यतींद्र मिश्र
गुलज़ार एक तरीके से हिंदी और उर्दू को मिलाने वाली हिंदुस्तानी ज़ुबान के उस संगम पर खड़े हैं जहां गंगा, यमुना और सरस्वती की तरह कविता, कहानी और गीत भी एक साथ आकर मिल जाते हैं. इन विधाओं का मिलन गुलज़ार का ऐसा अचूक हथियार है, जिससे वे समकालीन यथार्थ और परंपरागत दुनिया के रेशे-रेशे की पड़ताल करते हैं.
कोई रचना अपने आप में किस तरह से और कितनी बातें कह सकती है, इसकी बानगी गुलज़ार का पहला ही फिल्मी गीत ‘मोरा गोरा अंग लई ले’ (फ़िल्म: बंदिनी) है. इस गीत के बोलों की पारंपरिक शब्दावली कुछ-कुछ उन वैष्णव पदों जैसी है, जो बंदिनी की नायिका कल्याणी प्रतिदिन अपने पिता से सुनती-पढ़ती रही है. गीत के बोल न सिर्फ़ उसके मनोभावों को व्यक्त करते हैं, बल्कि अन्य पात्रों से उसके रिश्ते के ताने-बाने को भी उजागर करते हैं. गुलज़ार, बिमल रॉय और सचिन देव बर्मन जैसे रचनाकारों की अपनी कलाओं के प्रति आत्मीयता भी यह गीत शब्दशः व्यक्त कर देता है, जब वह कहता है:
कुछ खो दिया है पाई के / कुछ पा लिया गंवाई के / कहां ले चला है मनवा / मोहे बावरी बनाई के — बंदिनी
यदि कल्याणी बावरा होने की बात करती है तो यह न केवल मीरा, चैतन्य महाप्रभु, पलटूदास, स्वामी हरिदास, बैजू बावरा और गोपाल नायक जैसे वैष्णव संत-कवियों और निर्गुणियों की परंपरा वाली उसकी पृष्ठभूमि को दिखाता है, बल्कि उस वैष्णवता के करीब भी जा पहुंचता है जिसे पूरी फ़िल्म में एक अंतर्लय की तरह बिमल रॉय ने पिरो रखा है.
‘बंदिनी’ के साथ 1963 से शुरू हुआ गुलज़ार के गीतों का यह सफ़रनामा आज क़रीब छह दशकों के बाद भी बदस्तूर जारी है. इस यात्रा में वे न जाने कितने अनजाने चेहरों से वाबस्ता हुए होंगे और न जाने कितने चेहरों को अपने गीतों की शक्ल में सार्थक पहचान दी होगी. कभी किसी वैष्णव लड़की के लिए कोई प्रेम-गीत लिखा, तो कभी किसी मां के लिए उसके आंचल को भिगोने वाली लोरी. एक हताश व्यक्ति की निराशा को स्वर दिया, तो कई बार उत्सव के बहाने त्योहारों को इंद्रधनुषी रंग बख़्शे. कभी जीवन का फ़लसफ़ा बताने वाली पंक्तियों के मोह में पड़े, तो कई बार ग़ैर-ज़रूरी से लगते लम्हों को भी पूरी हरारत से याद किया. एक गीतकार की विभिन्न मनोभूमियों में टहलने की अद्भुत यात्रा को कुछ गीतों के मिसरों से बांधकर भी समझा जा सकता है:
फिर से अइयो बदरा बिदेसी / तेरे पंखों पे मोती जड़ूंगी
भर के जाइयो हमारी तलैया / मैं तलैया के किनारे मिलूंगी — नमकीन
आने वाला पल जाने वाला है / हो सके तो इसमें / ज़िंदगी बिता दो / पल जो यह जाने वाला है — गोलमाल
रोज़ अकेली आए / रोज़ अकेली जाए / चांद कटोरा लिए भिखारन रात — मेरे अपने
इन गीतों से स्पष्ट है कि एक गीतकार का मन अनगिनत सिलवटों में लिपटा हुआ कितनी अनजान खिड़कियों को अंधेरों की ओर खोलता है. कभी बरसात के लिए बादलों को पुकारते हुए उसे कुछ देने का स्वर बनता है, तो कहीं रात जैसी कायनात के लिए भिखारन होने का दावा होता है—कि उसके पास सिर्फ़ एक पूंजी, चंद्रमा का एक कटोरा ही है, जिसके सहारे वह भीख मांग सकती है. इसके साथ अगले गीत में यह संदेश भी है कि हर आते पल को जी लेना ही श्रेयस्कर है नहीं तो वह टूटकर बिखर जाएगा. गुलज़ार के गीतों को इत्मीनान से पढ़ते हुए एक बात यह हाथ लगती है कि उनके ज़्यादातर गीतों की शब्द-रचना उनकी कविताओं के अलग-अलग रूप हैं. ‘आने वाला पल जाने वाला है’ गीत को पढ़ते-सुनते हुए उनकी एक कविता ‘बुलबुला’ अनायास याद आ जाती है:
वक़्त की हथेली पर बहता / आदमी बुलबुला है पानी का
फ़िल्मी गीतों की समानार्थी सी लगती गुलज़ार की ढेरों कविताओं और ग़ज़लों को उन गीतों के साथ पढ़ना हममें से कइयों के लिए एक बेहद दिलचस्प अनुभव हो सकता है. ऐसे में इन गीतों में हमें गुलज़ार के शायराना व्यक्तित्व को देख पाना भी आसान हो जाता है, नहीं तो फ़िल्म-कला की ढेरों चीज़ों के बीच हम अक्सर उसे अनदेखा कर देते हैं.
