समाज | जन्मदिन

हमें मैकाले को कोसना चाहिए, पर हमारे पास क्या आज भी कोई विकल्प मौजूद है?

लॉर्ड मैकाले द्वारा बनाई गई भारतीय दंड संहिता और शिक्षा पद्धति को हम आज भी लेकर चल रहे हैं

अनुराग भारद्वाज | 25 अक्टूबर 2021

साल 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने 150 साल पुराने कानून – धारा 377 – के उस हिस्से को रद्द कर दिया जो सहमति से बनाये गये समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखता था. किसी भी सजा के लिए अपराध का प्रावधान इंडियन पीनल कोड या भारतीय दंड संहिता से परिभाषित होता है. आज इसके जनक थॉमस बैबिंगटन मैकाले का जन्मदिन है. वही मैकाले जिसने भारतीय शिक्षा पद्धति की भी नींव रखी थी.

मैकाले को यकीनन ‘ब्रिटिश-भारत’ के निर्माताओं में से एक कहा जा सकता है. वह एक इतिहासकार भी था और राजनयिक भी. यह तय है कि उसने भारतीयों को हेय दृष्टि से ही देखा. पर यह भी उतना ही सत्य है कि उसने कुछ ऐसे काम किये जो हमारी आने वाली क़ानूनी और सामाजिक प्रणाली का आधार बने. अब तक हम उसके प्रभाव से उबर नहीं पाए हैं. यह हमारी कमतरी है क्या कुछ और?

मैकाले को हम अक्सर ग़लत बातों के लिए ही याद करते हैं, पर कुछ अच्छा भी था उसमें. वह उन चंद अंग्रेज़ अफ़सरों में था जिसने अपने अन्य अंग्रेज़ अफ़सरों द्वारा भारतीयों के शोषण पर कड़ी टिप्पणी की थी. शशि थरूर अपनी क़िताब, ‘एन ऐरा ऑफ़ डार्कनेस’ में लिखते हैं कि मैकाले ने ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारियों को ‘नवाब’ की उपाधि दी थी क्योंकि वे भारत से लूट का माल भरकर इंग्लैंड ले गए और वहां उनकी जिंदगी में वह ऐशोआराम था कि इंग्लैंड के बाकी लॉर्ड उनकी बराबरी नहीं कर पाते थे.

दरअसल, तत्कालीन लॉर्ड वारेन हेस्टिंग्स और ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों के ज़ुल्म की यह इंतिहा थी कि मैकाले भी एकबारगी हिल गया था. उसने कहा था कि कंपनी के अफसरों की कारगुज़ारियां हद दर्ज़े तक अमानवीय हैं.

भारतीय दंड संहिता या मैकाले लॉ

समझने की बात है कि न्याय की उत्पति कहां से हुई. चर्चित पत्रकार और लेखक फ़रीद ज़कारिया अपनी किताब ‘फ्यूचर ऑफ़ फ़्रीडम’ में लिखते हैं कि विश्व भर में अनुबंध, संपत्ति, मानहानि या विरासत पर बनाये गए कानून रोम की देन हैं.’ देखा जाए तो इंग्लैंड का मैग्ना कार्टा भी इसी से प्रभावित है. अंग्रेजी राज से पहले भारत में सिर्फ राजप्रमुख न्याय करता था. दंड था, उसका विधान नहीं था.

मशहूर लेखक गुरचरण दास अपनी किताब ‘इंडिया ग्रोज एट नाइट’ में लिखते हैं कि ज़माने से हम एक कमज़ोर राज्य और मज़बूत समाज रहे हैं. भारत के संदर्भ में यह बड़ी शानदार व्याख्या है और शायद इसका ही परिणाम है कि यहां दंड व्यवस्था स्थापित नहीं हो सकी. दूसरे शब्दों में कहें तो यहां हर वर्ग के हिसाब से दंड विधान तय किये गए थे. एक ही अपराध के लिए शूद्रों के लिए सज़ा का प्रावधान अलग था और उच्च जाति के लिए अलग. अक्सर, उच्च जाति के लोग दंड से बच निकल सकते थे.

