लेखन

समाज | कभी-कभार

साहित्यकार का लक्ष्य हो सकता है, साहित्य का नहीं

इस बात पर एक अनसुलझा विवाद सदियों से रहा है कि साहित्य का कोई लक्ष्य होता है या नहीं

अशोक वाजपेयी | 18 जुलाई 2021 | फोटो: पिक्साबे

तेरा बयान ग़ालिब

इस बीच संयोगवश ग़ालिब के ख़तों को पढ़ने का सुयोग हुआ. यों तो उन्हें कई बार पहले भी पढ़ा है: उन्हें पढ़ा जाता सुना है. यह उचित ही माना जाता है कि ख़तों में नुमाया उनका गद्य अप्रतिम है. उसमें कई बार शायरी की सी लय है और बातचीत का लहजा और मिठास भी. पर जो हिस्से मैंने नोट किये वे, अपनी मार्मिकता और हम पर जो बीत रही है उसके लिए अपनी प्रासंगिकता, एक साथ बखूबी ज़ाहिर करते हैं.

‘हक़ीक़ते हाल इससे ज्यादा नहीं है के अब तक जीता हूं, भाग नहीं गया, निकाला नहीं गया, नहीं, किसी महकमे में अभी तक बुलाया नहीं गया…’ (दिसम्बर 1857)

‘लिखूं तो क्या लिखूं? कुछ लिख सकता हूं, कुछ क़ाबिल लिखने के है? तुमने जो मुझको लिखा तो क्या लिखा और अब जो मैं लिखता हूं तो क्या लिखता हूं? बस इतना ही है कि अब तक हम जीते हैं. ज़्यादा इससे न तुम लिखोगे, न मैं लिखूंगा.’ (दिसम्बर 1857)

‘दिल्ली अब शहर नहीं, छावनी है, कम्प है. न क़िला है, न शहर के उमरा, न अतराफ़े शहर के रऊसा.’ (दिसम्बर 1864)

‘अब तक मैं अपने को ये भी नहीं समझा के बेगुनाह हूं या गुनहगार. मक़बूल हूं या मरदूद.’ (नवम्बर 1859)

‘जिस्म में जितना लहू था पीप बनकर निकल गया. थोड़ा सा जो जिगर में बाक़ी है, वो खाकर जीता हूं, कभी खाता हूं, कभी पीता हूं.’ (नवम्बर 1864)

कोरोना प्रकोप के दौरान हममें से बेश्तर की हालत कुछ ऐसी ही रही है जिसका बयान ग़ालिब ने किया है. इतना फ़र्क भर है कि हम हर रोज़ सैकड़ों झूठ, अफ़वाहों या ख़बरों की तरह, देखते-सुनते हैं और हमारा ध्यान अपनी हालत का जायज़ा लेने बंट जाता है. ऐसा पहले शायद कभी नहीं हुआ कि जिजीविषा ही मूल्य बन गयी हो जैसी कि इस प्रकोप में. उसमें हम जीवित हैं और बचे हुए हैं यह बड़ी नियामत है.

ग़ालिब जैसे लोग बड़े इसलिए भी हैं कि वे सिर्फ़ जीते भर नहीं थे, उसकी बेबसी का ऐसा बयान भी करते थे, अपने घनिष्ठों को लिखकर एक तरह की गवाही भी देते थे. ये बयान स्पष्ट ही उस वक़्त, उसकी भयावहता, उसकी बरबादी और ख़राबी, उनकी अपनी बूढ़ी उमर सब की गवाही है. सच्ची गवाही न सिर्फ़ अपने समय में व्यापती है, वह हर समय में व्यापती है. इसलिए कि आदमी को हर वक़्त में इन्सान होना मयस्सर नहीं होता जैसा कि ग़ालिब को पता था. यह कहने का मन होता है कि जब आज चारों तरफ़ आप सब कुछ भूल जायें की मुहीम चली हुई है और अक्सर कामयाब भी होती है, ग़ालिब याद दिलाते हैं कि सच्चा आदमी वह है जो याद रखता है, जो याद दिलाता है. हमारा यह सौभाग्य है कि हम अपने एक महान पुरखे से ये सबक आज सीख सकते हैं, भले यह सब उन्होंने सबक सिखाने की गरज से न लिखना होगा.