गुलज़ार के फ़िल्मी गीतों की संरचना पर आएं तो सबसे ध्यान खींचने वाला पहलू यह नज़र आता है कि गीतकार ने लगभग रूढ़ि की तरह प्रयोग हो रहे उपमानों को अपनी शब्दावली से परे हटाकर एक नए क़िस्म का काव्य-मुहावरा विकसित किया. गीतों को लेकर, ख़ासकर साहित्यिक गीतों को लेकर अब तक जो बिंब-विधान, रूपक, उपमाएं और उत्प्रेक्षाएं हिंदी नवगीतकार प्रयोग करते रहे थे, उन्हें बिलकुल निर्मम ढंग से गुलज़ार ने तज दिया. उदाहरण के तौर पर कुछ गीतों से चुनकर कुछ ऐसी स्थितियाँ पढ़ी जा सकती हैं:
सावन के कुछ भीगे-भीगे दिन रखे हैं
और मेरे एक ख़त में लिपटी रात पड़ी है (फ़िल्म: इजाज़त के ‘मेरा कुछ सामान’ गीत से)
नीली नदी के परे, गीला सा चांद खिल गया (फ़िल्म: लिबास के ‘सीली हवा छू गई’ गीत से)
टूटी हुई चूड़ियों से जोड़ूं ये कलाई मैं (फ़िल्म: लेकिन के ‘यारा सीली-सीली’ गीत से)
उनके लिखे हुए तमाम गीतों में से सैकड़ों ऐसे चुने जा सकते हैं जो अपना एक अलग गुलज़ार किरदार रखते हैं. यहां तक कि उन गीतों की धुनों पर भी हम एक परोक्ष प्रभाव गुलज़ार का पढ़ सकते हैं. ‘सत्या’ जैसी बौद्धिक फ़िल्म में वे ‘गोली मार भेजे में / भेजा शोर करता है’ जैसा बौद्धिक मगर खिलंदड़ा गीत लिखते हैं और अतिसाधारण फ़िल्म ‘बंटी और बबली’ में छोटे शहरों को लेकर इस तरह की बात करते हैं—‘छोटे-छोटे शहरों से / ख़ाली बोर दोपहरों से / हम तो झोला उठा के चले.’ यह नज़रिया तब और अलग हो जाता है जब वे कोरी भावुकता से दूर खड़े होकर जीवन-संघर्ष और मानवीय गरमी की तपती हुई धरती को स्पर्श करते हैं:
जीने की वजह तो कोई नहीं / मरने का बहाना ढूंढ़ता है / एक अकेला इस शहर में — घरौंदा
गुलज़ार के गीतों की बात करें तो हमें उन सारे बिंदुओं को भी ध्यान में रखना होगा जिनसे उनकी रचनाएं शक्ति अर्जित करती हैं. अपनी मधुरता में संपूर्ण से लगते हुए उनके अधिकांश गीतों के ऊर्जा-स्रोत उनके लोकोन्मुख होने से निकले भी हो सकते हैं. लोकपक्ष की प्रभावी मौजूदगी गुलज़ार के गीतों में ही नहीं बल्कि उनके द्वारा निर्देशित अधिकांश फ़िल्मों में भी पार्श्व संगीत की तरह उपस्थित नज़र आती है. आप चाहें ‘नमकीन’, ‘मौसम’, ‘मीरा’, ‘ख़ुशबू’ और ‘माचिस’ जैसी फ़िल्मों के माध्यम से उनके फ़िल्मकार व्यक्तित्व को परखें अथवा इन्हीं फ़िल्मों के गीतों से बातचीत करें, आपको एक अद्भुत क़िस्म की लोकधर्मी ऊष्मा महसूस होती है. यह किसी उपलब्धि से कम नहीं कि सीमित दायरे में लिखे जाने वाले गीतों की संरचना में गीतकार कुछ ऐसा कह जाए जिसकी चेतना अपने लोक और मिट्टी से जुड़ी हो:
जनम से बंजारा हूं बंधु जनम-जनम बंजारा / कहीं कोई घर न घाट न अंगनारा — राहगीर
