क्या भाजपा की आईटी सेल अब बूढ़ी हो रही है?
भाजपा की आईटी सेल भारत की सबसे संगठित डिजिटल मशीनरी है. फिर जेन-ज़ी आंदोलन के सामने वह इतनी बेअसर क्यों दिखी?
क़रीब छह साल पहले भी सत्याग्रह ने भाजपा की आईटी सेल पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी. उस समय कोविड की पहली लहर खत्म ही हुई थी और विभिन्न परीक्षाओं व रोज़गार से जुड़े मुद्दों को लेकर छात्र और युवा काफी आक्रोशित थे. वे गुस्से में यूट्यूब पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वीडियो दनादन डिसलाइक कर रहे थे और उनके जन्मदिन पर सोशल मीडिया में ‘राष्ट्रीय बेरोज़गार दिवस’ ट्रेंड करा रहे थे. उस वक्त जब आईटी सेल ने इसे तुर्की के बॉट्स की कारस्तानी बताया तो युवाओं ने मोदीजी के वीडियोज़ पर कमेंट्स के साथ-साथ अपने गांवों-कस्बों के नाम भी लिख डाले. वे मज़ाक में इन स्थानों को तुर्की, कनाडा और अमेरिका में स्थित बता रहे थे.
जून-जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए छात्रों के आंदोलन की शुरुआत भी इंटरनेट और सोशल मीडिया पर ही हुई थी. भारत के मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी ने एक अजीबोगरीब ऑनलाइन संगठन — कॉकरोच जनता पार्टी — को जन्म दिया, और उसने इस आंदोलन को. इस संगठन से जुड़े लोगों में दो बातें कॉमन हैं: इनमें से ज्यादातर युवा हैं और ‘मीम-लवर्स’ भी. इसलिए जब इन लोगों ने मोदी सरकार के खिलाफ अपना आंदोलन शुरू किया तो उन्हें भी भाजपा की आईटी सेल का सामना करना ही था. अगर साल 2020 में जो हुआ उसे मुठभेड़ कहें तो इस बार जो देखने को मिला वह किसी युद्ध से कम नहीं था.
पुराना टूलकिट
आईटी सेल पर लंबे समय से नज़र रखने वालों का मानना है कि उसके तरकश में कुछ स्थायी तीर हैं. इनमें प्रदर्शन करने वालों को ‘एंटी-नेशनल’, ‘एंटी-हिंदू’, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’, ‘अर्बन नक्सल’, ‘खालिस्तानी’ या ‘कांग्रेसी-वामपंथी’ बताना ख़ास तौर पर शामिल है. इन तमगों के समर्थन में अक्सर यह भी दावा किया जाता है कि आंदोलन की फंडिंग पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश जैसे देशों या जॉर्ज सोरोस और बिल गेट्स जैसी विदेशी हस्तियों से आ रही है. इसके अलावा आंदोलन और उससे जुड़े लोगों के खिलाफ पुराने वीडियोज़, एडिटेड क्लिप्स या एआई से बनी तस्वीरें और वीडियो भी इस्तेमाल किए जाते हैं. कई बार मूल मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए प्रदर्शन से लोगों को हो रही दिक्कतों, पुलिसकर्मियों के घायल होने आदि को चर्चा का केंद्र बनाने की कोशिश भी की जाती है. और हर बार चल सकने वाला एक तीर ‘कांग्रेस भी तो ऐसा करती थी’ भी है ही.
इस बार भी आईटी सेल ने अपने इन तीरों का इस्तेमाल करने की भरसक कोशिश की, लेकिन वे कारगर साबित नहीं हुए. दरअसल इस बार उसका पाला एक ऐसी ‘वानर सेना’ से पड़ा था जिसके बारे में कुछ भी प्रेडिक्ट कर पाना आसान नहीं था. ये लोग ‘एंटी-नेशनल’ कहे जाने पर तिरंगा, फूल और किताबें लेकर राष्ट्रगान गा सकते थे और ‘फॉरेन फंडिंग’ के इल्ज़ाम का मुकाबला शी जिनपिंग को फोन मिलाने जैसी रील्स बनाकर कर रहे थे. देश के कोने-कोने से आए ये युवा फ़ुटपाथ पर चटाई बिछाकर सो सकते थे, रात भर जागकर प्रदर्शन-स्थल की पहरेदारी कर सकते थे, दिन में जंतर-मंतर की सफाई कर सकते थे, और अपने इन सभी कामों के अजब-गज़ब वीडियो बनाकर उन्हें हर रोज़ वायरल भी करा सकते थे.
