समाज | सिर-पैर के सवाल

उपवास में अन्न छोड़कर मिठाई, मेवा और कुट्टू की पूरी या पिज्जा खाने का क्या तुक है?

सवाल जो या तो आपको पता नहीं, या आप पूछने से झिझकते हैं, या जिन्हें आप पूछने लायक ही नहीं समझते

अंजलि मिश्रा | 09 अक्टूबर 2021

गौतम बुद्ध के जीवन पर लिखी एक किताब में उनके कठिन उपवास का जिक्र किया गया है. बुद्ध ने संबोधि पाने के लिए सालों तक कुछ नहीं खाया. इस प्रक्रिया के तहत उन्होंने शुरू में अन्न कम किया, फिर कुछ दिन फल खाए और उसके बाद वे भी छोड़ दिए. ऐसा उपवास करने से उनके पैर बांस जैसे पतले हो गए, रीढ़ की हड्डी रस्सी की तरह दिखाई देने लगी, सीना ऐसा हो गया जैसे किसी मकान की अधूरी छत हो और आंखें ऐसी धंस गई जैसे कुएं में पत्थर खो जाता है. कुल मिलाकर वे एक चलता-फिरता कंकाल बन चुके थे. फिर भी उन्हें वह ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ जिसकी तलाश थी. यह आदर्श उदाहरण है जो बताता है कि सिर्फ खाना-पीना छोड़ देने से न भगवान मिलते हैं, न ज्ञान.

हालांकि यह बात भी उतनी ही सही है कि उपवास से शरीर को फायदा पहुंचता है. विज्ञान बताता है कि सप्ताह में एक दिन न खाने से जहां शरीर के अंगों को आराम मिलता है तो वहीं उसमें मौजूद टॉक्सिन्स भी बाहर निकल जाते हैं. लेकिन हम यहां पर शरीर को स्वस्थ रखने के उद्देश्य के बजाय धार्मिक कारणों से रखे जाने वाले उपवासों का जिक्र कर रहे हैं. नवरात्रि, जन्माष्टमी और दूसरे त्योहारों में दिनभर उपवास रखकर शाम को पूजन के बाद प्रसाद खाने की परंपरा रही है. यहां पर सवाल यह है कि उपवास में प्रसाद के नाम पर साधारण रोटी-सब्जी छोड़कर मिठाई, मेवे, कुट्टू के आटे की पूरियां या साबूदाने की खीर खाने का क्या तुक है?

इस बात की पड़ताल करने से पहले हम जरा व्रत और उपवास का फर्क समझ लेते हैं. आमतौर पर व्रत-उपवास दोनों साथ-साथ बोले जाने वाले शब्द बन गए हैं लेकिन असल में उपवास, व्रत का एक हिस्सा भर है. व्रत यानी कोई भी संकल्प जो आप अपनी बेहतरी या ईश्वर के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए करते हैं. यह रोज घूमने का व्रत भी हो सकता है, कभी झूठ न बोलने का, रोज पूजा कर जल चढ़ाने या सप्ताह में एक दिन खाना न खाने यानी उपवास करने का भी हो सकता है.

गांधीवादी विचारक और लेखक अव्यक्त बताते हैं कि हमारे ऋषि-मुनियों ने कभी–कभार उपवास करने के फायदे जान लिए थे. इन्हें आम जनता और सामान्य समझ के लोगों तक पहुंचाया जा सके इसलिए उपवास को उनकी श्रद्धा और ईश्वर प्राप्ति की इच्छा से जोड़ दिया गया. जाहिर है कि धीरे-धीरे उपवास भगवान तक पहुंचने का रास्ता समझा जाने लगा. पीछे-पीछे इस धारणा ने भी समाज में स्थान बनाया कि उपवास से तन-मन की शुद्धि होती है और जो कि सही भी है. उपवास में फलाहार का विचार कैसे शामिल हुआ होगा, इस पर अव्यक्त बताते हैं कि दिनभर भूखे रहना सब के वश की बात नहीं है. तो हो सकता है तब ऐसे लोगों को पुरोहितों ने बीच का रास्ता निकालते हुए आसानी से पचने वाला भोजन करने की सलाह दे दी होगी. फल-दूध-मेवे इस तरह के भोजन का सहज उपलब्ध विकल्प हैं.

यह सुझाव आयुर्वेद की दृष्टि से भी सही लगता है क्योंकि फल-दूध-मेवे सात्विक भोजन की श्रेणी में आते हैं. और दार्शनिक-अध्यात्मिक ग्रंथों के मुताबिक सात्विक भोजन से अध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है और ज्ञान, विचार, पवित्रता में वृद्धि होती है. ऐसे में ईश्वर में ध्यान लगाना आसान हो जाता है. इसके उलट अन्न तामसिक भोजन की श्रेणी में आता है और शरीर में तमस गुण जैसे नींद या आलस्य पैदा करता है, जो ईश्वर और ज्ञान प्राप्ति जैसे बड़े काम तो क्या दैनिक कामों में भी बाधा बनते हैं.

अन्न छोड़कर फल खाने की बात तो फिर भी समझ आती है लेकिन कुट्टू के आटे या सेंधा नमक खाने का तुक इससे साफ नहीं होता है. अव्यक्त के पिछले जवाब पर लौटें तो हम एक संभावना यह भी पाते हैं कि बिन खाए रह पाना तो सबके लिए मुश्किल है ही, सिर्फ फलों पर गुजारा कर पाना भी सबके लिए संभव नहीं है. इसलिए हो सकता है कि तत्कालीन पुरोहितों ने उपवास का कर्मकांड बचाने और साथ ही लोगों को अधिक और गरिष्ट भोजन से भी बचाने के लिए कुछ दुर्लभ खाद्य पदार्थ खाने की सलाह दे दी होगी. इस बात के तार उस प्रवृत्ति से भी जोड़े जा सकते हैं जिसमें कठिनतम व्रत पर जोर दिया जाता है. ऐसा करने के लिए दुर्लभ भोजन विकल्पों को खोजा गया होगा. जैसे नमक के बजाय सेंधा नमक या किसी व्रत विशेष में साधारण चावल के बजाय खुद से उगने वाले विशेष तरह के चावल. यहां दुर्लभ का एक मतलब वे खाद्य पदार्थ भी हैं जो रोजाना इस्तेमाल नहीं होते.

धीरे-धीरे पाककला विशेषज्ञों ने उपवास के समय प्रयोग आने वाले इन विशेष खाद्य पदार्थों पर प्रयोग किए होंगे. इन्हीं का नतीजा है कि अब हमें तमाम तरह के फलाहारी कटलेट, कचौरी और मिठाइयां उपवास के लिए उपलब्ध होती हैं. इसे बाजार ने भी भली तरह से भुनाया है. बाजार के जानकार यह अच्छे से जानते हैं कि लोग कितने भी आधुनिक हो गए हों, धर्म के मूल संदेश के बजाय अब भी प्रतीकों में ही उलझे हुए हैं. ऐसे में बाजार ने उनकी बढ़ी हुई क्रयशक्ति का फायदा उठाते हुए फलाहारी पिज्जा और बर्गर भी परोस दिए हैं, जो श्रद्धा और धंधा दोनों को साथ ही साधते हैं.

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