कंगना रनोट

समाज | सिनेमा

क्या कंगना रनोट का व्यवहार उस भारतीय संस्कृति से मेल खाता है जिसकी अब वे झंडाबरदार बन गई हैं?

अब कंगना रनोट जिस तरह की बातें करती हैं उन्हें सिर्फ उनकी बेबाकी मान पाना संभव नहीं है

अंजलि मिश्रा | 29 जुलाई 2020 | फोटो: फेसबुक/कंगना रनोट

महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर बात करने वाली वेबसाइट ऑडनारी डॉट कॉम ने कुछ साल पहले अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत से पूछा था कि उनके हिसाब से बॉलीवुड की ऑड नारी कौन हैं? जवाब में उन्होंने कंगना रनोट का नाम लिया था. सुशांत सिंह राजपूत का कहना था कि ‘हम सबको वही रास्ता आसान लगता है जिस पर बहुत सारे लोग चलते दिखते हैं. ऐसे में अलग राह चुनना, अपने मन की बात कहना और उस पर कायम रहना, बहुत हिम्मत का काम है. इसलिए मेरा जवाब कंगना हैं.’ इसी तरह, साल 2017 में जब कंगना रनोट के तीखे बयानों के चलते नेपोटिज्म पर बहस की शुरूआत हुई तब भी सुशांत सिंह राजपूत उनका समर्थन करते हुए दिखाई दिए थे. उस दौरान नेपोटिज्म पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में उनका कहना था कि ‘नेपोटिज्म बॉलीवुड में ही नहीं हर जगह है. अगर फिल्म इंडस्ट्री में लगातार नए टैलेंटेड लोगों को सही मौके नहीं मिलेंगे तो एक दिन यह ढह जाएगी.’

कंगना रनोट के लिए समानुभूति का यह भाव सुशांत सिंह राजपूत ने अपने कई साक्षात्कारों में दिखाया था. यह बात कंगना भी जानती और मानती हैं. शायद यही वजह रही कि पिछले दिनों रिपब्लिक टीवी को दिए अपने इंटरव्यू में उन्होंने यह बात स्वीकार भी की थी. कंगना का कहना था कि जब बॉलीवुड में कोई उन्हें सपोर्ट नहीं कर रहा था, तब सुशांत उनके साथ खड़े थे और इसीलिए उनकी मृत्यु पर बोलना वे जरूरी समझती हैं. इस इंटरव्यू से अलग भी कंगना रनोट सुशांत सिंह राजपूत से जुड़ी कई टिप्पणियां कर चुकी हैं जिनमें से ज्यादातर में करण जौहर, महेश भट्ट, आलिया भट्ट समेत कई लोगों को निशाना बनाया गया है. कहा जा सकता है कि सुशांत की मौत के बाद सोशल मीडिया पर नेपोटिज्म के खिलाफ चल रही बहस के शुरू होने और इतना लंबा खिंचने की एक बड़ी वजह कंगना रनोट और उनके समर्थक भी हैं. बीते हफ्ते सुशांत सिंह की आखिरी फिल्म ‘दिल बेचारा’ की रिलीज की चर्चा के चलते जब यह बहस मंद होने लगी थी तो कंगना ने अचानक यह इंटरव्यू देकर उसे फिर ताज़ा कर दिया.

