जब कोरोना वायरस अपनी जड़ें जमा रहा था, तब हम क्या कर रहे थे?
25 मार्च 2020 को देश में पहली बार कोविड लॉकडाउन हुआ था. लेकिन फरवरी की शुरुआत से उस दिन तक, जब दुनिया खतरे की घंटी बजा रही थी, भारत क्या कर रहा था?

भारत में कोरोना वायरस का पहला मामला 29 जनवरी को दर्ज किया गया था. मरीज केरल के त्रिचूर की रहने वाली एक छात्रा थी जो चीन के वुहान विश्वविद्यालय में पढ़ती थी. वह थोड़े दिन पहले ही चीन से लौटी थी. इसके तुरंत बाद ही राज्य में दो और मामले दर्ज किए गए. ये दोनों भी वुहान विश्वविद्यालय के ही छात्र थे. इन तीनों का केरल में ही इलाज हुआ और ये सभी ठीक हो गए.
इसी दौरान 30 जनवरी को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना वायरस के संक्रमण को अंतरराष्ट्रीय आपात स्थिति घोषित किया था. इससे पहले सिर्फ पांच बार ही ऐसा किया गया था. अगले दिन यानी 31 जनवरी को इटली ने भी कोरोना वायरस के चलते अपने यहां आपातकाल की घोषणा कर दी. अब तक हमारे पड़ोसी देश चीन में कोरोना वायरस से मरने वालों का आंकड़ा 250 के पार जा चुका था. उसके 10 दिन में 1000 बेड वाला अस्पताल तैयार करने की खबर भी दुनिया भर में सुर्खी बन रही थी. इसके बाद चार फरवरी को भारत ने इस मामले में अपना पहला छोटा सा कदम उठाया: उसने चीनी नागरिकों और बीते दो हफ्तों में चीन गए विदेशी नागरिकों के मौजूदा वीजा रद्द कर दिए.
फरवरी के पहले हफ्ते तक भारत में कोरोना वायरस खबरों और प्राथमिकताओं की लिस्ट में बहुत पीछे था. उस समय दिल्ली में विधानसभा चुनाव थे. मुकाबला केंद्र में सत्ताधारी भाजपा और दिल्ली में सत्तासीन आम आदमी पार्टी के बीच था. ये वही दिन भी थे जब एनआरसी और सीएए का हल्ला अपने चरम पर था. इस दौरान शाहीन बाग सहित कई जगहों पर इनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे थे, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन प्रदर्शनों को संयोग नहीं प्रयोग बता रहे थे, भाजपा नेता अनुराग ठाकुर देश के गद्दारों को गोली मारने के नारे लगवा रहे थे, और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हनुमान चालीसा पढ़ रहे थे. चारों तरफ इन्हीं खबरों की चर्चा थी. इनमें कोरोना वायरस कहीं नहीं था, और था तो इतना और ऐसे दबा था कि दिख नहीं रहा था.
फरवरी का दूसरा हफ्ता शुरू हुआ. इसके पहले दिन यानी आठ फरवरी को चीन में कोरोना वायरस से मरने वालों का आंकड़ा 722 हो चुका था. इसी दिन दिल्ली चुनाव के लिए वोट भी पड़े थे. 11 फरवरी को नतीजे आए और खबरों में आम आदमी पार्टी की प्रचंड जीत छाई रही. उधर चीन में कोरोना वायरस से मरने वालों का आंकड़ा 1000 पार कर चुका था. विश्व स्वास्थ्य संगठन चेतावनी दे रहा था कि कोरोना वायरस के चीन से बाहर जाने का मतलब दुनिया पर बड़ी आफत का आना है और मानवजाति भरसक कोशिश करे कि यह महामारी काबू के बाहर न निकलने पाए.
