एडोल्फ हिटलर

दुनिया | पुण्यतिथि

एडोल्फ हिटलर की मौत के बाद की कहानी भी उतनी ही विचित्र है जितनी उससे ठीक पहले की

जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर ने 30 अप्रैल 1945 को बर्लिन में आत्महत्या की थी

राम यादव | 30 अप्रैल 2021 | फोटो: हिस्ट्री ऑन द नेट

एडोल्फ हिटलर जब कभी दक्षिणी जर्मनी के बवेरियाई आल्प्स पर्वतों की गोद में बसे बेर्शतेसगाडन के अपने निजी बंगले ‘बेर्गहोफ़’ में होता था, तब उसके लिए भोजन पास के ही एक अस्पताल की रसोई से आया करता था. 1944 की वसंत ऋतु थी. हिटलर कुछ दिनों के लिए एक बार फिर वहां था. इस बीच कोंस्तान्त्से मन्त्सियार्ली नाम की एक आकर्षक युवती उस अस्पताल की रसोई में खाना बनाना सीख रही थी. वही हिटलर के लिए भी खाना बनाती थी. हिटलर को उसका बनाया खाना इतना पसंद आने लगा कि उसने कहा कि बनाने वाली स्वयं आकर उसे खाना परोसा करे.

हिटलर से सभी डरते थे. कोंस्तान्त्से भी. लेकिन मना भी नहीं कर सकती थी. भाग्य ने कुछ ऐसा मोड़ लिया कि उन्हीं दिनों पता चला कि हिटलर के भोजन में किसी जानलेवा मिलावट का पता लगाने के लिए जो महिला हिटलर से पहले भोजन चखा करती थी, वह ‘’शुद्ध आर्य’’ नहीं थी, यहूदी मिश्रण वाली थी! उसकी छुट्टी कर दी गयी. तब कोंस्तान्त्से मन्त्सियार्ली से संपर्क किया गया. उसने हिटलर की एक टाइपिस्ट क्रिस्टा श्रोएडर से राय ली. श्रोएडर ने पेशक़श मान लेने की सलाह दी.

पाककला के साथ संगीतकला भी

कोंस्तान्त्से अच्छी पियानोवादक भी थी. उसका पारिवारिक नाम ‘मन्त्सियार्ली’ संगीतकार मोत्सार्ट की पत्नी का भी पारिवारिक नाम था. हिटलर को यह बात और अधिक जंचती थी. यह सारी कहानी एक इतिहासकार ने, कुछ ही वर्ष पूर्व, कोंस्तान्त्से मन्त्सियार्ली के लिखे कोड-शब्दावली वाले कुछ अबूझ पत्रों के आधार पर प्रकाशित की है. हिटलर को उसका जंचना अंततः उसके भी दारुण अंत का आरंभ बना.

वास्तव में, हिटलर ने जिस किसी को अपने साथ लिया, उसका अंततः बंटाढार ही हुआ. उसके छेड़े द्वितीय विश्वयुद्ध के हर मोर्चे पर जर्मनी की जब हार होने लगी, तब 16 जनवरी 1945 से वह अपने राइश-चांसलर कार्यालय के लॉन में बने तीन मीटर मोटी दीवारों वाले भूमिगत बंकर में रहने लगा था. कोंस्तान्त्से मन्त्सियार्ली ने, 15 अप्रैल 1945 को, हिटलर के इसी बंकर में अपना 25 वां जन्मदिन मनाया था. एक साल से वही हिटलर के लिए खाना बना रही थी.

हिटलर के थे कई शारीरिक-मानसिक कष्ट

एडोल्फ हिटलर का पेट काफ़ी नाज़ुक था. उसे पार्किन्सन-रोग सहित कई शारीरिक व मानसिक कष्ट थे. इसीलिए वह पथ्य, यानी सादा खाना लिया करता था. कोंस्तान्त्से के जन्मदिन के पांच दिन बाद, 20 अप्रैल को, हिटलर ने भी बंकर में ही अपना 56वां जन्मदिन मनाया. कहते हैं कि उस दिन की दावत में शैम्पेन (सबसे महंगी शराब) ख़ूब बही थी.