ये युवा एडिटेड वीडियो, एआई से बनी तस्वीरों और मेनस्ट्रीम मीडिया की एकतरफा रिपोर्टों का न केवल अनोखा जवाब दे सकते थे बल्कि इतने तरीकों से और इतनी बड़ी संख्या में ऐसा कर रहे थे कि घिसे-पिटे फॉर्मूलों पर चलने वाले किसी भी आईटी सेल के लिए उनका मुकाबला कर पाना आसान नहीं था. डीयू की एक प्रोफेसर इसका अंदाज़ा सत्याग्रह को यह कहते हुए देती हैं कि प्रोटेस्ट के दौरान वे घंटों उससे जुड़े युवाओं के वीडियो देखा करती थीं और अब वे उन्हें काफी मिस करती हैं.
सोशल मीडिया के जानकारों की मानें तो आईटी सेल इन युवाओं के प्रदर्शन पर अपने ज्यादातर ठप्पे इसलिए भी नहीं लगा सकी क्योंकि युवा होने के अलावा उनकी कोई और पहचान नहीं थी, और उनका मुद्दा भी वैसा ही था. “आईटी सेल के पास कोई ठोस सफ़ाई नहीं थी. किसान आंदोलन के समय आप फिर भी बहस कर सकते थे कि सरकार की नीतियां अच्छी हैं या बुरी. लेकिन पेपर लीक को आप कैसे सही ठहरा सकते हैं?”, मार्केटिंग विशेषज्ञ और लेखक नवीन चौधरी कहते हैं.
“ये युवा देश के हर वर्ग से आते थे और किसान या सीएए आंदोलन के उलट इनकी मांगें भी समाज के हर वर्ग की मांगें थीं. और इनमें कई बहुत छोटे और मासूम से दिखने वाले लड़के-लड़कियां थे जिन्हें उतने ही आकर्षक तरीके से अपनी बात भी कहना आता है.” डीयू की प्रोफेसर कहती हैं कि ऐसे युवाओं का मुकाबला उस आईटी सेल से था जिसके पास नया कहने के लिए कुछ खास नहीं था.
लड़ाई का नया मैदान
ऊपर से आईटी सेल और युवाओं का मुकाबला एक ऐसे प्लेटफॉर्म पर था जहां पहला पक्ष उतना सहज नहीं है. “वे इंस्टाग्राम का इस्तेमाल तो कर रहे हैं लेकिन उनका मॉडल फ़ेसबुक वाला ही है. इनके फॉलोअर्स भी 35-40 साल से ज्यादा उम्र के लोग हैं जिन्होंने अब तक इंस्टाग्राम को पूरी तरह अपनाया नहीं है. फ़ेसबुक पर पोस्ट लिखना और इंस्टाग्राम पर वीडियो बनाकर नरेटिव खड़ा करना, दोनों अलग चीजें हैं. फ़ेसबुक पर एक तस्वीर लगाकर ‘मोदी ज़िंदाबाद’ लिख देना काफी हो सकता है लेकिन इंस्टाग्राम पर यह नहीं चलता.” नवीन चौधरी कहते हैं, “आईटी सेल ने असर खोया है, इसका पता इस बात से भी चलता है कि ख़ुद मोदी जी को उसके रेस्क्यू के लिए आना पड़ा. नहीं तो कैबिनेट मंत्रियों को इंस्टाग्राम पर सक्रिय होने का निर्देश देने की क्या जरूरत थी?”
कुछ इसी तरह की बात एक प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान के संपादक भी कहते हैं: “इस बार आईटी सेल के लगभग बेअसर होने की पहली वजह यही लगती है कि उसका मुकाबला जेन-ज़ी से था और इससे ‘प्लेइंग-फील्ड’ ही बदल गया. इंस्टाग्राम पर हर दिन एल्गोरिदम एक नई चीज़ आपके सामने रखता है जिसे नई पीढ़ी अच्छी तरह समझती और इस्तेमाल करती है. हर रील के साथ उनका कॉन्टेंट तो बदलता ही है, उसे पेश करने का तरीका भी बदल जाता है. कुल मिलाकर इन नए बच्चों के सामने भाजपा की आईटी सेल किसी घर-पड़ोस के ऐसे अंकल जैसी नज़र आ रही थी जिसकी रोज़ की एक जैसी बातों को ये लोग चलते-फिरते ‘रोस्ट’ करते रहते हैं.”
