बर्ड फ्लू: क्या 2026 भी महामारी का साल बनने जा रहा है?
2020 में दुनिया एक महामारी देख चुकी है. अब वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि एक और वायरस — बर्ड फ्लू — धीरे-धीरे उसी दिशा में बढ़ रहा है

दिसंबर 2025 में केरल में लगभग एक लाख पक्षी बर्ड फ्लू से मर गए. फरवरी के पहले हफ्ते में भारी संख्या में कौओं की मौतों के बाद तमिलनाडु सरकार ने भी राज्य में बर्ड फ्लू की चेतावनी जारी की थी. फरवरी के अंत तक बिहार के पॉल्ट्री फार्म्स में भी यह संक्रमण देखा गया. इसके चलते प्रशासन को वहां हज़ारों मुर्गियों को मारकर गहरे गड्ढों में दफनाना पड़ा. मार्च के महीने में हर हफ्ते एक नए प्रदेश का नाम इस फेहरिस्त में शामिल हो रहा है. इनमें सबसे नए राज्य महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ हैं.
अब इसके मामले दुनिया के लगभग हर महाद्वीप में दर्ज किए जा रहे हैं. हालात ऐसे हैं कि इस वक्त केवल ऑस्ट्रेलिया ही इस संक्रमण से बचा हुआ है. अमेरिका इस समय बर्ड फ्लू से सबसे अधिक प्रभावित देशों में से एक है. उधर ब्रिटेन, नीदरलैंड और पोलैंड जैसे यूरोपीय देशों को भी इसकी रोकथाम के लिए हरसंभव प्रयास करने पड़ रहे हैं.
दशकों से पक्षियों में सीज़नल फ्लू की तरह देखे जाने वाले, बर्ड फ्लू संक्रमण का पैटर्न बीते 5-6 सालों में बहुत तेज़ी से बदला है. इस अंतराल में बर्ड फ्लू से प्रभावित पशु-पक्षियों की मौत से जुड़े आंकड़े लगातार बढ़े हैं. बीते एक साल से इंसानों में भी इसके संक्रमण की संख्या न केवल बढ़ी है बल्कि दुनिया के सुदूर कोनों में भी बर्ड फ्लू के मामले देखने को मिल रहे हैं. वैज्ञानिक आशंका जता रहे हैं कि आने वाले समय में यह संक्रमण भी कोरोना वायरस की तरह एक वैश्विक महामारी की वजह बन सकता है.
बर्ड फ्लू या एवियन इन्फ्लुएंजा क्या है?
बर्ड फ्लू या एवियन इन्फ्लुएंजा मुख्य रूप से, प्रवासी पक्षियों में इन्फ्लुएंजा ए वायरस के संक्रमण से फैलता है. इन्फ्लुएंजा कोई नया वायरस नहीं है. इसके चलते 2009 में स्वाइन फ्लू नाम की महामारी फैली थी. मैक्सिको से शुरू होने वाली यह महामारी सबसे पहले स्वाइन यानी सुअरों में देखी गई और फिर उनसे इंसानों तक पहुंची. यह महामारी दुनियाभर में लगभग तीन लाख लोगों की मौत का कारण बनी थी. स्वाइन फ्लू, इन्फ्लुएंजा ए के H1N1 सबटाइप के कारण फैला था जो आज भी इंसानों को परेशान कर रहा है.
एवियन इन्फ्लुएंजा का हालिया संक्रमण जिस H5N1 सबटाइप के कारण फैल रहा है वह पहली बार दक्षिणी चीन में 1997 में पाया गया था. 2005 से प्रवासी पक्षियों के ज़रिए यह पूरी दुनिया में फैलना शुरू हुआ. H5N1 वायरस का एक नया रूप — clade 2.3.4.4b — साल 2020 में उभरा जो यूरोप से निकलकर अफ्रीका, पश्चिमी एशिया और एशिया के बाकी हिस्सों तक पहुंचा. 2021-22 के दौरान इस वायरस ने जंगली पक्षियों और पॉल्ट्री पर भी अपना प्रकोप दिखाया. पहली बार, लोमड़ी और सील जैसे स्तनधारी (मैमल्स) जीव भी इससे प्रभावित पाए गए.
2022 के बाद H5N1 के मामलों का दायरा और बढ़ा और कई देशों में छिटपुट मानव संक्रमण भी दर्ज होने लगे. लेकिन राहत इस बात की थी कि इंसानों में यह विषाणु आम तौर पर संक्रमित पॉल्ट्री के संपर्क में आने पर ही फैल रहा था. 2023 में यह वायरस ध्रुवीय क्षेत्रों के जीवों तक भी पहुंच गया. साल 2024 में H5N1 बर्ड फ्लू पहली बार डेयरी पशुओं में भी देखा गया और इनके ज़रिए मानव संक्रमण की दर में भी इज़ाफा होने लगा.
