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एक संपादक के रूप में महात्मा गांधी प्रेस और सरकार की निरंकुशता को किस तरह देखते थे?

महात्मा गांधी का मानना था कि कलम की निरंकुशता खतरनाक हो सकती है, लेकिन उस पर व्यवस्था का अंकुश ज्यादा खतरनाक है

अव्यक्त | 01 सितंबर 2020 | फोटो: पिक्साबे

महात्मा गांधी ने अपनी पहली और सबसे महत्वपूर्ण किताब ‘हिंद स्वराज’ संपादक और पाठक के बीच सवाल-जवाब के रूप में लिखी थी. इस किताब को पढ़ने से पता चलता है कि इसमें पाठक की भूमिका वाले गांधी ने संपादक की भूमिका वाले गांधी से कैसे-कैसे प्रश्न-प्रतिप्रश्न किस अक्खड़ता से पूछे हैं. आत्मसंवाद के जरिए संसार से संवाद करने का यह तरीका भले ही उनके शब्दों में उन्होंने केवल लेखकीय ‘सुभीते’ की वजह से अपनाया हो, लेकिन अपने साप्ताहिक अखबार इण्डियन ओपीनियन की संपादकीय जिम्मेदारियों ने उन्हें ऐसे सवाल-जवाब का अभ्यस्त बना दिया था. बाद में भी, न केवल इण्डियन ओपीनियन, बल्कि हरिजन, यंग इंडिया, दैनिक नवजीवन और हरिजनसेवक जैसे पत्रों के माध्यम से पाठकों के कटु से कटु सवालों का सहजता से जवाब देना उन्होंने नियमित रूप से जारी रखा था. साथ ही, प्रेस की स्वतंत्रता जैसे प्रश्नों पर भी उन्होंने खुलकर अपने विचार रखे थे.

दक्षिण अफ्रीका के अपने अख़बारी दिनों को याद करते हुए महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है – ‘समाचार-पत्र सेवाभाव से ही चलाने चाहिए. समाचार-पत्र एक जबर्दस्त शक्ति है; लेकिन जिस प्रकार निरंकुश पानी का प्रवाह गांव के गांव डुबो देता है और फसल को नष्ट कर देता है, उसी प्रकार निरंकुश कलम का प्रवाह भी नाश की सृष्टि करता है. लेकिन यदि ऐसा अंकुश बाहर से आता है, तो वह निरंकुशता से भी अधिक विषैला सिद्ध होता है. अंकुश अंदर का ही लाभदायक हो सकता है.’

लेकिन विडंबना है कि आज़ाद भारत में संसदीय लोकतंत्र और तमाम संवैधानिक आश्वासनों के बाद भी हम घूम-फिर कर एक बार फिर से आज उसी सवाल के साथ खड़े हैं कि प्रेस या आज के स्वरूप में मीडिया यदि सवाल नहीं पूछेगा, तो आखिर करेगा क्या? और लोकतांत्रिक व्यवस्था चूंकि जवाबदारी की बुनियाद पर ही खड़ी है, इसलिए शासन और सरकार यदि जवाब नहीं देगी, तो फिर करेगी क्या? लेकिन फिर सवाल यह भी है प्रेस और शासन इन दोनों की वैधता का स्रोत क्या है या कौन है? और यह भी कि इनमें से किसी एक के द्वारा दूसरे से किए गए सवालों की वैधता का स्रोत क्या है?

मोटे तौर पर हम मानकर चलते हैं कि शासन के प्रतिनिधियों को चूंकि जनता ने स्वयं अपने लिए चुन कर भेजा है, इसलिए जनता को सवाल पूछने का अधिकार है. और जब जनता के पास सवाल पूछने के औपचारिक और प्रत्यक्ष साधनों और मंचों का अभाव हो या ऐसा लगातार कर पाना अव्यावहारिक हो, तो प्रेस ही इसका स्वाभाविक माध्यम बन जाता है. और प्रेस घटनाओं और सूचनाओं के अलावा दोनों ही पक्षों, यानी जनता और शासन के बीच के सवालों और जवाबों के घर्षण से पैदा हुए विचारों को प्रसारित करने का भी एक स्वाभाविक दावेदार बन जाता है.

