सात

समाज | कभी-कभार

पिछले सात वर्षों में हमने इन सात क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति और वृद्धि दर्ज़ की है

और इस सप्तवृद्धि ने हमारी इन सात स्वतंत्रताओं में अभूतपूर्व कटौती की है

अशोक वाजपेयी | 13 जून 2021 | चित्र: मनीषा यादव

तीन-सात

वर्तमान निज़ाम सात वर्ष पूरे कर चुका है और इस समय तीनों प्रकोपों की कालछाया में सक्रिय है: कोरोना महामारी का प्रकोप, इस प्रकोप को लेकर किए गये देशव्यापी कुप्रबन्ध का प्रकोप और इन दोनों को लेकर फैलाये जा रहे झूठों का प्रकोप.

यह मुक़ाम है जहां पिछले सात वर्षों में जिन क्षेत्रों में हमने अभूतपूर्व प्रगति और वृद्धि दर्ज़ की है उसका जायज़ा लिया जाये. पहला क्षेत्र है घृणा और भेदभाव का, जिसका सामाजिक भूगोल बेहद फैल गया है और लगभग कोई भी अंचल इनसे बचा नहीं है. दूसरा क्षेत्र है हिंसा-हत्या-बलात्कार का, जिसका भी लगातार विस्तार होता रहा है. तीसरा क्षेत्र है झूठ का, जिसे दूर-दूर तक तेज़ी से फैलाने के सत्कार्य में राजनेता, धर्मनेता, व्यापारी, मीडिया एक-दूसरे से होड़ में हैं. शीर्ष से लेकर बिलकुल नीचे तक झूठ निस्संकोच बोला-बरता जा रहा है. चौथा क्षेत्र है अज्ञान का. ज्ञान की प्रतिष्ठा तो भारतीय परम्परा का एक बड़ा पहलू रही है लेकिन अब मंत्री-संत्री-तंत्री सभी इतने आत्मविश्वास से अज्ञान फैला-बढ़ा रहे हैं कि अचरज होता है कि इतना अज्ञान, उसकी विशद सम्पदा अब तक कहां छुपी बैठी थी. पांचवां क्षेत्र है ग़ैर-बराबरी का, जो चरमराती अर्थव्यवस्था की वजह से पहले ही बढ़ रही थी और जिसे महामारी ने और विकराल कर दिया है. छठवां क्षेत्र है बेरोज़गारी का जो पिछले सात वर्षों में घटने के बजाय असाधारण रूप से बढ़ी है. सातवां क्षेत्र है पर्यावरण के शोषण का जिसमें अर्थव्यवस्था, राजनीति तथा धर्म तक के कॉरपोरेटीकरण के कारण मनमानी वृद्धि हुई है.

इस सप्तवृद्धि ने हमारी कुछ स्वतंत्रताओं में भी अभूतपूर्व कटौती की है. कटौती के ये सात क्षेत्र हैं: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, असहमति की स्वतंत्रता, आलोचना और वाद-विवाद की स्वतंत्रता, प्रश्नवाचकता की स्वतंत्रता, ज्ञान की स्वतंत्रता, विज्ञान की स्वतंत्रता और भद्राचार की स्वतंत्रता. अभिव्यक्ति, असहमति, आलोचना, वाद-विवाद आदि का अपराधीकरण किया गया है और उन्हें देशद्रोह के दायरे में लगातार धकेला गया है. उनके जो स्वाभाविक मंच थे जैसे मीडिया, संसद, विश्वविद्यालय उन्हें लगातार संकुचित किया गया है. सार्वजनिक संवाद के मंच झगड़ालू, लांछन और गाली-गलौज से भर गये हैं. इन मंचों से शीर्ष सत्ताधारियों से लेकर छुटभैयों ने इतने अभद्र वचन कहे हैं कि एक विशद ‘अभद्र वचनावली’ ही संकलित की जा सकती है. परंपरा-संस्कृति-इतिहास आदि की लगातार अपात्रों और अज्ञानियों द्वारा दुर्व्याख्या की जा रही है. दुर्वचन और दुर्व्याख्या हमारे सामाजिक आचरण का सबसे दृश्य और श्रव्य हिस्सा हो गये हैं. राजनेताओं और धर्मनेताओं में आतार्किक सर्वज्ञता का अहंकार बेहद बड़बोला होकर सक्रिय है. सार्वजनिक जीवन में, विशेषतः सत्ताधारियों में, विनयशीलता, नम्रता और धीरज का घोर अभाव है.