कंगना रनोट के समर्थकों-प्रशंसकों का जिक्र आया है तो उनके हालिया इंटरव्यू पर आई कुछ टिप्पणियों पर भी गौर कर लेते हैं. करीब एक हफ्ते पहले लिए गए इस इंटरव्यू पर आए एक कॉमेन्ट के मुताबिक ‘जब सो कॉल्ड हीरो चूहों की तरह बिल में घुस जाते हैं, तब कंगना सामने आती हैं और शेरनी की तरह दहाड़ती हैं.’ एक अन्य टिप्पणी कहती है कि ‘यह इंटरव्यू देखने के बाद मुझे लग रहा है कि कंगना ने इंडस्ट्री में रहते हुए कितना कुछ सहन किया होगा. कंगना, हम आपसे सिर्फ प्यार ही नहीं करते बल्कि आपकी बहुत इज्जत भी करते हैं.’ कंगना की बातों को सराहने वाली एक और टिप्पणी में उन्हें संबोधित करते हुए लिखा गया है कि ‘अगर मैं दे सकती तो इस इंटरव्यू को हजार लाइक्स देती. कंगना, आपको सलाम कि आप हमेशा सच सामने रखती हैं, फिर चाहे बॉलीवुड से कोई समर्थन करे या न करे. अगर कुछ और लोग भी आपकी तरह हो जाएं तो इसकी सूरत बदल सकती है.’ यह रिपोर्ट लिखे जाने तक कंगना रनोट के इस इंटरव्यू पर लगभग 32 हजार से अधिक टिप्पणियां आ चुकी थीं और इनमें से ज्यादातर में कुछ इसी तरह की बातें कही गई हैं.

कंगना रनोट के इंटरव्यू के बाद बहस सिर्फ नेपोटिज्म तक ही सीमित नहीं रही. अपने इंटरव्यू में उन्होंने तापसी पन्नू और स्वरा भास्कर आदि से जुड़ी कुछ टिप्पणियां भी की थीं और जिन पर इन सहित कई अन्य लोगों की प्रतिक्रियाएं  आने के बाद नेपोटिज्म के साथ-साथ कंगना से जुड़ी एक बहस भी ज़ोर पकड़ती दिखी. लेकिन कंगना के प्रशंसकों और समर्थकों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है.

यह सिलसिला बीते दो-तीन सालों से चल रहा है. वे सोशल मीडिया या मीडिया के जरिए अपने या किसी अन्य फिल्मी हस्ती के बारे में कोई दावा करती हैं तो लोग उसे हाथों-हाथ ले लेते हैं. यहां अगर थोड़ी साफगोई बरतते हुए कहा जाए तो सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाला एक खास तबका जो आम तौर पर दक्षिणपंथी राजनीतिक रुझान वाला और वर्तमान सरकार और उसकी नीतियों का समर्थक-प्रशंसक है, कंगना रनोट के कहे हर शब्द को कुंदन की तरह खरा मानता दिखाई देता है. इसकी वजह ढूंढ़ना ज्यादा मुश्किल नहीं है. पिछले कुछ समय से कंगना रनोट नेपोटिज्म और फेमिनिज्म के साथ-साथ लगातार धर्म-संस्कृति, राष्ट्र प्रेम, गौरक्षा, सेना-शहीद जैसे शब्दों को चुन-चुनकर अपनी बातों में इस्तेमाल कर करती हैं.

कंगना रनोट की ऐसी बातों का जिक्र करें तो कुछ समय पहले आध्यात्मिक गुरू जग्गी वासुदेव से बातचीत के दौरान उदारवाद (लिबरलिज्म) और देशभक्ति से जुड़ा सवाल पूछते हुए उन्होंने मणिकर्णिका के एक दृश्य का जिक्र किया था. गाय के एक बछड़े को बचाने वाले इस दृश्य के बारे में कंगना का कहना था कि उनका क्रू बछड़े की जगह मेमने को लेना चाहता था ताकि सीन को धार्मिक चश्मे से न देखा जा सके. इस पर आपत्ति जताते हुए कंगना का कहना था कि वे किसी भी जानवर की जान बचाना चाहेंगी लेकिन गाय को वे ज़रूर बचाएंगी क्योंकि उसे लेकर लोगों की सोच अलग है. इस बातचीत में कंगना ने लिबरल्स पर यह अजीब सा आरोप भी लगाया था कि वे गायों को बचाने के बारे में कभी नहीं सोचते हैं लेकिन जब गायों को लेकर मॉब लिंचिंग होती है तो शोर मचाने आ जाते हैं. इन बातों के दौरान, उन्होंने लिबरल्स को भारतीय जनता पार्टी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से नफरत करने वाला भी बताया था.