दो दिन बाद, 22 अप्रैल को, हिटलर ने अपने सबसे वरिष्ठ जनरल विलहेल्म काइटेल को बुला कर इच्छा प्रकट की कि वह लड़ाई के अंत तक बर्लिन में ही रहेगा. जर्मन सेना ‘वेयरमाख़्त’ यदि बर्लिन की – यानी स्वयं हिटलर की – रक्षा नहीं कर पायी, सोवियत सैनिकों ने बर्लिन पर क़ब्ज़ा कर लिया, तो वह अपने आप को गोली मार लेगा. हिटलर समझ गया था कि अब उसके पास अधिक समय नहीं है. अपने बाक़ी काम उसे जल्दी ही निपटा देने हैं. अपने मुख्य एड्जुटैंट (सहायक) यूलियुस शाउब को उसने आदेश दिया कि वह बर्लिन, म्युनिक और बेर्गहोफ वाली उसकी निजी तिजोरियों में रखे सारे कागज़-पत्र जला दे.

ग्यौएरिंग का अजीब तार

23 अप्रैल के दिन हिटलर को वायुसेना अध्यक्ष राइशमार्शल हेर्मान ग्यौएरिंग का एक अजीब तार (टेलीग्राम) मिला. ग्यौएरिंग ने बेर्शतेसगाडन से लिखा था कि हिटलर यदि बर्लिन में ही जमा रहता है और रात 10 बजे तक तार का जवाब नहीं देता, तो वह (ग्यौएरिंग) जून 1941 की एक व्यवस्था के अनुसार, समस्त अधिकारों के साथ अपने आप को उसका उत्ताराधिकारी घोषित कर देगा. हिटलर ने इसे अपना तख्ता पलटने का एक षड़यंत्र माना. अपने सबसे भरोसेमंद अधिकारी, नाज़ी पार्टी के प्रमुख मार्टिन बोरमान द्वारा रेडियो-संदेश भिजवाया कि ग्यौएरिंग के सभी पद छीन लिये गये हैं. उसे तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाये. यही हुआ.

25 अप्रैल से सोवियत सेना ने बर्लिन को घेर लिया था. समझा जाता है कि 27 अप्रैल के दिन हिटलर ने तय कर लिया था कि वह सोवियत सेना के हाथों में पड़ने के बदले आत्महत्या कर लेगा. 28 अप्रैल को उसे ख़बर मिली कि उसका डिप्टी, हाइनरिश हिमलर, युद्ध में जर्मनी के विरोधी मित्रराष्ट्रों के साथ कई महीनों से गोपनीय शांतिवार्ताएं कर रहा था. हिमलर को भी उसने तुरंत पद व पार्टी से निकाल बाहर किया. हिमलर तो उसके हाथ नहीं लगा, अतः अपनी भड़ास उतारने के लिए उसने हिमलर के अधीनस्थ ‘वाफ़न-एसएस’ (नाज़ी पार्टी की सशस्त्र सैनिक इकाई) के एक ऊंचे अफ़सर को गोली से उड़वा दिया.

मध्यरात्रि को शादी रचायी

उसी 28 अप्रैल वाली मध्यरात्रि को हिटलर ने लंबे समय की अपनी प्रेमिका एफ़ा ब्राउन के साथ अपने बंकर में ही शादी रचायी. उसका प्रचारमंत्री गोएबल्स इस विवाह का साक्षी बना. प्रचार मंत्रालय के ही एक अधिकारी ने विवाह की विधिवत रजिस्ट्री की. हिटलर ने उसी रात अपनी टाइपिस्ट ट्राउडल युंगे को सामने बिठा कर अपना वसीयतनामा लिखवाया. वसीयत का निजी हिस्सा बहुत छोटा था. उसमें उसने लिखवाया कि वह अब जीना नहीं चाहता. उसके पास जो भी संपत्ति है, उसे वह पार्टी और देश के नाम कर रहा है.

