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समाज | कभी-कभार

क्या हिंदी अपराधों की बढ़ती संख्या के खूनी दागों से अपना दामन बचा सकती है?

अगर सिर्फ़ हत्या, बलात्कार, बच्चों के खिलाफ़ अपराध और पिछड़ी जातियों के विरुद्ध अपराध के आंकड़े देखे जायें तो हिंदी प्रदेश उसमें आगे दिखते हैं

अशोक वाजपेयी | 03 अक्टूबर 2021 | फोटो: मनीषा यादव

दुर्दशा के आंकड़े

दो अक्टूबर को बीते कुल एक दिन हुआ है और संसार भर में यह दिवस अहिंसा दिवस के रूप में माना जाता है : यह दिन महात्मा गांधी का, जिन्होंने अहिंसा को प्रतिरोध और मुक्ति का कारगर उपकरण बता और बनाकर उसे नयी प्रासंगिकता दी. उसी दिन से कुछ पहले राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो ने वर्ष 2020 में भारत में अपराधों के आंकड़े जारी किये. यह भारत दुर्दशा का स्वयं भारत सरकार द्वारा खींचा गया मानचित्र है. अपराध के मामलों में, कुल मिला कर, 28 प्रतिशत की वृद्धि हुई है: यह विडंबना नहीं है कि हमारी विकास दर गिर रही है और अपराध दर बढ़ रही है!

यह भारत-दुर्दशा हिंदी अंचल में सबसे भीषण और दारुण है. अगर सिर्फ़ हत्या, बलात्कार, बच्चों के खिलाफ़ अपराध, अनुसूचित जातियों के विरुद्ध अपराध और आदिवासियों के विरुद्ध अपराध के आंकड़े देखे जायें तोभारत के सभी बाक़ी प्रदेशों के मुक़ाबले इन सभी क्षेत्रों में उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्यप्रदेश अग्रणी हैं. इन सभी अपराधों में हिंदी प्रदेश पहले पांच में शामिल हैं. इसका सीधा आशय यही है कि ये हिंदी प्रदेश, जिनमें हिंदी भाषा-भाषी सबसे अधिक बसते हैं, देश के सबसे अपराधग्रस्त प्रदेश हैं.

हत्या के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर है और बिहार तथा मध्यप्रदेश पहले पांच में शामिल हैं. बलात्कार के क्षेत्र में राजस्थान सबसे ऊपर है और राजस्थान और मध्यप्रदेश पहले पांच में शामिल हैं. बच्चों के खिलाफ़ अपराधों की गिनती में सबसे ऊपर मध्यप्रदेश है और पहले पांच में उत्तर प्रदेश और बिहार शामिल हैं. दलितों के विरुद्ध अपराधों के मामलों में उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर है और पहले पांच में बिहार, राजस्थान और मध्यप्रदेश हैं. आदिवासियों के विरुद्ध अपराधों में मध्यप्रदेश सबसे ऊपर है, राजस्थान पहले पांच में शामिल है.

पहले यह तर्क दिया जाता रहा है कि विकास के साथ-साथ अपराध बढ़ते हैं क्योंकि लोगों की बेहतर जीवन अर्जित करने की आकांक्षा बढ़ती है. यह कुतर्क ही है क्योंकि विकास की दर के हिसाब से हिंदी प्रदेश सबसे पिछड़े प्रदेश हैं. दूसरी बात यह है कि इन सभी प्रदेशों में हिंसा-हत्या-बलात्कार-अन्याय-भेदभाव की मानसिकता फैलानेवाली राजनीति बहुत सक्रिय है और अधिकांश में तो वह सत्तारूढ़ है. अपराध और राजनीति के विस्तार में इस संबंध को अनदेखा नहीं किया जा सकता. तीसरी बात, यह समझ में आती है कि यह पूरा अंचल जातिवाद से भी ग्रस्त है और दलितों-आदिवासियों आदि के विरुद्ध अपराधों में इज़ाफ़ा इस मनोवृत्ति के कारण भी है.

हाल में हिंदी पखवाड़ा बीता है. उसके पहले अपराधों के ये आंकड़े आ चुके थे. हिंदी का व्यर्थ और अकारण महिमामण्डन करनेवालों को हिंदी अंचल की इस बढ़ती दुर्दशा ने परेशान नहीं किया यह दुखद आश्चर्य का विषय है. क्या हिंदी इन अपराधों की बढ़ती संख्या के खूनी दागों से अपना दामन बचा सकती है?