कंगना रनोट की इस तरह की बातों की वजह से सोशल मीडिया पर एक बड़ा तबका न सिर्फ उनका समर्थन करता है बल्कि उन्हें आलोचनाओं से परे होने वाला एक एक सच्चा हिंदू और राष्ट्रप्रेमी स्थापित करने की कोशिश करता भी दिखाई देता है. बिना किसी मेहनत के मिले इस अंध-समर्थन के चलते, बीते कुछ समय से अक्सर कंगना रनोट ऐसी बातें करते हुए कुछ ज्यादा ही उत्साहित और इसलिए थोड़ी असावधान भी रहने देने लगी हैं. वे आजकल ऐसी कई बातें बोलने लगी हैं जो काफी हद तक उनकी कथनी और करनी के अंतर को काफी स्पष्ट तरीके से दिखाती हैं. उदाहरण के लिए आजकल वे अक्सर हिंदू धर्म, भारतीय सभ्यता-संस्कृति की बातें करती हैं लेकिन उनके कुछ समय पहले के वीडियो ही, जिस तरह की सभ्यता-संस्कृति की वे बातें करती हैं, उसके पैमानों से थोड़े दूर दिखाई देते हैं.

इसका एक उदाहरण 2017 का कॉफी विद करण का वह ऐपीसोड है जिसमें उन्होंने करण जौहर को नेपोटिज्म के लिए काफी खरी-खोटी सुनाई थी (20:40 पर देखें). लेकिन ज्यादातर लोगों ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि इसी प्रोग्राम में उन्होंने सेक्स से जुड़े कुछ निहायत ही निजी सवालों के जवाब न केवल दिये थे बल्कि हां में दिये थे (19:40 पर देखें). बेशक, सेक्स से जुड़ी किसी भी स्वीकारोक्ति के लिए उनका या किसी का भी आकलन करना उचित नहीं है. लेकिन जिस तरह की सभ्यता-संस्कृति की बात कंगना आए दिन करती हैं, वह तो सार्वजनिक रूप से इतने खुले सेक्स की बात करने को बेशर्मी ही मानती है. और लड़की के बिना शादी किए ऐसा करने को इज्जत-मर्यादा का प्रश्न बना लेती है. वह तो वैलेंटाइन्स डे को पार्क में बैठे लड़के और लड़की को मुर्गा बनाने और कान पकड़वाने में विश्वास रखती है. ऐसे में कंगना रनोट का यह बताना कि उन्होंने शादी किए बगैर सेक्स में किस-किस तरह के, कहां-कहां और किसके साथ एक्सपेरीमेंट किए हैं, भारतीय संस्कृति के खिलाफ क्यों नहीं माना जाना चाहिए?

संस्कृति के खिलाफ जाने वाले एक अन्य उदाहरण का जिक्र करें तो यूट्यूब चैनल एआईबी के दीवा सॉन्ग को भी याद किया जा सकता है. ‘सिमरन’ के प्रमोशन के लिए बनाए गए इस गाने के बोल थे ‘आई हैव वजाइना रे…’ पहली बात तो यह कि फिल्मों में महिलाओं को ऑब्जेक्टिफाई किए जाने पर आपत्ति जताने वाले इस गाने का मुखड़ा भी ‘वजाइना’ शब्द का इस्तेमाल कर ही ध्यान खींचने की कोशिश करता है. यानी एक तरह से यह भी ‘वजाइना’ को ऑब्जेक्टिफाई करता है. दूसरे, इस तरह की खुले शब्दों वाली बोलचाल भारतीय संवाद परंपरा के खिलाफ भी है. शायद कंगना यह बात समझती भी हैं, अगर ऐसा न होता तो गाने के अंत में वे यह सफाई देती नहीं दिखाई देतीं कि यह गाना उन्होंने नहीं लिखा है.

