समाज | महिला मुद्दे

आज भी लड़कियों के लिए शादी आज़ाद होने या गुलाम बनने का सवाल क्यों बनी हुई है?

शादियों के मौसम में सत्याग्रह ने ऐसी कई लड़कियों से बात की जिनकी शादी होने वाली है या हाल ही में हुई है. वे जो कहती हैं वह हमारे बारे में बहुत कुछ कहता है

सत्याग्रह ब्यूरो | 17 जून 2022 | फोटो: मनीषा यादव

कहते हैं, शादी मोतीचूर का लड्डू है – जो खाए, पछताए और जो न खाए, ललचाए. यह बात अक्सर पुरुषों के लिए बोली जाती है लेकिन शायद उतनी ही महिलाओं पर भी लागू होती है. साथ ही यह भी माना जाता है कि महिलाओं में इस लड्डू को खाने का लालच ज्यादा होता है. हमारे यहां लड़कियों की शादी हर परिवार का लक्ष्य होती है सो जाहिर है लड़कियां भी इसके असर से बच नहीं पाती हैं. ज्यादातर तो शादी के सपने देखते हुए ही बड़ी होती हैं. और इसलिए भी जब यह वक्त करीब आने लगता है तो उनके मन में उथल-पुथल मच जाना स्वाभाविक है. शादी की बात शुरू होने से लेकर फेरे लेने तक का समय उनके लिए कई मायनों में जिंदगी का सबसे रोमांचक समय होता है. इस दौरान वे एक साथ खुशी, जोश, उमंग, उत्साह डर और आशंका की स्थिति में होती हैं. यानी इस समय उनके मन का हाल सटीक तरह से बता पाना लगभग नामुमकिन होता है.

शादी ज्यादातर लड़कियों के लिए वह पहला मौका बनकर आता है जब वे पूरे परिवार के लिए बेहद खास बन जाती हैं. आम दिनों में जो मां-बाप लड़की पर हजार-पांच सौ रूपए खर्च करने से पहले भी सोचते हैं (इसके पीछे का कारण शादी के लिए ही बचत करना भी होता है), वे शादी के वक्त बेहिसाब खर्च करने को तैयार रहते हैं. ‘मेरे लिए शादी का मतलब सबसे पहले शॉपिंग करने का एक्साइटमेंट ही था. मैं यही सोचती थी कि मेरा लहंगा कैसा होगा और उसे पहनकर मैं कैसी दिखूंगी. इस ख़याल की खुमारी मुझे सबसे ज्यादा थी. मेरे लिये शादी का मतलब स्पेशल फील करना, खूब सजना, ब्यूटी ट्रीटमेंट लेना और बस खर्च करते जाना ही था’, हरिद्वार में रहने वाली शालिनी आर्य कहती हैं.

लहंगे की कल्पनाओं में खोई लड़कियां एक तरफ तो शादी के सच होते सपने को जी रही होती हैं, वहीं दूसरी तरफ आने वाले वक्त के लिए फिक्रमंद भी रहती हैं. रेवाड़ी की नेहा यादव जल्दी ही शादी करने जा रहीं हैं और इस बारे में बात करते हुए वे बहुत उत्साह के साथ बताती हैं, ‘मैं कैसी दिखूंगी, ब्राइडल का क्या नया ट्रेंड चल रहा है, आजकल हर वक्त मेरे दिमाग में यही चलता रहता है. लेकिन सेम टाइम पर कुछ डर भी सताते रहते हैं. जैसे सेक्स को लेकर दिमाग में एक तनाव रहता है कि क्या होगा, कैसे होगा, हसबैंड कितना कोऑपरेटिव होगा? इस चीज को लेकर जैसी समझदारी वाली बातें करता है, क्या सच में उतना ही मैच्योर होगा भी या नहीं.’ नेहा की तरह लहंगा और सेक्स शादी से पहले लड़कियों के दिमाग में बने रहने वाले दो सबसे जरूरी मुद्दे हैं, चाहे वे इसे स्वीकार करें या नहीं.

