चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिल्ली में हो रहे प्रदर्शनों के बारे में एक बात आसानी से कही जा सकती है—वे शांतिपूर्ण हैं. लोग नारे लगा रहे हैं, पोस्टर लिए हुए हैं, सवाल पूछ रहे हैं. लेकिन इनमें ऐसी कोई हिंसा, पत्थरबाज़ी या तोड़फोड़ नहीं दिखती जिसकी वजह से प्रदर्शनकारियों को ऐसी जगह जाकर प्रदर्शन तक न करने दिया जाए जो इसी काम के लिए है. लेकिन उन्हें जंतर-मंतर तो छोड़िए, उसके आस-पास भी नहीं पहुंचने दिया जा रहा है.
दिल्ली पुलिस ने दो अक्टूबर को सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिया. तीन अक्टूबर को भी ऐसा ही किया. फिर छह और सात अक्टूबर को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और बड़ी संख्या में विपक्षी सांसदों के साथ भी ऐसा ही हुआ. राहुल गांधी और प्रियंका गांधी सहित जिसने भी इसका विरोध किया, उसे दिल्ली पुलिस ने अपनी चिर-परिचित ताक़त से जवाब दिया. इसके बावजूद प्रदर्शन सामान्यतः अहिंसक ही रहे. फिर भी इन्हें आगे न होने देने के लिए सेना बुलाने के सिवाय लगभग हर उपाय किया जा रहा है.
यहां एक बहुत साधारण सा सवाल पैदा होता है: चुनाव आयोग से पूछे जा रहे सवालों का जवाब पुलिस के जरिये क्यों दिया जा रहा है?
पुलिस यह नहीं बता सकती कि चुनाव आयोग के दो सदस्यों ने बार-बार आयोग के निर्णयों के खिलाफ अपनी लिखित आपत्तियां क्यों दर्ज़ कीं. वह यह नहीं बता सकती कि लोगों को मताधिकार देने वाला फॉर्म-6 किसने बदला और इसके क्या परिणाम हो सकते हैं. पुलिस यह नहीं बता सकती कि पश्चिम बंगाल में न्यायिक अधिकारियों ने लाखों मतदाताओं के नाम सूची में बनाए रखने का फैसला किया तो आयोग उन्हें फिर से हटाने पर क्यों तुला हुआ है. वह यह भी नहीं बता सकती कि मतदाता सूची में लोगों के नाम केवल दिल्ली से ही क्यों जोड़े जा रहे हैं जबकि कानूनन यह काम देश भर में फैले ईआरओ का है. यह भी कि चुनाव आयोग के तीनों सदस्य अब आपस में मिलते और मिलकर फैसले क्यों नहीं लेते. और पुलिस यह कैसे बताएगी कि इतिहास में पहली बार दो चुनाव आयुक्तों ने आयोग में चल रही अव्यवस्था के ख़िलाफ़ कैबिनेट सचिव को पत्र किस मजबूरी की हालत में लिखा था.
इन सवालों के जवाब केवल चुनाव आयोग दे सकता है, पुलिस या केंद्रीय सुरक्षा बल नहीं और न ही मोदी सरकार. लेकिन हालत यह है कि आयोग पर उठ रहे सवालों के सिर्फ राजनीतिक जवाब मिल रहे हैं. ये जवाब कभी भाजपा के प्रवक्ता दे रहे हैं कभी विभिन्न राज्यों के उसके मुख्यमंत्री. बस चुप है तो चुनाव आयोग और इसका विरोध जताने पर इनका जवाब दिल्ली पुलिस अपने ही ढंग से दे रही है.
मोदी सरकार को भी इस मामले से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब देने हैं. लेकिन फिलहाल वह चुनाव आयोग की न बोलने की आज़ादी की रक्षा के लिए सेंट्रल दिल्ली को छावनी बनाने में लगी हुई है.
चुनाव आयोग के सामने मौजूद सवाल सिर्फ राहुल और प्रियंका गांधी या विपक्ष के बनाए हुए राजनीतिक सवाल नहीं हैं. सितंबर 2026 में इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट आई थी, जिसकी मूल बातों को चुनाव आयोग ने भी नहीं नकारा. इससे पता चलता है कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के दो आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने खुद लिखित में इनमें से कई सवाल उठाए हैं.
