समाज | सिर-पैर के सवाल

हम सपने में भाग क्यों नहीं पाते और कभी मरते क्यों नहीं हैं?

सवाल जो या तो आपको पता नहीं, या आप पूछने से झिझकते हैं, या जिन्हें आप पूछने लायक ही नहीं समझते

अंजलि मिश्रा | 13 दिसंबर 2021

अक्सर ऐसा होता है कि जो काम हम रोजमर्रा की जिंदगी में बड़ी आसानी से कर लेते हैं उन्हें सपनों में पूरा करते-करते हमें पसीने आ जाते हैं. यह बात हममें से हर किसी ने महसूस की होगी कि अगर सपने देखते हुए हमें भागने की नौबत आ जाए तो हम उतनी तेजी से नहीं भाग पाते जितनी तेज दौड़ने की हमें जरूरत होती है. ऐसा ही सपने में मुक्के मारने या चीखने की कोशिश करते वक्त भी होता है. यहां तक कि सपने में तो हमें मरना भी नसीब नहीं होता.

सपने मनोविज्ञान के लिए अभी भी पहेली बने हुए हैं. उनके स्पष्ट परिभाषित न हो सकने के कारण उनमें देखी गई घटनाओं की हमें तरह-तरह की व्याख्याएं सुनने-पढ़ने को मिलती हैं. सपनों पर किये गये कई शोध बताते हैंकि हमारी बाहरी परिस्थितियों हमारे द्वारा देखे गये सपनों को प्रभावित करती हैं. जैसे अगर आप लगातार किसी काम के लिए मेहनत कर रहे हैं और उसमें सफल नहीं हो पा रहे हैं तो आपको न दौड़ पाने या न बोल पाने जैसे सपने आते हैं. इस तरह के सपने किसी व्यक्ति के चेतन और अचेतन मन में लगातार चल रहे संघर्ष को दिखाते हैं. अचेतन मन सपनों के जरिये लगातार यह इशारा देने की कोशिश कर रहा होता है कि कुछ ऐसा है जो उसे सफल होने से रोक रहा है.

सपनों के विश्लेषक लगातार या तेजी से न दौड़ पाने की स्थिति को आत्मविश्वास की कमी से भी जोड़कर देखते हैं. उसी तरह से अगर आप सपने में बोल नहीं पा रहे हैं तो इसका अर्थ यह समझा जाता है कि आप दूसरों तक अपनी सोच नहीं पहुंचा पा रहे हैं. आपको ऐसा लगता है कि आपके विचारों से कोई सहमत नहीं होगा.

मनोविज्ञान का दूसरा विचार यह कहता है कि किसी को मुक्का मारना या भागना शरीर के कई अंगों के समन्वय से होने वाली गतिविधि है. इस तरह के कामों में शरीर के अलग-अलग अंग अलग-अलग भूमिका निभा रहे होते हैं. वहीं जब हम सपने देख रहे होते हैं तो शरीर के बाकी अंग शिथिल होते हैं केवल दिमाग ही सक्रिय होता है और शरीर को निर्देश भेज रहा होता है. लेकिन दिमाग के पास इसकी जो प्रतिक्रिया वापस पहुंचती है वह बताती है कि शरीर उसके निर्देश का पालन करने में असमर्थ है. ऐसा ही कुछ हमें सपने में दिखाई देता है.

कुछवैज्ञानिक प्रयोगबताते हैं कि सपने असलियत के मुकाबले काफी धीमी गति से घटते हैं. स्विट्ज़रलैंड की बर्न यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डेनियल एर्लाकर ने नींद में सपने देखते हुए दिमाग की क्रियाओं का विश्लेषण किया और पाया कि सपने देखते हुए इंसान किसी भी काम को करने में सामान्य से डेढ़ गुना ज्यादा समय लेता है. यानी कि अगर आप सपने में भागने की कोशिश करते हुए अपने पैरों को आगे बढ़ा रहे हैं तो वे बहुत धीमी गति से आगे बढ़ेंगे. उस समय आपको महसूस होगा कि कोई आपको आगे बढ़ने से रोक रहा है.

इसी तरह से नींद में आपको बार-बार लगता है कि आप मरने वाले हैं लेकिन ऐसा कभी होता नहीं है. इसका कारण दौड़ने-भागने के कारणों से बिलकुल अलग है. सपने में हम जो भी देखते हैं, सुनते हैं या महसूस करते हैं वह हमारे पिछले अनुभवों पर आधारित ही होता है. लेकिन हमारे दिमाग को यह मालूम ही नहीं होता कि मरने का अनुभव कैसा होता है. इसलिए आप सपने में खुद को कभी मरता हुआ नहीं देख पाते.

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