मैकाले ने इस अंतर को ख़त्म करके सबके लिए एक ही दंड विधान बनाया. वह सिर्फ भारतीय दंड संहिता का जनक ही नहीं था, बल्कि ब्रिटेन के तमाम उपनिवेशों में उसकी बनायी हुई दंड संहिता लागू की गयी. बताते हैं कि मैकाले ने तीन साल तक कमरे में बंद रहकर इस दंड संहिता पर काम किया. उसका कहना था कि यह दंड संहिता सबके लिए है पर किसी के लिए नहीं. दंड संहिता मैकाले का भारत को सबसे बड़ा योगदान है. इसको उसने 1837 में ही पूरा कर लिया था, पर इसे 1861 यानी पूरे 34 साल बाद लागू किया गया.

आज भी भारतीय दंड संहिता का मुख्य आधार मैकाले की परिकल्पना है. और उसने सिर्फ भारतीय दंड संहिता की रचना ही नहीं की. सिविल (दीवानी) और क्रिमिनल (फौज़दारी) प्रोसीजर कोड के साथ संपत्ति के अधिकार भी उसी के बनाये हुए हैं.

इतिहास के साथ खिलवाड़

औद्योगिक क्रांति के बाद पश्चिमी समाज तरक्की करते हुए बाकियों से काफी आगे निकल आये थे. पश्चिम के लोगों को अब पूर्व और अफ्रीका के समाज कमतर लगते थे. उन्हें यहां का साहित्य, दर्शन सब कुछ ही बेढंगा लगता था. मैकाले भी इस भावना से ग्रसित था. उसने एक बार कहा था कि समूचे भारतीय साहित्य की तुलना में यूरोप की किसी अच्छी लाइब्रेरी का सिर्फ एक शेल्फ़ ही काफ़ी है.

उसकी इस सोच के पीछे जेम्स मिल नाम का एक ब्रिटिश अफसर था जिसने भारत आये बिना यहां का इतिहास लिखा था. जेम्स मिल भारतीयों को इतना कमतर आंकता था कि उसके मुताबिक जो कुछ भी वैज्ञानिक या गणितीय विकास यहां हुआ वह सब पश्चिम के लोगों से चुराया हुआ था.

शिक्षा पद्धति और मैकाले पुत्र

यह तय है कि मैकाले ने हमें अशिक्षित माना था. पर यह भी तय है कि उसने हमें शिक्षित करने का ईमानदार प्रयास किया था. ब्रिटिश सरकार ने जब ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में शिक्षा के लिए एक लाख रुपये आवंटित करने का हुक्म दिया था, उस समय यह बहस उठी था कि किस माध्यम से पढ़ाया जाएगा. देशज या कुछ और?

इंग्लैड के हाउस ऑफ़ कॉमन्स में बोलते हुए मैकाले ने कहा था, ‘ये हम पर निर्भर करता है कि हम भारतीयों के साथ किस प्रकार बर्ताव करना चाहते हैं. क्या हम उन्हें अधीन बनाये रखना चाहते हैं? क्या हम समझते हैं कि हम भारतीयों में जाग्रति पैदा किये बगैर उन्हें ज्ञान दे सकते हैं? क्या हम उनमें महत्वाकांक्षा तो भर दें पर उसे बाहर निकालने का रास्ता न सुझाएं? बहुत संभव है कि भारतीय जनमानस हमारे द्वारा बनाई गई प्रणाली से पढ़ता हुआ उस प्रणाली से आगे निकल जाए: बेहतर सरकार देकर हम उनमें अच्छी सरकार बनाने की प्रेरणा दें. हमारी प्रणाली से पढ़कर संभव है, कि एक दिन वे यूरोप के जैसे संस्थान बनाने की इच्छा करें. क्या ऐसा दिन भारत में आएगा? मैं नहीं जानता. हां, पर ये ज़रूर जानता हूं कि मैं वो शख्स नहीं जो भारतीयों को पीछे धकेल दूं. या उस दिन को आने से रोक दूं. और कभी ऐसा दिन आया, तो इंग्लैंड के इतिहास में वो सबसे गौरवशाली क्षण होगा.’