जहां तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इंस्टाग्राम पर अपनी सरकार और आईटी सेल का बचाव करने की बात है तो इसका परिणाम भी कुछ ज्यादा अलग नहीं हो सकता था. “पीएम मोदी भी इसके बाहरी स्वरूप को ही अपना रहे हैं. वे इंस्टाग्राम और उसकी जेनरेशन को नहीं समझ रहे हैं. उन्होंने कैमरे को वर्टिकल कर चेहरे के क़रीब तो लगा लिया लेकिन इतना करना काफी नहीं था. यह ठीक वैसा ही था जैसे पंजाब में पगड़ी पहनकर, हल्की-फुल्की पंजाबी के चार शब्द बोलना. पर इंस्टाग्राम एक अलग दुनिया है. यहां भी अच्छा-बुरा सब चलता है पर इस शर्त के साथ कि वह क्रिएटिव हो और फटाक से अपनी बात कह दे”, संपादक महोदय कहते हैं.
पीएम मोदी की पहली रील पर आए रिस्पॉन्स और उस पर उनके जवाबी वीडियो को देखें तो यह बात और मजबूत हो जाती है. रील के अगले दिन प्रधानमंत्री और उनके ऑनलाइन समर्थक 30.3 करोड़ व्यूज मिलने का जश्न तो मना रहे थे लेकिन बिना यह बताए कि इस पर आई ज्यादातर प्रतिक्रियाएं नकारात्मक और आलोचनात्मक ही थीं. युवाओं ने इतनी तेज़ी और क्रिएटिविटी के साथ उनके ‘मितरो’ शब्द के ‘फ्रेंड्स’ हो जाने, लोअर कैमरा एंगल, धीमी रफ़्तार से बोलने आदि का इतना मज़ाक उड़ाया कि आईटी सेल से ज्यादा कुछ करते नहीं बना.
पीएम की रील्स पर आई प्रतिक्रियाओं और दूसरी रील्स को देखें तो इस प्रदर्शन का एक और पहलू सामने आता है. जेन-ज़ी इस पूरे आंदोलन के दौरान ज़मीन पर जितना अहिंसक दिखा, ऑनलाइन उतना ही आक्रामक और निर्मम था. हालांकि क्रिएटिव और मज़ेदार वह दोनों जगहों पर था. आलोचना में कही गई ज्यादातर बातों का जवाब उसने ह्यूमर से दिया जिसमें अपना और सामने वाले, दोनों का मज़ाक़ उड़ाया गया था. फिर चाहे वह ‘फ़िट-चेक रील्स’ के कैप्शन में यह लिखना हो कि “तैयार होकर पुलिस की मार खाने जा रहे हैं”, या फिर पिटने के बाद पुलिस वालों के मुंह पर कैमरा लगाकर पूछना कि — “वास्तेगनाहुइयां?”, या फिर पुलिस द्वारा ज्यादा कुछ न करने पर यह पूछना कि “आंसू गैस-वॉटर कैनन की व्यवस्था नहीं है क्या?”
जेन-ज़ी की बनाई ज्यादातर रीलों और नारों का कॉन्टेक्स्ट तो पुराने ऑनलाइन ट्रेंड्स और मीम्स में था ही, प्रदर्शन के दौरान जंतर-मंतर पर हुई कई गतिविधियों में भी इनका असर दिखाई दिया. जैसे मेलोडी टॉफी बांटना हो, या एक प्रदर्शनकारी का गोरिल्ला की ड्रेस पहनकर पहुंचना या फिर स्पीकर पर प्रधानमंत्री के बयानों का बजाया जाना. उनके पोस्टर्स-बैनर्स भी मीम्स जैसे ही चटपटे थे. ये सब जब रील्स की शक्ल में सोशल मीडिया पर पहुंचे तो कइयों को इनका चस्का लग गया.
सोशल मीडिया पर राजनीतिक टिप्पणियां करने वाले क्रिएटर आशुतोष उज्जवल इसे कुछ इस तरह समझाते हैं, “अब तक आईटी सेल की सफलता का कारण यह भी था कि पिछली पीढ़ियां आसानी से चिढ़ जाती थीं. मिलेनियल्स का स्वभाव थोड़ा संकोची होता है. उन्हें ज़रा सी बात भी बुरी लग जाती है. फिर वे या तो लिहाज़ करके चुप हो जाते हैं या आईटी सेल उन्हें गाली-गलौज पर उतार लाने में सफल होता है. मगर जेन-ज़ी को इन बातों से फर्क नहीं पड़ता है. वह भावनात्मक रूप से सुरक्षित लगता है. उन्हें तुम कुछ भी कहते रहो, वे अपने मुद्दे पर डटे हैं.”
