समाज | कभी-कभार

अब भ्रम होने लगा है कि पूरा समाज ही साहित्य को एक ग़ैरज़रूरी व्यसन मानता है

अधिकांश के लिए साहित्य पढ़ने की चीज़ तो हो सकती है, उससे जीवन का आचार और व्यवहार, विचार और चुनाव प्रभावित नहीं हो सकते हैं

अशोक वाजपेयी | 03 अप्रैल 2022 | फोटो: पिक्साबे

‘ज्यों उस पार गया’

जिस दिन पांच राज्यों में हाल में हुए विधान सभा चुनावों के नतीजे आए, उस दिन कम से कम मुझे गहरी सांस्कृतिक पराजय का, एक बार फिर, तीख़ा अहसास हुआ. एक ऐसी राजनीति ने सफलता पायी है जो हमारी संस्कृति की अभूतपूर्व विकृति है. अगर बढ़ते अपराधों, भयावह बेरोज़गारी, कोरोना महामारी के जगज़ाहिर कुप्रबन्ध, हिंसा-हत्या की बढ़ती मानसिकता, असहमति को लगातार आपराधिक बनाने की कोशिश, राज्य की मुखर-सक्रिय साम्प्रदायिकता, स्पष्ट धर्मान्धता के बावजूद उत्तर प्रदेश ने फिर इन्हीं सबको बढ़ावा देनेवाली शक्तियों को सत्ता सौंपने का निर्णय लिया है तो यह स्पष्ट है कि व्यापक हिन्दू समाज के लिए स्वतन्त्रता-समता-न्याय के संवैधानिक और लोकतान्त्रिक मूल्यों का कोई अर्थ नहीं रह गया है. उसके प्रेरक मूल्य इस मूल्य-त्रयी को खारिज करते हैं. अब और किसी साक्ष्य की ज़रूरत नहीं जो साबित करे कि हिन्दू समाज, स्वयं लोकतांत्रिक प्रक्रिया का इस्तेमाल करते हुए भी, लोकतंत्र-विरोधी हो गया है, कम से कम उसका बहुसंख्यक अंग.

हिन्दू दृष्टि की कई विकृतियां सामने आती रही हैं. पर वर्तमान स्थिति उसका परम विद्रूप है. हमें यह मानने में कितनी ही हिचक क्यों न हो सच यही है कि उत्तर भारत का हिन्दू समाज भयानक रूप से सड़ा हुआ समाज हो चुका है. इस समाज में संकीर्णता, भेदभाव, अत्याचार इस क़दर हावी हैं कि उसमें किसी उदार या उदात्त विचार या वृत्ति की संभावना पूरी तरह से ख़त्म हो गयी है. ऐसे समाज से, फ़िलवक़्त, अपने किसी पुनराविष्कार की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती: न तो ऐसी राजनीति कहीं नज़र आती है जो इस समाज को उसकी अपार विकृतियों से मुक्त कराने की चेष्टा करे. उत्तर भारत में यह समय संस्कृतिमुक्त राजनीति का है, एक ऐसी राजनीति का जिसका संस्कृति से किसी तरह संवाद या सहकार नहीं है. यह भी कहा जा सकता है कि यह ऐसा समय है जिसमें संस्कृति राजनीति को बदलना तो दूर, संयमित तक नहीं कर पायी है. यह एक बार फिर याद करने की ज़रूरत है कि इस समय सारी राजनीति का असली और मूल्यपरक विपक्ष हमारा साहित्य ही है. यह वह समय है जिसमें साहित्य समाज की बहुसंख्यक वृत्तियों के स्पष्ट-मुखर विरोध में खड़ा और सक्रिय है.