अपनी रचनाओं में इसके अलावा भी गुलज़ार धरती से एक अन्य जुड़ाव रखते आए हैं. यह जुड़ाव लोकगीतों का है जो उनके द्वारा रचे गए गीतों में नयापन लाता है. गुलज़ार ने अपने रचनाकर्म में लोक के स्पंदन की धूप-छांही संस्कृति को इतनी सुंदरता से पकड़ा है कि हम यह जान ही नहीं सकते कि फ़िल्मों में लिखे गए उनके कुछ गीत निहायत उनकी क़लम की उपज हैं, न कि पारंपरिक लोकगीतों की नई प्रस्तुतियां. जैसे उनका लिखा ‘काबुलीवाला’ का गीत:
गंगा आए कहां से, गंगा जाए कहां रे / लहराए पानी में जैसे, धूप-छांव रे
या फिर ‘माचिस’ का गीत:
भेज कहार पियाजी बुला लो / कोई रात-रात जागे / डोली पड़ी-पड़ी ड्योढ़ी में / अर्थी जैसी लागे
या फिर ‘लेकिन’ का:
केसरिया बालमा मोहे बावरी बोलें लोग / प्रीत को देखें नगरी वाले, पीड़ न देखें लोग / बावरी बोलें लोग
‘प्रेम’ हमेशा से ही हिंदी फ़िल्मों का प्रमाण-तत्व रहा है. सिनेमा के केंद्र में प्रेम की शाश्वत उपस्थिति रही है. गुलज़ार भी इस बात से अछूते या अपवाद नहीं रहे हैं. बल्कि जीवन के इस महत्वपूर्ण पहलू ने उनके सिनेमाई क़द को बढ़ाने में एक प्रमुख भूमिका निभाई है. आज जब वैश्वीकरण के युग में तथा निर्मम ढंग से खुले हुए समाज में प्रेम को नए अर्थों में तलाशा जा रहा है, इस समय मात्र दो ही नाम—गुलज़ार और जावेद अख़्तर—अपना पुराना जादू बचाए हुए प्यार की नैसर्गिक आवाजाही को रच रहे हैं.
यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि गुलज़ार आज भी प्रेम जैसी मानवीय अनुभूति को उजागर करने में ही अपना सर्वश्रेष्ठ रच पाते हैं. प्रेम के प्रति उनकी यह सहज स्वीकारोक्ति उन्हें एक बार फिर से उसी सूफ़ी और भक्ति परंपरा के नज़दीक ले जाती है, जहां अपने सबसे सच्चे अर्थों में प्रेम की सार्थक और आदर्श अभिव्यक्ति होती रही है. कभी-कभी गुलज़ार की अभिव्यक्ति की कहानियों और ग़ज़लों को पढ़ते हुए यह भी लगता है कि यदि गुलज़ार एक सफल गीतकार या शायर न होते तो एक असफल प्रेमी ज़रूर होते. एक सीमित शब्दावली के इस्तेमाल के बाद भी उनका गीतकार प्रेम की अलग-अलग अभिव्यक्तियों में अद्भुत ढंग से असीमित रंग भर देता है. रिश्तों के बहाने प्रेम के लिए गुलज़ार का खिंचाव, एक ग़ैर-फ़िल्मी अहसास में ‘लिबास’ शीर्षक से लिखी गई इस कविता में छिपा हुआ है:
मेरे कपड़ों में टंगा है तेरा ख़ुशरंग लिबास
घर पे धोता हूं मैं हर बार उसे,
और सुखा के फिर से,
अपने हाथों से उसे इस्त्री करता हूं मगर,
इस्त्री करने से जाती नहीं शिकनें उसकी,
और धोने से गिले-शिकवों के चकत्ते नहीं मिटते!
ज़िंदगी किस क़दर आसां होती
रिश्ते गर होते लिबास...
और बदल लेते कमीज़ों की तरह!