वसीयत के राजनैतिक हिस्से में हिटलर ने प्रथम विश्वयुद्ध से मिली सीख और द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू करने के बारे में अपनी सोच-समझ वाले तर्क पेश किये. स्वयं को निर्दोष बताते हुए दावा किया कि वह युद्ध नहीं चाहता था, युद्ध उस पर थोपा गया. पोलैंड पर 1 सितंबर 1939 को आक्रमण से तीन दिन पहले तक वह ब्रिटेन से वार्ताएं करता रहा. उसने जो कुछ किया, अपने देश और जनता के प्रति निष्ठा व प्रेम के चलते किया. युद्ध तो ‘’उन स्वार्थी अंतरराष्ट्रीय राजनेताओं ने थोपा, जो या तो स्वयं यहूदी थे, या यहूदियों के बहकावे में आ गये थे.’’

वसीयत में उत्तराधिकारी भी तय किये

वसीयत के इस राजनैतिक हिस्से में ही हिटलर ने अपने उत्तराधिकारी भी तय कर दिये. नौसेनाध्यक्ष एडमिरल कार्ल ड्यौएनित्स को जर्मन राइश (साम्राज्य) का राष्ट्रपति बनाया और अपने प्रिय ढिंढोरची योज़ेफ गोएबल्स को राइश-चांसलर (प्रधानमंत्री). वसीयत लिखवाने का यह काम 29 अप्रॆल की सुबह चार बजे तक चलता रहा. वसीयत का अंतिम वाक्य था, ‘’मैं राष्ट्र के इन नेताओं को वचनबद्ध करता हूं कि वे विश्व के जनगण के बीच ज़हर घोल रहे अंतरराष्ट्रीय यहूदीवाद के विरुद्ध निष्ठुर प्रतिरोध दिखाने वाले (हमारे) नस्ली अधिनियमों का पूरी बारीक़ी से पालन करेंगे.’’ वसीयतनामे पर हिटलर के अलावा उसकी नाज़ी पार्टी के दो तथा सेना के दो उच्चपदस्थ अधिकारियों ने हस्ताक्षर किये.

29 अप्रैल की ही शाम को हिटलर ने सुना कि उसके परम मित्र, इटली के तानाशाह बेनीतो मुसोलिनी और उसकी प्रेमिका को, कम्युनिस्टों ने मौत के घाट उतार दिया है. मुसोलिनी के शव को जनता द्वारा पीटे जाने के लिए सरेआम लटका दिया गया है. इस ख़बर से हिटलर हिल गया और आत्महत्या का उसका इरादा संभवतः और भी पक्का हो गया. बर्लिन पर तब तक एक हज़ार से अधिक बम गिर चुके थे. हिटलर का चांसलर-कार्यालय पहले ही ध्वस्त हो चुका था. सोवियत सैनिक अपनी तोपों और टैंकों के साथ बर्लिन में पहुंच चुके थे. जर्मन सेना उन्हें रोक नहीं पा रही थी. हिटलर किसी भी हालत में सोवियत सैनिकों के हाथों में नहीं पड़ना चाहता था. उसकी भी मुसोलिनी जैसी दुर्गति हो सकती थी.

सबको आत्महत्या के लिए संखिया बांटा

30 अप्रैल की दोपहर हिटलर ने अपनी नाज़ी पार्टी के अंतिम प्रमुख मार्टिन बोरमान, अपनी टाइपिस्ट ट्राउडल युंगे तथा कोन्स्टान्त्से मन्त्सियार्ली सहित उन शेष बचे लोगों से विदा ली, जो तब तक बंकर में ही थे. सबको आत्महत्या के लिए संखिया-विष की छोटी-छोटी शीशियां बांटीं और कहा कि जो कोई निजी जोखिम पर बंकर से बाहर जाना चाहता है, जा सकता है. विष की घातकता हिटलर की अलशेसियन कुतिया पर पहले ही आजमा ली गयी थी.