बोलचाल पर ही थोड़ी और बात करें तो कुछ समय पहले एक पत्रकार से विवाद होने पर कंगना रनोट ने उनकी और उनकी फिल्मों की आलोचना करने वाले पत्रकारों के लिए – दीमक, देशद्रोही, बिकाऊ, चिंदी, नालायक, दोगले – जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था. बीते साल जारी एक वीडियो में कंगना ने सिने पत्रकारों को देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा बताया था और कहा था कि वे फर्जी उदारवादी हैं और धर्म से जुड़ी बातों को बेवजह बुरा बताते हैं. इस दौरान बोलते-बोलते वे यहां तक बोल गईं थीं कि दसवीं तक पास ना कर सकने वाले ये पत्रकार हर जगह केवल मुफ्त का खाना खाने के लिए जाते हैं और ऐसे ‘नालायक’ ‘गद्दार’ पत्रकार उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते हैं. कुछ भी बोल जाने का ऐसा ही एक और उदाहरण याद करें तो बीते साल एक इंटरव्यू में वे यह भी कह चुकी हैं कि उनकी फिल्म ‘मणिकर्णिका’ को राष्ट्रीय पुरस्कार नहीं मिलता है तो इससे राष्ट्रीय पुरस्कारों की क्रेडिबिलिटी पर प्रश्नचिन्ह लग जाएगा.

भले ही कंगना रनोट हमेशा खरी-खरी कहने के लिए सभी से तारीफ पाती रही हों लेकिन अब कई बार उनकी बातें अपशब्दों से भरी, अर्थहीन, बड़बोलेपन का वजन लिए और दोहराव वाली भी लगने लगी हैं. ऊपर बताए गए सभी उदाहरणों पर गौर करें तो यह भी कहा जा सकता है कि उनकी बातें हमारी उस संस्कृति से भी दूर होती जा रही हैं जो हमें ‘सत्यं ब्रूयात, प्रियं ब्रूयात’ यानी सच और मीठा बोलने की सीख देती है.

बातचीत से आगे बढ़कर व्यवहार पर आएं तो उसके लिए भी कंगना के बारे में यही कहा जा सकता है कि उन्होंने इंडस्ट्री को वही लौटाया जो उन्हें मिला था. ‘मणिकर्णिका’ और ‘सिमरन’ से जुड़ा क्रेडिट विवाद हो या फिर ‘मणिकर्णिका’ में अन्य कलाकारों के रोल काटने-कटवाने के आरोप, ये वाकये बताते हैं कि मौका मिलने पर कंगना रनोट ने भी वही किया है जो एक ताकतवर शख्सियत किसी कमजोर के साथ ताकत के गुरूर में या अंह से भरे पुरुष, महिलाओं के साथ करते रहे हैं. ‘मणिकर्णिका’ फिल्म की शूटिंग के दौरान, इसका निर्देशन कर रहे तेलुगु फिल्म निर्देशक राधा कृष्ण जगरलामुड़ी (कृष) से विवाद को लेकर कंगना चर्चाओं में थीं. एक साक्षात्कार में कृष ने उलटबांसी सी यह बात बताई थी कि जब उन्होंने कंगना के कुछ सुझाव मानने से इनकार कर दिया तो उन्हें फिल्म से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. बॉलीवुड में राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता तेलुगु निर्देशक की बजाय सुपर स्टार अभिनेत्री का वजन अधिक होना स्वाभाविक था. लेकिन आप अगर अपनी ताकत का इस्तेमाल सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि आप ऐसा कर सकते हैं तो फिर आप में और दूसरों में अंतर ही क्या है!