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक नवंबर 2025 से सितंबर 2026 के बीच दोनों आयुक्तों ने कम से कम 14 बार चुनाव आयोग के महत्वपूर्ण फैसलों और प्रक्रियाओं पर लिखित आपत्तियां दर्ज कीं. इनमें फॉर्म-6 का मामला भी है जिसके जरिये नये मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में जुड़ते हैं. पिछले दिनों इस फॉर्म में यह सवाल भी जोड़ दिया गया कि आवेदक या उसके माता-पिता का नाम पिछली एसआईआर में शामिल था या नहीं. आयोग के दोनों सदस्यों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के मुताबिक ऐसा करना “अवैध” और “अनधिकृत” था क्योंकि चुनाव आयोग अपने स्तर पर फॉर्म-6 को इस तरह नहीं बदल सकता; इसके लिए तय वैधानिक प्रक्रिया जरूरी है.
बाद में जब चुनाव आयोग ने अपने बचाव में एक प्रेस रिलीज़ के जरिये यह कहा कि नये फॉर्म 6 को सुप्रीम कोर्ट की भी मंज़ूरी थी तो भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का खुले कोर्ट में यह कहना था कि सुप्रीम कोर्ट ने किसी बदले हुए फॉर्म 6 को मंजूरी नहीं दी है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में यह भी था कि गोवा के 97 लोगों को चुनाव आयोग का नोटिस मिलने के बाद संबंधित ईआरओ ने सुनवाई और दस्तावेजों की जांच के आधार पर मतदाता सूची में शामिल किए जाने योग्य पाया था. कानून मतदाता सूची पर निर्णय का अधिकार ईआरओ—जो सामान्यतः एसडीएम होते हैं—को देता है. लेकिन चुनाव आयोग की नई वेबसाइट ईसीआईनेट ने उन्हें इन 97 लोगों के नाम जोड़ने ही नहीं दिए. इन अधिकारियों ने बार-बार दिल्ली में चुनाव आयोग को लिखा, लेकिन हुआ कुछ नहीं. नतीजतन ये सभी मतदाता गोवा की अंतिम मतदाता सूची से बाहर रह गए. ताज़ा जानकारी के मुताबिक अब वे फॉर्म-6 के जरिये अपना नाम सूची में शामिल कराने का प्रयास कर रहे हैं.
इस तरह की घटनाओं की वजह से ही दोनों चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग लिखकर यह आपत्ति जताई कि मतदाता सूची पर देश भर में फैले ईआरओ के बजाय दिल्ली में बैठे चंद लोगों का नियंत्रण बढ़ता जा रहा है. उनके मुताबिक यह न केवल वैधानिक व्यवस्था के खिलाफ है बल्कि इससे मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हेरफेर की गुंजाइश भी बन सकती है.
पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान करीब 60 लाख लोगों को लॉजिकल डिसक्रिपेंसी के नोटिस दिए गए. इनके मामलों की जांच के लिए न्यायिक अधिकारियों को लगाया गया. उनके निर्णयों के खिलाफ अपीलों की सुनवाई के लिए हाईकोर्ट के रिटायर्ड जजों वाले ट्रायब्यूनल बनाए गए. इन ट्रायब्यूनल्स में पहुंची अपीलों में करीब 16 लाख ऐसे लोगों के खिलाफ थीं जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने मतदाता सूची में बनाए रखने का फैसला किया था. एक्सप्रेस के मुताबिक चुनाव आयुक्त संधू ने अगस्त 2026 में आयोग के अधिकारियों को पत्र लिखकर पूछा कि चुनाव आयोग की ओर से ये अपीलें किसके कहने पर दाखिल की गईं.
यहां कमाल की बात यह है कि आयोग ने सुप्रीम कोर्ट की एक सुनवाई में उसे यह तो बताया कि ट्राइब्यूनल में पश्चिम बंगाल से जुड़े कुल 38 लाख मामले हैं लेकिन यह नहीं कि इनमें से 16 लाख मामले उसने ही लोगों के वोट काटने के लिए दाख़िल किये हैं.