तीसरे पहर साढ़े तीन बजे, एफ़ा ब्राउन ने बंकर में हिटलर के काम करने के कमरे में ज़हर निगला. उसी क्षण हिटलर ने भी 7.65 मिलीमीटर की नली वाली अपनी पिस्तौल को दाहिनी कनपटी रख कर अपने सिर में गोली मार ली. उसका निजी सेवक हाइंत्स लिंगे कुछ ही मिनट बाद कमरे में आया. दोनों शवों को कंबलों में लपेटा और नाज़ी पार्टी के दो ‘एसएस’ सैनिकों की मदद से चांसलर कार्यालय के लॉन में ले जाकर जला दिया. दोनों शवों को अधिकतम सीमा तक जलाने के लिए काफी पेट्रोल उड़ेला गया. शवों के बचे-खुचे हिस्से को, कुछ अन्य शवों के साथ, बम गिरने से बंकर के पास बने एक गढ्ढे में डाल कर दफ़ना दिया गया. बाद में सोवियत सैनिकों को हिटलर के बदले यही सब मिला.

मृत्यु की शाम का खाना नहीं खाया

हिटलर के जो भी कर्मचारी व सहयोगी उसके मरने के समय तक चले नहीं गये थे, वे बंकर के रसोईघर में जमा हुए. उनके बीच 25 साल की कोंस्तान्त्से मन्त्सियार्ली भी थी जो रो रही थी और कह रही थी कि हिटलर ने उससे शाम के खाने के लिए मसले हुए आलू के साथ अंडे की भुर्जी बनाने को कहा था. उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे. हिटलर की आत्महत्या के कुछ ही घंटे बाद, उसके ढिंढोरची योज़ोफ़ गोएबेल्स ने भी पांच सदस्यों के अपने पूरे परिवार के साथ आत्महत्या कर ली.

जर्मन सेना की सर्वोच्च कमान ने हिटलर की मृत्यु का समाचार अगले दिन, 1 मई को दिया. जर्मन रेडियो के हैम्बर्ग स्टेशन से प्रसारित यह समाचार भी झूठ की पराकाष्ठा था. उसमें कहा गया था, ‘’फ्युअरर (नेताजी) के मुख्यालय से ख़बर आयी है कि हमारा फ्युअरर, एडोल्फ़ हिटलर, राइश चांसलर कार्यालय में स्थित अपने कमान केंद्र में, बोल्शेविकों (रूसी कम्युनिस्टों) के विरुद्ध अंतिम सांस तक लड़ते हुए, आज तीसरे पहर वीरगति को प्राप्त हुआ.’’ अगले ही दिन, यानी 2 मई को, पूरे बर्लिन पर सोवियत सेना का क़ब्ज़ा हो गया था.

चारों ओर मौत और असुरक्षा

हिटलर की रसोंइया, 25 साल की कोंस्तान्त्से मन्त्सियार्ली के भाग्य के बारे में इतना ही पता है कि 2 मई वाले दिन ही वह ‘एसएस’ के एक ब्रिगेडियर की अगुवाई में, हिटलर के बंकर में रह गये कुछ अन्य लोगों के साथ, बंकर से बाहर निकली. बर्लिन उस समय तक खंडहर बन चुका था. चारो ओर मौत और असुरक्षा पसरी हुई थी. इन कुछ लोगों का लक्ष्य किसी तरह बर्लिन के नगर-केंद्र तक पहुंचना और वहां अपने लिए कोई सुरक्षित जगह ढ़ूंढना था.

