शॉपिंग

समाज | पर्यावरण

कैसे शॉपिंग की आदतें बदलकर आप पैसा और सेहत ही नहीं, पर्यावरण भी बचा सकते हैं

आज विश्व पर्यावरण दिवस है

प्रदीपिका सारस्वत | 05 जून 2021 | फोटो: पिक्साबे

यह हम सबके साथ कई बार होता है. आप अक्सर कहीं बाहर जाने से पहले अपनी कपड़ों की अलमारी के सामने खड़े होते हैं और लगभग हर कपड़े को एक तरफ करते हुए सोचते हैं कि आज पहनने के लिए आपके पास कुछ अच्छा है ही नहीं! और आप तय करते हैं कि अगली तनख़्वाह आने पर आप कुछ और कपड़े ख़रीदेंगे. आपके भीतर कुछ खरीदने की इच्छा जागने का यह सबसे आम उदाहरण है.

इसके अलावा यूं भी होता है कि कई बार आप मॉल या शहर के बाजार में जाते हैं और ऐसी बहुत-सी चीज़ें ख़रीद लाते हैं जिन्हें शायद ही कभी इस्तेमाल करेंगे. नई घड़ियां, फ़ोन, बैग, लिपस्टिक या ऐसी चीज़ें जो पहले से ही आपके पास थीं. शादियों, जन्मदिनों और बाकी अवसरों पर आप औपचारिकतावश लोगों को तोहफ़े देते हैं, जो कई बार उतने स्तरीय नहीं होते कि इस्तेमाल किए जा सकें या फिर शायद पाने वाले के किसी काम के नहीं होते. यानी एक हिसाब से यह खरीदारी भी कोई खास उपयोगी नहीं कही जा सकती.

बात आगे बढ़ाने से पहले रोजमर्रा की जिंदगी के कुछ और उदाहरण भी देखे जा सकते हैं. मसलन आलस के चलते आप बाहर से खाना ऑर्डर करते हैं, जो सेहत के लिहाज़ से तो शक के दायरे में आता ही है, साथ में प्लास्टिक की पैकिंग अलग दिक्कत लेकर आती है. कई बार आप सिर्फ अपने स्टेटस के चलते सार्वजनिक परिवहन के साधनों की जगह अपनी या भाड़े की गाड़ी से अकेले सफ़र करते हैं.

कुल मिलाकर हम हर दिन ऐसे तमाम काम करते हैं और शायद ही सोचते हैं कि इसका पर्यावरण से भारी लेना-देना है. दरअसल आप यह सब करते वक्त वह सोच रहे होते हैं जो इन तमाम उत्पादों को बनाने वाली कंपनियां चाहती हैं. रिसर्च और अनुभव दोनों से साफ है कि टीवी और फ़ोन के ज़रिए हमारे घरों और एकांत के क्षणों तक पहुंचे विज्ञापन और बाज़ार ने हमें बताया है कि दुख से दूर होने के लिए या फिर सुख की तरफ जाने के लिए हमें नई-नई चीज़ें ख़रीदने की ज़रूरत है. फिर चाहे वह एक आइसक्रीम हो या फिर आइफोन का नया मॉडल!

एक रिसर्च के मुताबिक़ ज़्यादातर लोग इन छह कारणों से ख़रीदारी करते हैं.
1. मीडिया का प्रभाव – आपने टीवी, होर्डिंग या वेबसाइट पर कुछ देखा, आपको पसंद आया और सोच लिया कि यह तो आपके पास भी होना चाहिए.
2. सामाजिक दबाव – आपके पड़ोसी ने नई गाड़ी ख़रीदी है, या फिर दोस्त ने नया फ़ोन लिया है तो आप दबाव में हैं कि आपको भी नई चीज़ें चाहिए.
3. सेल, कीमत में छूट (डिस्काउंट) – आप सोचते हैं कि सेल के दौरान सामान्य से कम कीमत पर सामान ख़रीदकर आप पैसे बचा रहे हैं. जबकि इसके चलते आप काफी ग़ैरज़रूरी सामान घर ले आते हैं.
4. खुद पर नियंत्रण न होना – कई लोग जब बाज़ार में होते हैं, चाहे इंटरनेट के ज़रिए ही सही, वे हर वह सामान ख़रीदते जाते हैं जो उन्हें ठीक लगता है, वे अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रख पाते.
5. अमीरी का अहसास होना – पहले आपकी तनख़्वाह कम थी, आप काफी चीज़ें ख़रीदने से पहले सोचते थे, लेकिन अब आप कुछ भी ख़रीद सकते हैं इसलिए कुछ भी ख़रीद लेते हैं.
6. आप बोर हो चुके हैं – बहुत से लोग, जिनके पास काफी पैसा है और करने के लिए उतना काम नहीं है इसलिए ख़रीदारी करने निकल पड़ते हैं कि वे बोर हो चुके हैं और उन्हें लगता है कि ख़रीदारी करके उनका मन बहल जाएगा. इसके अलावा तनाव से उबरने के लिए की गई ख़रीदारी जिसे रिटेल थैरेपी भी कहा जाता है, ग़ैरज़रूरी ख़रीदारी की एक और वजह है.