इसका एक मोटा अर्थ यह है कि आयोग ने कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश की. और दूसरा यह कि हमेशा लोगों के वोट बनाने पर ज़ोर देने वाला आयोग पिछले कुछ समय से उनके नाम काटने पर ज्यादा ज़ोर देता और वोट बनाने को मुश्किल बनाता दिख रहा है. और वहां फैसले भी मिल-बैठकर नहीं लिये जा रहे हैं. नहीं तो दो चुनाव आयुक्तों को इस तरह से लिखित में अपनी आपत्तियां और विरोध दर्ज़ नहीं कराने पड़ते. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट भी बताती है कि करीब चार महीने तक तीनों चुनाव आयुक्तों की कोई संयुक्त बैठक ही नहीं हुई थी.
क़ानून कहता है कि आयोग का काम जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से होगा और मतभेद होने पर उसका फैसला बहुमत से होगा. लेकिन ऐसा होता तो वह असाधारण घटना भी न घटती जो चुनाव आयोग के इतिहास में पहली बार घटी. संधू और जोशी ने देश के कैबिनेट सचिव को अलग-अलग दो पत्र लिखे. इनमें उन्होंने आयोग के भीतर नियमों के उल्लंघन का हवाला दिया था. चुनाव आयोग ने बाद में इस पर सिर्फ इतना कहा कि ये पत्र आयोग के एक अधिकारी के कामकाज से जुड़े थे. लेकिन एक स्वतंत्र संवैधानिक आयोग के दो सदस्यों को अगर सिर्फ एक अधिकारी की शिकायत लेकर कैबिनेट सचिव के पास जाना पड़े तो मामला इतना सीधा नहीं रह जाता.
इस पूरे मामले की गंभीरता समझने के लिए 1995 में टी.एन. शेषन की उस याचिका पर आए फैसले को याद किया जा सकता है जो उन्होंने चुनाव आयोग को तीन सदस्यीय बनाने के नरसिम्हा राव सरकार के निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर की थी. सुप्रीम कोर्ट ने वह याचिका खारिज कर दी थी.
उस फैसले का सार बहुत साफ था: चुनाव आयोग केवल मुख्य चुनाव आयुक्त नहीं है. तीनों आयुक्त मिलकर चुनाव आयोग हैं. मुख्य चुनाव आयुक्त उसका अध्यक्ष है, बाकी दो सदस्यों का मालिक नहीं.
लेकिन वर्तमान चुनाव आयोग ऐसा व्यवहार करता नज़र नहीं आता.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट आने के बाद चुनाव आयोग ने बस ढुलमुल सी दो प्रेस रिलीज़ जारी की हैं जो रिपोर्ट में शामिल आरोपों को नकारती नहीं हैं लेकिन उसमें मौजूद बुनियादी सवालों का कोई जवाब भी नहीं देतीं.
अब बात इस मामले में मोदी सरकार की भूमिका की और उससे किये जा सकने वाले सवालों की.
संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को असाधारण अधिकार देता है. लेकिन वह चुनाव आयुक्तों के चयन का स्पष्ट तरीका तय नहीं करता. वह मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति (केंद्र सरकार) पर छोड़ देता है, “संसद द्वारा इस संबंध में बनाए गए कानून” के मुताबिक करने के लिए.
लेकिन संसद ने सात दशक से ज्यादा समय तक ऐसा कोई कानून नहीं बनाया. केंद्र सरकार चुनाव आयुक्तों के नाम तय करती रही और राष्ट्रपति उनकी नियुक्ति करते रहे.
मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने इस खाली स्थान को भर दिया. अनूप बर्नवाल मामले में उसने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए चुनाव आयोग को कार्यपालिका के प्रभाव से बचाना जरूरी है. जब तक संसद कानून न बनाए, उसने अंतरिम व्यवस्था दी कि सभी चुनाव आयुक्तों का चयन प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता विपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश की चयन समिति करेगी.