इसी फिल्म के लिए सोनू सूद की भूमिका की लंबाई और शूट डेट्स को लेकर भी विवाद हुआ था जिसके बाद उन्हें भी फिल्म से बाहर कर दिया गया. इसके बाद कंगना ने सोनू सूद पर आरोप लगाया था कि वे एक महिला निर्देशक के साथ काम नहीं करना चाहते थे. इसके बचाव में सूद का कहना था कि वे पहले ही फराह खान के निर्देशन में ‘हैप्पी न्यू इयर’ कर चुके हैं इसलिए इस आरोप का कोई सवाल ही नहीं उठता है. इस फिल्म का हिस्सा रहीं बांग्ला अभिनेत्री मिष्टी चक्रबोर्ती ने भी कंगना रनोट द्वारा उनका रोल काटे जाने की बात कही थी. कुल मिलाकर, सिर्फ एक फिल्म से जुड़े ये उदाहरण ही यह बताने के लिए काफी हैं कि उन्होंने अपने से कमतर नामों के साथ वही व्यवहार किया है जिसकी शिकायत वे कथित बॉलीवुड बिगीज़ को लेकर करती रही हैं.

कंगना रनोट अक्सर ही कहती रहती हैं, उन्होंने जो फिल्में बनाई उसके लिए उन्हें किसी ने नहीं सपोर्ट किया या उनकी तारीफ नहीं की. हालांकि सेल्फमेड कंगना अब उस कद को पा चुकी हैं जहां उन्हें अब किसी के सपोर्ट या वैलिडेशन की ज़रूरत शायद ही है. लेकिन फिल्म उद्योग में अभी अनगिनत ऐसे लोग हैं जिन्हें कंगना जैसों के सपोर्ट की ज़रूरत है. यहां पर पूछा जा सकता है कि उन्होंने कितने स्ट्रगलिंग एक्टर्स की मदद कर दी है. अगर ऐसा उदाहरण खोजें तो केवल अंकिता लोखंडे का नाम याद आता है जो कि पहले से टीवी के सबसे बड़े सितारों में से एक हैं. कंगना की फिल्म ‘मणिकर्णिका’ में वे झलकारी बाई जैसा महत्वपूर्ण किरदार निभाते हुए नज़र आईं. लेकिन इसमें उन्हें सिर्फ इतना ही स्क्रीन स्पेस मिल सका कि वे एक आइटम सॉन्ग-नुमा गाने पर थोड़ी कमर भर लचका सकें. ऐसा तब हुआ, जब झलकारी बाई का किरदार हमेशा लक्ष्मीबाई से जुड़ी कहानियों का अहम हिस्सा रहा है.

बॉलीवुड के कई स्थापित नाम जैसे – इरफान खान, शाहिद कपूर, सोनू सूद से लेकर फिल्मकार आनंद एल राय तक, खुले या छिपे शब्दों में कंगना के साथ काम करने में असहजता की शिकायत कर चुके हैं. हाल ही में निर्माता-निर्देशक अनुराग कश्यप ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके प्रोडक्शन हाउस की फिल्म ‘सांड की आंख’ कंगना रनोट को ऑफर की गई थी. कश्यप के मुताबिक, इस पर कंगना का कहना था कि फिल्म में दो हीरोइन्स की जरूरत क्यों है, दोनों किरदारों को मिलाकर एक कर दिया जाए तो वे यह फिल्म कर लेंगी. यह फिल्म एक खालिस पुरुषसत्तात्मक समाज में तमाम संघर्षों के बावजूद साठ साल की दो महिलाओं – चन्द्रो तोमर और प्रकाशी तोमर – के चैंपियन निशानेबाज़ बनने की कहानी कहती है. लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में भेदभाव के खिलाफ खड़ीं कंगना उन महिलाओं के संघर्ष को शायद इतना महत्वपूर्ण नहीं मानतीं कि उन पर एक ईमानदार फिल्म बनाई जा सके. उन्हें शायद इस बात से ही मतलब है कि वे खुद किसी फिल्म में क्या करना चाहती हैं! इसके अलावा, अपनी ही तरह बाहर से आने वाली तापसी पन्नू, स्वरा भास्कर जैसी कुछ अभिनेत्रियों के लिए सार्वजनिक तौर पर उनका जो रवैया दिखता है, वह भी काफी हद तक उनके आत्मकेंद्रित व्यवहार का थोड़ा अंदाज़ा देता है.