बहुत सी लड़कियों को शादी एक अलादीन के चिराग की तरह लगती है. इससे पहले तक मां-बाप इसी चिराग के सहारे उन्हें उनके सारे अरमान पूरे होने का भरोसा दिलाते रहते हैं – शादी के वक्त खरीद लेना, शादी के बाद घूम लेना, ससुराल में जाकर कर लेना, अपने घर में जो चाहे करना, अपने पति से करवा लेना या पति कर देगा. बस तब तक उन्हें इंतजार करना है. कई बार तो लड़कियों को फिल्म देखने, घर के बाहर खुलकर जाने जैसी छोटी-छोटी आजादी भी सिर्फ शादी के बाद ही मिल पाती है.

इसे एक आंकड़े से भी समझा जा सकता है. हमारे देश में जहां सिर्फ 38 फीसदी महिलाओं के पास ही मोबाइल फोन हैं वहीं पुरुषों के मामले में यह आंकड़ा 70 फीसदी से ऊपर है. इसके अलावा भारत में 15-18 साल की करीब 40 फीसदी लड़कियों को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ती है. ‘इसके बाद ऐसी ज्यादातर लड़कियों को शादी होने तक बस घर के काम ही करना होता है. ऐसे में अगर उन्हें शादी आजादी की सांस लेने के मौके की तरह लगे तो उसमें गलत क्या है!’ इंदौर में महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाली इंदु जायसवाल कहती हैं कि आज भी देश की ज्यादातर लड़कियों के लिए मन की पढ़ाई करना संभव नहीं है, जिनके लिए संभव है वे अपने मन के शिक्षा संस्थानों और शहरों में जाकर ऐसा नहीं कर सकती हैं. इन लड़कियों के लिए पढ़ाई सिर्फ शादी होने तक समय गुजारने का जरिया होती है.

गोरखपुर की किट्टू पाठक इस बात का उदाहरण हैं. ‘मेरे लिए शादी अपने घर की जेल से मुक्ति का मौका था. अपनी शादी के समय मैं सिर्फ यही सोचती थी कि काश मेरा पति मुझे मेरी तरह जीने, खाने, पहनने, पढ़ने, दोस्तों से मिलने दे. अपने मनचाहे रूटीन को जी सकूं, ज्यादा सो सकूं, ज्यादा फिल्में देख सकूं … और ये भी मेरे दिमाग में हमेशा रहा कि मेरा पति मुझे इंपोर्टेंस दे. मायके में हमेशा मैं एक गैरजरूरी इंसान की तरह ही जी. मेरे ऊपर हर चीज की पाबंदी थी. सो शादी मेरे लिए एक बहुत बड़ा मौका था इन सबसे निकलने का’ अपनी शादी से पहले की मनोस्थिति के बारे में किट्टू बताती हैं.

किट्टू के अलावा कुछ और लड़कियों की बातों से यह भी निकल कर आता है कि शादी हिंदुस्तानी समाज में कुछ लड़कियों को आजादी छिनने जैसी लगती है तो कुछ को आजादी मिलने जैसी. या फिर यह भी कह सकते हैं कि यह एक तरह की आजादी छीनती है तो कई मामलों में कुछ लड़कियों को अपनी मर्जी के काम करने के मौके भी दे देती है. हालांकि किट्टू पाठक की तरह ज्यादातर लड़कियां यह भी जानती हैं कि ये मौके काफी हद तक उनके पति की समझ और इच्छा पर निर्भर करते हैं. और अगर वह एक संयुक्त परिवार में जा रही है तो मामला फिर काफी जटिल हो जाता है.