लेकिन चूंकि एक ही जनता प्रेस और सरकार दोनों की वैधता का स्रोत है, इसलिए इस द्वंद्व का समाधान हमें केवल प्रतिनिधिक लोकतंत्र के सिद्धांतों के दायरे में नहीं मिल पाता. तभी तो दुनियाभर के मानवतावादियों ने दार्शनिक चिंतन से लेकर संवैधानिक प्रारूपों तक में इसे अभिव्यक्ति या बोलने और लिखने के नैसर्गिक या प्राकृतिक अधिकारों से जोड़ कर देखा. इसलिए जब भी कोई शासन-व्यवस्था या सरकार प्रेस को प्रतिबंधित और दंडित किए जाने को राष्ट्रहित, सुरक्षा, संवेदनशील या गोपनीय सूचना या अराजकता फैलाने के संदेहास्पद प्रसंगों से जोड़ने का प्रयास करे, तो जनता को चाहिए कि वह पूरी तरह से प्रेस यानी बोलने और लिखने की आजादी के साथ खड़ी हो जाए.

अभी तो स्थिति यह है कि प्रेस के साथ कम से कम प्रेस बिरादरी ही एकजुट होकर खड़ी हो जाए तो हम गद्गद् होकर इस सीमित सामुदायिक एकजुटता की सराहना करने लग जाते हैं. लेकिन समूची जनता के लोकप्रिय समर्थन की उम्मीद पाले प्रेस के लिए जरूरी है कि एक सवाल वह स्वयं से भी लगातार पूछता रहे. वह यह कि जनता जिस तरह अपने प्रतिनिधियों से लगातार सवाल पूछते रहने की अधिकारी है, क्या वही अधिकार प्रेस ने अपने प्रति भी संस्थागत रूप से जनता को दे रखा है? और यदि हां, तो फिर इस जवाबदेही का कौन सा पारदर्शी ढांचा प्रेस ने अपने लिए बनाकर रखा है? संपादकों और प्रसारकों के अपने संघ अस्तित्व में हैं, लेकिन वे प्रभावी उपकरण साबित नहीं हो पाए लगते हैं. याद नहीं पड़ता कि आज़ादी के बाद किस अख़बार या टीवी मीडिया के मालिक या संपादक ने स्वयं अपने लिए यह व्यवस्था रखी हो, जिसमें कम से कम चयनित/प्रतिनिधि पाठकों के जरूरी और कठिन वैचारिक सवालों का नियमित जवाब वह किसी स्थायी स्तंभ या कार्यक्रम के जरिए देते हों. रेडियो में इस तरह के कुछ सराहनीय प्रयोग अवश्य हुए, लेकिन वह भी उस दर्जे का न नहीं कहा जा सकता.

हमारे संपादकीय में भी पाठकों से परस्पर संवाद करने की शैली और स्थान का अभाव होता गया है. उन्होंने स्वयं को सूचना, ज्ञान और विचार का एकतरफा, आधिकारिक और प्रामाणिक स्रोत समझ लिया लगता है. हमारे समय के संपादकों और प्रसारकों को शायद गांधी जैसे संपादकों की विनम्रता से सीखने की जरूरत है. अपने अख़बार ‘इण्डियन ओपीनियन’ के बारे में वे अपनी आत्मकथा में लिखते हैं- ‘इस अख़बार के द्वारा मुझे मनुष्य के रंग-बिरंगे स्वभाव का बहुत ज्ञान मिला. संपादक और ग्राहक के बीच का निकट का और स्वच्छ संबंध स्थापित करने की ही धारणा होने से मेरे पास हृदय खोलकर रख देने वाले पत्रों का ढ़ेर लग जाता था. उसमें तीखे, कड़वे, मीठे, यों भांति-भांति के पत्र मेरे नाम आते थे. उन्हें पढ़ना, उनपर विचार करना, उनमें से विचारों का सार लेकर उत्तर देना- यह सब मेरे लिए शिक्षा का उत्तम साधन बन गया था. मुझे ऐसा अनुभव हुआ मानो इसके द्वारा मैं समाज में चल रही चर्चाओं और विचारों को सुन रहा होऊं.’