यह सही है कि दस में से आठ मौकों पर कंगना रनोट जो भी कहती हैं, उससे यही पता चलता है कि वे बहुत हिम्मती हैं. लेकिन उनसे जुड़े कई ऐसे उदाहरण भी हैं जो बताते हैं कि कई बार कंगना की हिम्मत भी मौका देखकर ही अपना काम करती है. उदाहरण के लिए मीटू कैंपेन के दौरान उन्होंने ‘क्वीन’ के निर्देशक विकास बहल पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया था. उनका कहना था कि बहल उनसे गलत तरीके से गले मिलते थे और अक्सर यह कहते हुए उनके बालों को सूंघा करते थे कि उन्हें कंगना की खुशबू अच्छी लगती है. ध्यान खींचने वाली बात यह है कि कंगना का यह बयान तब सामने आया था जब विकास बहल की किसी क्रू-मेंबर ने उन पर यौन शोषण के आरोप लगाए थे.

यहां पर इस बात का आश्चर्य होता है कि कंगना रनोट को यह बताने के लिए मीटू जैसे किसी आंदोलन की ज़रूरत कैसे पड़ गई? क्योंकि क्वीन तक पहुंचने से पहले ही वे बॉलीवुड में न सिर्फ अच्छा-खासा कद हासिल कर चुकी थीं, बल्कि अपनी हिम्मत और साफगोई की धाक भी जमा चुकी थीं. ऐसे में अगर वे ठीक उसी समय बहल से निपट लेतीं तो न सिर्फ सेक्सिज्म से लड़ाई के लिए लड़कियों की प्रेरणा बन जातीं बल्कि यह भी हो सकता था कि मीटू आंदोलन भारत से ही शुरू हो गया होता. लेकिन, मौके पर न बोलने के बाद कंगना तब भी कुछ बोलती नहीं दिखाईं दीं जब यह मामला बिना किसी कार्रवाई के रफा-दफा कर दिया गया.

इस घटना के साथ-साथ कंगना की हर फिल्म की रिलीज के पहले विवाद खड़ा हो जाना भी उनके बारे में कुछ तो बताता ही है. उनकी पिछली तीन-चार फिल्मों के पहले खड़े होने वाले विवादों पर गौर करें तो ‘सिमरन’ के समय वे ऋतिक रोशन पर लगाए गए आरोपों को लेकर चर्चा में थीं, तो ‘मणिकर्णिका’ की रिलीज से पहले ‘मणिकर्णिका’ और ‘सिमरन’ में अपने वर्क क्रेडिट से जुड़े विवाद को लेकर. इसके बाद ‘जजमेंटल है क्या’ की बारी आने पर वे उन पत्रकारों से उलझ बैठी थीं जिन्होंने अपने लेखों और सोशल मीडिया में ‘मणिकर्णिका’ की आलोचना की थी. वहीं, उनकी अंतिम रिलीज ‘पंगा’ के समय जेएनयू और जामिया मिलिया इस्लामिया में छात्रों पर हमले हो रहे थे और वे इस पर आपत्ति जताने वाले लिबरल लोगों या फिल्मी हस्तियों पर अपना गुस्सा निकालकर सुर्खियां बटोर रहीं थीं.