मशहूर लेखक सलमान रश्दी ने चार शादियां की थीं. साल 2008 में एल मैगज़ीन को दिए एक साक्षात्कार में उनका कहना था, ‘ज़्यादातर लड़कियों को शादी करना अच्छा लगता है, खास कर तब जब उन्होंने पहले कभी शादी नहीं की हो, लेकिन उन्हें बस वैडिंग ड्रेस का शौक होता है. दरअसल उन्हें वैडिंग चाहिए होती है, मैरिज नहीं. काश ऐसा हो पाता कि आप वैडिंग तो कर पाते मगर उसके बाद मैरिज ज़रूरी नहीं होती.’ रश्दी की बात पर न भी जाएं और अपने आस-पास की लड़कियों पर गौर करें तो हम पाएंगे कि ज्यादातर लड़कियां शादी के लिए सिर्फ सज-धजकर तैयार हो पाती हैं, मानसिक स्तर पर नहीं!

बाज़ार और हमारे समाज के पुरुषसत्तात्मक ढांचे को पोसने वाली परंपराओं ने लड़कियों को लहंगे और गहनों के सपने देखना तो सिखा दिया, लेकिन उन्हें शादी के बाद ज़िंदगी में आने वाले बदलावों से ठीक तरह से निपटने के लिए तैयार करने का जिम्मा किसी ने नहीं उठाया. इसके उलट लड़कियों को तो यह बताया जाता है कि अब उसकी सारी जिम्मेदारी उसके पति पर है. वे युवा होने तक जो भी करती हैं वह एक तरह से शादी करने की तैयारी की तरह ही होता है. लेकिन यह उन्हें शादी के बाद की परिस्थितियों के लिए भी सही मायने में तैयार करे ऐसा कम ही होता है. सिखाया सिर्फ यह जाता है कि पति के घर पर जाकर क्या करे ताकि उसे वहां रहने में ज्यादा परेशानी न हो. यहां ध्यान देने वाली एक बात यह भी है कि लडकियों के लिए शादी न करना कोई विकल्प ही नहीं है. वे ‘पराया धन’ और ‘घर की इज्ज़त’ होती हैं और उन्हें इन्हीं दोनों बातों को ध्यान में रखते हुए पाला-पोसा-पढ़ाया-सिखाया जाता है. उसे एक जिम्मेदारी की तरह ऐसे पाला जाता है जो खानदान की तथाकथित नाक न कटने दे.

बदलते वक्त में, जब लड़कियां अपनी प्राथमिकताएं खुद तय करने लगी हैं, अपने पैरों पर खड़ी होने लगी हैं, तब भी उनके लिए शादी करने का मतलब वे समझौते करने के लिए खुद को तैयार करना हो सकता है जिनसे बचने के लिए उन्हें शायद कभी बहुत जद्दोजहद करनी पड़ी होगी. हाथरस की विनीता शर्मा, सीनियर इंजीनियर की पोस्ट पर काम करती हैं और उम्र में 33 का आंकड़ा पार कर चुकी हैं. वे बताती हैं कि ‘मैं तीन बहनों में सबसे बड़ी हूं और मेरी दोनों छोटी बहनों की शादी हो चुकी है. मैंने उन्हें शादी की शॉपिंग के लिए खुश होते हुए देखा. फिर उन्हें डरते हुए भी देखा कि नए परिवार में जाने के बाद उनकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल जाएगी. लेकिन इस तरह के डर सजने-संवरने और शॉपिंग के सपनों के नीचे दब कर रह जाते हैं.’ खुद के बारे में विनीता शर्मा कहती हैं, ‘मैं जब शादी के बारे में सोचती हूं तो बस यही सोचती हूं कि जिसके साथ शादी हो उसके साथ ठीक-ठाक कंपैटिबिलिटी हो. शादी से पहले हम एक दूसरे के साथ कम से कम इतनी बातचीत कर लें कि एक-दूसरे के बारे में थोड़ी समझ में बन सके. मैं यह समझ सकूं कि किसी व्यक्ति से शादी करने के बाद आज की मेरी जिंदगी में कितने बदलाव आ सकते हैं.’ विनीता मानती हैं कि लड़कियों को शादी से पहले खुद को अपनी नई ज़िंदगी के लिए तैयार करने के बारे में सबसे पहले सोचना चाहिए.

