समाज | कभी-कभार

समय आ गया है कि मनुष्य अपनी सीमाएं स्वीकारे और प्रकृति के सान्निध्य में विनयशील होकर रहना सीखे

इतना अधिक अहंकार मनुष्य में भर चुका है कि ऐसा विनय विकसित करना आसान नहीं होगा. इसके लिए उस विद्या की और लौटना होगा जो विनय देती है

अशोक वाजपेयी | 23 मई 2021 | इलस्ट्रेशन: मनीषा यादव

षड्यन्त्र का शिकार!

कवि-मित्र ध्रुव का भोपाल से फ़ोन आया. उन्हें यह गहरा सन्देह हो रहा है कि भारत कोरोना महामारी को लेकर किसी बड़े षड्यन्त्र का शिकार हो गया है. वे पूछते हैं कि ऐसा कैसे है कि एशिया के अन्य देशों की तुलना में भारत में ही यह दूसरी लहर ऐसी जानलेवा और व्यापक हो गयी है? इधर चीन के एक आयोग द्वारा एक चित्र जारी किया गया था (जो बाद में हटा लिया गया) जिसमें चीन के वुहान शहर में स्थित प्रयोगशाला दिखायी गयी थी जहां कोरोना 19 का वायरस विकसित किया गया और दूसरी तरफ़ भारत में चिताओं के जलने का दृश्य.

इस आधिकारिक आयोग ने यह दावा भी किया कि यह वायरस मनुष्य-निर्मित है और जैविक-रासायनिक युद्ध प्रणाली का हिस्सा है. कुछ जानकारों ने इस पर भी अचरज जताया है कि भारत में इस वायरस के जो दो म्यूटेण्ट मिले हैं वे सामान्य तौर पर एक साथ या एक-दूसरे से समंजस नहीं होते. हर वृत्ति या अनहोनी को षड्यन्त्र बताने वाली सत्ता और सत्ताधारी दल इस क़दर भौचक है कि अभी तक उन्होंने इस दौर को भारत के विरूद्ध षड्यन्त्र होने का दावा नहीं किया है.

लेकिन हमने भी, भारत में, नागरिक और सरकारों के स्तर पर सावधानी नहीं बरती हैं और चुनाव रैलियों, कुम्भ मेले आदि के माध्यम से इस प्रकोप को और फैलाने की भयानक चूक की है. शहरों के अलावा अब गांवों में भी इसका विस्तार हो गया है. आंकड़ों के स्तर पर भारत के सरकारी आंकड़े अब पूरी दुनिया में प्रामाणिक और विश्वसनीय नहीं माने जाते. कई प्रतिष्ठित संस्थान और अन्तरराष्ट्रीय मीडिया के मंच भारत में कोरोना-ग्रस्त और मृतकों की संख्या अधिकृत आंकड़ों से पांच से दस गुना अधिक यथार्थपरक मान रहे हैं. कहां हम विश्वगुरु बनने चले थे और कहां हमारे अपने बारे में आंकड़े इस क़दर अप्रामाणिक माने जा रहे हैं! अब तक किसी प्रवक्ता ने इसे भारत के विरूद्ध विश्वव्यापी षड्यन्त्र नहीं कहा यह भी हैरत की बात है.

ऐसी स्थिति में, अन्तरिम तौर पर, हम क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं. एक तो यह कि भारत का नेतृत्व अपने बड़बोलेपन और सर्वज्ञता के दंभ के कारण नाकारा साबित हो रहा है. वह इतना अबोध या अज्ञानी है कि उसे ऐसे किसी षड्यन्त्र की भनक तक नहीं लगी, अगर यह षड्यन्त्र है तो. दूसरा यह कि या तो अपने अज्ञान के कारण या चुनावों में व्यस्त रहने के कारण वह अपनी निष्क्रियता से इस षड्यन्त्र में शामिल हो गया.

