लेखन

समाज | कभी-कभार

हम साहित्य किसलिए लिख रहे हैं?

हिन्दी में पढ़े-लिखे लोगों की संख्या जिस दर से बढ़ी है, उस दर से साहित्य के पाठक नहीं बढ़े हैं

अशोक वाजपेयी | 07 नवंबर 2021 | फोटो: पिक्साबे

उधेड़बुन

यह सवाल बार-बार उठता रहता है कि आज यानी इस तेज़ी से बदलते और मनोरंजन के नये माध्यमों और तकनीकों की विपुलता से भरे समय में साहित्य की क्या ज़रूरत बची है. सही है कि अभी भी बल्कि शायद पहले से कहीं अधिक साहित्य की पुस्तकें पढ़ी-पढ़ायी जाती हैं, बिकती हैं. पुस्तक-व्यापार अपने अनेक रूपों में बढ़ा ही है. पर दूसरी तरफ़ यह भी सही है कि वर्चस्वशाली हर क्षेत्र में, जिनमें राजनीति, सत्ता, तकनालजी, मीडिया आदि शामिल हैं, ऐसा नेतृत्व फैलता गया और जाता है जिसकी पुस्तकों में, विशेषकर साहित्य में न तो कोई दिलचस्पी है और न ही उसे उनकी कोई ज़रूरत लगती है.

हमारे देश और राज्यों में जो लोग सत्तारूढ़ हैं, उनमें से शायद ही किसी पर साहित्य-प्रेमी तो दूर साहित्य से परिचित होने का लांछन लगाया जा सके. हिन्दी में तो ख़ासकर एक ऐसा विशाल मध्यवर्ग पैदा हो गया है जो अपनी मातृभाषा से लगातार दूर जाता हुआ वर्ग है: हिन्दी में पढ़े-लिखे लोगों की संख्या जिस दर से बढ़ी है, उस दर से साहित्य के पाठक नहीं बढ़े हैं. कई बार तो लगता है कि वे शायद आनुपातिक दृष्टि से घटे हैं.

फिर हम साहित्य किसलिए लिख रहे हैं? हम जैसे धवलकेशियों और अधेड़ों के लिए तो लिखना आदत बन गया है और हम उससे अलग या बेहतर कुछ कर नहीं सकते. सो लिखते हैं. वैचारिक रूझान जो भी हों, हम, कुल मिलाकर, आदतन और आत्माभिव्यक्ति के लिए ही लिख रहे हैं. हमें पता है कि हमारे पाठक कम ही हैं. रहे युवा लेखक, जो हाल में, इस रणक्षेत्र में आये या आ रहे हैं, तो वे शायद इस मोहक भ्रम में लिखते हैं और, कई बार आक्रामकता और उग्रता से, लिखते हैं कि उनके लिखने से कोई फ़र्क पड़ता है. वे इसलिए भी शायद लिखते हैं कि पहले से काबिज बूढ़ों-अधेड़ों को बेदख़ल किया जा सके. यह सोचने की बात है कि क्या युवा अधिक स्वप्नशील हैं और उनसे पहले के लोगों के सपने और सचाई पर पकड़ दोनों ही ढीले पड़ चुके हैं? यह तर्क भी उचित दिया जा सकता है कि इस तरह पीढ़ियों में विभाजित कर साहित्य को देखना ग़लत है: सपने और सचाई पर किसी पीढ़ी का एकाधिकार नहीं होता, न हो सकता है, न होना चाहिये.

इस उधेड़बुन को समेटते हुए यह कहा जा सकता है कि मानवीय स्थिति देशकाल से प्रभावित होती-बदलती है, फिर भी लगभग वही बनी रहती है अपने सत्व में. साहित्य हमेशा यह कोशिश करता है कि वह हर समय और स्थिति में यह जताता रहे कि हर हालत में मनुष्य, अपनी विपुलता-जटिलता-विडम्बना में, बने रहना सम्भव है. वह यह भी जतलाता है कि हम दी हुई सचाई और ध्वस्त हो गये सपनों के बरक़्स वैकल्पिक सचाई और नये सपने देखकर ही अपनी मानवीयता सत्यापित करते हैं. अगर मनुष्य अविराम है तो साहित्य भी अथक है.

श्रीराम वर्मा की याद

वे मुझसे तीन-चार साल बड़े थे. उनका पहला कविता-संग्रह ‘ग्रीनविच’ मुझे ‘पहचान’ सीरीज की तीसरी संख्या में प्रकाशित करने का संपादकीय सौभाग्य मिला था, 1973-74 में. थे तो आज़मगढ़ के पर जब उनसे सम्पर्क हुआ तब वे इलाहाबाद में थे और उस समय सुप्रतिष्ठित पत्रिका ‘नयी कविता’ के संपादन से जुड़े थे. वे नयी कविता आंदोलन से, अगर वह सिर्फ़ प्रवृत्ति भर नहीं आंदोलन भी था, जुड़े थे और शायद इसी कारण उन्हें मान्यता और प्रतिष्ठा नहीं मिली जिसके वे सर्वथा सुपात्र थे. उनकी हस्तलिपि सुंदर थी और मुझे याद आता है कि एक बार लगभग अस्सी पृष्ठ लम्बा निबन्ध कुंवर नारायण पर लिखकर ‘पूर्वग्रह’ में भेजा था. फिर उनकी सहमति से मदन सोनी ने उसके आकार को छोटा किया जिसकी उन्होंने सराहना की. उनकी एक संचयिता रज़ा पुस्तक माला में जल्दी ही प्रकाशित होने जा रही है.