‘उस दिन भी था’

संसार के स्तर पर और विशेषकर पश्चिम में इस समय जो दो सबसे लोकप्रिय कवि हैं, वे हैं रूमी और रिल्के. एक ने फ़ारसी में लिखा और दूसरे ने जर्मन में. ये दोनों ही भाषाएं संसार की सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली भाषाएं नहीं की जा सकतीं जैसी कि अंग्रेज़ी, फ्रेंच और स्पैनिश, उदाहरण के लिए, हैं. फिर भी, इस दौरान इन भाषाओं में जिन कवियों के सबसे अधिक अनुवाद हुए हैं वे इन्हीं दो कवियों के हैं. इन दोनों के कई-कई अनुवाद होते और प्रकाशित होते रहते हैं.

सौभाग्य से हिंदी में रूमी का सीधे फ़ारसी से, हाल ही में संस्कृत और फ़ारसी के विद्वान बलराम शुक्ल ने अनुवाद किया है जिसे राजकमल प्रकाशन ने ‘निःशब्द नुपुर’ नाम से प्रकाशित किया है. दिलचस्प यह है कि बलराम जी के कविताओं के शीर्षक संस्कृत में दिये हैं जबकि कविताएं हिंदी में अनूदित हैं. मेरा ध्यान गया ‘नासदासीत् नो सदासीत् तदानीम्’ शीर्षक कविता की ओर जो, एक स्तर पर, ऋग्वेद के नासदीय सूक्त की याद दिलाती है :

मैं उस दिन भी था जब दुनिया में नाम नहीं थे.
और न ही नामों से पुकारे जाने वाली चीज़ों का नामो-निशान था.

नाम और नामी दोनों उस दिन हमसे ही प्रकट हुए थे.
लेकिन तब वहां न तो मैं था और न ही हम.

मैं सिनाई के पहाड़ पर भी गया.
वहां न तो रात थी और न ही दिन.

वहां मैंने सलीब और ईसाइयों को हर जगह खोजा.
लेकिन तब न सलीब थी और न ही ईसाई.

मैं मंदिर के दरवाज़े से मंदिर के अंदर गया.
मंदिर के अंदर कोई भी रंग प्रकट नहीं हो रहा था.

मैं हिरा और कंदहार के पहाड़ों के पास गया.
मैंने देखा उस जगह कोई भी ऊंचाई-नीचाई नहीं थी, सब कुछ समतल था.

अपने तलब के घोड़े को मैंने काबे तक दौड़ाया.
लेकिन वहां बूढ़ों और जवानों का प्राप्तव्य (अर्थात् खुद काबा) अनुपस्थित था.

मैंने इब्ने सीना से इन सभी रहस्यों के बारे में जानना चाहा.
लेकिन इन रहस्यों की व्याख्या इब्ने सीना के सामर्थ्य से बाहर की बात थी.

मैंने अपने दिल के अंदर निगाह डाली.
मैंने दिल को वहां ढूंढ़ा- मेरा दिल भी वहां नहीं था.

स्‍त्री-कविता

यह ध्यान में रखते हुए कि सामान्यीकरण अक्सर अपर्याप्त होता है और उससे कुछ न कुछ छूट जाता है. स्त्रियों के गद्य में पहले से मौजूद रही निर्भीकता अब उनकी कविता में भी है. यह नई निर्भीकता जो पारंपरिक संकोच और संयम से मुक्त है, कई बार साहस के साथ उनका निडर अतिक्रमण करती है. यह भी नोट करना चाहिये कि यह निर्भीकता अलग-अलग बहुत रूप लेती है : वह अपनी ज़द में मानवीय संबंध, प्रेम, रोज़मर्रा का अन्याय, देह, यौनिकता, सामाजिकता आदि को ले रही है. उसमें मोहक उग्रता है, कई बार तीख़ा क्रोध और उसका अनियंत्रित विस्फोट भी. समाज में समता लाने की दिशा में इस उपक्रम को राजनैतिक भी कहा जा सकता है : उसकी राजनीति पुरुष-सत्ता को चुनौती देती है और समकक्षता पर इसरार करती है. पर वह, सौभाग्य से, सत्ताकामी नहीं है.

