जब कोई फिल्म इतिहास की किसी जटिल और मुश्किल घटना पर रोशनी डालती है, तो सरकारें अक्सर दो में से एक काम करती हैं: वे या तो फिल्म पर इसलिए प्रतिबंध लगाने की कोशिश करती हैं कि वह उनकी या देश की शांति भंग कर सकती है, या खुद को शांत रखकर वे अपने नागरिकों की समझ पर भरोसा करती हैं और उन्हें वह फिल्म और सच्चाई का उसका संस्करण देखने देती हैं.
मोदी सरकार ने सतलुज को ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटवाकर, ज़ाहिर है पहला वाला रास्ता चुना. लेकिन अगर दूसरे देशों के उदाहरण देखें तो परिपक्व लोकतंत्र अक्सर दूसरे रास्ते पर चलते दिखते हैं. इन उदाहरणों से पता चलता है कि रोक लगाने के बजाय कड़वी सच्चाई का सामना करके लोगों का भरोसा जीतना या बनाए रखना ज्यादा आसान है.
हनी त्रेहन के निर्देशन में बनी फिल्म सतलुज, मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है. खालड़ा ने उग्रवाद के दौर की पंजाब पुलिस की आपराधिक ज्यादतियों और हज़ारों लोगों के गायब हो जाने को उजागर किया था. बाद में उनका भी अपहरण और हत्या कर दी गई थी. ये तथ्य अदालती रिकॉर्ड्स और विभिन्न जांचों का हिस्सा हैं.
सतलुज को तीन साल तक केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) का सर्टिफिकेट नहीं मिला. इसके लिए निर्माताओं से फिल्म में 100 से ज्यादा कट्स लगाने के लिए कहा गया. जब उन्होंने ऐसा न करके इसे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज कर दिया, तो सरकार ने सतलुज को वहां से भी हटवा दिया.
आइए देखते हैं कि दुनिया के अलग-अलग महाद्वीपों में फैले पांच नए-पुराने लोकतंत्रों में जब इस तरह की फिल्में बनीं, तो उनके साथ कैसा बर्ताव किया गया:
1. दक्षिण कोरिया: ए टैक्सी ड्राइवर (2017)
ए टैक्सी ड्राइवर मई 1980 के उस ‘ग्वांगजू विद्रोह’ पर बनी है जो सैन्य तानाशाही के खिलाफ दक्षिण कोरिया के ग्वांग्जू शहर में हुआ था. इस दौरान कोरियाई सेना ने अपने सैकड़ों नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया था.
इस डर से फिल्म पर रोक लगाने के बजाय कि इससे सेना की छवि खराब होगी और वह या लोग भड़क सकते हैं, दक्षिण कोरियाई सरकार ने ए टैक्सी ड्राइवर को अपना पूरा समर्थन दिया. यहां तक कि तत्कालीन राष्ट्रपति मून जे-इन ने खुद इस फिल्म को एक सार्वजनिक सिनेमाघर में जाकर देखा.
ए टैक्सी ड्राइवर बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई और इसने ऑस्कर में दक्षिण कोरिया का प्रतिनिधित्व भी किया. फिल्म से शुरू हुई व्यापक बहस के बाद, सरकार ने ग्वांगजू की घटना और उसे छिपाने के प्रयासों की जांच के लिए एक नए जांच आयोग का गठन भी किया.
2. यूनाइटेड किंगडम: ब्लडी संडे (2002)
ब्लडी संडे उत्तरी आयरलैंड में 1972 को हुई उस दुखद घटना को दोबारा पर्दे पर जीती है, जब ब्रिटिश पैराट्रूपर्स ने नागरिक अधिकारों के लिए मार्च कर रहे निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध गोलियां चलाई थीं. इसके बाद दशकों तक यह ब्रिटेन के इतिहास और राजनीति का एक बेहद संवेदनशील विषय बना रहा.
ब्लडी संडे में ब्रिटिश सेना की कार्रवाई की तीखी आलोचना की गई थी, फिर भी ब्रिटिश सरकार ने इसकी रिलीज में कोई दखल नहीं दिया. न केवल देशभर के सिनेमाघरों में फिल्म को दिखाया गया, बल्कि ब्रिटेन के एक बड़े टेलीविजन चैनल (आईटीवी) पर इसे प्रसारित भी किया गया.
ब्लडी संडे ने बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में ‘गोल्डन बियर‘ सहित कई प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीते. यह फिल्म उस वक्त रिलीज़ हुई थी जब यूके में इस त्रासदी पर एक व्यापक जांच चल रही थी. लेकिन इससे देश में किसी तरह की अशांति देखने को नहीं मिली.
3. अमेरिका: द रिपोर्ट (2019)
यह पॉलिटिकल ड्रामा अमेरिकी संसद (सीनेट) के एक स्टाफ मेंबर डेनियल जे जोंस की वास्तविक कहानी कहता है. जोंस ने सीआईए के उन क्रूर तरीकों का पर्दाफाश किया था जो उसने 11 सितंबर के आतंकी हमलों के बाद बंदियों को टॉर्चर करने के लिए अपनाए थे. द रिपोर्ट उनके द्वारा सामने लाए गए सच को छिपाने के सरकार के प्रयासों को भी पूरी दुनिया के सामने रखती है.