इससे पहली बार ऐसी निष्पक्ष सी चयन प्रक्रिया बनी जिसमें सरकार अकेले चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति नहीं कर सकती थी. कुछ महीने बाद दिसंबर 2023 में मोदी सरकार ने इसकी जगह चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक नया क़ानून बना दिया—The Chief Election Commissioner And Other Election Commissioners Act, 2023 (चुनाव आयुक्त कानून 2023).
नए कानून ने देश के मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति से बाहर कर दिया. उनकी जगह समिति में प्रधानमंत्री की पसंद के एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को रख दिया गया. तीन सदस्यीय समिति में अब प्रधानमंत्री और उनका चुना हुआ मंत्री एक तरफ होते हैं, नेता विपक्ष दूसरी तरफ. इसका सीधा मतलब यह है कि सरकार अब फिर से जिसे चाहे चुनाव आयुक्त चुन सकती है बस वह भारत सरकार में सचिव स्तर का कोई वर्तमान या पूर्व नौकरशाह होना चाहिए.
इस चुनाव आयुक्त कानून की धारा 16 वर्तमान और पूर्व चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक या कथित आधिकारिक कामों के लिए बहुत व्यापक व्यक्तिगत कानूनी संरक्षण भी देती है. यानी ऐसे कामों के लिए उनके ख़िलाफ़ किसी अदालत में सिविल या क्रिमिनल कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती; हालांकि आयोग के फैसलों की न्यायिक समीक्षा इसमें शामिल नहीं है.
ये बदलाव कई सवाल खड़े करते हैं. और ये केवल विपक्ष ही खड़े नहीं करता. सितंबर 2026 में 2023 के चुनाव आयुक्त कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीश—जस्टिस दीपांकर दत्ता और एस.सी. शर्मा—दो अलग निष्कर्षों पर पहुंचे थे (अब यह मामला बड़ी संवैधानिक पीठ द्वारा सुना जाएगा). अपने फैसले में जस्टिस दत्ता का कहना था कि चुनाव आयोग का स्वतंत्र होना ही पर्याप्त नहीं है, उसका स्वतंत्र दिखना भी जरूरी है. उन्होंने चयन समिति में शामिल कैबिनेट मंत्री को प्रधानमंत्री से अलग मानने पर भी सवाल उठाया और कहा कि ऐसी स्थिति में समिति में नेता विपक्ष की मौजूदगी केवल सजावटी ही हो सकती है.
सवाल यह है कि क़ानून बनाकर मोदी सरकार ने पहली बार सुप्रीम कोर्ट द्वारा चुनाव आयुक्तों के चयन के लिए बनाई निष्पक्ष दिखने वाली व्यवस्था को खत्म क्यों किया? किसी दुरुपयोग की संभावना वाली व्यवस्था को चलाए रखना अलग बात है लेकिन उसके सही होने के बाद फिर से वही पुरानी राह पकड़ लेना संदेह खड़ा करता है?
अच्छी व्यवस्था वह नहीं होती जो तब ठीक काम करे जब अच्छे लोग सत्ता में हों. अच्छी व्यवस्था वह होती है जिसका दुरुपयोग बुरे लोग भी आसानी से न कर सकें. जो सत्ता में बैठे लोगों की अच्छाई या बुराई पर निर्भर न रहे.
मोदी सरकार का नया कानून और उससे बनी व्यवस्था इन कसौटियों पर खरी उतरती नहीं दिखती. आज जो नियुक्ति व्यवस्था भाजपा को सुविधाजनक लग सकती है, कल वही किसी दूसरी पार्टी की सरकार के हाथ में होकर उसके खिलाफ भी जा सकती है.
2024 में इसी नए कानून के तहत पहली बार ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को चुनाव आयुक्त चुना गया. और जिस तरह से उन्हें चुना गया वह भी मोदी सरकार को कई सवालों के घेरे में खड़ा करता है.
चुनाव आयुक्त कानून 2023 को दिसंबर के आखिर में राष्ट्रपति की मंजूरी मिली थी, 2024 के लोकसभा चुनावों से महज़ कुछ महीने पहले. इसके तुरंत बाद कांग्रेस नेता जया ठाकुर और बाद में एडीआर इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चले गए. फिर 9 मार्च 2024 को आम चुनावों की घोषणा से कुछ दिन पहले चुनाव आयुक्त अरुण गोयल ने अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया. अगर ऐसा न करते तो ज्ञानेश कुमार की जगह आज वे देश के मुख्य चुनाव आयुक्त होते और 2027 के अंत तक इस पद पर बने रहते.