कारण इनमें से चाहे जो हो लेकिन आप इस ख़रीदारी या रिटेल थैरेपी के बाद भी ज़्यादा देर ख़ुश नहीं रह पाते. बल्कि आप में से ज़्यादातर लोग महसूस करते हैं कि बेकार ही इतना पैसा खर्च किया. इंटरनेट पर बहुत सारे ऐसे सर्वे और रिसर्च मौजूद हैं जो बताते हैं कि रिटेल थैरेपी अंत में आपका तनाव और बढ़ा देती है. यानी एक तरफ हम देख सकते हैं कि ग़ैरज़रूरी ख़रीदारी से आपको किसी तरह का फ़ायदा होने के बजाय कहीं न कहीं नुक़सान ही है. और दूसरी तरफ आपके पर्यावरण पर इसका काफी बुरा असर हो रहा है.

इस तरह ख़रीदी जाने वाली चीज़ों में सबसे ऊपर कपड़े हैं, फिर शराब और खाना, उसके बाद गैजेट्स और एक्सेसरीज़. पर क्या आप जानते हैं कि एक नई सूती शर्ट बनाकर आप तक पहुंचाने में कितनी ग्रीन हाउस गैसें आपकी हवा में मिल जाती हैं या ज़मीन से कितना पानी निकालकर खर्च कर दिया जाता है? या फिर कितने खराब रसायन मिट्टी और पानी में मिल जाते हैं?

जर्नल ऑफ इंडस्ट्रियल ईकॉलॉजी में छपे एक अध्ययन के अनुसार दुनियाभर में होने वाले ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन का 60 फ़ीसदी हिस्सा घरों में होने वाले उपभोग से होता है. इसी तरह दुनियाभर में होने वाले ज़मीन, पानी और सामग्री के इस्तेमाल का 50 से 80 फ़ीसदी घरों के द्वारा ही होता है. अध्ययन की प्रेस रिलीज़ में लिखा गया, ‘हम सब कोशिश करते हैं कि सारा दोष किसी और के मत्थे मढ़ दिया जाए. सरकारों पर, व्यापारों पर… लेकिन इस ग्रह पर पड़ने वाले असर के 60 से 80 फ़ीसदी हिस्से के लिए आम परिवार जिम्मेदार हैं. अगर हम अपने उपभोग की आदतें बदल लें तो हमारे एनवायरेन्मेंटल फुटप्रिंट (पर्यावरण को इंसानी कार्यों की वजह से होने वाला नुक़सान) पर बहुत बड़ा असर पड़ेगा.”

यानी हम चाहें तो अपनी ख़रीदारी की आदतें सुधारकर न सिर्फ सामाजिक असमानता की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ढोने से बच सकते हैं, बल्कि पर्यावरण को बरबाद होने से बचाने में अपनी भूमिका भी निभा सकते हैं. अगर हम ज़रूरत से ज़्यादा कपड़ा, खाना, पानी या ज़मीन इस्तेमाल करते हैं तो ज़ाहिर-सी बात है कि उतना खाना, पानी, कपड़ा या ज़मीन किसी और के हिस्से कम पड़ रही होगी. चूंकि हम असमानता को सिर्फ अर्थव्यवस्था के स्तर पर नाप सकते हैं खाने, पानी और कपड़े की मात्रा के अनुपात में नहीं, तो ठीक-ठीक बताना मुश्किल होगा कि इन चीज़ों का कितना उत्पादन विश्व की पूरी जनसंख्या के लिए काफी होगा. लेकिन हम यह ज़रूर जानते हैं कि कितना कपड़ा, खाना या बाकी चीज़ें हमारे लिए वाक़ई काफी हैं. तो बेहतर यही होगा कि सरकारों के बजाय हम ही तय करें कि हमें कितना उपभोग करना है और कितना बरबाद.

हमारे रोज़मर्रा के कामों के चलते पर्यावरण को होने वाले नुक़सान पर चेताने वाले डॉक्टर स्कंद शुक्ला लिखते हैं, ‘भौतिक विकास और कार्बन-उच्छ्वास दोनों साथ चलते रहे हैं. आगे नहीं चल सकेंगे. हम अपना घर फूंककर अपने हाथ नहीं ताप सकते. शुद्ध खाने को नहीं होगा, तो मॉलों में शॉपिंग किसी काम नहीं आएगी. पानी में सीसा-कैडमियम-आर्सेनिक घुले रहेंगे, तो सेडान का सुख ध्वस्त हो जाएगा. गर्म हवा में सल्फ़र डाईऑक्साइड होगी तो रियल एस्टेट अनरियल बन जाएगा. वायुमण्डल को गर्म करती कार्बन डाईऑक्साइड को जानिए. सोचिए कि हम कहां कटौती कर सकते हैं.’

डॉ शुक्ला‌ के मुताबिक जितनी गर्म पृथ्वी आज है, उतनी 11000 साल पहले थी. हमारे पास 2030 तक का समय है. उसके बाद यह चक्र चाहने पर भी लौटाया नहीं जा सकेगा. अभी भी हम अनेक मामलों में ग्रह का इतना नुकसान कर चुके हैं कि उसे संभालने और मुक्ति पाने में बहुत लंबा अरसा गुज़र जाएगा.

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