वास्तव में, अख़बार, टीवी या वेब मीडिया की रीडरशिप और व्यूअरशिप उसकी लोकप्रियता का पैमाना उतनी नहीं हो सकती, जितनी कि उसका अपने पाठकों से वैचारिक आदान-प्रदान का स्वस्थ और आत्मीय संबंध. आज ‘संपादक के नाम चिट्ठी’ जैसे अनिवार्य स्तंभों का स्वरूप बदल गया है. उसकी गुणवत्ता और महत्ता के साथ-साथ संपादकीय पृष्ठ में उसे मिलनेवाला स्थान भी सिकुड़ता गया है. हालांकि ज्यादातर वेबसाइट पर हर खबर, आलेख और रिपोर्ट पर कमेंट या टिप्पणी देने की सुविधा हो गई है. लेकिन यदि इन कमेंट को मॉडरेट न किया जाए, तो कितनी अश्लील और अराजक स्थिति बन सकती है, उसका अंदाजा आज कई संपादकों को हो चला है. अख़बार, पोर्टल और चैनल से लेकर व्यक्तिगत रूप से संपादक तक सोशल मीडिया पर अपने पाठकों से संवाद कर रहे हैं, लेकिन वहां भी हर बहस पर राजनीतिक दलबंदी हावी हो जाती है और मूल विमर्श भटक जाता है.

तो ऐसी स्थिति में आखिर संपादक करें क्या? गांधी ने उस समय के अपने अनुभवों के आधार पर इसका समाधान देते हुए कहा था- ‘…(अपने अख़बार) में मैंने एक भी शब्द बिना विचारे, बिना तौले लिखा हो या किसी को केवल खुश करने के लिए लिखा हो अथवा जान-बूझकर अतिशयोक्ति की हो, ऐसा मुझे याद नहीं पड़ता. मेरे लिए यह अख़बार संयम की तालीम सिद्ध हुआ था. ….मैं संपादक के दायित्व को भली-भांति समझने लगा और मुझे समाज के लोगों पर जो प्रभुत्व प्राप्त हुआ, उसके कारण भविष्य में होनेवाली लड़ाई संभव हो सकी, वह सुशोभित हुई और उसे शक्ति प्राप्त हुई.’

एक समाज के तौर पर मनुष्य ने अपने अनुभवों से सीखा है कि बोलने और लिखने जैसी नैसर्गिक आज़ादी का भी हमने आत्मघाती होने की हद तक दुरूपयोग किया है. तरह-तरह के छद्म और प्रकट मुखपत्रों के जरिए अफवाह, सांप्रदायिक वैमनस्यता और हिंसा तक फैलाने के कार्य होने लगते हैं. ऐसे अपवादजन्य और अवांछित दुरुपयोगों को रोकने के लिए संविधान-निर्माताओं ने अपरिहार्य परिस्थितियों में ही इसके लिए विवेकपूर्ण मर्यादाएं भी तय की थीं. लेकिन ये मर्यादाएं इसलिए नहीं तय की गईं थीं कि शासन-व्यवस्था या सरकारें ही ऐसे प्रतिबंधों का दुरुपयोग करने लग जाएं. तो फिर ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए हम क्या करें?

इसी प्रश्न पर 28 मई, 1931 को ‘यंग इंडिया’ में महात्मा गांधी ने ‘विषैली पत्रकारिता’ शीर्षक से की गई एक टिप्पणी में लिखा- ‘अख़बारों की नफरत पैदा करनेवाली बातों से भरी हुई कुछ कतरनें मेरे सामने पड़ी हैं. इनमें सांप्रदायिक उत्तेजना, सफेद झूठ और खून-खराबे के लिए उकसानेवाली राजनीतिक हिंसा के लिए प्रेरित करनेवाली बातें हैं. निस्संदेह सरकार के लिए मुकदमे चलाना या दमनकारी अध्यादेश जारी करना बिल्कुल आसान है. पर ये उपाय क्षणिक सफलता के सिवाय अपने लक्ष्य में विफल ही रहते हैं; और ऐसे लेखकों का हृदय-परिवर्तन तो कतई नहीं करते, क्योंकि जब उनके हाथ में अख़बार जैसा प्रकट माध्यम नहीं रह जाता, तो वे अक्सर गुप्त रूप से प्रचार का सहारा लेते हैं.’