अरुण गोयल के इस्तीफे के बाद चुनाव आयोग में केवल एक सदस्य रह गया था—मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार—क्योंकि उसके एक दूसरे सदस्य ए.सी. पांडे फरवरी 2024 में रिटायर हो गये थे. इस आशंका से कि सरकार अब दोनों चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति उस नये चुनाव आयुक्त क़ानून के आधार पर कर देगी जिसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित था, जया ठाकुर और एडीआर ने सुप्रीम कोर्ट से अर्जेंट सुनवाई की गुज़ारिश की. वे नये नियुक्ति क़ानून पर रोक लगवाना चाहते थे. 13 मार्च को जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने मामले को 15 मार्च को सुनना तय किया. लेकिन सरकार ने आनन-फ़ानन में अगले ही दिन ज्ञानेश कुमार और एसएस संधू को चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिया.
नये कानून के तहत चुने गए ये पहले चुनाव आयुक्त थे. जिस चयन समिति ने उन्हें चुना उसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी शामिल थे. चौधरी का कहना था कि अंतिम छह नाम उन्हें चयन बैठक से कुछ ही मिनट पहले दिए गए और ऐसे में उनके लिए उन पर गंभीरता से विचार करना संभव नहीं था.
जब ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त बने तब राहुल गांधी लोकसभा में नेता विपक्ष थे. उन्होंने भी कुमार की नियुक्ति का विरोध किया था क्योंकि चयन समिति की संरचना को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कुछ ही समय बाद सुनवाई होनी थी. उनका कहना था कि नियुक्ति तब तक टाल दी जानी चाहिए. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.
अरुण गोयल की नियुक्ति का मामला भी कम दिलचस्प नहीं था. नवंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की निष्पक्ष प्रक्रिया तय करने के लिए बर्नवाल मामले की सुनवाई चल रही थी. उसी दौरान चट से अरुण गोयल की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति मंजूर हुई और पट से मोदी सरकार ने उन्हें चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिया. उनकी इस तरह से नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट खासा खफा दिखा और उसने मोदी सरकार से इस पर काफी तीखे सवाल भी किये थे.
यह टाइमिंग अपने आप में मोदी सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करती थी. नहीं तो उसे इतनी जल्दबाज़ी में, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाइयों के बीच नियुक्ति करने की क्या जरूरत थी? और इतने महत्वपूर्ण पदों के लिए तो वैसे भी बहुत सोच-विचारकर फैसला लेने की ज़रूरत होती है. लेकिन ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू की नियुक्ति के समय भी सरकार ने लगभग ऐसा ही किया था.
गोयल के इस्तीफे का आधिकारिक कारण आज भी स्पष्ट नहीं है. लेकिन हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट बताती है कि उनमें और सीईसी राजीव कुमार के बीच कई मुद्दों पर मतभेद थे. इनमें शिवसेना की टूट वाला मामला भी शामिल था. पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह शिंदे या ठाकरे में से किस पक्ष को दिया जाए, इसका फैसला करते समय गोयल पार्टी संगठन में बहुमत को भी महत्व देना चाहते थे. अंतिम फैसला हालांकि सर्वसम्मति से हुआ और पार्टी का नाम व चिन्ह शिंदे के नेतृत्व वाले उस गुट को मिला जिसके पास विधायकों और सांसदों की संख्या ज्यादा थी और जो महाराष्ट्र में भाजपा का सहयोगी था.
कारण जो भी रहा हो लेकिन किसी चुनाव आयुक्त के लिए लोकसभा चुनाव के प्रबंधन से ज्यादा महत्वपूर्ण कार्य शायद ही कुछ और हो. और गोयल के कार्यकाल में यह अवसर सिर्फ एक बार 2024 में ही आने वाला था. लेकिन उससे ठीक पहले और मुख्य चुनाव आयुक्त बनने से सिर्फ एक साल पहले वे मैदान छोड़कर चले गए. लेकिन इसका उन्हें कुछ ज्यादा नुक़सान नहीं हुआ. कुछ महीने बाद उन्हें क्रोएशिया में भारत का राजदूत नियुक्त कर दिया गया.
