समाज | स्मृति शेष

सुंदरलाल बहुगुणा अब गए हैं, लेकिन अपने नायकों को बरतने का हमारा विवेक पहले ही जा चुका है

नहीं तो यह कैसे हो सकता है कि कोई आपको आपके वजूद के संकट के लिए चेताए और आप उस पर दिखावे की हरकत भी न करें

विकास बहुगुणा | 22 मई 2021

ज्यादातर लोगों की तरह मेरे लिए भी चिपको आंदोलन और सुंदरलाल बहुगुणा पांचवीं-छठी के दिनों में सामान्य ज्ञान का विषय ही थे. मैं उत्तराखंड का ही था, वे बहुगुणा थे और मेरे दादाजी का नाम भी सुंदरलाल था, इस बात ने मेरे मन में उनके लिए एक स्वाभाविक आकर्षण का भाव पैदा कर दिया था. हर गर्मियों की छुट्टियों में मेरा अपने गांव जाना और पुरानी टिहरी के पुल से गुजरना होता. ऐसी ही एक यात्रा के दौरान मेरी सीट के पास बैठे एक सज्जन किसी परिचित को बाहर इशारा करते हुए बोले, ‘वो है साहब सुंदरलाल बहुगुणा की कुटिया.’

मैंने भी बस की खिड़की से बाहर देखा. जो मुझे नजर आया वह टिन और लकड़ी के जुगाड़ से बना एक कामचलाऊ इंतजाम सा था. यही सुंदरलाल बहुगुणा की कुटिया थी जिसके बाहर अनशन स्थल या ऐसा ही कुछ लिखा हुआ एक बोर्ड लगा था. इसके ठीक नीचे पूरे वेग से बहती हुई भागीरथी थी. कुटिया से थोड़ा आगे वह सुरंग तब खोदी ही जा रही थी जिसमें नदी को डाला जाना था और उसी स्थान पर भारत के सबसे बड़े बांध की दीवार उठाई जानी थी. तब से हर बार टिहरी के जर्जर पुल से गुजरते हुए बस की खिड़की से जिज्ञासा के साथ उस कुटिया को देखना एक नियमित काम हो गया.

वाट्सएप उन दिनों नहीं था, लेकिन अफवाहबाज गिरोह आज की भांति ही खूब सक्रिय थे. समय के साथ मेरा भी इन गिरोहों द्वारा फैलाई गई बातों से खूब परिचय हुआ. मसलन ‘आंदोलन-वांदोलन सब दिखावा है, सुंदरलाल बहुगुणा को जब भी पैसा चाहिए होता है वो अनशन पर बैठ जाता है, इसके बच्चे विदेश के महंगे स्कूलों में पढ़े हैं’, वगैरह वगैरह. सूचनाएं उतनी ही विश्वसनीय होती हैं जितना उनका स्रोत, इस बात की उन दिनों समझ नहीं थी. सो मैं भी इन बातों पर थोड़ा-बहुत यकीन करने लगा था.

खैर, वक्त बीतता गया. ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए मैं देहरादून आ गया. इसी दौरान एक बार बस से घर जा रहा था. ऋषिकेश में बस रुकी. कुछ सवारियां उतरीं और कुछ चढ़ीं. इनमें से एक बुजुर्ग भी थे जो मेरी बगल की सीट पर बैठ गए. उनका विन्यास ध्यान खींचने वाला था. धोती-कुर्ता, लंबी दाढ़ी, झोला और सर पर बांधा हुआ एक साफा. सब सफेद. ये वही हैं क्या! यह सोच ही रहा था कि बस कंडक्टर ने सारा संदेह खत्म कर दिया. विनम्र मुस्कान के साथ वह झुका और बोला, नमस्कार बहुगुणा जी.

बहुगुणा जी ने अभिवादन का प्रत्युत्तर दिया और किराए के पैसे बढ़ा दिए. कंडक्टर ने कहा, ‘रण द्या न, क्वी बात नी’ (रहने दीजिए न, कोई बात नहीं.). वे बोले, ‘न भाई’ और इसके साथ ही पैसे उसके हाथ में पकड़ा दिए.

इतनी मशहूर हस्ती से क्या बात की जाए, इस झिझक के मारे उस एक घंटे की यात्रा में मैं चुप ही रहा. उन्होंने भी घर के किसी बुजुर्ग सी एक निगाह मेरे ऊपर सिर्फ इस तरह से डाली मानो देखना चाहते हों कि उनकी वजह से कहीं मुझे बैठने में कोई तकलीफ तो नहीं हो रही है. इसके अलावा उस सफर में ऐसा कुछ भी नहीं था जो मेरी किसी भी पिछली बस यात्रा से ज़रा भी अलग हो. बाद में जब सोचा तो लगा कि उस सफर की असाधारणता उसके साधारण होने में ही थी.

उस दिन सुंदरलाल बहुगुणा से मेरा एक नया परिचय हुआ. ये वह सुंदरलाल बहुगुणा नहीं थे जिन्होंने टिहरी बांध विरोधी आंदोलन से पैसा कूटा था और जिनके बच्चे विदेशों में पढ़े थे. जब उनके बारे में और जाना तो यह भी जाना कि सुंदरलाल बहुगुणा वह शख्स थे जिन्होंने बस की टिकट की तरह प्रकृति से भी मुफ्त में कुछ नहीं लिया. उन्होंने जिससे जितना लिया शायद उससे ज्यादा लौटाया था. उन्होंने पहाड़ों, जंगलों और नदियों को पैदल नापा था और बताया था कि इनसे उतना ही लिया जाए जितनी जरूरत है, तभी धरती जीने लायक बची रहेगी. यह अलग बात है कि हमने उनकी नहीं सुनी. केदारनाथ से ऋषिगंगा त्रासदी तक उत्तराखंड का मौजूदा हाल उसका प्रमाण है.

सुंदरलाल बहुगुणा भले ही अब गए हों, लेकिन अपने नायकों को बरतने का विवेक हमारे समाज से काफी पहले ही जा चुका है. नहीं तो यह कैसे हो सकता था कि कोई आपको आपके वजूद के संकट बारे में चेताए और आप उस पर पर्याप्त तो छोड़िये दिखावे की हरकत भी न करें. सुंदरलाल बहुगुणा कहते थे कि बांध रूपी जो यह राक्षस दिल्ली की सरकार बना रही है वह बनने के बाद भी बलियां लेता रहेगा. उनका मानना था कि बांध की झील के इर्द-गिर्द जो गांव बसे हैं, उनका भी भविष्य असुरक्षित है क्योंकि नीचे पानी और ऊपर भुरभुरी मिट्टी होगी तो उस मिट्टी से बनी ढलान का एक दिन दरकना तय है.

लेकिन उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती जैसी लगती थी. या फिर एक ऐसे व्यक्ति की आवाज़ जो अपने मतलब के लिए ऐसा कह रहा था. इसलिए न तो सरकार ने उनकी चेतावनी पर ध्यान दिया और न उन लोगों ने जिनके लिए वे लड़ रहे थे. और आज वही हो रहा है. झील से सटी ढलानें दरकने लगी हैं और इन पर बसे गांवों के लोग अपना वजूद बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं.

क्या आगे हालात बदलेंगे? इन दिनों सूचनाओं का जो सूरते-हाल है उसे देखकर फिलहाल तो ऐसी उम्मीद दूर की कौड़ी लगती है. मार्क ट्वेन सही कहते हैं – आपको खबर ही नहीं कि आपके साथ क्या हो रहा है. बल्कि आप तो यही नहीं जानते कि आप बेखबर हैं.

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