दुनिया का नक्शा

समाज | कभी-कभार

विचार अब सार्वभौमिक नहीं रहे, प्रादेशिक हो गये हैं

यह समय सीमित भूगोल में ही उपभोज्य और मूल्यवान ऐसे विचारों का समय है जिन्हें विश्व-व्याप्ति की कोई महत्वाकांक्षा नहीं है

अशोक वाजपेयी | 20 जून 2021

समय की अपर्याप्तता

कहने और सहने को इस मुक़ाम पर हम घरबन्दों और घेराबन्दों के पास बहुत समय है. बिताये नहीं बीतता. फिर भी, इस अहसास से छुटकारा नहीं है कि यह समय अपर्याप्त है. यह भरा-पूरा नहीं है, इसमें बहुत कमियां हैं, हंसी-ठठ्ठा, मेल-मुलाक़ात, बहस-मुबाहिसे, बातचीत, ग़प-सड़ाका आदि नहीं हैं. जब तक यह सब और इसी तरह का बहुत कुछ न हो तब तक समय पर्याप्त महसूस नहीं होता है. खालीपन से भरे इस समय में मन हो तो किसी के पास मिलने, मिलकर बैठने, गपियाने नहीं जा सकते हैं. कहीं जाने या कुछ भी करने से पहले सोचना पड़ता है कि ऐसा करने से या करने में कोई ख़तरा तो नहीं है. वह जो बहुत सामान्य है, रोज़मर्रा का है उसको लेकर भी शंका होती रहती है. समय मानो सेनेटाइज़ किया जाकर, कई बार, दिन में बीसियों बार सैनेटाइज़ किया जाकर, जैसे सिकुड़ सा जाता है. वह खुद अपने पर शंकालु हो उठता है. वह खुद अपने ही लिये ख़तरनाक हो सकता है, अगर उसने कोई असावधानी बरती.

सावधान होकर भी समय अपर्याप्त लगता है तो इसलिए कि लगातार सावधानी अपने पर ही चौकसी बन जाती है और उससे सामान्यता अगर गायब नहीं तो बहुत कम हो जाती है. रोज़मर्रा की ज़िन्दगी कुछ अधिक ही नियमित, यांत्रिक हो गयी है. उसमें एक नया फल या ताज़ी सब्ज़ी भी एक घटना का रूप ले लेती है. दिलचस्प यह है कि इस अपर्याप्त समय में जीवन, जैसे-तैसे, फिर भी, अपनी गति से चलता जाता है: उसमें मोह-मत्सर, दूसरों के लिए चिन्ता और सहायता, सत्ता और बाज़ार की, मीडिया की निर्ममता और नीचता, मुनाफ़ाखोरी, चीज़ों की बहुतायत, बाज़ साथियों का चिर जागरूक टुच्चापन आदि सब बदस्तूर चलते रहते हैं. समय न उनकी व्याप्ति कम कर पाया, न ही अभद्रता के लिए उत्साह को स्थगित किया जा सका. कई बार यह सोचकर दहशत होती है कि इतने भयानक और आतंककारी अनुभवों से गुज़रने के बाद भी जो टुच्चे थे वे वैसे ही बने रहेंगे, जो दूसरों का शोषण कर अपना पुरुषार्थ प्रगट करते हैं वे वैसा ही करते रहेंगे, अन्याय-हिंसा-हत्या-बलात्कार सिर्फ़ कम नहीं होंगे और बढ़ जायेंगे. लुटेरे लूटते रहेंगे और भंगेड़ी अपनी नीचता के सूअर-बाड़े में अपनी मण्डली जमाते रहेंगे. यह विडम्बना ही है कि प्रकोप के कारण घिर आयी कालछाया में भी मानवीयता को स्थगित करने वाले तत्वों और शक्तियों की रोक-थाम नहीं हो पायी है.

देर-सबेर जब हम इस प्रकोप से मुक्त होकर निकलेंगे तो शायद हमारी इसकी पहचान धुंधला चुकी होगी कि हम इस कठिन समय से गुज़रकर अधिक मानवीय, अधिक संवेदनशील, अधिक सहायक होकर नहीं निकल पाये हैं. किसने सोचा था या कल्पना की थी कि ‘आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्सां होना’ की ग़ालिब-उक्ति अब भी चरितार्थ होती रहेगी!

पिछड़ता विचार

रचना आगे चलती है और अकसर आलोचना थोड़ा पीछे चलती है. विचार और विचारधाराएं आलोचना से भी पीछे चलती हैं. रचना जिस गति से बदलती है, आलोचना नहीं और विचार तो बहुत धीरे बदलता है. नयी तकनालजी ने और उसे पोसने वाली मानसिकता ने गति बहुत तेज़ कर दी है. इस तेज़ गति से हमक़दम हो सकना रचना के लिए भी कठिन हो रहा है. आलोचना इस आपा-धापी में अधीर भले लगे पर चल धीरे ही पा रही है. विचार तो निश्चय ही इस भागते अधीर समय में पश्चात्पद है.