लेकिन, भारत सरकार का कहना था कि चिंता की कोई बात नहीं. 13 फरवरी को तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन का बयान आया कि घबराने की जरूरत नहीं है और भारत के पास मास्क-दस्तानों से लेकर दवाओं तक सभी जरूरी चीजों का भरपूर स्टॉक मौजूद है. उन्होंने यह भी बताया कि भारत खुद तो कोरोना वायरस के लिए तैयार है ही, पड़ोसी देश चीन को भी वह दवाएं, उपकरण और अन्य सामान भेज रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को फोन कर इस मामले में मदद की पेशकश की थी. हर्षवर्धन का यह भी कहना था कि पूरी सावधानी बरतते हुए हवाई अड्डों के अलावा 12 प्रमुख और 65 छोटे बंदरगाहों पर लोगों की थर्मल स्क्रीनिंग की जा रही है. हालांकि यह कोई फूलप्रूफ तरीका नहीं था क्योंकि कोरोना वायरस संक्रमण की शुरुआत में कई दिन तक शरीर का तापमान सामान्य ही रह सकता था. खैर, इस तरह फरवरी का दूसरा हफ्ता भी खत्म हो गया.
फरवरी का तीसरा हफ्ता आने के साथ ही चीन में कोरोना वायरस से मरने वालों की संख्या 1800 के पार जा चुकी थी. लेकिन उसके साथ तीन हजार किलोमीटर से ज़्यादा लंबी सीमा साझा करने वाले भारत में तब भी इसे लेकर कोई खास हलचल नहीं थी. इस दौरान सभी का सारा ध्यान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत दौरे और इससे जुड़ी तैयारियों की तरफ लगा हुआ था. इसी दौरान झारखंड विकास मोर्चा का भाजपा में विलय और इसके मुखिया बाबूलाल मरांडी की ‘घर वापसी’ भी कोरोना वायरस से ज्यादा चर्चाएं बटोर रही थी.
फरवरी का चौथा हफ्ता डोनाल्ड ट्रंप के दो दिवसीय भारत दौरे और इस दौरान राजधानी दिल्ली में सीएए समर्थकों और विरोधियों के बीच हिंसा के नाम रहा. इस दौरान भारत ने अमेरिका के साथ तीन अरब डॉलर का रक्षा खरीद समझौता भी किया. उधर, दिल्ली में हुई हिंसा बढ़ती गई और जब तक यह रुकी तब तक इसमें 50 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी थी. इस समय तक चीन में कोरोना वायरस से मरने वालों का आंकड़ा तीन हजार को छूने लगा था.
बहुत से लोग मानते हैं कि भारत ने उस अवधि में कुछ खास नहीं किया जब उसे कोरोना वायरस रूपी आपदा से निपटने की जी-तोड़ कोशिशें करनी थीं. वे इसके समर्थन में 24 फरवरी को अहमदाबाद के मोटेरा स्टेडियम में हुए ‘नमस्ते ट्रंप’ नाम के कार्यक्रम का उदाहरण देते हैं, इसमें सोशल डिस्टेंसिंग को धता बताते हुए करीब एक लाख लोग जुटाए गए थे.
इस तरह के आरोपों को इस खबर से भी बल मिलता है कि जब पूरी दुनिया कोरोना वायरस से बचाव के सुरक्षा उपकरण (पीपीई) ख़रीद रही थी भारत तब भी लगातार इनका निर्यात किये जा रहा था. 27 फरवरी को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी आगाह किया था कि दुनिया भर में पर्याप्त मात्रा में पीपीई किट्स उपलब्ध नहीं हैं और जल्द ही इनकी किल्लत होने लगेगी. इसके बावजूद भारत ने पीपीई के निर्यात पर 19 मार्च तक रोक नहीं लगाई. इसका नतीजा डॉक्टरों और नर्सों को झेलना पड़ा जो बार-बार सरकार से इनकी पर्याप्त आपूर्ति की गुहार लगाते रहे.
बहरहाल, मार्च की शुरुआत हुई. अब तक केरल में दर्ज हुए तीन मामलों के अलावा भारत में कोरोना वायरस का कोई नया मामला दर्ज नहीं किया गया था. दो मार्च को देश में इस वायरस के जो दो नए मामले दर्ज हुए उनमें से एक राजधानी दिल्ली का था और दूसरा तेलंगाना का. ये दोनों ही लोग विदेश यात्रा करके लौटे थे. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने इनकी जानकारी देते हुए एक बार फिर से कहा कि लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है. उनका कहना था कि अगर किसी को भी कोरोना वायरस के लक्षण नजर आ रहे हैं तो वह तुरंत सरकार की हेल्पलाइन के माध्यम से अधिकारियों से संपर्क करे. अगले ही दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देशवासियों से न घबराने को कहा.