इस फिल्म में असली अधिकारियों के नाम और देश की खुफिया व्यवस्था के शीर्ष स्तर पर हुए व्यापक कदाचार को बिना किसी लाग-लपेट के दिखाया गया था. राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा इतना संवेदनशील विषय होने के बावजूद, अमेरिकी सरकार ने द रिपोर्ट को रोकने, काटने-छांटने या इसकी रिलीज को टालने की कोई कोशिश नहीं की. इसे अमेज़न स्टूडियोज़ ने खरीदा और बिना किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के विश्व भर में दिखाया. इसके चलते पूरी दुनिया में आतंकवाद से निपटने की अमेरिकी नीतियों की खुलकर आलोचना हुई.
4. अर्जेंटीना: अर्जेंटीना, 1985 (2022)
यह लीगल ड्रामा उस ऐतिहासिक मुकदमे को पर्दे पर लाता है जिसमें अर्जेंटीना की क्रूर सैन्य तानाशाही के शीर्ष नेतृत्व को न्याय के कटघरे में खड़ा किया गया था. इस शासन पर अर्जेंटीना के करीब 30,000 नागरिकों को मरवाने जैसे गंभीर आरोप थे.
सैन्य तानाशाही का यह इतिहास अर्जेंटीना में आज भी एक बेहद नाजु़क मसला है. फिर भी सरकार ने “अर्जेंटीना, 1985” पर कोई पाबंदी नहीं लगाई. उसने न केवल फिल्म को देश के पुराने ज़ख्मों को भरने का एक ज़रूरी जरिया माना बल्कि इसके निर्माण से लेकर प्रमोशन तक में अपना पूरा सहयोग भी दिया.
रिलीज के पहले ही महीने में अर्जेंटीना के सिनेमाघरों में 10 लाख से ज्यादा लोग इस फिल्म को देखने पहुंचे. राजनीतिक विवादों के डर से इतिहास को छिपाने के बजाय उसे सबके सामने रखकर, अर्जेंटीना, 1985 ने शांति के माहौल में पली-बढ़ी युवा पीढ़ी को लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति जागरूक करने का काम किया.
5. इसराइल: वॉल्ट्ज विद बशीर (2008)
यह एनिमेटेड डॉक्यूमेंट्री इसके निर्माता-निर्देशक-लेखक आरी फोलमान की ही कहानी है. वे अपने जीवन के उस समय को भूल गए थे जब उन्होंने एक युवा सैनिक के रूप में 1982 के लेबनान युद्ध में हिस्सा लिया था. वॉल्ट्ज विद बशीर, फोलमान को उस समय की याद दिलाती है और उन ‘सबा और शतीला नरसंहारों‘ को भी पर्दे पर लाती है जिनमें सैकड़ों फिलिस्तीनी शरणार्थियों को मौत के घाट उतार दिया गया था.
यह फिल्म एक युद्ध के दौरान इजराइल के सैन्य नेतृत्व की गंभीर नैतिक विफलताओं और लापरवाही को सामने लाती है. इसके बावजूद, इजरायली सरकार ने इसकी रिलीज पर कोई रोक नहीं लगाई. उल्टे इस प्रोजेक्ट को ‘इजराइल फिल्म फंड’ द्वारा आर्थिक मदद दी गई. यह संस्था इज़राइल के संस्कृति मंत्रालय के अधीन काम करती है.
वॉल्ट्ज विद बशीर को न केवल इज़राइल के बाहर बल्कि देश में भी खूब सराहना मिली. इसने छह इजरायली फिल्म अकादमी अवार्ड्स जीते और ऑस्कर के लिए भी नामित भी की गई. राष्ट्रीय सुरक्षा का संकट खड़ा करने के बजाय, इस फिल्म ने पूर्व सैनिकों को अपने अपराधबोध और ट्रॉमा पर खुलकर बात करने का मौका भी दिया.
कुछ फिल्मों पर पाबंदी लगाने के जायज़ कारण भी हो सकते हैं. इनमें तथ्यों को जानबूझकर तोड़ना-मरोड़ना प्रमुख है. सतलुज के मामले में, सरकार का कहना है कि इससे कानून-व्यवस्था खराब हो सकती है और भारत-विरोधी ताकतों को फायदा मिल सकता है. लेकिन मानवाधिकार के वैश्विक मानक कहते हैं कि “राष्ट्रीय सुरक्षा” के नाम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुर्बान करना ग़लत है. ऐसा केवल तब किया जा सकता है जब खतरा बिलकुल सीधा, स्पष्ट और प्रामाणिक हो. ऐसा, जनता को बुरा लगेगा इस, या राजनीतिक नफा-नुकसान के आधार पर नहीं किया जा सकता.
अंतरराष्ट्रीय मानक आनुपातिकता के सिद्धांत पर भी बहुत ज़ोर देते हैं. किसी फिल्म को मात्र 48 घंटे के भीतर किसी प्लेटफॉर्म से पूरी तरह से गायब कर देना उसके खिलाफ उठाया जा सकने वाला सबसे कठोर कदम है. सतलुज का मूल विषय कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं है. यह भारत के न्यायिक रिकॉर्ड में भी दर्ज है. यदि फिल्म उस रिकॉर्ड को सही तरीके से नहीं दिखाती है, तो यह दावा भी नहीं कर सकती कि वह सच्ची घटनाओं पर आधारित है. नहीं तो, राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर फिल्म को प्रतिबंधित करके, सरकार खुद को वैश्विक लोकतांत्रिक मानकों से दूर खड़ा करती दिखाई देती है.
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