विनीता का कहना सही है. शादी के बाद की जिंदगी की तैयारी के लिए आपसी समझ बनना जरूरी है. मगर कई बार शादी से पहले ऐसी समझ बनाने की कोशिश कुछ नए डर पैदा होने की वजह बन जाती है. उत्तर प्रदेश के कासगंज की रहने वाली रीना गुप्ता की शादी तय हुए तीन महीने बीत चुके हैं और उनकी अक्सर अपने मंगेतर से बात होती है. बहुत कुरेदने पर रीना बताती हैं कि उन्हें लगता है कि उनके होने वाले पति काफी कंज़र्वेटिव सोच के हैं और अक्सर यह जानने की कोशिश में लगे रहते हैं कि शादी से पहले उनकी किसी लड़के से ज़्यादा दोस्ती तो नहीं रही. ऐसे में रीना असहज हो जाती हैं. वे कहती हैं, ‘वर्जिनिटी हमारी सोसाइटी का बहुत बड़ा सवाल है. ज़्यादातर लड़कों को ऐसी लड़की चाहिए जिसने उनसे पहले किसी लड़के को नज़र उठाकर भी न देखा हो. कुछ लोग तो आपको समझने की कोशिश करते हैं मगर कुछ लोग अपनी सोच से आगे नहीं बढ़ पाते. अगर सामने वाले को आप पर शक है तो आप कैसे उसे यकीन दिलाओगे?’

रीना की स्थिति में लड़कियों के मन का चैन और गायब हो जाता है. ऐसे में वे शादी को एंजॉय करने के बजाय इसी सोच में पड़ी रह जाती हैं कि किस तरह से पति के सामने अपनी सही तस्वीर रख पाएंगी. इसकी वजह यह भी है कि शादी से पीछे हटने का विकल्प मध्यम या छोटे शहरों की ज्यादातर लड़कियों के पास नहीं होता है.

शादी (अरेंज मैरिज) तय होने के बाद उसमें लव की गुंजाइश तलाशने वाली लड़कियां कई बार रीना की तरह अपने मंगेतर को हुई गलतफहमियों या उसके पूर्वाग्रहों की शिकार हो जाती हैं. उनके लिए यह स्थिति कई बार बेहद अपमानजनक और त्रासद हो जाती है. इस दौरान हममें से ज्यादातर कुछ न कर पाने की मजबूरी से भर जाती हैं. हालांकि इसका उल्टा होने पर भी ऐसा नहीं है कि हमारे सारे डर दूर ही रहें. अपने लव को अरेंज मैरिज में बदलने जा रही स्वाति श्रीवास्तव कहती हैं, ‘मैं आजकल सोचती हूं कि मेरी आगे की लाइफ कैसी होगी. जितनी आज है उतनी आजादी मिलेगी या नहीं. नया परिवार मुझे आसानी से अपना लेगा या मशक्कत करनी पड़ेगी.’ स्वाति को लगता है कि लव मैरिज के कारण रिश्तेदारों का रवैया उनके प्रति ज्यादा आलोचनात्मक हो सकता है इसलिए वे इन दिनों मानसिक रूप से अपने आपको भाभी-चाची-बहू कहलवाने की तैयारी भी कर रही हैं और इन संबोधनों के साथ आने वाली जिम्मेदारियों की भी.

स्वाति की इन बातों को मन का वहम कहकर टाला जा सकता है लेकिन लव मैरिज करने वाली दुल्हनों को होने वाली कई चिंताएं बाकियों से कहीं अलग, ज्यादा जमीनी और जरूरी हो सकती हैं. जैसे-जैसे लड़कियां अपने फैसले खुद ले रही हैं उनकी समस्यायों का स्वरूप भी बदलने लगा है. दिल्ली में रह रही मीडिया प्रोफेशनल मौलश्री कुलकर्णी की शादी को थोड़ा ही वक्त बीता है. वे बताती हैं कि उनकी शादी लव मैरिज थी. उन दिनों इस बात की खुशी सबसे ज्यादा थी कि शादी के बाद दोनों साथ रह सकते हैं मगर उनकी चिंताएं आम लड़कियों से अलग थीं.