अब तक कोरोना वायरस ने इटली और ईरान में कहर बरपाना शुरू कर दिया था. पांच मार्च को भारत में भी इसके मामलों की संख्या तेजी से बढ़ते हुए 29 तक पहुंच गई. इसी दिन कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक बार फिर से मोदी सरकार को आगाह किया. अपने एक ट्वीट में उनका कहना था, “स्वास्थ्य मंत्री कह रहे हैं कि कोरोना वायरस संकट को लेकर हालात भारत सरकार के नियंत्रण में हैं. यह ऐसा ही है कि टाइटेनिक का कप्तान यात्रियों को बता रहा हो कि वे घबराएं नहीं क्योंकि यह जहाज डूब ही नहीं सकता. सरकार को इस संकट से निपटने के लिए एक कार्य-योजना सार्वजनिक करनी चाहिए जो ठोस संसाधनों पर आधारित हो.”
इससे पहले राहुल तीन मार्च को भी कोरोना वायरस और इसके चलते भारतीय अर्थव्यवस्था पर आने वाले संकट की चेतावनी दे चुके थे. उनका कहना था कि ऐसे वक्त में एक सच्चे राजनेता का ध्यान पूरी तरह से उस संकट को टालने पर होगा जो कोरोना वायरस की वजह से भारत और उसकी अर्थव्यवस्था पर आने वाला है.
हालांकि खबरों में इन सब बातों से ज्यादा चर्चा संसद में सरकार और विपक्ष के बीच दिल्ली की हिंसा को लेकर हो रहे टकराव की थी. इसके चलते कई दिन संसद की कार्रवाई ठप रही. इस तरह मार्च का पहला हफ्ता निकल गया. इस बीच छह मार्च को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी मोदी सरकार को आगाह किया कि सामाजिक कड़वाहट, आर्थिक सुस्ती और कोरोना जैसी महामारी का मेल देश के लिए विकट हालात की आहट है. उनका यह भी कहना था कि ऐसे वक्त में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश को आश्वस्त करना चाहिए. इसके एक दिन बाद अपने आलोचकों पर निशाना साधते हुए प्रधानमंत्री का बयान आया कि कि अलग-अलग कारणों से वैश्विक अर्थव्यवस्था एक मुश्किल दौर से गुजर रही है, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है.
मार्च का दूसरा हफ्ता मध्य प्रदेश में तत्कालीन कमलनाथ सरकार पर आए संकट के साथ शुरू हुआ. इसकी परिणति ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थक विधायकों के भाजपा में जाने और कमलनाथ सरकार के गिरने के रूप में हुई. यानी जब कोविड-19 महामारी से निपटने के लिए राजनीतिक स्थिरता जरूरी थी उस वक्त मध्य प्रदेश में ज़बर्दस्त सियासी घमासान चल रहा था. करीब दो हफ्ते तक चले इस प्रकरण के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग को धता बताते हुए कांग्रेस और भाजपा के विधायकों और समर्थकों के जमावड़े होते रहे. आखिरकार कमलनाथ ने इस्तीफा दे दिया और 23 मार्च को शिवराज सिंह चौहान चौथी बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए.
ठीक इसी समय कोरोना का संकट कितना बड़ा हो चुका था इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि 19 मार्च 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनता कर्फ्यू का ऐलान किया था और 20 मार्च को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अपने पद से इस्तीफा दिया था. 22 मार्च को देश में जनता कर्फ्यू लगा था और उसके अगले दिन शिवराज सिंह चौहान चौथी बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे. इसके अगले दिन 24 मार्च को एक तरफ मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह सरकार विश्वासमत हासिल कर रही थी तो दूसरी तरफ़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश में 25 मार्च से लगने वाले पहले कोविड लॉकडाउन का ऐलान कर रहे थे.