देश में वैकल्पिक राजनीति के उभरने और सशक्त होने की उम्मीद उसके हिन्दी अंचल से नहीं की जा सकती. ऐसी राजनीति दक्षिण के राज्यों और बंगाल आदि हिन्दीतर राज्यों और भाषाई अंचलों से ही उभरना संभव है. एक हिन्दी लेखक के रूप में मेरे लिए यह गहरे विषाद का समय है कि राजनीति और समाजनीति में परिवर्तन, नयी पहल की उम्मीद हिन्दी से नहीं, हिन्दीतर भाषी अंचलों से ही सम्भव है. हिन्दी इस समय संस्कृति और राजनीतिक दृष्टियों से एक पराजित भाषा है. बड़ी ट्रैजडी यह है कि हिन्दी, एक व्यापक समाज के रूप में, भारतीय सभ्यता के उपक्रम के साथ विश्वासघात करती भाषा है. हममें से अधिकांश ने यह हश्र नहीं सोचा था!

साहित्य का प्रभाव

विचारधारियों और स्वाययत्तवादी लेखकों के बीच यह वैचारिक साम्य होता है कि दोनों ही मानते हैं कि साहित्य का समाज पर प्रभाव पड़ता है. पहले के लिए यह प्रभाव लक्ष्य होता है, दूसरे के लिए अनिच्छित. इस समय हिन्दी समाज में जिस तरह की धर्मान्धता, साम्प्रदायिकता, जाति-विद्वेष, भेदभाव आदि राजनैतिक लोकप्रियता पा रहे हैं उनसे यह नतीजा साफ़ तौर पर और अनिवार्यतः निकाला जा सकता है कि हम ऐसे मुक़ाम पर पहुंच गये हैं जिसमें साहित्य का, उसकी मूल्यदृष्टियों, उसकी मानवीय चिन्ताओं आदि का कोई प्रभाव समाज पर नहीं पड़ रहा है. साहित्य तो, कम से कम उसकी मुख्य धारा, उसके अधिकांश महत्वपूर्ण लेखक और कृतियां, व्यवस्था-विरोधी, स्वतंत्रता-समता-न्याय मूल्यों का पक्षधर है कि जो साहित्य में हो रहा है उसका, जो समाज में हो रहा है उससे कोई संबंध या सहकार है ही नहीं. यह शायद कुछ अधिक क्रूर लगे पर सही है कि साहित्य इस समय समाज के विरुद्ध है और इसी में उसकी सार्थकता है. समाज का अधिकांश हिस्सा साहित्य को एक ग़ैरज़रूरी व्यसन मानता है. यह स्थिति नयी नहीं है, पहले भी निश्चय ही थी. पर इधर लगता है कि यह हिस्सा इतना विशाल और विकराल हो गया है कि लगभग पूरा समाज होने का भ्रम पैदा करता है.

हो सकता है कि यह अतिरंजित विचार या अवधारणा हो, मुझे ऐसा सन्देह होता है कि हिन्दी का पढ़ा-लिखा वर्ग बल्कि उसका पढ़ानेवाला बड़ा वर्ग अधिकांशतः साहित्य से न सिर्फ़ प्रभावित नहीं है, जिसको पढ़ाने से वह अपनी आजीविका कमाता है, बल्कि उसके बुनियादी मूल्यों याने स्वतंत्रता-समता-न्याय, अहसमति और बहुलता आदि को व्यावहारिक जीवन में लगातार अस्वीकार कर रहा है. हम इस सचाई को कुतर्कों से ढांक नहीं सकते कि जिनका स्वाभाविक काम लोगों को साहित्य और उसके बुनियादी मानवीय बोध और सहानुभूति के नज़दीक लाना होना चाहिये, वे उसे साहित्य से दूर ले जा रहे हैं. उनमें से अधिकांश के लिए साहित्य पढ़ने की चीज़ तो हो सकती है, उससे जीवन का आचार और व्यवहार, विचार और चुनाव प्रभावित नहीं हो सकते- शायद नहीं होना चाहिये. जिस साधारण की मान्यता, केन्द्रीयता और गरिमा से आधुनिकता की शुरूआत हुई थी वह साधारण अब वीर अभद्र बाहुबली धनशाली नायकों से अपदस्थ किया जा चुका है, कम से कम सामाजिक जीवन में. साहित्य और समाज में बढ़ती दूरी का यह एक कारण भी है और लक्षण भी.