इस दौरान मीडिया ने अपनी निष्पक्षता, प्रश्नवाचकता, आत्मसम्मान, साहस और सत्यनिष्ठा सत्ता और बाज़ार को बेच दिये और उसका अधिकांश गोदी मीडिया बनकर नीच ढंग से संतुष्ट-प्रसन्न है. सत्ता के दबाव में अनेक संवैधानिक संस्थाएं, जिनमें न्यायालय, चुनाव आयोग आदि शामिल हैं, राजभक्ति के उत्साह में अपनी गरिमा प्रतिष्ठा और साहस खो बैठी हैं. वे अपने नैतिक और संवैधानिक कर्तव्यों से विरत हैं. लोक-आन्दोलनों का, जो किसी भी लोकतंत्र का ज़रूरी पहलू होते आये हैं, सख़्ती से दमन किया गया है. सरकारी आंकड़ों पर विश्व स्तर पर अप्रामाणिक और अविश्वसनीय होने के आरोप तथ्य और तर्क के आधार पर लग रहे हैं. विश्वगुरु बनने का दम्भ सात वर्षों में विश्व-याचक होने की दयनीय स्थिति में हमें ले आया है: हम टीका, दवाई, आक्सीजन, वैण्टीलेटर आदि की भीख मांग रहे हैं सारी दुनिया से. विश्व मीडिया में भारत अपने कुप्रबन्ध, अदूरदिर्शता, राजनैतिक नेतृत्व की विफलता के लिए जितना बहुनिन्दित आज है उतना शायद पहले कभी नहीं हुआ.

बांसुरी के बजाय निकास-नल

हाल ही में अमरीकी कवि लारेंस फ़रलिंगे़त्ती का निधन हुआ. वे सौ वर्ष से अधिक आयु के थे. कवि होने के अलावा उन्होंने सैन फ्रांसिस्‍को में सिटी लाइट्स नाम से एक प्रकाशन ग्रह की स्थापना भी की. विशेषतः कविता के क्षेत्र में न्यू डायरेक्शंस और सिटी लाइट्स का सारी दुनिया में व्यापक प्रभाव रहा है. अपनी पाकेटपोएट्स सीरीज़ में सिटी लाइट्स ने दशकों पहले रूसी कवि मायकोवस्की की आरंभिक कविताओं के मारिया एन्सेंत्वर्गर द्वारा किये अंग्रेज़ी अनुवाद की एक पुस्तिका ‘लिसेन’ शीर्षक से प्रकाशित की. मारिया संयोगवश प्रसिद्ध जर्मन कवि हान्स माग्नुस एन्सेंत्वर्गर की रूसी मूल की पत्नी हैं. क्रान्ति के कवि होने के पहले मायकोवस्की एक ऐसे कवि-कलाकार समूह के सदस्य थे जो कला में घनवाद और कविता में भविष्यवाद लाने का प्रयत्न कर रहा था.

शुरू से ही मायकोवस्की विस्फोटक कवि थे और उन्हें ऐसा होने का तीख़ा अहसास था. वे आग्रह करते हैं: ‘क्या तुम बजा सकते हो एक निशागान/निकास-नल का बांसुरी की जगह उपयोग कर?’ एक कविता में ‘आने वाले वर्षों के रात्रिभोज में/अपनी आत्मा को जिबह किये जाने के लिए प्रस्तुत’ करते हुए वे कहते हैं कि ‘एक अनचाहे आंसू की तरह ढलकते हुए/चौक के बेहज़ामत गाल से/मैं बिजलीबल्बों का स्वामी हूं.’ वे इसरार करते हैं कि ‘तुम सब लोग/सिर्फ़ घंटियां हो/झुनझुनाती हुई ईश्वर की पगड़ी पर’ और यह याद करते हैं कि ‘देवियो और सज्जनो, आपने सुना नहीं/कहीं तो भी/मुझे लगता है ब्राजील में/एक सुखी प्राणी है!’

हमारे यहां मुक्तिबोध ने ‘आत्मा के गुप्तचर’ होने की बात कवि के सन्दर्भ में की है और रूसी कवि बोरिस पास्तरनाक ने कवि को ‘अनन्त का राजदूत’ कहा है जिसे ‘समय ने बन्धक बना रखा है.’ मायकोवस्की ऐसी ही कवि-जासूसी करते हुए पाते हैं कि ‘आकाश एक जेब कतरा है’ और ‘तुम्हारी दाढ़ी में करमकल्ला है’. उनकी एक कविता का झटपटिया अनुवाद में समापन इस तरह होता है:

… और ईश्वर मेरी पुस्तक पर रोने लगेगा
ये शब्द नहीं हैं- ढेलों में दबोच दी गयी ऐंठनें
वह आकाश में दौड़ेगा, मेरी कविताएं उसके हाथ में
और छितराते हुए अपने मित्रों को दिखायेगा.

एक और कविता का समापन इन पंक्तियों से होता है:

…सुनो,
अगर तारे रोशन हैं
तो इसका मतलब है कि कोई है
जिसे उनकी दरकार है
इसका मतलब है कि यह ज़रूरी है
कि हर शाम
कम-से-कम एक तारा चढ़े
इमारत के शिखर के ऊपर.

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