियों द्वारा गाये जाते सुने. … जो मूल सन्देश है वह प्रामाणिकता की छाप है. बावजूद इसके कुछ महात्माओं ने आत्महित और आत्मरति के चलते क्षितिमोहन जी के कार्य की गहराई और महत्व को कम करने की कोशिश की है.’

अमर्त्य रवींद्र

रवींद्र नाथ ठाकुर के विचारों के बारे में अमर्त्य सेन अरसे से अन्यत्र भी लिखते रहे हैं. इस आत्मवृत्तान्त में भी वे उन विचारों की प्रासंगिकता और प्रखरता का विवेचन करते हैं. वे 1930 में रवींद्र नाथ की सोवियत रूस की यात्रा में दिये गये ‘इजवेस्तिया’ अख़बार को इण्टरव्यू का ज़िक्र करते हैं जो उस अख़बार ने छापने से इनकार कर दिया था और जो बाद में मैनचेस्टर गार्डियन में छपा. उसमें रवींद्र नाथ ने कहा था: ‘मुझे आपसे पूछना चाहिये: क्या आप उन लोगों के दिमाग़ में, जिन्हें आप प्रशिक्षण दे रहे हैं, क्रोध, वर्ग-घृणा और प्रतिशोध की भावना उकसा रहे हैं, उनके विरूद्ध जिन्हें आप अपना दुश्मन मानते हैं और इस तरह अपने आदर्शों की सेवा कर रहे हैं? … दिमाग़ की स्वतंत्रता सत्य तक पहुंचने के लिए ज़रूरी होती है, आतंक उसे नष्ट कर देता है…. मानवता के हित में मैं उम्मीद करता हूं कि आप ऐसा कोई हिंसा का अनैतिक बल कभी नहीं बनायेंगे जो फिर कभी नहीं थमनेवाला हिंसा और क्रूरता का सिलसिला सिलसिला शुरू कर दे… आपने कई बुराईयों को, जो ज़ार के ज़माने से थीं, नष्ट करने की कोशिश की है. इसको भी क्यों नहीं नष्ट करने की कोशिश करते?’ यह इण्टरव्यू गोर्बाचाफ़ के ज़माने में 1988 में सोवियत संघ में प्रकाशित हुआ.

रवींद्रनाथ तर्कणा और विवेक, स्वतंत्रता पर एकाग्र रहे और उन्होंने राष्ट्रवाद में निहित ख़तरों को भी पूरी स्पष्टता से पहचाना और निर्भीकता से व्यक्त किया. फिर भी, रवींद्र की पश्चिमी छवि पूर्व के एक रहस्यवादी संदेशवाहक के रूप में रूढ़ हो गयी और उसे संशोधित नहीं किया जा सका. अमर्त्य सेन का विवेचन है कि किसी हद तक स्वयं रवींद्रनाथ इस छवि से मुक्त नहीं हुए. यीट्स जैसे कवियों ने भी इसी छवि के निर्माण में भूमिका निभायी. फिर पहले विश्व युद्ध से बरबाद हुए विखण्डित यूरोप को आध्यात्मिक मरहम की ज़रूरत थी. रवीन्द्र की ‘गीतांजलि’ ने यही काम किया.

यह याद करना ज़रूरी है कि रवींद्र नाथ अगर साम्प्रदायिकता और धार्मिक संकीर्णता के विरोधी थे तो वे स्पष्ट रूप से राष्ट्रवाद को लेकर भी शंकालु थे. उनकी एक पुस्तक ही अंग्रेज़ी में ‘नेशनलिज्म’ के नाम से प्रकाशित हुई. राष्ट्रवाद के नामपर हो रही हिंसा और क्रूरता के विरूद्ध रवीन्द्रना थ लगातार लिखते रहे. अमर्त्य सेन बताते हैं कि बर्ट्रोल्ट ब्रेख़्त ने अपनी डायरी के एक इन्दराज़ में रवीन्द्र नाथ की चिन्ताओं से सहमति व्यक्त की है और उनके उपन्यास ‘घरे-बाहिरे’ को राष्ट्रवाद के भ्रष्ट होने की सम्भावना के लिए एक सौम्‍य सशक्त चेतावनी बताया.

यह भी स्पष्ट होता है कि ब्रिटिश राज की अपनी सख़्त आलोचना के बावजूद रवीन्द्रनाथ ने कभी ब्रिटिश जन और संस्कृति का विरोध नहीं किया. चूंकि अमर्त्य सेन पश्चिम में बहुमान्य हैं, उनका रवीन्द्र-विवेचन, पश्चिम को रवीन्द्रनाथ को नये परिप्रेक्ष्य में देख सकने का आधार बन सकता है.

सूर्य की ओर

ओमेरो एरिजीज मेकिसको कवि होने के अलावा बरसों से पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं. ये 1989 में भारत भवन के विश्व कविता समारोह में आये थे और बाद में स्टाकहोम में आयोजित एक विश्व लेखक सम्मेलन में उनसे भेंट फिर हुई थी. सिटी लाइट्स ने उनकी कविताओं के अंग्रेज़ी अनुवाद का एक संग्रह: ‘सोलर पोएम्स’ शीर्षक से 2010 में प्रकाशित किया है. उसमें से कुछ छोटी कविताओं के हिन्दी अनुवाद:

उजाले की शक्तियां

जागो अब
अपनी आंखों में उजाले के साथ
बातें कहो अब
अपने ओठों पर उजाले के साथ
आगे बढ़ो अब
सभी बीते कलों के उजाले के साथ
संसार में

हरे दरवाज़े से

मैं अनन्त के अवैध विदेशियों में से एक हूं.
ज़रूरी कागज़ात के बिना मैंने समय की सरहदें पार की हैं.
जीवन और मृत्यु के आव्रजन अधिकारियों द्वारा गिरफ़्तार,
मैं दिनों के चैसबोर्ड के पार लांघ गया.
घाघ कस्टम अधिकारियों ने मूल्यवान स्मृतियों की टोह में
छायाओं के मेरे सूटकेस को उलटा-पुलटा है.
बताने को कुछ नहीं. पछताने को कुछ नहीं.
मैं हरे दरवाज़े से बाहर आ गया.

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