अभी मेरा ध्यान उनके पहले कविता संग्रह की कविताओं पर गया. उनकी एक कविता का अंश इस प्रकार है: ‘… मैं हूं एक नहीं के बराबर/होना चाहता हूं/होने के समानांतर/रौशनी की त्वरा से रास्ते को/केंचुए सा चाहता हूं रेडियम-रेखा बना देना/पर क्या मैं चल सकता हूं?/जो मैं सोचता हूं कि रास्ता है, (मेरा खुद का बनाया हुआ)/क्या उस पर मेरा अधिकार भी है/कि कहूं वह मेरा है. मैं एक ख़ालिस वोट हूं (मच्छरों ने सर पे भन्ना के कहा.)/और यह रास्ता पट्टे की तरह टूट जाता है/या बन जाता है गले का फंदा./मैं चौराहे पर हूं अनाथ/देश में, समय में, दुनिया के पेंचदार जहन्नुम में,/दीखते हुए यांत्रिक स्वर्ग में/मुझे संदेह है मैं उतना हूं/जितना मैं हूं. क्या तुम्हें नहीं लगता कि जूं तक हमसे ज़्यादा आज़ाद हैं,/और दरअस्ल क्या यह सभ्यता उन्हीं की नहीं है?’

श्रीराम वर्मा की कविता का वितान व्यापक था. वे निजता से लेकर सार्वजनिकता तक आसानी से पहुंच जाते थे. कविता ‘शुक्र-1’ देखें:

नीलांचल भेदती
नोक यह उरोज की.
नदी: गहरी नाभि. त्रिवली.
सुनहली रोमावली.
नदी: कोमल देहवल्ली.
खुली जांघों की पुलक से लदी कदली.
सूर्य डूबा नहीं
चुम्बन-तूर्य-सा बजता रहा.

रज़ा के रेखांकन

रज़ा फ़ाउण्डेशन के पास रज़ा के सभी दस्तावेज़ों का एक बड़ा संग्रह है. वे जब अंततः भारत में अपने जीवन का अंतिम हिस्सा बिताने आये थे तो अपने साथ बहुत सारे व्यवस्थित ढंग से कई तरह की फ़ाइलों में रखे कागज़ात भी लाये थे. रज़ा ने बहुत सावधानी और जतन से उन्हें लिखे गये पत्रों और उनके उत्तर में लिखे गये अपने पत्रों, छायाचित्रों, कैटलाग, प्रेस कतरनों आदि को सुरक्षित किया था. इस सामग्री को अब पूरी तरह से विन्यस्त किया जा चुका है. शायद भारत में किसी कलाकार की यह सबसे बड़ी आर्काइव है.

फ़ाइलों को नबेरते हुए रज़ा के किये गये कई रेखांकन भी मिले: उनके आश्चर्यजनक और सुखद संख्या जब 70 से ऊपर चली गयी तो हमने सोचा कि रज़ा-शती के अंतर्गत उनकी एक प्रदर्शनी आयोजित की जाये. सो ‘स्कैचिंग साइलेन्स’ नाम से यह प्रदर्शनी इन दिनों वढ़ेरा कला वीथिका में चल रही है. सिर्फ़ रेखांकनों की यह रज़ा की अब तक सबसे बड़ी प्रदर्शनी है जिसमें? रेखांकन शामिल हैं. कुछ तो 2011-15 के बीच बनाये गये हैं पर अधिकांश 1950-60 में. इस विपुलता में वे रेखांकन भी हैं जो रज़ा साहब ने अपने चित्रों के आरंभिक प्रस्ताव के रूप में बनाये हैं. एक बड़ा कैटलाग भी प्रकाशित हुआ है जिसमें कलालोचक गायत्री सिनहा ने एक अत्यंत सार्थक टिप्पणी लिखी है.

रेखांकनों में रेखाएं कभी ज्यामितीय आकार लेती हैं और कभी मुक्त भाव से विचरती जाती हैं. उनमें किसी पूर्णता का आग्रह नहीं है: एक स्तर पर वे जीवन और कला दोनों की अपूर्णता का अंकन है. रज़ा पूर्णकाम थे पर उन्हें पता था कि 95 वर्ष की आयु और 70 से अधिक वर्षों की कला-चेष्टा अंततः अधूरी ही थी: उनके यहां कला जीवन का अंकन थी तो जीवन भी कला का अंकन और दोनों ही अधूरे होने को अभिशप्त.

मुझे फ्रेंच कवि गिलविक की एक कविता याद आती है:

रेखा
जहां तक तुम जाती हो
कोई समस्या नहीं.
तुम टिकी हो
इस विश्वास पर
कि भविष्य
जन्म लेता है
इस हर बिन्दु से
जो तुम पार करती हो
तुम संसार पार करती हो.
अप्रत्याशित रूप से
उसे आधे में काटती हुई
बिना कुछ सीखे, बिना कुछ दिये, तुम आगे बढ़ती हो.

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