ये मज़ाबीन ख़याल में ग़ैब से नहीं आ रहे हैं: ये हमारे पास हर दिन क्रूरतर हो रही सचाई से आ रहे हैं. शायद हम उनका कोई कारगर प्रतिकार नहीं कर सकते. पर कम से कम उनका एहतराम तो कर सकते हैं. यह एहतराम निरी औपचारिकता न हो पर हमारी दृष्टि और कल्पना का कुछ पुनर्नियोजन कर सके तभी उसका महत्व होगा. नाउम्मीदी के अंधेरे में उम्मीद की दरार खोज पाना आसान नहीं है पर लेखक होने के नाते हम इस निराश कर्तव्य से विरत नहीं हो सकते.

युवा सम्भव

पिछली शताब्दी में सत्तर के दशक से शुरू कर इस शताब्दी के पहले दशक तक फ्रांस में बसे भारतीय चित्रकार सैयद हैदर रज़ा जब भारत आते थे तो विशेषतः उन केन्द्रों में, जहां वे कुछ दिनों के लिए जाते-ठहरते वहां युवा कलाकारों में ख़ासी खलबली मच जाती थी. ये केन्द्र होते थे मुम्बई, दिल्ली, भोपाल, पुणे, जयपुर आदि. कारण यह था कि रज़ा युवतर चित्रकारों के काम में दिलचस्पी लेते थे और उस समय के कई लोग उन्हें अपने ठहरने की जगह पर घण्टों फ़र्श पर बैठकर युवा चित्रकारों के काम को देखने और उन्हें किस दिशा में आगके जाना, और खोज-शोध करना चाहिये ऐसी सलाह देते देखते रहे थे. अपने समवयसियों में रज़ा कलाकारों को लेकर सबसे अधिक उत्सुक और उदार रहे. अगर उन्हें किसी अज्ञातकुलशील युवा कलाकार की कोई कृति पसन्द आ जाती तो वे उसे खरीद भी लेते. ऐसी अनेक कलाकृतियां वे हर वर्ष अपने साथ पेरिस ले जाते. उनका एक बड़ा संग्रह उन्होंने दक्षिण फ्रांस में बसे अपने गांव गोर्बियो के कलाकेन्द्र को उपहार में दिया: कई बरसों से उनमें से कुछ कलाकृतियां, स्वयं रज़ा और उनकी कलाकार-पत्नी जानीन मोजिंला के चित्रों के साथ, वहां प्रदर्शित है. भारत में उनके द्वारा स्थापित रज़ा फ़ाउण्डेशन मुख्यतः युवाओं की ललित कला, कविता, शास्त्रीय संगीत और नृत्य, विचार के क्षेत्रों में प्रतिभा, सम्भावना आदि के सम्मान और प्रोत्साहन पर एकाग्र है.

रज़ा शती के अन्तर्गत रज़ा की इस रूचि और दृष्टि को ध्यान में रखते हुए 26 मार्च से 9 अप्रैल 2022 तक दिल्ली में पांच कला-वीथिकाओं बीकानेर हाउस, त्रिवेणी आर्ट गैलरी, इण्डिया हैबीटाट सेण्टर में एक साथ आयोजित कर रहा है. शायद देश भर में विशेष संग्राहकों द्वारा चुनी गयी 100 युवा कलाकारों की 300 कलाकृतियों की यह सबसे बड़ी प्रदर्शनी है. 26 मार्च को अलग-अलग समय पर, इस प्रदर्शनी के अलग-अलग हिस्सों का, अलग-अलग जगहों पर शुभारम्भ हुआ. किसी कलाकार की जन्मशती के सिलसिले में ऐसा कोई आयोजन पहले हुआ हो यह याद नहीं आता. बड़ी संख्‍या में इन दिनों दर्शक इस प्रदर्शनी को देख रहे हैं. बहुत सारे युवा कलाकार दूर-दराज़ से इस प्रदर्शनी के लिए दिल्‍ली आये हैं. प्रदर्शनी में लगभग 60 शहरों-कस्‍बों से चुने गये चित्रकारों के काम शामिल हैं जिनमें गैंगटाक, लेह, अबूझमाड़, पुडुचेरी, अंदमान के कलाकार भी हैं.

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