उन्होंने आगे लिखा- ‘इसका वास्तविक इलाज तो वह स्वस्थ लोकमत है, जो विषैले समाचार-पत्रों को प्रश्रय देने से इनकार करता है. हमारे यहां पत्रकार संघ है. वह एक ऐसा विभाग क्यों न खोले, जिसका काम विभिन्न समाचार-पत्रों को देखना और आपत्तिजनक लेख मिलनेपर उन पत्रों के संपादकों का ध्यान उस ओर दिलाना हो? दोषी समाचार-पत्रों के साथ संपर्क स्थापित करना और जहां ऐसे संपर्क से इच्छित सुधार न हो, वहां उन आपत्तिजनक लेखों की प्रकट आलोचना करना ही इस विभाग का काम होगा. अख़बारों की स्वतंत्रता एक बहुमूल्य अधिकार है और कोई भी देश इस अधिकार को छोड़ नहीं सकता. लेकिन यदि इस अधिकार के दुरुपयोग को रोकने की कोई सख्त कानूनी व्यवस्था न हो, केवल बहुत नरम किस्म की कानूनी व्यवस्था हो, जैसा कि उचित भी है, तो भी मैंने जैसा सुझाया है, रोकथाम की एक आंतरिक व्यवस्था करना असंभव नहीं होना चाहिए और उसपर लोगों को नाराज भी नहीं होना चाहिए.’

आज हम केवल यह कहकर नहीं बच सकते कि जनता ही मीडिया है या मीडिया भी जनता है. व्यावसायिकता, तकनीक और बड़ी पूंजी ने आज इसके संस्थागत चरित्र को बदलकर रख दिया है. बहस-चर्चा और विमर्श के एजेंडे तक में हम एक प्रकार की राजनीतिक हेजीमनी (एक ही समूह या विचार की प्रबलता) के शिकार हो चुके लगते हैं. सवाल-जवाब के अवसर भी प्रतिक्रियावादी शोर की भेंट चढ़ जाते हैं. इस शोर में पहले से तय या बने-बनाए पक्ष और विपक्ष अपने-आप सक्रिय हो जाते हैं. प्रोपेगेंडा से लेकर मिसइन्फॉर्मेशन तक के मैकेनिज्म भी प्रेस का रूप धारण कर अपना काम करते नजर आ रहे हैं. आज सोशल मीडिया के अपने अनुभवों से हम सीख रहे हैं कि तरह-तरह से बंटी जनता को जब स्वयं मीडिया बन जाने की आभासी छूट मिलती है, तो ट्रेंडिंग और ट्रोलिंग जैसे प्रबंधित अराजकतावाद की विरोधाभासी स्थिति भी पैदा की जा सकती है.

इसलिए इस शोर-शराबे में इससे पहले कि हम ठीक-ठीक समझ भी पाएं कि यह हो क्या रहा है, एक बात हमेशा याद रखने की है कि हम किसी भी संप्रदाय, विचारधारा, राजनीतिक दल और पक्ष-विपक्ष भी कम से कम तभी हो पाएंगे, जब बोलने और लिखने का हमारा अपना नैसर्गिक और अविच्छेद्य अधिकार सुरक्षित रहेगा. इसमें हमें किसी शासन-व्यवस्था, सरकार, संगठन या राजनीतिक दल की चालाकी नहीं चलनी देनी चाहिए. किसी भी प्रलोभन में आकर, किसी भी क्षणिक राजनीतिक लाभ के लिए, किसी भी कीमत पर हम अपनी यह आज़ादी न खोएं. जनता यह याद रखे कि उसके पास सवाल उठाने का अधिकार रहेगा, तभी वह प्रेस और सरकार दोनों पर सवाल उठा पाएगी.

रही बात मीडिया के आपसी वैविध्यता की तो तरह-तरह की सामाजिक गैरबराबरी को देखते हुए एक हद तक यह स्वाभाविक और अनिवार्य भी है कि प्रेस और मीडिया के नाम पर सभी तरह के तत्व सक्रिय रहेंगे. इस बारे में भी यदि हम गांधी की कही हुई बात याद रखें तो शायद अनावश्यक कोफ़्त से बचे रहेंगे. अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा है – ‘…(स्व-विनियमन या आत्म-नियंत्रण) का यह तर्क यदि सच हो तो दुनिया के कितने समाचार-पत्र इस कसौटी पर खरे उतर सकते हैं? लेकिन निकम्मों को बंद कौन करे? कौन किसे निकम्मा समझे? भलाई और बुराई की तरह उपयोगी और निकम्मे अख़बार भी साथ-साथ चलते रहेंगे. लोगों को उनमें से अपनी-अपनी पसंद चुननी होगी.’

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