पराजित लक्ष्यों की गोधूलि

इस पर एक अनसुलझा विवाद सदियों से रहा है कि साहित्य का कोई लक्ष्य होता है या नहीं. इसमें एक बारीकी यह रही है कि साहित्यकार का लक्ष्य हो सकता है, साहित्य का नहीं. विवाद के दोनों और के पक्ष में विपुल साक्ष्य हैं. लक्ष्यपरक बड़ा साहित्य हुआ है और लक्ष्यहीन बड़ा साहित्य भी. यह सूक्ष्म अन्तर्विरोध भी रहा है कि साहित्यकार ने जिस लक्ष्य को साधा है, उसे उसका साहित्य कई बार प्रमाणित नहीं करता.

यह समय बहुत सारी वृत्तियों और चीज़ों के धुंधलाने का है. भारत ही नहीं पूरे संसार में इस समय जो सांस्कृतिक-राजनैतिक-सामाजिक वातावरण है उसमें लगता है कि सभी उदात्त लक्ष्य पराभव में पहुंच गये हैं. स्वतंत्रता, समता और न्याय के महान् स्वप्न और लक्ष्य हाशिये पर ठेल दिये गये हैं. यह शंका होती है कि ऐसा ही चलता रहा तो देर-सबेर वे हाशिये से भी बाहर कर दिये जायेंगे. ऐसे में जब राजनीति, बाज़ार, आर्थिकी, मीडिया, सामाजिक व्यवहार में ये उदात्त लक्ष्य अप्रासंगिक क़रार दिये गये होंगे तब क्या साहित्य में वे, प्रतिरोध की तरह, जीवित और सक्रिय रह सकते हैं? अगर आप इस सिद्धान्त में विश्वास करते हों कि साहित्य तो हमेशा सत्ता के विरोध में रहता है तो आप मान सकते हैं कि ये उदात्त मूल्य साहित्य में सशक्त रह सकते हैं, भले ही उनका सामाजिक आधार कमज़ोर पड़ गया हो. अगर आप दुर्दान्त आशावादी हों तो यह भी मान सकते हैं कि सारा साहित्य, भले उसने ज़ाहिर तौर पर इन्हें अपना लक्ष्य न भी माना या घोषित किया हो, अन्ततः स्वतंत्रता-समता-न्याय की ही अभिव्यक्ति होता है और उन्हें ही पोसता और यथासम्भव बढ़ाता है.

एक और रुख़ भी सम्भव है और निराशावादी होने के कारण अवैध या अप्रामाणिक नहीं हो जाता. दुनिया भर में स्वतंत्रता-समता-न्याय में लगातार तेज़ी से कटौती हो रही है और ये तीनों उदात्त लक्ष्यों के सिलसिले में दुनिया न सिर्फ़ तुलनात्मक दृष्टि से पिछड़ रही है बल्कि और पीछे जा रही है. कई ऐसे विमर्श इधर लोकप्रिय हो रहे हैं जो इन उदात्त लक्ष्यों की उपेक्षा करते हैं. स्वयं भारत का सामाजिक यथार्थ आज यह है कि एक ऐसा निज़ाम लोकतांत्रिक पद्धति से चुना जाकर सत्ता में है जिसके कुल सात बरसों के कार्यकाल में स्वतंत्रता में लगातार कटौती हुई है, समता के बजाय विषमता तेज़ी से बढ़ी है, और जगहों का क्या कहें स्वयं न्यायालयों में न्याय-बुद्धि अतर्कित ढंग से घट गयी है.