हाइली पैथोजेनिक एवियन इन्फ्लुएंजा (एचपीएआई) या H5N1 विषाणुओं को अत्यधिक संक्रामक माना जाता है. ये वायरस पक्षियों के लार और मल आदि के जरिए वातावरण में आते हैं और अन्य जानवरों और पक्षियों में तेजी से फैलते हैं. उदाहरण के लिए कौए और अन्य प्रवासी जलपक्षी जब पालतू जानवरों के फार्म्स, पॉल्ट्री फार्म्स या जलस्रोतों के संपर्क में आते हैं तो इस संक्रमण के वाहक बन जाते हैं. इंसानों के मामले में राहत की बात यह है कि अभी तक यह संक्रमित जीवों के सीधे संपर्क में आने वालों में ही पाया गया है.
क्या बर्ड फ्लू का मानव महामारी बनना तय है?
विशेषज्ञ बताते हैं कि महामारी जीवों की सिर्फ एक प्रजाति तक सीमित नहीं रहती. इसके जानवरों से इंसानों और फिर इंसानों से जानवरों में फैलने (स्पिलबैक) का खतरा हमेशा बना रहता है. कोविड-19 और H5N1 के शुरूआती मामलों में ऐसा देखा जा चुका है. स्पिलबैक होने पर वायरस का जेनेटिक कोड बदलता है और वह अधिक शक्तिशाली (म्यूटेटेड) होकर इंसानी महामारी में बदल सकता है. इसका मतलब यह है कि महामारी को रोकने के लिए सिर्फ इंसानों पर ही ध्यान देना काफी नहीं है, जानवरों और उनके पर्यावरण को भी सुरक्षित बनाना जरूरी है.
कुछ वैज्ञानिक आशंका जताते हैं कि बर्ड फ्लू, मानवीय महामारी बनने से महज़ एक ही कदम या म्यूटेशन दूर भी हो सकता है. मनुष्य H5N1 से पूरी तरह सुरक्षित तो अभी भी नहीं है, लेकिन अब तक इंसानों में इसका संक्रमण सीमित रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के आंकड़े बताते हैं कि जनवरी 2003 से नवंबर 2025 के बीच 25 देशों के कुल 992 लोगों में ही यह वायरस पाया गया है. चिंता की बात यह है कि इनमें से लगभग आधे (476) लोगों की मृत्यु हो गई. यानी हर दो संक्रमित लोगों में से लगभग एक. और बीते एक साल में मानव संक्रमण की संख्या और दर भी बढ़ गए हैं.
“जंगली जानवरों में होने वाला एवियन इन्फ्लुएंजा, अब पूरी तरह से नियंत्रण के बाहर है. यह दुनिया-भर में फैल रहा है. फिलहाल, जानवरों को बड़ी संख्या में मारने के अलावा, इसे रोकने का कोई और उपाय नहीं है,” ग्लासगो यूनिवर्सिटी में मोलिक्यूलर और सेल्युलर वायरोलजी के प्रोफेसर डॉ एड हचिन्सन बीबीसी की साइंस फ़ोकस पत्रिका को बताते हैं.
डॉ हचिन्सन और अन्य वैज्ञानिक लगातार यह चेतावनी दे रहे हैं कि एवियन इन्फ्लुएंजा वायरस बहुत तेजी से इवॉल्व हो रहा है और पिछले स्ट्रेन्स की तुलना में इसमें हवा के ज़रिए फैलने की क्षमता ज्यादा है. दुनिया के अलग-अलग कोनों और नई-नई प्रजातियों तक पहुंचने से इसकी आशंका लगातार बढ़ रही है.
इस खतरे को समझने के लिए अशोका यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने हाल ही में एक अध्ययन किया था. इन शोधकर्ताओं ने ‘भारतसिम’ नाम के स्टिमुलेशन प्लेटफॉर्म की मदद से एक ऐसे काल्पनिक दक्षिण भारतीय गांव का मॉडल बनाया जो एक बहुत बड़ा पॉल्ट्री केंद्र भी है. इस मॉडल के ज़रिये यह देखा गया कि यदि वायरस संक्रमित पक्षी से किसी इंसान तक पहुंच जाता है तो वह आगे कैसे फैलता है. अध्ययन बताता है कि शुरूआती दो मामलों के सामने आते ही अगर उन्हें बाकी समुदाय से अलग कर दें तो बर्ड फ्लू के संक्रमण को रोका जा सकता है. लेकिन अगर संक्रमित इंसानों की संख्या 10 के आसपास पहुंच जाती है तो इसके बुरी तरह से फैलने की आशंका बहुत ज़्यादा हो जाती है.