कोविड महामारी के दौरान ऐसी सियासी उठापटक केवल मध्य प्रदेश तक ही सीमित नहीं थी. इस दौरान पुडुचेरी की कांग्रेसी सरकार भी गिरी, बिहार चुनाव से ठीक पहले सुशांत सिंह राजपूत का मसला जमकर उछला, और इसी मसले पर महाराष्ट्र की सरकार भी गिरते-गिरते ज़रा सी संभली और कोविड की दूसरी लहर के तुरंत बाद गिर गई. मतलब देश में इस दौरान और कुछ भले न चल रहा हो लेकिन राजनीति की रफ़्तार कभी कम नहीं हुई.
यहां एक बात ध्यान देने की और है. पहले ज्यादा कुछ न करने के बाद देश में पहला लॉकडाउन जिस जल्दबाज़ी में लगाया गया उसका नतीजा यह हुआ कि अपने घरों से दूर रहने वाले करोड़ों लोग अचानक पूरे देश की सड़कों पर नज़र आने लगे. भूखे-प्यासे पैदल जाते इतने लोग शायद इससे पहले देश के बंटवारे के वक्त ही देखे गए होंगे. यहां मोदी सरकार से सबसे बड़ा सवाल यह पूछा जा सकता है कि उसने लॉकडाउन से कुछ घंटे पहले उसकी घोषणा करते वक्त इन करोड़ों लोगों के बारे में क्यों नहीं सोचा?
सरकार ने 19 मार्च को जब यह घोषणा की कि तीन दिन बाद एक दिन का जनता कर्फ्यू लगेगा तब उसने सीधे यह क्यों नहीं कहा कि चार-पांच दिनों के बाद वह लंबे समय के लिए सब बंद करने वाली है. अगर वह ऐसा करती तो जिसे जहां जाना होता वह वहां चला जाता? क्या इससे यह इशारा नहीं मिलता कि सरकार इस मामले में पहले लापरवाही बरतकर फिर बदहवासी में काम कर रही थी? क्यों थाली-ताली बजवाने में अपना दिमाग लगाने के बजाय मोदी सरकार ने इन गंभीर बातों पर ध्यान नहीं दिया? आख़िर ऐसे लॉकडाउन का फायदा ही क्या जिसमें लाखों लोग एक साथ सड़क पर थे. क्या उनमें से जो संक्रमित थे, वे सड़कों पर और अपने गांवों में जाकर कोविड नहीं फैला रहे होंगे?
हममें से जो लोग बड़े शहरों में रहते हैं उनकी ज़िंदगी 2020 में भी एमज़ॉन, फ्लिपकार्ट, बिग बास्केट और मिल्क बास्केट जैसी कंपनियों के सहारे ही चलती थी. लेकिन सरकार ने शायद लॉकडाउन से पहले इन सप्लाई चेन कंपनियों के साथ तालमेल बिठाकर उनकी डिलीवरी सुनिश्चित करने जैसा बुनियादी काम ही नहीं किया. नतीजा यह हुआ कि लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में दूध-ब्रेड जैसी अनिवार्य चीज़ों के लिए भी हाहाकार मच गया.
अगर कोविड की दूसरी लहर की भी थोड़ी चर्चा करें तो इसके दौरान देश के हालात पहली लहर से भी बदतर दिखे. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ कोविड की दूसरी लहर (15 अप्रैल से 3 मई 2021) के दौरान ज़्यादातर समय, एक साथ करीब 30 लाख लोग कोरोना वायरस से संक्रमित थे. इनमें से 15 फीसदी (क़रीब साढ़े चार लाख) से कम लोगों को ही अस्पताल ले जाने या ऑक्सीजन देने की ज़रूरत थी.
फिर क्या हुआ कि उस समय न तो देश के अस्पतालों में लोगों को जगह मिल रही थी और न श्मशान घाटों में? अगर हमने पहली लहर से सबक लेकर कुछ तैयारियां की थीं तो वे ज़मीन पर क्यों नहीं दिखीं? और क्यों प्रधानमंत्री बंगाल चुनाव के दौरान अपनी सभाओं में बिना मास्क की ‘रिकॉर्ड भीड़’ को देखकर चिंतित होने के बजाय ख़ुश होते दिखते रहे?