मोदी सरकार देश की अकेली सरकार है जिसके कार्यकाल में दो-दो ऐसे चुनाव आयुक्तों के इस्तीफे हुए जो ऐसा न करते तो आगे जाकर देश के मुख्य चुनाव आयुक्त बनते.
गोयल से पहले 2020 में ऐसा करने वाले चुनाव आयुक्त थे अशोक लवासा. उनसे पहले यह काम सिर्फ एक बार 1973 में हुआ था जब तब के मुख्य चुनाव आयुक्त नागेंद्र सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दिया था. लेकिन उन्होंने ऐसा किसी विवाद के चलते नहीं बल्कि इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में अपनी नियुक्ति की वजह से किया था.
अशोक लवासा को मोदी सरकार ने एक सामान्य तरीके से पिछली नियुक्ति प्रक्रिया के तहत चुनाव आयुक्त बनाया था. लेकिन उनकी तब के मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा से नहीं बनी.
2019 में चुनाव आयोग में नरेंद्र मोदी और अमित शाह से जुड़ी चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन की पांच शिकायतें पहुंचीं. इन मामलों में अरोड़ा और तीसरे चुनाव आयुक्त ने उन्हें क्लीन चिट दी. लेकिन लवासा इससे सहमत नहीं थे. वे चाहते थे कि इन मामलों से जुड़े चुनाव आयोग के अंतिम आदेशों में उनकी माइनॉरिटी ओपिनियन भी दर्ज हो. आयोग ने 2-1 से उनकी मांग नहीं मानी. इसके बाद लवासा ने चुनाव आचार संहिता से जुड़ी बैठकों से खुद को अलग कर लिया.
चुनाव खत्म होने के कुछ महीनों बाद उनकी पत्नी, बेटे और बहन के खिलाफ आयकर विभाग की जांच और नोटिसों की खबरें आईं. इसके कुछ समय बाद लवासा अपने पद से इस्तीफा देकर एशियन डेवलपमेंट बैंक चले गए. उनके इस्तीफे के बाद राजीव कुमार के मुख्य चुनाव आयुक्त बनने का रास्ता खुल गया.
राजीव कुमार, ज्ञानेश कुमार के बाद शायद ऐसे दूसरे मुख्य चुनाव आयुक्त रहे जो सबसे ज्यादा विवादित रहे. लेकिन उससे पहले उन सुनील अरोड़ा के दौर को थोड़ा और देखते हैं जिनके बारे में योगेंद्र यादव ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा कि दिसंबर 2018 में उनकी नियुक्ति के साथ चुनाव आयोग संस्थागत स्वायत्तता और राजनीतिक तटस्थता में गिरावट के मौजूदा दौर में प्रवेश कर गया.
लवासा प्रकरण के बाद अरोड़ा 2021 के पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर बड़े विवाद में घिरे. आयोग ने वहां आठ चरणों में मतदान कराया. आलोचकों ने आरोप लगाया कि इतने लंबे चुनाव कार्यक्रम से भाजपा को फायदा हुआ क्योंकि प्रधानमंत्री और दूसरे राष्ट्रीय नेताओं को राज्य में ज्यादा चुनावी सभाएं करने का समय मिला. आयोग का तर्क था कि उसने ऐसा हिंसा, सुरक्षा बलों की उपलब्धता, मतदान केंद्रों की बड़ी संख्या और कोविड को ध्यान में रखते हुए किया था. लेकिन यह इतना असामान्य था कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठने स्वाभाविक थे.
ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार से पहले चुनाव आयोग कभी विवादों के केंद्र में नहीं रहा.
1989 में राजीव गांधी सरकार ने आम चुनाव से कुछ सप्ताह पहले पहली बार दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिए थे. इस पर काफी विवाद हुआ. आरोप लगा कि ऐसा उस समय के मुख्य चुनाव आयुक्त आर.वी.एस. पेरी शास्त्री का प्रभाव कम करने के लिए किया गया था क्योंकि सरकार के साथ उनके संबंध तनावपूर्ण थे.