ज़ाहिर इस समय तो प्राथमिकता जनजीवन को बचाना है और उस प्रयत्न में हम सभी को निस्संकोच शामिल होना चाहिये. सत्ता, सत्ताधारी दल के बजाय ज़्यादा व्यापक और मानवीय प्रयत्न उस दिशा में व्यक्तियों और नागरिक संस्थाओं द्वारा किया जा रहा है. पर देर-सबेर हमें यह जानने की कोशिश तो करनी होगी कि किस तरह की शक्तियां भारत के विरूद्ध सक्रिय हैं और वे कौन हैं जिन्होंने सामान्य नागरिक का जीना और मरना दोनों ही इतनी मुश्किल में डाल दिया है.

क्या वसन्त लौटेगा?

रिल्के के आरफ़ियस के लिए गये सोनेटों में से एक यों शुरू होता है, झटपटिया हिन्दी अनुवाद में:

वसन्त लौट आया है – और अब धरती है

एक बच्ची की तरह जिसने अपनी कविताएं मुखाग्र कर ली हैं

इतनी सारी, इतनी सारी… और अपने कठिन

और लम्बे श्रम के लिए अब लेती है पुरस्कार

रिल्के को प्रकृति की शक्ति में गहरा यक़ीन था, उस प्रकृति में जो आधुनिक काल में प्रकट नहीं होती और ऋतुचक्रों से धुंधला जाती है. इस समय जब हम सबके जान के लाले पड़े हुए हैं, प्रकृति पहले जैसी ऊर्जस्वित और सक्रिय नज़र आती है: हम घरबन्दी और तालाबन्दी में हैं पर प्रकृति पहले जैसी ही उन्मुक्त दिखायी पड़ती है. बहुत सारे लोग, दुनिया भर में, यह मानने लगे हैं बल्कि मानने पर विवश हैं कि जो विभिन्न प्रकोप मनुष्य झेलता है ये प्रायः सभी उसके प्रकृति के साथ किये जा रहे शोषण, दोहन और अन्याय से उपजते हैं और प्रकृति ऐसे प्रकोपों के माध्यम से मनुष्य से बदला लेती है.

इस बार के विश्वव्यापी और मरणान्तक प्रकोप ने पर्यावरण और जलवायु संकट को साधारण लोगों के अवबोध की परिधि के अन्दर ला दिया है और हो सकता है कि प्रकृति के साथ मनुष्य के संबंध और संवाद की कोई नयी पहल हो. ऐसी पहल के शत्रु होंगे नवपूंजीवाद, बाज़ार और कॉरपोरेट जगत्, बहुराष्ट्रीय कंपनियां. संसार भर में लोकतांत्रिक और तानाशाह सत्ताएं इन शक्तियों के गहरे प्रभाव में हैं और आसानी से उनके बचावों का प्रतिरोध नहीं कर पायेंगे. इसलिए ज़रूरी होगा कि पर्यावरण और प्रकृति सक्रिय राजनीति के एजेण्डे पर हों. सभी धर्मों में प्रकृति की महिमा का सहज स्वीकार रहा है. भारत के कई हिस्सों में विशेषतः आदिवासी अंचलों में प्रकृति की पवित्रता और उसके इर्द-गिर्द अनेक अनुष्ठानों की सदियों से चली आ रही प्रथाएं हैं. सिर्फ़ यही वह मुक़ाम है जहां राजनीति में धर्मों को हस्तक्षेप करने की अनुमति नागरिक दे सकते हैं. प्रकृति की रक्षा, उसकी पवित्रता का सुनिश्चय, उसकी अपराजेयता का स्वीकार करने के लिए.

अपने सारे ज्ञान-विज्ञान के बावजूद मनुष्य प्रकृति के सामने अकिंचन ही है. समय आ गया है कि मनुष्य अपनी सीमाएं स्वीकार करे और प्रकृति के सान्निध्य में विनयशील होना-रहना सीखे. इतना अधिक अहंकार मनुष्य में भरा जा चुका है कि ऐसा विनय विकसित करना आसान नहीं होगा. हमें उस विद्या की और लौटना होगा जो विनय देती है.

वसन्त लौट सकता है अगर हम अपने संसार, कलाओं और कविताओं में, भाषाओं और संगीत में उसके लिए खुली जगह बना सकें. वसन्त सिर्फ़ फूलों-पत्तियों में लौटना नहीं चाहता – उसकी आकांक्षा मनुष्य के संसार को रंग-बिरंगा करने की भी होती है. हम चाहेंगे और रिल्के की कविता की बच्ची की तरह कोशिश करेंगे और न्योतेंगे तो वसन्त ज़रूर लौटेगा.