अशोका यूनिवर्सिटी का अध्ययन बताता है कि सही समय पर हस्तक्षेप करने से बर्ड फ्लू को महामारी बनने से रोका जा सकता है. इसके लिए संक्रमित पक्षियों को जल्दी खत्म करने, संक्रमित लोगों और उनके संपर्क में आए लोगों को क्वारंटीन करने और इस वायरस के आसानी से संपर्क में आ सकने वाले लोगों के टारगेटेड वैक्सीनेशन जैसे उपाय किये जा सकते हैं.
दुनिया इस वायरस से निपटने के लिए क्या कर रही है?
किसी भी और महामारी की तरह, बर्ड फ्लू के लिए भी वैक्सीनेशन को एक संभावित समाधान की तरह देखा जा रहा है. रिपोर्ट्स बताती हैं कि डब्ल्यूएचओ बीते लगभग दो सालों से इस वायरस के वैक्सीन कैंडिडेट्स की समीक्षा कर रहा है. वहीं यूरोपीय देशों ने इससे निपटने के लिए लाखों डोज़ की प्री-पैंडेमिक वैक्सीन डील्स की हुई हैं, ताकि जरूरत पड़ने पर तुरंत टीकाकरण शुरू किया जा सके. अमेरिका भी एम-आरएनए तकनीक का इस्तेमाल करते हुए बर्ड फ्लू की वैक्सीन विकसित करने की कोशिश कर रहा है.
लेकिन वैक्सीनेशन सिर्फ इंसानों का ही हो यह ज़रूरी नहीं. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि पक्षियों का वैक्सीनेशन भी इस संक्रमण को नियंत्रित करने का एक प्रभावी तरीका हो सकता है. फ्रांस और मैक्सिको जैसे देशों ने अपने पॉल्ट्री फार्म्स में यह प्रयोग करना शुरू भी कर दिया है. वहीं, अमेरिका अभी इसमें थोड़ा पीछे है और यहां कुछेक कंपनियों को कमर्शियल उपयोग ना करने की शर्त के साथ इसका लाइसेंस दिया गया है.
वैक्सीनेशन एक समाधान हो सकता है, लेकिन इससे वायरस के छिप जाने और व्यापारिक प्रतिबंधों जैसी नई समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं. कुछ विशेषज्ञों को डर है कि वैक्सीन पक्षियों में वायरस को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उसे छिपा सकता है. इससे संक्रमण दिखाई भले न दे लेकिन उनकी आबादी में मौजूद रहेगा. बाद में वह नए, अधिक घातक संस्करणों में बदल सकता है. बड़े पैमाने पर पक्षियों का वैक्सीनेशन करना भी एक अलग सरदर्द है. एक तो यह बहुत महंगा होगा, दूसरा ऐसा करने पर पक्षियों के फार्म्स में काम करने वाले लोगों की सुरक्षा का भी ख़याल रखना होगा.
इसके अलावा, अगर किसी देश में पॉल्ट्री को बर्ड फ्लू का वैक्सीन लगाया जाता है तो दूसरे देश उसके पॉल्ट्री उत्पादों को खरीदने से मना कर सकते हैं. इस स्थिति से बचने के लिए मज़बूत निगरानी और परीक्षण व्यवस्था की जरूरत होगी ताकि यह साबित किया जा सकेगा कि पॉल्ट्री उत्पाद वास्तव में वायरस से मुक्त हैं, न कि सिर्फ उसके लक्षणों से.
महामारी की आशंकाओं से भरी इस तस्वीर में उम्मीद का एक हिस्सा भी है. कुछ वैक्सीन और एंटीवायरल दवाएं, एवियन इन्फ्लुएंजा के मामले में कारगर दिख रही हैं और कोविड महामारी के दौरान मिले सबक भी हमारे ज़ेहन में अभी ताजा हैं. वैश्विक स्तर पर की जा रही इस संक्रमण की निगरानी की वजह से भी हो सकता है कि स्थिति बिगड़ने की नौबत न आए. कुछ जानकार यह भी कहते हैं कि अगर मानव संक्रमण फैलता भी है तो यह कोविड-19 की बजाय स्वाइन फ्लू महामारी जैसा दिखेगा.
फिलहाल, बर्ड फ्लू महामारी बनने से एक कदम दूर है — लेकिन इतिहास बताता है कि ऐसे ‘एक कदम’ को पहचानना ही अक्सर सबसे मुश्किल काम होता है.