यह निर्भीकता, विशेषकर संबंध-देह-यौनिकता-सामाजिकता के संदर्भ में, भाषा को अव्वल तो ऐसे कई क्षेत्रों में ले जा रही है जहां वह पहले नहीं गयी या जाने से हिचकती रही है. कई बार वह भाषा में अंतर्निहित समता और समकक्षता विरोधी अन्यायी अभिप्रायों पर प्रहार भी कर रही है. यह निर्भीकता कविता में एक नये तरह की ऐन्द्रियता को रूपायित कर रही है. ज़ाहिर है कि देर-सबेर यह निर्भीकता आलोचना में भी जायेगी जहां उसकी दृष्टि से साहित्य, साहित्यिक कृतियों और कवियों का पुनर्विश्लेषण और पुनराकलन होगा.

इस अवधारणा में सचाई है कि दुनिया को देखने की दृष्टि स्त्री और पुरुष की अलग-अलग होती है. यह अलगाव जैविक होने के साथ-साथ सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक व्यवस्था से भी उत्प्रेरित होता है. जिस समाज में हम ‘बेटी बचाओ’ अभियान को ‘बेटी भगाओ, मारो’ अभियान में बदलता देख रहे हैं, उसमें स्त्री-दृष्टि तो अलग होगी ही. यह कोई रूमानी बात नहीं है कि शिकार होने के कारण स्त्री की दृष्टि अधिक सम्यक, कई बार अधिक यथार्थपरक, अधिक मानवीय हो पाती है. अच्छे कवियों में स्त्री-तत्व भी होता है जैसे अच्छी कवयित्रियों में पुरुष-तत्व. केदार नाथ सिंह की प्रगीतात्मकता में यह स्‍त्रीतत्व देखा जा सकता है. कीर्ति चौधरी की कई कविताएं आत्‍मक्तव्य होते हुए भी पुल्लिंग में लिखी गयी हैं. बाद के समय में, मुझे लगता है, एक तरह का सहचारिता का भाव रहा है, बावजूद कवयित्रियों की बढ़ती संख्या, दृष्टि और शैली की विविधता के.

यौनिकता स्त्रियों की नयी निर्भीकता का अंग है जिसमें योनि विमर्श भी शामिल है. स्त्री निरी देह माने जाने से इनकार करे यह सर्वथा उचित है. पर मुझे लगता है कि कवयित्रियां अपनी देह को नकार नहीं रही है. उस पर उनका ‘टेक’ दूसरे ढंग का है और वहां भी दृष्टि की बहुलता है. अगर रीतिकाल ने स्त्री को केंद्र में रखकर उसकी देह का उत्सव माना तो यह कोई पश्चगामी दृष्टि, मेरी समझ से, नहीं थी. भक्ति काल में स्त्री का, एक स्तर पर, उदाहरण के लिए कबीर के यहां जहां उसे सारी बुराई का स्रोत बताया गया था, जो अवमूल्यन हुआ था उसके बरक़्स स्त्री पर संकेंद्रण, उससे उपजी नयी ऐन्द्रियता ने कविता को एक तरह के सामाजिक संशोधन के रूप में प्रासंगिक बनाया. जो हो, स्त्री का निर्भीक खुलापन, फिर एक बार, सामाजिक संशोधन है, एक क़िस्म का ज़रूरी मूलसुधार.

इस कविता में प्रगट होनेवाला स्त्री-संसार इकहरा नहीं है और उसे सिर्फ़ यौनिकता आदि तक महदूद करना उसके साथ अन्याय करना है. यह कविता अगर नवाचार करते हुए स्वतंत्रता-समता-न्याय के मूल्यों की छाया में हमारे समय-समाज-आत्म का संधान करती है तो उसमें बड़ी कविता होने की सम्भावना निश्चय ही होगी. अभी कोई अटकल लगाना या कोई फ़तवा देना बेहद जल्दबाज़ी होगी. बड़ी कविता के लिए दृष्टि, रूप, कौशल, कल्पना, अध्यवसाय आदि बहुत सारे तत्व एकत्र चाहिये: उसमें गहरा उद्वेलन, समय और समयातीत का स्पंदन, विराट जीवन को सहेजने की आकांक्षा, सच्चा और टिकाऊ साहस आदि भी ज़रूरी होते हैं. कम से कम मैं यह उम्मीद करता हूं कि ऐसा समावेश हो पायेगा.

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