अगले साल वी.पी. सिंह सरकार ने इन दोनों पदों को समाप्त कर दिया तो इनमें से एक चुनाव आयुक्त एस.एस. धनोआ इसके खिलाफ अदालत चले गए. उन्होंने आरोप लगाया कि नई सरकार उनसे नाराज थी, खासकर 1989 के चुनाव में जनता दल के चुनाव चिन्ह से जुड़े विवाद के कारण. सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी.
1991 में चंद्रशेखर सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की सेवा शर्तों से जुड़ा कानून — Election Commission (Conditions of Service of Election Commissioners and Transaction of Business) Act, 1991 (चुनाव आयोग कानून 1991) — बनाया.
इसके बाद 1993 में पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार ने टी.एन. शेषन के साथ खुले टकराव के बीच आयोग को फिर से तीन सदस्यीय बना दिया. उसी समय चुनाव आयोग कानून 1991 में संशोधन करके यह भी स्पष्ट किया गया कि आयोग सर्वसम्मति से फैसला करने की कोशिश करेगा और मतभेद होने पर बहुमत से निर्णय होगा. शेषन ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. लेकिन कोर्ट ने 1995 में बहुसदस्यीय आयोग और बहुमत से निर्णय की व्यवस्था को वैध ठहराया.
लेकिन इन और कुछ अन्य विवादों के बावजूद हाल के कुछ सालों तक चुनाव आयोग दुनिया भर में भारतीय लोकतंत्र की शान बना रहा. लोग उससे सीखते थे, देश उस पर गर्व करता था. आज ऐसा नहीं है तो उसमें सुनील अरोड़ा के बाद उनके पद पर विराजे उन राजीव कुमार की बहुत बड़ी भूमिका है जिन्हें मोदी सरकार ने चुना था और अशोक लवासा ने अपना इस्तीफा देकर भारत का मुख्य चुनाव आयुक्त बनने दिया.
अगर सुनील अरोड़ा के समय में एक चुनाव आयुक्त का इस्तीफा और कुछ ही बड़े विवाद हुए तो राजीव कुमार पहले मामले में उनके बराबर रहकर विवादों के मामले में उनसे मीलों आगे निकल गए.
राजीव कुमार के कार्यकाल में ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे बड़े नेताओं द्वारा चुनाव आचार संहिता के कथित उल्लंघन पर सीधे उन्हें नोटिस देने के बजाय उनकी पार्टी के अध्यक्षों को नोटिस देने की नई परंपरा शुरू हुई. और उनके कार्यकाल में ही चुनाव में मतदान के आंकड़ों को लेकर बड़ा विवाद हुआ जो सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा.
राजीव कुमार के समय में ही शिवसेना और एनसीपी की टूट के मामले आयोग तक पहुंचे थे और आयोग ने दोनों मामलों में उन गुटों को मूल पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह दिया जो भाजपा के साथ सत्ता में थे.
राजीव कुमार के समय में ही असम का विवादित परिसीमन हुआ जिसके बारे में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने खुद कहा कि परिसीमन के चलते राज्य में मुस्लिम मतदाता केवल करीब 23 सीटों पर निर्णायक रह गए थे. ज़ाहिर सी बात है इसका फायदा भाजपा को मिला.
2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान सूरत का वह असामान्य चुनाव भी राजीव कुमार के कार्यकाल में ही हुआ जिसमें भाजपा उम्मीदवार बिना मतदान के निर्विरोध जीत गया. द गार्डियन की एक खोजी रिपोर्ट में कई उम्मीदवारों ने दबाव और धमकियों के आरोप लगाए थे. रिपोर्ट के मुताबिक इस मामले में चुनाव आयोग से की गई शिकायतों पर उसने कोई कार्रवाई नहीं की.
