समाज | कभी-कभार

कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा हमारे लोकतंत्र में एक गांधी-क्षण है

गांधी जी ने जिन दो बड़े आन्दोलनों से स्वतंत्रता-संग्राम को नयी दिशा दी थी वे, चम्पारण और नमक सत्याग्रह, मुख्यतः किसान आन्दोलन थे

अशोक वाजपेयी | 12 दिसंबर 2021

हिन्दी: रूढ़ पूर्वग्रह

हाल ही में समाज विज्ञान की एक नयी पत्रिका के लोकार्पण के अवसर पर आयोजन की अध्यक्षता कर रहे एक विश्व विख्यात समाजचिंतक ने यह रूढ़ पूर्वग्रह दुहराया कि हिन्दी एक बनावटी भाषा है, उसकी कई बोलियां स्वतंत्र रूप से उसके मुक़ाबले हज़ार बरस पुरानी हैं और उसका देश की राजभाषा बनने का अधिकार बेहद संदिग्ध है. दिलचस्प है कि ऐसे बुद्धिजीवियों को इसका कोई अंदाज़ तक नहीं है कि हिन्दी साहित्य और हिन्दी बौद्धिक चिंतन का अपने तथाकथित राजभाषा रूप से कुछ लेना-देना नहीं है: दोनों ही उसके इस रूप से अधिकतर अप्रभावित और बारहा उसके निंदक रहे हैं.

सही है कि हिन्दी में, उसके परिवार में 46 बोलियां शामिल हैं और खड़ी बोली, जो आज हिन्दी के नाम से जानी जाती है, वह उसकी एक बोली है और उसका इतिहास सौ बरस से कुछ अधिक का ही है. पर इसी हिन्दी ने इतनी कम अवधि में जो साहित्य रचा है, उसमें जो आलोचना व्यक्त हुई है, वे भारत की किसी भी भाषा में रचे साहित्य और आलोचना के समकक्ष रखे जा सकते हैं. सौ बरस की अपेक्षाकृत सीमित और कम अवधि में अगर श्रेष्ठ रचना और आलोचना संभव हुए हैं तो क्या यह उसके बनावटीपन का सशक्त और अकाट्य प्रत्याख्यान नहीं है?खड़ी बोली के आरंभिक दौर में उसके लेखकों और पुरस्कर्ताओं ने उसकी कमियों को खुलकर स्वीकार किया था और उन्हें दूर करने के लिए जो उद्यम किया, वह असाधारण और भाषाओं के इतिहास में अभूतपूर्व है.

यह भी नोट करने की बात है कि हिन्दी को राजभाषा या राष्ट्रभाषा बनाने की मांग न तो हिन्दी लेखकों ने की और न ही ऐसा कोई अभियान उन्होंने चलाया. इसकी पहल तो एक ज़माने में महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ ठाकुर ने की थी जो मूलतः हिन्दी भाषी नहीं थे. यह कहने में हमें संकोच नहीं होना चाहिये कि हिन्दी आज भारत की सबसे आतिथेय भाषा है: उसमें भारतीय भाषाओं से सबसे अधिक अनुवाद होते और प्रकाशित होते हैं. बावजूद इसके कि हिन्दी भाषी अकसर दूसरी कोई भारतीय भाषा सीखने में कोताही करते रहे हैं. हिन्दी के राजभाषा रूप को अधिक सुबोध, साहित्य की अपनी भाषा के अधिक नज़दीक और उसमें मौलिक चिन्तन की संभावना पर हिन्दी साहित्य और बुद्धि के लोगों ने कम काम किया है.

राजभाषा के नाम पर हिन्दी के साथ बहुत अनाचार हुआ है और बड़ी संख्या में औसत से कम प्रतिभा वाले लोग नौकरी पा गये हैं. यह बात अन्य भाषा-भाषियों को, उचित ही नाराज़ करती है. पर इसके लिए हिन्दी भाषा और उसके लेखक-बुद्धिजीवी ज़िम्मेदार नहीं ठहराये जा सकते. यह और बात है कि अब यह औसतपन और मीडियोक्रिटी हिन्दी में नयी टेकनालजी के सहारे तेज़ी से साहित्य में फैल रहे हैं और उन्हें हिन्दी की मुख्य धारा बना रहे हैं.