आज जो अभी

कहा यह जा रहा है कि यह समय, कोरोना-आक्रान्त समय, उसके लिए किसी को ज़िम्मेदार ठहराने का नहीं है. इस समय सबको एकजुट होकर कोरोना के विरूद्ध युद्ध जीतना है. यह विचित्र और अनैतिक कुतर्क है. हर रोज़ हज़ारों लोग आक्सीजन, अस्पताल की सुविधाओं, वैण्टीलेटर के अभाव, टीकाओं की कमी के कारण मर रहे हैं, लाशों की श्मशानों में जलने के लिए कतारें लगी हैं, लोग अपने मृतक परिजनों को साइकिल पर गाड़ी में अन्तत्येष्टि के लिए ले जाते दिखायी दे रहे हैं, दवाइयों की कमी है. यह सब आज और अभी हो रहा है. हममें से अधिकांश इसके निरूपाय गवाह हैं, कुछ अभागे मुक्तभोगी. इस हत्याकाण्ड के लिए हम आज और अभी किसी सत्ता-राजनीति-राजनेताओं, व्यवस्था को ज़िम्मेदार न ठहरायें और कल तक धीरज रखें जब पीड़ितों और मृतकों की संख्या एक विश्व रिकार्ड बना चुकी होगी. हम एक लोकतांत्रिक व्यवस्था है जिसमें सत्ता की जवाबदेही है. क्या यह उस जवाबदेही पर इसरार करने का समय नहीं है?

हमारी लोकतांत्रिक जिजीविषा हमारी प्रश्नवाचकता है. जब सारा संसार हमारी दुर्व्यवस्था और कुप्रबन्ध पर थू-थू कर रहा है, हमें चुप रहने की सलाह देना अलोकतांत्रिक है. इस समय जब, कुल मिलाकर, मीडिया का एक बड़ा हिस्सा, राजनीति, धर्म, न्यायालय, अन्य संवैधानिक संस्थाएं कायर चुप्पी या कुप्रबन्ध का भी महिमा-मण्डन करने में भक्तिभाव से लगे हुए हैं, नागरिक ही हैं जो अपनी आवाज़ उठा सकते हैं. सत्ता-बाज़ार-धर्म-राजनीति से अलग नागरिक अन्तःकरण होता है: सामान्य नागरिक ही उसके प्रवक्ता और रखवाले होते हैं. वह नागरिक अन्तःकरण अगर आज चुप रहता है तो वह न तो नागरिक कहा जा सकता है, न ही अन्तःकरण. अन्तःकरण सुअवसर की तलाश नहीं करता, वह कुसमय भी कुभक बोलने का जोखिम उठाता है.

इस समय नयी दिल्ली में सैण्ट्रल विस्टा पर, दूसरी लहर के बावजूद, काम चल रहा है. उस पर काम को ‘आवश्यक सेवा’ घोषित किया गया है. उस पर बीस हज़ार करोड़ रूपये का ख़र्च आने वाला है. एक भूतपूर्व सिविल सेवक ने, जो भारत सरकार में सचिव रह चुके हैं, हिसाब लगाकर बताया है कि बीस हज़ार करोड़ की राशि में 62 करोड़ लोगों को टीका लगाये जा सकते हैं या 22 करोड़ रेमेडिसिविर दवाई के पत्ते खरीदे जा सकते हैं. या दस-दस लीटर के तीन करोड़ आक्सीजन के सिलिण्डर खरीदे जा सकते हैं. भारतीय जन की प्राथमिकता और सत्ता की प्राथमिकता में इससे अधिक विपर्यय शायद ही कभी पहले हुआ हो. अगर हम अब नहीं इस फ़िजूलख़र्च ज़िद्दी सत्ता की जवाबदेही पर इसरार करेंगे तो कब करेंगे? इस समय सैण्ट्रल विस्टा पर ज़िद कर अड़े रहना अभद्र, अश्लील और लोक-विरोधी है, निर्मम और अपमानजनक भी.

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