क्या इसलिए यह तर्क किया जा सकता है कि उदात्त लक्ष्य के जो सपने देखे गये थे, वे इस समय सच्चाई से कोसों दूर फिंक गये हैं और उन्हें फ़िलमुक़ाम पराजित माना जा सकता है? सारी दुनिया में बाज़ार-सत्ता-धर्म-मीडिया आदि ने मिलकर, एक विश्वव्यापी षड्यन्त्र कर उन्हें लगभग असम्भव बना दिया है. जो राजनैतिक शक्तियां इन लक्ष्यों से परिचालित थीं उनकी जगह दुनिया में बहुत कम रह गयी हैं. लेकिन साहित्य और कलाएं अल्पसंख्यक कर्म होते हुए भी इन मूल्यों से विरत या उदासीन नहीं हो सकतीं. जैसे अध्यात्म अब धर्म में नहीं इन जगहों में बचा है, शायद ये मूल्य और लक्ष्य भी वहीं बचे हैं और वहीं बचे रहेंगे, सक्रिय और सशक्त होते रहेंगे.

जवाबदेही का अभाव

पिछली शताब्दी में शायद साठ के दशक में जब यूरोप में निस्शस्त्रीकरण के लिए आन्दोलन हो रहे थे जिनमें बट्रैण्ड रसेल, ज़्यां पाल सार्त्र जैसे बड़े बुद्धिजीवी भी सार्वजनिक प्रदर्शनों में भाग ले रहे थे तो ‘प्रोटेस्ट’ नाम से एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी. उसमें शायद डोरिस लेसिंग का एक निबन्ध जवाबदेही को लेकर प्रकाशित हुआ था. उसमें तर्क कुछ इस प्रकार था: जिस पायलेट ने अपने हवाई जहाज से अणु बम गिराये और लाखों लोगों का क्षण भर में संहार कर दिया, वह उसके लिए ज़िम्मेदार नहीं क्योंकि उसे ऐसा करने का आदेश सैन्य कमान ने दिया था. कमान ज़िम्मेदार नहीं क्योंकि उसे ऐसा करने का आदेश रक्षा मंत्री ने दिया था. रक्षा मंत्री ज़िम्मेदार नहीं क्‍योंकि निर्णय तो काबीना ने लिया था. काबीना ज़िम्मेदार नहीं क्योंकि उसके इस निर्णय को संसद ने अनुमोदित किया था. सांसद ज़िम्मेदार नहीं क्योंकि वे तो जनप्रतिनिधि थे. लेकिन जन में कोई भी ऐसा नहीं था जो इस नरसंहार का समर्थन करता. लेखिका का तर्क था कि अणु बम के लिए हर किसी के पास अपनी जवाबदेही से बचने का एक तर्क है और इस अर्थ में जवाबदेही के अभाव में वह एक पूरी तरह से अनैतिक इकाई है.

इधर कोरोना महामारी के दौरान क्या कुछ ऐसा ही नज़ारा देखने को नहीं मिल रहा है कि कुप्रबन्धन, सारी चेतावनियों के बावजूद उसकी समाप्ति की अपरिपक्व घोषणा, लॉकडाउन से बेघरबार हुए लाखों लोगों की दारुण व्यथा, करोड़ों लोगों के फिर ग़रीबी रेखा के नीचे फिंक जाने, आर्थिक प्रगति की दर नकारात्मक हो जाने, लाखों रोज़गार खत्म हो जाने, गंगा में हज़ारों शवों के बहने की अमानवीय दुर्घटना आदि के लिए कोई जवाबदेह नहीं है? सही है कि कोरोनों एक प्राकृतिक विपदा है जिसके लिए कोई ज़िम्मेदार नहीं है. पर उसके व्यापक हो जाने के बाद जो हुआ है उसकी ज़िम्मेदारी कौन ले रहा है? केन्द्र राज्यों पर, राज्य केन्द्र पर जवाबदेही टाल रहे हैं. यह सर्वथा अनैतिक दायित्वहीन दृश्य, जो दरअसल क्रूरता-नीचता-संवेदनहीनता का एक रौरव है, हम देख रहे हैं. भले अभी कुछ करना सम्भव न हो और इस समय जो हो रहा है उसे हम दर्ज़ भर कर सकते हैं, समय आयेगा जब हमें जवाबदेही पर इसरार करना होगा. अगर हम तब भी चुप या निष्क्रिय रहे तो यह उस विकराल अनैतिकता में शामिल होने के बराबर होगा.

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