इंडियन एक्सप्रेस की 2024 की एक रिपोर्ट बताती है कि 2014 के बाद केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई झेल रहे 25 प्रमुख विपक्षी नेता भाजपा में शामिल हुए और उनमें से 23 को बाद में किसी न किसी रूप में राहत मिली—तीन मामलों में केस बंद हुए और 20 में कार्रवाई ठंडी पड़ी या आगे नहीं बढ़ी. अखबार ने यह भी लिखा कि केंद्रीय एजेंसियों के राजनीतिक इस्तेमाल के आरोप यूपीए सरकार के दौर में भी लगे थे, लेकिन उसका पैमाना काफी छोटा था.
2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले आयकर विभाग ने कांग्रेस के मुख्य बैंक खातों पर टैक्स विवाद के कारण रोक लगा दी थी. कांग्रेस ने इसके लिए मोदी सरकार पर राजनीतिक बदले का आरोप लगाया, जबकि भाजपा और आयकर विभाग ने इसे सामान्य कानूनी कार्रवाई बताया.
मकसद जो भी रहा हो, मुख्य विपक्षी पार्टी के चुनावी संसाधनों तक पहुंच को ठीक चुनाव से पहले इस तरह सीमित कर देना अपने आप में गंभीर सवाल पैदा करता था. अगर यह सिर्फ सामान्य कानूनी कार्रवाई थी तो यह छह महीने पहले या दो महीने बाद भी तो की जा सकती थी.
इन घटनाओं से यह साबित नहीं होता कि चुनाव आयोग सरकार से मिला हुआ है. लेकिन कोई अगर इन सबको जोड़कर वर्तमान चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार के व्यवहार पर सवाल उठाता है तो उसे सिर्फ इस आधार पर खारिज कैसे कर सकते हैं कि उसके पास कोई ठोस प्रमाण नहीं है.
कोई बिहार में ठीक विधानसभा चुनाव से पहले, बाढ़ के मौसम और बड़े पैमाने पर प्रवासी आबादी की गैरमौजूदगी के बीच एसआईआर कराने के चुनाव आयोग के फैसले पर सवाल उठाता है, तो उसे ग़लत कैसे कह सकते हैं.
ऐसे ही सवाल पश्चिम बंगाल की एसआईआर पर भी उठाए जा सकते हैं. वहां एसआईआर का काम विधानसभा चुनावों से ठीक पहले हुआ था. ऐसी स्थिति में अगर गलतियां हों तो उन्हें मतदान से पहले पूरी तरह सुधार पाने की गुंजाइश बहुत कम थी, और ऐसा ही हुआ भी. ऐसे में कोई अगर वहां एसआईआर कराने वाले आयोग की मंशा पर सवाल उठाये तो उसे ग़लत कैसे कहेंगे.
क्यों ऐसा नहीं हो सकता था कि बिहार में एसआईआर कभी और कराई जाती और बंगाल में पिछले साल तब होती जब बिहार में हुई थी, जब बंगाल के चुनाव थोड़ी दूर थे. दोनों राज्यों में एसआईआर का ठीक चुनाव से पहले कराया जाना इतना जरूरी क्यों था?
जब अकेली भाजपा चुनाव आयोग से ऐसे सवाल नहीं पूछती बल्कि चुनाव आयोग से पूछे जाने पर ख़ुद इनके जवाब देने लगती है तो भाजपा की भूमिका पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है.
भाजपा की मंशा किसी भी क़ीमत पर सरकार बनाने की रहती है यह किसी से छिपा नहीं है. मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई चुनाव आयुक्तों के चयन की एक सही व्यवस्था को खत्म करके फिर से ऐसी व्यवस्था बनाती है जो सिर्फ उसके नियंत्रण में है. फिर वह चुनाव आयोग में सालों के अपने जाने-देखे-परखे नौकरशाहों को रखती है. इसके बाद जब उन पर गंभीर आरोप लगते हैं तो उनका जमकर बचाव करती है. और जब नागरिक उनके खिलाफ प्रदर्शन करते हैं तो उनके सामने उसी केंद्र सरकार के अधीन काम करने वाली दिल्ली पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बल दिखाई देते हैं.
इससे चुनाव आयोग पर हमारा भरोसा मज़बूत होता है या कमज़ोर?
क्या इस पर सवाल नहीं पूछे जाने चाहिए?
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