विरोध से सबक

शायद भारत और संसार में चले सबसे लम्बे, लगभग एक वर्ष लम्बे चल रहे किसान आन्दोलन की अन्ततः जीत हुई है: एक अहंकारी सत्ता जिसने इस आन्दोलन को लांछित करने, बदनाम करने के मंत्री स्तर से लेकर गोदी मीडिया और ट्रोलिंग तक लगातार प्रयत्न किये, अन्ततः झुकी और उसके तीन किसानी संबंध क़ानूनों को वापस लेने की घोषणा की. यह हमारे लोकतंत्र में एक गांधी-क्षण है: इस आन्दोलन ने व्यापक जनसमर्थन जुटा कर, पूरी तरह से अहिंसक रह कर, सक्रिय राजनीति से अपने को दूर रखकर, प्रलोभनों और लांछनों, समझौतों आदि की परवाह न कर एकाग्र रहकर जो हासिल किया है वह एक क्रूर-असंवेदनशील-अधिकार में अन्धी सत्ता को लोकतंत्र में, चुनाव से नहीं, अथक विरोध से हराने का पराक्रम है. सारी हेकड़ी, गाली-गलौज, विदेशी सहायता मिलने के निराधार दावे आदि धरे रह गये. जनशक्ति ने अपनी ऊर्जा और उसके सात सौ अधिक किसानों की शहादत के माध्यम से अड़ियल और ज़िद्दी सत्ता को विनय का पाठ सिखा दिया. कितना यह पाठ सीखा गया है यह हम आगे देखेंगे.

यह भी नोट करने की बात है कि किसान आन्दोलन ने अपने नेता सामने किये हैं और अपने को दलगत राजनीति से समझ-बूझ के साथ अलग रखा है. यह भी अलक्षित नहीं जाना चाहिये कि किसानों के इस आन्दोलन में धर्म-जाति-सम्प्रदाय आदि से ऊपर रहकर सभी को समान रूप से शामिल किया गया. स्त्रियों की शिरकत भी काफ़ी रही. भले इसे सिर्फ़ सिखों का या कि पंजाब-हरियाणा-पश्चिमी उत्तर प्रदेश का आन्दोलन बताने की चेष्टा कर सीमित दिखाने की कोशिश की गयी, पर ज़ाहिर था कि उसे भारत भर के किसानों का समर्थन प्राप्त था. बल्कि किसानों के अलावा अनेक लेखकों-कलाकारों-बुद्धिजीवियों ने भी खुलकर किसानों का समर्थन किया. यह भी याद करने की ज़रूर है कि गांधी जी ने जिन दो बड़े आन्दोलनों से स्वतंत्रता-संग्राम को नयी दिशा दी थी वे, चम्पारण और नमक सत्याग्रह, मुख्यतः किसान आन्दोलन थे. यह सबक सीखने का मन होता है कि भारत में अब किसान, स्त्रियां, अल्पसंख्यक और दलित मिलकर क्रान्तिकारी परिवर्तन ला सकते हैं. यह लोकतंत्र की आत्मा और अन्तःकरण के पुनर्जागरण का क्षण हो सकता है.

यह बदलाव की उम्मीद जगानेवाला क्षण भी है. जो किसान कर सकते हैं वह हमारे लाखों की संख्या में फैले शिक्षक अपनी स्वायत्तता की रक्षा के लिए और सारी शिक्षा को कौशल और उपकरणात्मक बनाने और उसके ज्ञानपक्ष को लगातार शिथिल करने के विरुद्ध वे एकजुट और मुखर-सक्रिय क्यों नहीं हो सकते? उन्हें यह याद रखना चाहिये कि वे इस लोकतंत्र के सबसे लाभान्वित समुदायों में से एक हैं और उसे उसके सत्व में बचाने की कोशिश करना उनका सहज गुरुधर्म और नैतिक कर्तव्य होना चाहिये. किसानों ने रास्ता दिखाया है. जोखिम भरा है पर क्या दूसरे तबकों के पीड़ित-वंचित लोग उस पर चलने का साहस दिखायेंगे?