हिटलर की टाइपिस्ट ट्राउडल युंगे भी इसी टोली में थी. युंगे को सबसे अधिक डर इस बात का लग रहा था कि कोंस्तान्त्से मन्त्सियार्ली बहुत युवा और आकर्षक है. ठीक वैसी, जैसी हर रूसी मर्द अपने लिए चाहेगा. ऊपर से उसने जर्मन ‘वेयरमाख्त’ के सैनिकों वाला एक जैकेट पहन रखा था. रूसी सैनिकों का ध्यान आकर्षित करने और उन्हें भड़काने के लिए यह जैकेट ही काफ़ी होता. संभवतः यही हुआ. यह टोली अगले दिन एक जगह पानी के पीने लिए रुकी. कोंस्तान्त्से ने कहा कि वह अपने लिए कुछ दूसरे कपड़ों की जुगाड़ करने जा रही है. ट्राउडल युंगे ने कुछ देर बाद देखा कि रूसी लाल सेना के दो सैनिक उसे बर्लिन की भूमिगत रेल की एक सुरंग की तरफ़ ले जा रहे हैं. उसने ऊंची आवाज़ में इतना ही कहा, ‘’ये लोग मेरे पेपर देखना चाहते हैं.’’

अभागी कोंस्तान्त्से मन्त्सियार्ली

इसके बाद कोंस्तान्त्से मन्त्सियार्ली का फिर कभी पता नहीं चला. हिटलर की सचिव और टाइपिस्ट ट्राउडल युंगे को शक था उसके साथ भी वही हुआ होगा, जो उन दिनों बहुत सी जर्मन युवतियों और महिलाओं के साथ हुआ था – पहले बलात्कार… फिर गोली. ट्राउडल युंगे की 80 वर्ष की आयु में 2002 में म्युनिक में मृत्यु हुई.

किंतु, हिटलर की कथित आत्महत्या के साथ ही कहानी ख़त्म नहीं हो जाती. 30 अप्रैल 1945 के कई दशक बाद तक अफ़वाहें उड़ती रहीं, दावे होते रहे कि ‘’हिटलर ज़िंदा है.’’ उसका कट्टर शत्रु, सोवियत तानाशाह योज़ेफ़ स्टालिन भी ऐसी अफ़वाहों और दावों को हवा दिया करता था. सोवियत गुप्तचर सेवा ‘केजीबी’ को ही नहीं, अमेरिकी गुप्तचर सेवाओं ‘सीआईए’ और ‘एफबीआई’ को भी लंबे समय तक यही लग रहा था कि अपने कई अन्य ऊंचे अधिकारियों और साथियों की तरह हिटलर भी, सबको चकमा देकर, कहीं न कहीं भाग गया होगा.

कथित ‘प्रत्यक्षदर्शियों’ के दर्जनों बयान

इन एजेंसियों की फ़ाइलों में ऐसे दर्जनों कथित ‘प्रत्यक्षदर्शियों’ के बयान हैं, जिनमें ये दावे किये गये हैं कि हिटलर को ‘’बर्लिन में ही एक विमान में चढ़ते देखा’’ या फ़ासिस्ट तानाशाह ‘’फ्रांको के स्पेन में देखा’’. ऐसे लोगों की संख्या सबसे अधिक है, जिन्होंने हिटलर को लैटिन अमेरिकी देश अर्जेन्टीना में देखने के दावे किये हैं. कुछ लोगों ने तो वहां हिटलर और एफ़ा ब्राउन, दोनों को एक साथ देखने के दावे किये. इस बारे में कई पुस्तकें लिखी गयी हैं और डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में भी बनी हैं.

20 अप्रैल 1945 के दिन अपना 56वां जन्मदिन मनाने वाला हिटलर, 10 दिन बाद यदि आत्महत्या का झूठा नाटक रच कर बच भी निकला हो, तब भी पिछले 75 वर्षों में निश्चित रूप से इस दुनिया से जा चुका होगा. सच यह भी है कि उसकी आत्महत्या के 11 वर्ष बाद, जर्मनी में बेर्शतेसगाडन की एक अदालत ने, लंबी सुनवाई के बाद, 25 अक्टूबर 1956 को उसे अंतिम रूप से मृत माना.