‘मिनट ऑफ़ एजुकेशन’ पर बोलते हुए उसने आगे कहा, ‘हम अंग्रेज़ी बोलने वालों का एक ऐसा वर्ग तैयार करें जो हमारे और शासित लोगों के बीच पुल का काम करें. उनका रंग और खून तो भारतीय हो, पर सोच, नैतिकता और बुद्धिमता अंग्रेजों के मुक़ाबिल हो.’

मैकाले का यह भी मानना था कि अंग्रेज़ अपने सीमित साधनों से इस महासागर को शिक्षित नहीं कर पाएंगे. लिहाज़ा, उसने सुझाव दिया कि अंग्रेजी बोलने वाले भारतीयों को यह काम दिया जाये कि वे हिंदुस्तान की बोलियों और भाषाओं के भीतर पश्चिम के वैज्ञानिक तथ्य और जानकारी मिलाकर यहां के लोगों को पढ़ाएं.

यह बात अपने आप में मौलिक प्रतीत होती है. मैकाले समझता था कि अंग्रेजी और यहां की भाषाएं मिलकर ही भारतीयों का ज्ञान बढ़ा सकती हैं. अंग्रेजी भाषा को शिक्षा का आधार बनाने पर आज बहस होती है, पर उसने इसी भाषा में हमे पढ़ाने का प्रयास किया. उसके मुताबिक हिंदुस्तानियों को पढ़ाने की ज़िम्मेदारी अंग्रेजों की है, पर उन्हें मातृभाषा में नहीं पढ़ाया जा सकता. ऐसे में अंग्रेजी, जो यूरोप की सर्वश्रेठ भाषा है और भारतीय श्रेष्ठि वर्ग इसको समझता है, लिहाज़ा यह एक बेहतर माध्यम है. उसने आगे कहा, ‘पश्चिम यूरोप ने रूस को सभ्य बनाया और कोई शक नहीं है कि हिंदुओं को हम सभ्य बनायेंगे.’

यह बात अलग है कि जब अंग्रेज़ यहां से गए तो देश की शिक्षा दर महज़ 16 फीसदी थी. हम आज बहस तो करते हैं कि मैकाले की प्रणाली ग़लत थी, पर सवाल उठता है कि हम कोई वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं तैयार कर सके.

कर प्रणाली और मैकाले

कर प्रणाली को लेकर भी मैकाले के विचार एडम स्मिथ से मिलते हैं. ‘मिनट ऑफ़ एजुकेशन’ में मैकाले लिखा था कि वह 1834 से लेकर 1838 तक भारत में रहा और उसे यहां की कर प्रणाली बड़ी अमानवीय लगी. उसके मुताबिक हर टैक्स के बाद सरकार अगर उसका स्पष्टीकरण देती फिरे तो ज़ाहिर है कि वह चीज़ ही ग़लत है.

अफ़ीम की खेती और इसकी बिक्री को लेकर मैकाले का मानना था कि यह भारतीयों की सबसे बुरी आदतों में से एक है. उसने कहा था कि किसी आदमी से पीछा छुड़ाने का आसान तरीका है उसे अफ़ीम चटाते रहना. बेचारा कुछ ही महीनों में बेकार हो जाता था. मैकाले ने साफ़ शब्दों में कहा कि यह ब्रिटिश मॉडल नहीं हो सकता. पर अंग्रेज़ों ने इस बात को नहीं माना और तो और आज़ादी के बाद हमने भी नहीं माना. यह बात अलग है कि आज हमको हर तरह की अफ़ीम चटाई जा रही है.

हम मैकाले को कोस सकते हैं, क्यूंकि कई मायनों में उसकी सोच ग़लत थी. पर अगर सोचा जाए तो क्या उसके द्वारा स्थापित की गयी दंड और शिक्षा व्यवस्था ने भारतीयों के जीवन में एकरूपता का काम नहीं किया? और क्या यह हमारी राजनैतिक और सामाजिक आज़ादी का आधार नहीं बनी?

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