समावेशी भारत

सत्तारूढ़ राजनैतिक और आर्थिक शक्तियां, धर्माचार्यों और गोदी मीडिया के सक्रिय और उत्साहित सहायोग से एक ऐसा भारत बनाने की अथक चेष्टा कर रही हैं जो समावेशी होने के बजाय अपवर्जी हो और जिसमें सभी को सभी अधिकार समान रूप से न मिले हों. ऐसे समय में भी ऐसी वृत्तियां सामने आती रहती हैं जो उस समावेशी भारत को प्रगट करती हैं जो, सारी कठिनाइयों के बावजूद, मौजूद और सशक्त है.

शाहीन बाग़ आन्दोलन मुसलमान स्त्रियों द्वारा शुरू किया गया था जो नये नागरिकता क़ानून के विरुद्ध था. पर जल्दी ही उसमें सभी धर्मों और सम्प्रदायों के पुरुष और स्त्रियां स्वतःस्फूर्त ढंग से शामिल हो गये. देश में कई जगह शाहीन बाग़ बने. लगभग एक साल से चल रहे किसान आन्दोलन में भी किसानों के अलावा स्त्रियां, सभी धर्मों के अन्य ऐसे कई लोग शामिल होते रहे जो किसान नहीं थे. ज़ाहिर है कि ये सभी लोग पहचान पाये कि ये आन्दोलन कुछ बुनियादी अधिकारों और लोकतंत्र के इसरार के लिए हैं.

अल्पसंख्यकों को भय और घृणा के घेरे में ढकेलने का सर्वथा अनैतिक और अलोकतांत्रिक अभियान सत्तारूढ़ शक्तियां अरसे से चला रही हैं. ऐसा लगता है कि ख़ासकर पढ़े-लिखे समाज के एक बड़े हिस्से को उन्होंने अपने पक्ष में कर लिया है. पर दूसरी ओर ऐसे उदाहरण सामने आते रहते हैं जिनसे लगता है कि साधारण लोग अभी भी धार्मिक आपसदारी में यक़ीन करते और उसे निडर होकर बरतते हैं. गुड़गांव में प्रशासन द्वारा निर्धारित खुले स्थानों पर मुसलमानों को नमाज अदा करने के कुछ उग्र हिन्दू संगठन रोक रहे हैं. ऐसे माहौल में वहां के गुरुद्वारों ने यह प्रस्ताव किया है कि मुसलमान गुरुद्वारों में नमाज अदा कर सकते हैं. हर धार्मिक स्थल प्रथमतः और अन्ततः ईश्वर की पूजा और प्रार्थना करने की जगह ही होता है. सिखों को यह समझ है कि दूसरे धर्मावलम्बियों का अपने ढंग से प्रार्थना करना उनका अधिकार है और उसके लिए हर धार्मिक स्थल खुला होना चाहिये.

ज़रा सोचें कि अलग हमारे यहां सारे मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर एवं गुरुद्वारे आदि सब धर्मों की प्रार्थना के लिए खुल जायें तो कितना समरसता, सद्भाव और आपसदारी आदि बढ़ सकते हैं. पहल सिखों ने की है जो भारत में एक अल्पसंख्यक समुदाय हैं. क्या हिन्‍दू, जो कि बहुसंख्यक हैं, ऐसी पहल कर सकते हैं? अगर वैष्णव वही है जो पीर पराई जानता है तो क्या उसे पराये धर्म के लिए भी जगह नहीं बनाना चाहिये? दुर्भाग्य से हिन्दू धर्म के नेतृत्व में दूसरे धर्मों की समझ, उनसे सहानुभूति, उनके प्रति भाईचारे का भाव, पर पीड़ाकातरता, उदारता आदि गुण इतने दुर्लभ हो गये हैं कि ऐसी पहल की आशा नहीं की जा सकती. भारत के समावेशी बनने के लिए ज़रूरी है कि हिन्दू धर्म अपना कायाकल्प करे, प्रतिशोधक होने की अधर्मी वृत्ति से मुक्त हो और अपना लोकतांत्रिक पुनराविष्कार करे, जातिप्रथा को अतिक्रमित करके.

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