मौलश्री कहती हैं, ‘हम शादी से पहले लंबे समय तक दोस्त और फिर प्रेमी थे, इसलिए अनजाने का कोई डर रहा हो ऐसा नहीं था. लेकिन हमारी गृहस्थी की शुरूआत हमें खुद करनी थी. भारी-भरकम दहेज या महंगे गिफ्ट्स का कोई सीन ही नहीं था. उन दिनों फाइनेंस को लेकर थोड़ी इन्स्टैबिलिटी थी. इसलिए मैं शादी के पहले इन्हीं चिंताओं में रहती थी कि कैसे होगा, क्या लोन लेना पड़ेगा या कुछ और करना पड़ेगा.’ शादी के पहले की चिंताओं में इन बातों का शामिल होना एक सकारात्मक बदलाव कहा जा सकता है. आजादी का सवाल भी मौलश्री के सामने एक नए तरीके से आता है, जवाब में वे एक मिनट सोचती हैं और कहती हैं, ‘वैसे तो मुझे पता था कि सब ठीक होगा पर फिर भी मुझे लगता था कि फ्रेंड्स के साथ टाइम बिताने के लिए मिलेगा या नहीं.’

मध्य प्रदेश के बेहद छोटे से कस्बे मऊगंज से आने वाली आरती सोनी की बातें भी एकदम अलग हैं. लंबे समय से परिवार की जिम्मेदारियां उठा रहीं आरती को शादी तय होने के बाद से इस बात की चिंता ज्यादा है कि उनके जाने के बाद उनका परिवार बिना किसी दिक्कत सब-कुछ कैसे मैनेज कर पाएगा. इस चिंता के बावजूद शादी उनके लिए एक नई तरह का अवसर लेकर आई है. यह गोरखपुर की किट्टू पाठक की आजादी वाली अवधारणा से बिलकुल अलग है. आरती सोनी शादी को खुद की जिंदगी दोबारा शुरू करने के लिए आए एक मौके की तरह देखती हैं. वे कहती हैं, ‘परिवार की जिम्मेदारियां उठाते हुए मैंने सबका ख्याल रखा, सिवाय अपने. शादी तय होते ही सब मेरा ख्याल रखने लगे तो मुझे भी अपना होश आया. मुझे लगता है कि मुझे अपने नए परिवार से बस एक इसी चीज की उम्मीद रहेगी.’ यहां पर आरती इस बात को स्वीकार करती हैं कि उनकी जिंदगी में रोमांस आ जाने से ही उन्हें बहुत सारी नई चीजों को देखने-महसूस करने की इच्छा होने लगी है. इसलिए वे तमाम चिंताओं के बावजूद आजकल ज्यादा खुश महसूस करती हैं.

कुल मिलाकर शादी के पहले हर लड़की अपने कपड़ों और लुक्स के बारे में सबसे पहले और सबसे ज्यादा सोचती है. इसके बाद बारी आती है रोमांस, साथ, हनीमून और सेक्स की. इनके बारे में सोचना ही उन्हें अलग सी झुरझुरी महसूस करवाता है और इसके सहारे ही वे आने वाले रोमांचक और खूबसूरत जीवन के सपने बुनती हैं. तीसरे नंबर पर डर की बारी आती है जब वे आजादी छिन जाने से डरती हैं, सास और बाकी लोगों के साथ पटरी बैठाने की मशक्कतों के बारे में सोचती हैं, साथ ही नई जगह पर जॉब के विकल्प और मां-बाप की चिंता भी करती जाती हैं. इसमें सबसे दिलचस्प बात यह है कि इन सब तनावों और डरों के साथ, वे कुछ दिनों के लिए घर में सबसे ज्यादा खास हो जाने का सुख चुपचाप लूटती हैं. हालांकि इस वक्त भी वे हमेशा की तरह अपनों के बारे में सोचना नहीं छोड़ती हैं.

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