भारत हो या अमेरिका, सत्ता हर जगह उतनी ही महिला-विरोधी है!
अब तक कैबिनेट के कुल चार सदस्यों ने डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को अलविदा कहा है और कमाल की बात यह है कि वे सभी महिलाएं हैं

हाल ही में अमेरिका की राष्ट्रीय खुफिया निदेशक (डीएनआई) तुलसी गबार्ड ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया. वे कैबिनेट स्तर की चौथी पदाधिकारी हैं जिन्होंने पिछले तीन महीनों में ट्रंप प्रशासन को अलविदा कहा है. डोनाल्ड ट्रंप के राज में, उनके बड़े से बड़े अधिकारियों का कभी भी आना और चले जाना कोई नई बात नहीं है. अगर उनके पिछले कार्यकाल को देखें तो उसमें करीब 90 फीसदी लोगों को अपने पदों से हटना पड़ा था.
लेकिन इस बार अजीब यह है कि अब तक कैबिनेट के जिन चार अधिकारियों ने ट्रंप प्रशासन को अलविदा कहा है, वे सभी महिलाएं हैं. और यह संख्या ट्रंप कैबिनेट के कुल महिला सदस्यों की ठीक आधी है. इनमें से ज्यादातर महिलाएं विवादों और आरोपों के घेरे में रही हैं. लेकिन ऐसा तो डोनाल्ड ट्रंप के पुरुष काबीना अधिकारियों के बारे में भी कहा जा सकता है. मगर वे तो बेझिझक अपने पदों पर जमे हुए हैं.
तो फिर ट्रंप कैबिनेट की इन निकासियों को सिर्फ राजनीतिक, प्रशासनिक या बाहर जाने वाली महिलाओं के व्यक्तिगत निर्णय की तरह कैसे देखा जा सकता है? क्या इनमें किसी किस्म का लैंगिक पूर्वाग्रह भी मौजूद होने की संभावना हमें नहीं दिखती? अगर हां, तो फिर हम इस सवाल पर भी विचार कर सकते हैं कि लैंगिक समानता के मामले में दिल्ली से वॉशिंगटन तक, क्या दुनिया भर की सत्ताएं उतनी ही अच्छी या बुरी हैं?
भारत
भारत ने 2023 में देश की संसद और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के लिए ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पारित किया था. इसे एक ऐतिहासिक कदम बताकर इसके खूब गीत गाए गए. लेकिन यह कब लागू होगा, ठीक से किसी को पता नहीं. दरअसल इस आरक्षण को लागू करने के लिए कानून में दो शर्तें भी जोड़ दी गई थीं— 2026 के बाद देश में जो भी जनगणना होगी उसके आधार पर पहले लोकसभा और देश भर की विधानसभाओं का परिसीमन होगा और फिर उसके बाद उन पर महिला आरक्षण लागू होगा.
इसका सीधा मतलब यह है कि जो हक महिलाओं को कानून बनते ही मिल सकता था, उसे एक अनिश्चित समय के लिए टाल दिया गया. इसके उलट प्रशासन के निचले स्तर पर (शहरों और गांवों के स्थानीय निकायों में) भारतीय महिलाओं को आरक्षण मिले दशकों बीत चुके हैं.
भारत वह देश भी रहा है जिसने आज़ादी के करीब 20 साल बाद ही एक महिला को देश का प्रधानमंत्री बना दिया था. लेकिन देश की वर्तमान सरकार की बात करें तो उसके 30 कैबिनेट मंत्रियों में सिर्फ दो ही महिलाएं हैं. इनमें भी एक के पास महिलाओं का मंत्रालय ही है. इसके अलावा केंद्रीय मंत्रिमंडल में इस समय पांच राज्य मंत्रियों के पास स्वतंत्र प्रभार है जिनमें से एक भी महिला नहीं है. बाकी बचे केंद्रीय मंत्रियों के नीचे काम करने वाले 36 राज्यमंत्री. इनमें भी सिर्फ पांच महिलाएं हैं जिनमें से किसी के पास कोई ऐसा विभाग नहीं है जिसे तुलनात्मक रूप से शक्तिशाली कहा जा सके.
यानी केंद्रीय कैबिनेट में अगर केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण को छोड़ दें तो किसी नेत्री के पास सही मायनों में वह ताकत नहीं है जो इसके पुरुष मंत्रियों के पास है. वैसे कुछ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि वित्त मंत्रालय के सबसे महत्वपूर्ण निर्णय प्रधानमंत्री कार्यालय लेता है, सीतारमण नहीं.