हिटलर को मृत घोषित करने की याचिका

जर्मनी के पड़ोसी और हिटलर की मातृभूमि रहे ऑस्ट्रिया के एक वकील हेर्बर्ट एगश्टाइन ने, 29 जुलाई 1952 को, बेर्शतेसगाडन की अदालत में एक याचिका दायर की. वह हिटलर को विधिवत मृत घोषित करवाना चाहता था, ताकि ऑस्ट्रिया में ज़ब्त उसकी संपत्तियों के बारे में विवादों का निपटारा हो सके. मुख्य विवाद एक डच कलाकार की बनायी एक पेंटिंग को लेकर था. हिटलर ने उसे ऑस्ट्रिया के एक नागरिक पर दबाव डाल कर सस्ते में ख़रीदा था. वह व्यक्ति पेंटिंग वापस चाहता था. हिटलर के निजी सेवक हाइंत्स लिंगे व एड्जुटैंट ओटो ग्युन्शे जैसे जीवित लोगों के बयान सुनने के बाद अदालत ने उसे मृत घोषित किया.

इसके बाद भी अटकलों और अफ़वाहों का बाज़ार ठंडा नहीं पड़ रहा था. फ्रांस के अनुरोध पर रूसी गुप्तचर सेवा ‘एफ़एसबी’ ने 2017 में, फ्रांस के पांच फ़ोरेंसिक वैज्ञानिकों की एक टीम को मॉस्को आकर वहां रखे हिटलर की खोपड़ी के टुकड़ों और जबड़े की जांच करने की अनुमति प्रदान की. फ्रांसीसी टीम मार्च और जुलाई 2017 में वहां गयी. टीम ने पाया कि जांच के लिए उसे दी गयी खोपड़ी की एक हड्डी में एक छेद था, जो संभवतः किसी गोली से बना होना चाहिये. यानी, हिटलर ने अपने सिर में गोली मारी रही होगी.

हिटलर शाकाहारी था!

टीम के प्रवक्ता फ़िलिप शार्लिय़ेर का कहना था कि मॉस्को में उन्हें जो दांत दिखाये गये, वे भी हिटलर के ही होने चाहिये. इन दांतों का मिलान उन्होंने हिटलर की मृत्यु से पहले के उसके सिर के एक्स-रे चित्र से किया और पाया कि दोनों में कोई विसंगति नहीं है. उसके दांत बहुत अच्छे नहीं थे. कुछ नकली दांत भी थे. दांत मांसाहारी नहीं, बल्कि शाकाहारी होने की पुष्टि करते थे.

फ़िलिप शार्लिय़ेर का यह भी कहना था कि वे नहीं बता सकते कि हिटलर की मृत्यु ज़हर से हुई या गोली से. सारी संभावना यही लगती है कि उसने दोनों का उपयोग किया. गोली के किसी दांत से टकराने के संकेत नहीं मिले. इसका अर्थ था कि गोली मुंह में नहीं, बल्कि सिर या गर्दन की तरफ से दागी गयी थी. नकली दांतों पर नीले रंग का एक निक्षेप मिला, जो हो सकता है संखिया और नकली दांतों की धातु के बीच रासायनिक क्रिया से बना हो.

फ्रांसीसी टीम की यह खोज ‘यूरोपीयन जर्नल ऑफ़ इन्टर्नल मेडिसिन’ में प्रकाशित भी हुई है. फ़िलिप शार्लिय़ेर ने हिटलर के बारे में अफ़वाहों और अटकलों की चुटकी लेते हुए कहा – ‘’वह किसी पनडुब्बी से अर्जेन्टीना नहीं भागा था. उत्तरी ध्रुव पर के किसी गुफ्त अड्डे पर भी कहीं नहीं छिपा था और न ही चंद्रमा के अंधेरे हिस्से में रह रहा था.’’


बतौर पत्रकार पूर्वी, पश्चिमी और आज की जर्मनी में काम कर चुके राम यादव डॉयच वेले की हिंदी सेवा के प्रमुख रह चुके हैं.

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