जानकारों की मानें तो प्रदर्शन के दौरान जेन-ज़ी का जो रवैया नज़र आया वह उससे ज्यादा अलग नहीं था जो वे किसी मशहूर म्यूज़िक बैंड की कॉन्सर्ट, कॉमेडी शो या इन्फ्लुएंसर के मीट-एंड-ग्रीट इवेंट्स में दिखाते हैं. शायद यही वजह रही कि उन पर नॉन-सीरियस होने का आरोप भी लगा. दूसरी तरफ इसी सहजता ने उन्हें लोगों में लोकप्रिय किया और आईटी सेल को निहत्था. यह भी याद रखने वाली बात है कि यह सब कुछ तब था जब जंतर-मंतर और उसके आसपास इंटरनेट बंद था.
बदले हालात
इंस्टाग्राम पर लड़ी गई इस लड़ाई का कुछ श्रेय जेन-जी से पहले वाली पीढ़ियों को भी दिया जाना चाहिए. राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि मोदी सरकार के 12 साल बीत चुके हैं और भाजपा समर्थकों में से भी कुछ लोग उससे खुश नहीं हैं. लंबे समय तक राज करने वाली किसी भी सरकार के मामले में ऐसा होना स्वाभाविक है. लेकिन नवीन चौधरी पिछली पीढ़ी के सक्रिय होने की एक और वजह बताते हैं: “12 साल पहले भाजपा के सबसे बड़े वोटर वर्ग के बच्चे अब 10वीं-12वीं या कॉलेज की उम्र में आ रहे हैं. ऐसे में इन समर्थकों के मन में डर होगा कि कल मेरे बच्चे का भविष्य क्या होगा. भाजपा के पुराने नरेटिव की स्थिति ‘भेड़िया आया’ वाली हो चुकी है. अब उसके समर्थक ही इसका मज़ाक़ उड़ाने लगे हैं.”
आईटी सेल की प्रभावहीनता का एक और कारण भाजपा के कुछ नेताओं के बयान भी रहे. नवीन कहते हैं कि “अगर आप याद करें तो कांग्रेस के खिलाफ जो माहौल बना था, उसमें भ्रष्टाचार तो एक बड़ा कारण था ही, कांग्रेस नेताओं के कई अजीबोगरीब बयान भी थे. पिछले दिनों बीजेपी से जुड़े लोगों ने भी वैसी ही ऊल-जलूल बातें कही हैं जिससे लोगों में नाराजगी है.” कुछ मौकों पर ये बयान इतने अजीब थे कि आईटी सेल के पास भी इनके बचाव का कोई उपाय नहीं था, और जेन-ज़ी इसे मीम बनाने से चूक नहीं रही थी.
कुछ लोगों का कहना है कि इस बार भाजपा, सरकार और आईटी सेल का आपसी तालमेल भी कुछ बिगड़ा हुआ दिखा. आंदोलन के दौरान कई बार इनके बयानों में अंतर नज़र आया. आईटी सेल जब कह रही थी कि ‘कॉकरोच आंदोलन’ के पीछे विदेशी फंडिंग है, तब विदेश मंत्रालय ने ऐसी कोई जानकारी होने से साफ़ इनकार किया. इसी तरह जब आंदोलन अपने चरम पर था और आईटी सेल ताल ठोककर कह रही थी कि कोई संवाद नहीं होगा, तभी भाजपा नेता जेपी नड्डा कॉकरोच जनता पार्टी के सदस्यों को बातचीत के लिए अपने घर बुला रहे थे.
आशुतोष भी ऐसा ही एक उदाहरण देते हुए कहते हैं कि “तालमेल की कमी इससे भी पता चलती है कि 25 तारीख़ को भी सोशल मीडिया पर लगातार कहा जा रहा था कि इस्तीफा नहीं होगा, ऐसा करना जिम्मेदारी से भागना माना जाएगा; और वहीं एक घंटे बाद इस्तीफा आ गया.” वहीं, नवीन चौधरी इस संयोग को रणनीति ही बताते हैं और कहते हैं कि “आईटी सेल इसके अलावा कह भी क्या सकती थी.” वे साथ ही यह भी जोड़ देते हैं कि “आईटी सेल आज भी व्हाट्सएप पर बहुत मज़बूत पकड़ रखती है और जनता की राय बदलने के लिए वह कभी भी इसका पूरा इस्तेमाल कर सकती है और करेगी.”
लेकिन समस्या यह है कि सोलह साल के बच्चे अब इंस्टाग्राम को ही मैसेजिंग के लिए भी इस्तेमाल करने लगे हैं. वे आईटी सेल के मैसेजों को शायद ही कभी व्हाट्सएप पर पढ़ते हैं. और अगले आम चुनाव में वे अपना पहला वोट डालने वाले हैं.
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