हालांकि निर्मला सीतारमण ही वह महिला भी हैं जो हमारे देश की रक्षामंत्री भी रही हैं. उनके अलावा आज तक कोई महिला देश के उस मंत्रालय की मुखिया नहीं रही जिसके जिम्मे देश की सीमाओं की सुरक्षा है. और इस देश की किसी महिला के हाथों में (इंदिरा गांधी को छोड़कर) कभी देश की आंतरिक सुरक्षा (गृह मंत्रालय) भी नहीं दी गई. और जब इस देश ने सुषमा स्वराज को अपनी पहली पूर्णकालिक महिला विदेश मंत्री बनाया तो किसी से छुपा नहीं था कि उनकी स्थिति मंत्रालय में किसी राज्य मंत्री जैसी ही थी. उस वक्त विदेश मंत्रालय के ज़्यादातर बड़े काम अपनी अनगिनत विदेश यात्राओं के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बाकी समय पीएमओ ही निपटाया करता था.
अमेरिका
अब जरा समंदर पार उस अमेरिका की ओर देखें जो हर दिन दुनिया को लोकतंत्र और समानता का पाठ पढ़ाता रहता है. दूसरे ट्रंप प्रशासन की शुरुआत में सभी को ऐसा लगा था कि महिलाओं को सरकार के सबसे ताकतवर हिस्सों की कमान मिल रही है. लेकिन मई 2026 तक आते-आते यह भ्रम पूरी तरह टूट गया.
डीएनआई के पद से तुलसी गबार्ड का इस्तीफा इस सिलसिले की सबसे ताज़ा कड़ी है. उनसे पहले अटॉर्नी जनरल पाम बॉन्डी को उनके पद से हटाया गया, होमलैंड सिक्योरिटी की कमान संभाल रही क्रिस्टी नोएम को बर्खास्त किया गया और श्रम मंत्री लोरी शावेज-डेरेमर को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. इन सभी के पदों पर इनके जाने के बाद पुरुषों का ही कब्ज़ा हो गया. इसके उलट ट्रंप प्रशासन में अब तक कैबिनेट स्तर के एक भी पुरुष मंत्री को उसके पद से नहीं हटाया गया है, बड़े से बड़े विवादों के बाद भी. जो भी पुरुष अधिकारी हटाए गए, वे या तो ट्रंप प्रशासन में सलाहकार थे या निचले-स्तर के अधिकारी.
यहां एक दिलचस्प उदाहरण माइक वॉल्ट्ज का है जिन्हें ट्रंप 2.0 की शुरुआत में अमेरिका का राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) बनाया गया था. एक बड़े विवाद में फंसने के बाद उन्हें एनएसए के पद से हटाकर संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका का राजदूत बना दिया गया. कमाल की बात यह है कि उनका नया पद कैबिनेट स्तर का है, जबकि पुराना पद इससे निचले दर्ज़े का था. यानी गलती करने के लिए डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें पदोन्नति दी, सज़ा नहीं. लेकिन किसी भी महिला कैबिनेट अधिकारी के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.
इसे राजनीति विज्ञान के दो शब्दों ‘ग्लास क्लिफ’ (कांच की चट्टान) की मदद से समझा जा सकता है. इसका मतलब यह है कि अक्सर महिलाओं को बेहद चुनौतीपूर्ण समय में ऊंचे पदों पर बिठाया जाता है, और जैसे ही कोई समस्या आती है, उन्हें तुरंत बलि का बकरा बना दिया जाता है. वहीं, पुरुष बड़े से बड़े विवादों के बाद भी अपनी कुर्सियों पर जमे रहते हैं.
तुलसी गबार्ड के जाने के बाद उनकी जगह एक और पुरुष ऐरन लुकास लेने वाले हैं. इससे अमेरिकी प्रशासन के कुल 26 कैबिनेट पदों में से केवल चार पर ही (15 फीसदी) महिलाएं बची हैं. इस पूरे प्रकरण का एक और स्याह पहलू देखने के लिए इन चारों महिलाओं के विभागों को भी देख सकते हैं. इनमें से व्हाइट हाउस की चीफ ऑफ स्टाफ सूसी विल्स को छोड़ दें (किसी भी अमेरिकी प्रशासन में यह पद बेहद अहम होता है) तो किसी भी महिला कैबिनेट मंत्री-अधिकारी के पास कोई शक्तिशाली पद नहीं है. इन अधिकारियों में से लिंडा मैकमोहन उस शिक्षा विभाग को संभाल रही हैं जिसे ट्रंप प्रशासन धीरे-धीरे खत्म करना चाहता है, और ब्रुक रोलिंस उस कृषि विभाग को जिसके बजट में भारी कटौती प्रस्तावित है. इनके अलावा केली लोफ्लर “स्मॉल बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन” विभाग की प्रमुख हैं.