यह बात पहले भी कही जा चुकी है कि हमारे समय में विचार मात्र की गति शिथिल हो गयी है. अभी हाल तक विचार के क्षेत्र में फ्रेंच चिंतक अग्रणी माने जाते थे और थे भी. पर यह चिन्तन, अब चिन्तन पर ही चिन्तन है: चिन्तन उसी के बारे में चिन्तित और जिज्ञासु है जो चिन्तन रचता है, उसके बारे में कम जो बाहर संसार में है या हो रहा है. स्वयं चिन्तन की भाषा अब आत्मसंदर्भित और लगातार दुरूह हो रही है. लगता है यह चिन्तन की आत्मरति का समय है. इस समय वह ज़्यादातर उस सचाई की चीर-फ़ाड़ या विश्लेषण में लगा है जो चिन्तन द्वारा रची जाती है.

अगर कट्टर इस्लामवाद, कट्टर हिन्दुत्व, कट्टर नस्लवाद आदि को विचारधारा न जाना जाये, क्योंकि उनका भूगोल सीमित है और वे विश्वव्यापी वृत्तियां नहीं हैं, तो यह समय विचारधाराओं के स्थगन का समय है. दशकों से चली आ रही विचारधाराएं हैं पर उनमें न तो नयी चुनौतियों की शिनाख़्त है और न ही तेज़ी से बदल रहे बौद्धिक-सर्जनात्मक परिदृश्य की कोई नयी समीक्षा. उनमें अवस्थित यूटोपिया अब और धुंधले लगते हैं. उनसे कोई नया और समग्र वैकल्पिक महास्वप्न उभरता नज़र नहीं आता.

शायद मनुष्य अब विचार करने से थक और ऊब रहा है. शायद अब हम सारी मानव जाति के लिए विचार करना ज़रूरी नहीं समझते. शायद अब सीमित भूगोल में ही उपभोज्य और मूल्यवान विचारों का यह समय है जिन्हें विश्व-व्याप्ति की कोई महत्वाकांक्षा नहीं है. शायद इस वृत्ति को विचारों की प्रादेशिकता की वृत्ति कहा जा सकता है. शायद अखिलता अब ज़रूरी नहीं रह गयी है. शायद यह विडम्बना है कि जब नयी तकनालजी, विश्व का भूमण्डलीकरण, संचार और यातायात के नये साधन एक विश्व-ग्राम बना रहे हैं, तब विश्व में विचारों की प्रादेशिकता पनप रही है. कई महान विचारों के कारण महान उत्पात, असन्तुलन, तनाव और नरसंहार आदि हुए हैं. इसलिए अगर अब कोई ऐसा सर्वव्यापी विचार नहीं है तो इन सबसे उसकी विकराल विकृतियों से बचने की सुविधा हो पायेगी. मुश्किल सिर्फ़ यह है कि मनुष्य रचता तो है पर नष्ट भी करता चलता है. उसकी इस द्वन्द्वात्मकता से मुक्ति कहां हो सकती है, भले विचार अब प्रादेशिकता में ही विकसित-पोषित हों?

हंसने की नीचता

इस यहूदी कहावत का कई बार ज़िक्र करता रहा हूं: ‘ईश्वर के सामने रोओ, आदमी के सामने हंसो.’ उपन्यासकार मिलान कुन्देरा ने कभी कहा था कि अपनी ‘रचना विचित्र’ देखकर ईश्वर अट्टहास करता है और उपन्यास, कम से कम पश्चिम में, ईश्वर के अट्टहास से उपजा है. यह हंसना दूसरों की बेचारगी, मुफ़लिसी, निरुपायता, राजनैतिक या धार्मिक या आर्थिक फंसाव-अलगाव पर हंसना नहीं होता. यह हंसना दूसरों पर फ़ैसला लादना नहीं, उन्हें अपनी विडम्बना में सजग होकर शामिल करना है. यह हंसना अकसर अपने ऊपर हंसना है.

इस समय लाखों किसान भयानक सर्दी-बारिश और मुश्किलों के बीच आन्दोलन कर रहे हैं और सत्तारूढ़ शक्तियां और गोदी मीडिया उनकी वाजिब ज़िद को अड़ियलपन क़रार देकर उन पर हंस रही हैं. यही नहीं, लगता है कि अदालतें भी उन पर हंस रही हैं. ‘यह हंसी बहुत कुछ कहती’ है. समस्या को उसकी गहरी मानवीयता में न समझ कर कोई हल निकालने के बजाय उन्हें चैनलों और अख़बारों में उपहास का पात्र बनाया जा रहा है. सच तो यह है कि ऐसा हंसना नीचता की अभिव्यक्ति है. सत्ता पाते ही राजनीति से सारी मानवीयता का क्षरण लोकतंत्र को क्षत-विक्षत करने जैसा है. लोकतांत्रिक पद्धति से पायी गयी सत्ता उसी लोकतंत्र को कुतर रही है, उसमें लगातार कटौती का सुनियोजित प्रयत्न कर रही है.

गणतंत्र दिवस पर कुछ घुसपैठिये तत्‍वों द्वारा जो हिंसा आदि हुई उनसे किसान आन्‍दोलन ने फ़ौरन ही अपने को अलग कर लिया था. इन पंक्तियों के लिखे जाने तक वातावरण बेहद अभद्र, फूहड़ और नीच बना हुआ है. इसमें जो हंस रहे हैं, उनका हिसाब समय और इतिहास चुकता करेंगे. यह आश्वासन पर्याप्त नहीं लगता. फिर भी, ऐसे तो करोड़ों हैं जो अपने लोकतंत्र के लिए इस समय रो रहे हैं. इसकी अनदेखी-अनसुनी तो होगी, हो रही है. इसी से उम्मीद निकलती है. उम्मीद ऐसे आंसुओं की नदी में बहकर ही आयेगी.

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