गुलज़ार की तरह यह उनके पाठकों को भी बख़ूबी मालूम है कि प्रेम होगा तो एक तरफ़ उससे मिलने वाली तमाम चीज़ें—उत्साह, उम्मीद, अपनापन, निकटता और संवेदना—होंगी. वहीं दूसरी ओर सबसे ज़्यादा नाउम्मीदी, दूरी, बेचैनी और दर्द का ख़तरा भी होगा. यह अपने आप में दिलचस्प है कि गुलज़ार प्रेम के इन दोनों ध्रुवांतों के बीच बड़े विश्वास और लगन के साथ गमन करते हैं. वे प्रेम रचते वक़्त जितनी ख़ूबसूरती से उम्मीद और अपनेपन को शब्द देते हैं, उतनी ही गहराई से नाउम्मीदी, बेचैनी और तड़प को भी अभिव्यक्त कर डालते हैं:
जब भी थामा है तेरा हाथ तो देखा है / लोग कहते हैं कि बस हाथ की रेखा है
हमने देखा है दो तक़दीरों को जुड़ते हुए / आजकल पांव ज़मीं पर नहीं पड़ते मेरे — घर
होंठों पे लिए हुए दिल की बात हम / जागते रहेंगे और कितनी रात हम
मुख़्तसर सी बात है तुमसे प्यार है / तुम्हारा इंतज़ार है — ख़ामोशी
तमाम प्रकार के सिनेमाई सरोकारों से अलग गुलज़ार के रचनात्मक जीवन का एक कोना वह भी है, जो निहायत घरेलू व व्यक्तिगत जवाबदेही से उपजा है. यह कोना सौभाग्य से उनकी संवेदना का सबसे उर्वर प्रदेश भी है. ज़ाहिर है, यहां हम सारी बात बच्चों की दुनिया, उनके बचपन और उस बचपन में अटाटूट भरी जीवंत संवेदनाओं की सहज उपस्थिति के संदर्भ में कर रहे हैं. यह सभी को मालूम है कि ढेरों खंडों में गुलज़ार ने अपनी बेटी को संबोधित ‘बोस्की का पंचतंत्र’ लिखा है और दूरदर्शन के बच्चों के धारावाहिकों के लिए दो बहुप्रशंसित गीत—‘जंगल-जंगल बात चली है पता चला है / चड्ढी पहन के फूल खिला है, फूल खिला है’ तथा ‘अगर-मगर डोले नैया / अगर-मगर जाए रे पानी’ लिखे हैं.
हिंदी फ़िल्मों में बच्चों के लिए या उनसे जुड़े जितने भी गाने लिखे गए, सभी कर्णप्रिय व सुंदर होने के बावजूद एक ख़ास ढर्रे पर बने हैं, जिनका बच्चों से सीधा जुड़ाव नहीं दिखता. उन गीतों में बच्चे मौजूद हों तो भी लगता है कि बालसुलभ कौतूहल किसी वयस्क हाथों की ज़द में क़ैद है. मगर गुलज़ार इसे तोड़ते हुए ख़ुद बच्चे की मानसिकता में जाकर लिखते हैं और उन्हें बच्चों की निराली टीम के साथ ऊबड़-खाबड़, तेज़-धीमे स्वरों में जस-का-तस फ़िल्माते हैं.
इससे उस बचपन को रेखांकित करने में मदद मिलती है, जिस पर सिनेमा की दुनिया में पहले कभी नहीं सोचा गया. आप ‘मासूम’ के बच्चों की बालसुलभ मैत्री याद करें या ‘चाची 420’ की चाची के हुलिए का बखान. आप ‘मकड़ी’ का अद्भुत सॉन्ग सीक्वेंस अपनी स्मृति में कुरेदें, या ‘किताब’ के गीत के बारे में सोचें, सभी जगह बच्चों की दुनिया उनकी अपनी शर्तों पर संभव होती हुई जान पड़ती है.
लकड़ी की काठी, काठी पे घोड़ा / घोड़े की दुम पे जो मारा हथौड़ा
दौड़ा दौड़ा दौड़ा, घोड़ा दुम उठा के दौड़ा
घोड़ा था घमंडी, पहुंचा सब्ज़ी मंडी / सब्ज़ी मंडी बरफ़ पड़ी थी
बरफ़ में लग गई ठंडी / दौड़ा दौड़ा दौड़ा, घोड़ा दुम उठा के दौड़ा — मासूम
ओ पापड़ वाले पंगा ना ले / थप्पड़ बजेगा पंगा ना ले
उंगली दबा के अंगूठा बना दूंगी / टाऊं-टाऊं
दुनिया का पहिया घुमाती हूं / चालाकियों से चलाती हूं
आ-जा अजमइले, मक्खन मलइले — मकड़ी
इन गानों को सुनते हुए ऐसा भी लग सकता है कि गुलज़ार इन गीतों में या तो अपना खोया हुआ बचपन ढूंढ़ रहे हैं या अपनी प्यारी बिटिया के लिए खुले हुए आसमान के नीचे पूरे संसार को खेल का मैदान बना देना चाहते हैं, जहाँ सभी का बचपन सुरक्षित है.
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