इन सबके अलावा, जिस नेपोटिज्म को लेकर कंगना रनोट लगभग हर आठवें दिन शोर मचाती हैं, क्या वे खुद इससे उतनी ही दूर हैं जितनी दिखाई देती हैं? उनकी बहन रंगोली चंदेल जहां उनकी मैनेजर हैं और सोशल मीडिया पर हमेशा उनके प्रवक्ता की भूमिका में नज़र आती रहती हैं. वहीं, उनके भाई अक्षत चंदेल उनकी प्रोडक्शन कंपनी का कामकाज संभालते हैं. इसी साल जनवरी में लॉन्च हुई उनकी प्रोडक्शन कंपनी ‘मणिकर्णिका फिल्म्स’ में कंगना निर्माता, निर्देशक की जिम्मेदारी संभालती हैं तो अक्षत इसके वित्तीय और कानूनी मामलों की देख-रेख करते हैं. जब इसे लेकर कंगना पर भी भाई-भतीजावाद करने का आरोप लगा तो उनके बचाव के लिए उनकी बहन ही सामने आईं थी. रंगोली चंदेल ने ट्विटर पर कहा कि ‘कंगना एक स्थापित अभिनेत्री भले ही हों लेकिन बतौर प्रोड्यूसर वे एकदम शुरू से शुरूआत कर रही हैं. हां, अक्षत अगर सफल होते हैं तो उन्हें नेपो-प्रोडक्ट कहा जाना चाहिए और इसके लिए उन्हें एक फेयर चांस दिया जाना चाहिए.’ इस पर यह सवाल किया जा सकता है कि जिस फेयर चांस की बात रंगोली यहां पर करती हैं, वह बाकी सितारों के रिश्तेदारों को क्यों नहीं दिया जाना चाहिए? और यह भी कि कंगना खुद अपने परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति पर भरोसा नहीं करना चाहती हैं तो दुनिया से ऐसा करने की उम्मीद कैसे करती हैं?

इसके अलावा करण जौहर के ही शो में जब उनसे यह सवाल पूछा जाता है कि वे किस फिल्स स्टार का काम बार-बार देखना पसंद करेंगीं तो वे कहती हैं आलिया भट्ट. कमाल की बात यह है कि अब वे आलिया को नेपोटिज्म का प्रतीक मानकर हाथ धोकर उनके पीछे पड़ी हुई हैं और अब उनकी एक्टिंग भी उन्हें कुछ खास नहीं सुहाती है. लेकिन कुछ समय पहले वे ही इस नेपोटिज्म को बढ़ावा दे रही थीं.

और नेपोटिज्म को लेकर उनका रवैया काफी सिलेक्टिव भी दिखता है. उनकी फिल्मों ‘वंस अपॉन अ टाइम,’ ‘जजमेंटल है क्या’ समेत कई ऐसी फिल्में, जिनमें कंगना रनोट ने काम किया है, का प्रोडक्शन एकता कपूर ने किया है. एक टीवी-शो पर शिरकत के दौरान खुद कंगना रनोट ने एकता कपूर से अच्छी दोस्ती और अच्छे व्यावसायिक समीकरण होने की बात कही थी. अब इसे उनके दोहरे व्यवहार के अलावा और क्या कहा जा सकता है? एक तरफ तो उन्हें तगड़ा कॉम्पटीशन देने वाली आलिया भट्ट, टैलेंटेड लगने के बजाय नेपोटिज्म की प्रोडक्ट लगती हैं. वहीं, उसी तरह के बैकग्राउंड वाली निर्मात्री एकता कपूर से उन्हें कोई परहेज नहीं है.

कुल मिलाकर, नेपोटिज्म से लेकर दबंगई तक, हर वह बात जिसके लिए कंगना फिल्म उद्योग और फिल्मी हस्तियों की आलोचना करते नहीं थकती हैं, उन्हें वे खुद भी किसी न किसी तरीके से अपनाती हुई दिखती हैं. और जैसी वे हैं, उससे ऐसा लगता है कि आगे भी वे ऐसी ही दिखती रहने वाली हैं. और, शायद इसीलिए उन्हें यह भी याद दिलाने की ज़रूरत है कि जिस भारतीय संस्कृति की वे बात करती हैं, वह रघुकुल रीति का हवाला देते हुए वचनों का संबंध प्राणों से भी जोड़ती है.

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