प्रबंधन की भाषा में इसे ‘मैनेजिंग डिक्लाइन’ यानी पतन का प्रबंधन कहते हैं. यानी, जिन विभागों और संस्थाओं को बेहतर बनाना है उनकी ज़िम्मेदारी पुरुष मंत्रियों सौंप दी गई है. और जिन विभागों में काटने-छांटने जैसे अप्रिय और अलोकप्रिय काम करने हैं वे महिलाओं के मत्थे मढ़ दिए गए हैं.
डेमोक्रेट्स बनाम रिपब्लिकन
जब हम अमेरिका की दोनों मुख्य पार्टियों की तुलना करते हैं, तो सतह पर एक बड़ा अंतर दिखाई देता है. डेमोक्रेटिक पार्टी (जैसे ओबामा या बाइडेन प्रशासन) खुद को विविधता और लैंगिक समानता का पैरोकार बताती है. जो बाइडेन ने अपने कार्यकाल के दौरान कैबिनेट में लगभग 48 फीसदी पदों पर महिलाओं को जगह दी थी, जो अमेरिकी इतिहास में एक रिकॉर्ड था. उन्होंने देश को पहली महिला उपराष्ट्रपति (कमला हैरिस) भी दी. इसके उलट, दक्षिणपंथी रिपब्लिकन पार्टी का झुकाव हमेशा पारंपरिक और पुरुष-प्रधान ताने-बाने की तरफ ज्यादा रहता है.
लेकिन जब आप थोड़ा गहरा उतरते हैं, तो समझ आता है कि शायद यह अंतर सिर्फ ऊपर-ऊपर का ही है. डेमोक्रेटिक पार्टी अपनी उदार छवि के लिए महिलाओं को मंत्री तो बनाती है, लेकिन जब बात देश की सर्वोच्च कमान यानी ‘कमांडर-इन-चीफ’ की कुर्सी की आती है तो उसके समर्थक पीछे हट जाते हैं. साल 2016 में हिलेरी क्लिंटन और हाल ही में कमला हैरिस को राष्ट्रपति चुनाव में जिस तरह हार का सामना करना पड़ा, वह सिर्फ उनकी निजी हार नहीं थी. वह शायद अमेरिकी समाज के उस गहरे अविश्वास का नतीजा भी थी जो आज भी एक महिला को परमाणु कोड और सेना की कमान संभालने लायक नहीं समझता.
यह देखना दिलचस्प है कि भारत के अलावा पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों ने भी दशकों पहले अपने देश की कमान महिलाओं (इंदिरा गांधी, बेनजीर भुट्टो, शेख हसीना, सिरिमावो भंडारनायके) के हाथों में सौंप दी थी. लेकिन खुद को आधुनिकता का अगुवा मानने वाले अमेरिका में आज तक कोई महिला राष्ट्रपति के पद तक नहीं पहुंच सकी है. हालांकि भारत ने भी किसी महिला को दोबारा अपनी राजनीति के शिखर पर नहीं पहुंचाया. और ऐसा भी नहीं है कि पिछली बार उसने ज़मीन से उठकर आने वाली किसी महिला को अपना नेता बनने दिया था.
निकट भविष्य में भी ऐसा होने की कोई उम्मीद नहीं दिखती. हमारी वर्तमान राजनीति महिला-विरोधी भले न दिखे, वह महिला-समर्थक भी नहीं दिखती. अभी भी पुरुषों के वर्चस्व वाली राजनीति में महिलाओं का स्थापित होना तभी संभव दिखता है जब वे खुद को दोयम मानने के लिए तैयार हों. जैसे ही वे अपनी स्वतंत्र सत्ता दिखाने की कोशिश करती हैं, समाज और व्यवस्था के अंदर छिपा पुरुषत्व उन्हें बाहर धकेलने की कोशिश करने लगता है.
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