ईरान युद्ध से अमेरिका मज़बूत होगा या उसके विरोधी?
ईरान युद्ध अगर लंबा खिंचता है, तो अमेरिका के लिए उसका नतीजा कई अलग-अलग परिणामों के जटिल मिश्रण जैसा देखने को मिल सकता है

युद्धों का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जाता कि वे जिन देशों के बीच होते हैं, उन पर किस तरह का असर डालते हैं. यह भी देखा जाता है कि वे दुनिया में ताकत के व्यापक संतुलन को किस तरह प्रभावित करते हैं. इस लिहाज़ से अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध का असर तेहरान पर तो होगा ही, लेकिन क्या यह अमेरिका के सबसे बड़े भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों—रूस और चीन—के लिए अवसर के नए दरवाज़े भी खोल रहा है.
ईरान के खिलाफ इस सैन्य अभियान का घोषित उद्देश्य साफ़ है. वॉशिंगटन और इज़राइल का तर्क है कि ईरान की सैन्य क्षमता कमज़ोर करने से उसकी इज़राइल और अन्य क्षेत्रीय साझेदारों के लिए खतरा बनने की क्षमता घट जाएगी. युद्ध के चलते ईरान के आर्थिक संसाधनों पर भी दबाव बढ़ रहा है. इस वजह से भी वह कम-से-कम निकट भविष्य में हिज़्बुल्ला, हमास और हूती जैसे संगठनों के ज़रिये मध्य-पूर्व में अपना वर्चस्व कायम करने की पहले जैसी कोशिशें नहीं कर पाएगा. अमेरिका द्वारा ईरान युद्ध को एक रणनीतिक ज़रूरत के रूप में पेश किया जा रहा है—एक ऐसा कदम, जिसका उद्देश्य भविष्य में परमाणु हथियारों से लैस ईरान के साथ कहीं अधिक खतरनाक टकराव को टालना है.
लेकिन युद्धों के नतीजे हमेशा सैन्य ताकत के बल पर तय नहीं किए जा सकते. मार्च 2026 की शुरुआत तक यह संघर्ष पूरे क्षेत्र को ऊर्जा संकट की स्थिति में धकेल चुका है. होर्मुज़ जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने की अमेरिकी सेना की कोशिशों के बावजूद वहां से व्यावसायिक जहाज़ों की आवाजाही लगभग ठप बनी हुई है. ओमान की खाड़ी में इस समय 150 से ज़्यादा तेल टैंकर खड़े हैं, जबकि सऊदी अरब और क़तर की कई बड़ी रिफाइनरियों ने फोर्स मेज्योर (किसी आपदा के कारण तेल और गैस की आपूर्ति न कर पाने की स्थिति) घोषित कर दिया है. यानी वैश्विक अर्थव्यवस्था अब ऊर्जा संकट की सिर्फ आशंका नहीं जता रही, बल्कि उससे गुज़र रही है.
इस नाकाबंदी में एक दिलचस्प विडंबना भी देखी जा सकती है. पिछले कुछ वर्षों से पश्चिमी देश रूस को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिश करते रहे हैं. इसके लिए भारत जैसे देशों पर रूस से कच्चा तेल न खरीदने के लिए हरसंभव दबाव डाला जाता रहा है. लेकिन होर्मुज़ जलमार्ग बंद होने से पूरा समीकरण बदल गया है. दुनिया के तेल और एलएनजी व्यापार का करीब पाँचवां हिस्सा इस वक्त युद्ध क्षेत्र में फँसा हुआ है. इस वजह से कभी वैश्विक बाज़ार में ‘अछूत’ बन चुका रूसी तेल अचानक दुनिया को स्थिरता देने की कुंजी माना जा रहा है.
यह संघर्ष मॉस्को के लिए एक अप्रत्याशित जीवनरेखा बनकर उभरा है. ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुँचते ही रूस का आर्थिक प्रभाव फिर से मजबूत होता दिख रहा है. पहले जो रूसी तेल ‘छूट’ पर बिक रहा था, उसे खरीदने की ‘छूट’ अब भारत सहित कई देशों को दी जा रही है. यह वैश्विक भू-राजनीति के विरोधाभासों में से एक को भी दिखाता है. अमेरिका ने तेहरान को कमजोर करने का जो अभियान चला रखा है, वही मॉस्को को मज़बूत करने का काम भी कर रहा है.
चीन का रणनीतिक गणित थोड़ा अलग, लेकिन उतना ही अहम है. बीजिंग के मध्य-पूर्व के साथ गहरे आर्थिक रिश्ते हैं और वह ऊर्जा के लिए काफी हद तक इसी क्षेत्र से होने वाले आयात पर निर्भर है. इसलिए यहाँ पर किसी तरह की अस्थिरता चीन के लिए आदर्श स्थिति नहीं है. लेकिन व्यापक भू-राजनीतिक तस्वीर इससे कहीं अधिक जटिल है. आने वाले दशकों में अमेरिका की सबसे बड़ी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा चीन के साथ ही मानी जा रही है, खासकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में. ऐसे में ईरान के साथ लंबा संघर्ष अमेरिका को एक बार फिर से उस मध्य-पूर्व में उलझा सकता है जिससे वॉशिंगटन पिछले कई वर्षों से दूरी बनाने की कोशिश करता रहा है. रणनीति के जानकार मानते हैं कि अमेरिका जितना ही खाड़ी क्षेत्र में उलझेगा, चीन को एशिया में रणनीतिक तौर पर उतनी ही ज्यादा सांस लेने की जगह मिलती जाएगी.
इस बदलाव का एक कूटनीतिक पहलू भी है. मॉस्को और बीजिंग दोनों ही खुद को स्थिरता के पक्षधर और पश्चिमी शक्तियों को वैश्विक अस्थिरता का कारण बताने की कोशिश करते रहे हैं. जब अमेरिका सीधे किसी सैन्य कार्रवाई में शामिल होता है, तो इससे उन्हें अपनी इस बात को और ज़्यादा मजबूती से रखने का मौका मिल जाता है. एक ऐसे वैश्विक माहौल में, जहाँ प्रचार और कहानियाँ कई बार सैन्य ताकत से कम अहम नहीं होती हैं, इसका असर ग्लोबल साउथ के देशों पर कुछ ऐसा भी हो सकता है जो अमेरिकी हितों से पहले जितना मेल न खाता हो.
इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि यह युद्ध अमेरिका को कमजोर ही करेगा. हो सकता है ईरान की ताकत काफी हद तक कम हो जाए, और इससे मध्य-पूर्व के सुरक्षा संतुलन में कुछ ऐसे बदलाव देखने को मिलें जो वॉशिंगटन और उसके क्षेत्रीय साझेदारों के लिए फायदेमंद हों. लेकिन आज की परस्पर जुड़ी दुनिया में रणनीतिक नतीजे शायद ही कभी इतने सीधे और सरल होते हैं. दुनिया के अलग-अलग मसले अब आपस में इस तरह उलझे हुए हैं कि एक जगह उठाया गया कदम अक्सर कहीं और बिल्कुल अलग असर पैदा कर देता है.
इसलिए इस संघर्ष की कसौटी सिर्फ यह नहीं होगी कि इससे ईरान को कितना नुकसान पहुँचा, बल्कि यह भी होगी कि इससे व्यापक रणनीतिक माहौल कैसा बना. अगर यह युद्ध सीमित और छोटा रहता है, तो अमेरिका और इज़राइल न केवल तेहरान की महत्वाकांक्षाओं पर अंकुश लगाने में सफल हो सकते हैं, बल्कि उससे बड़े रणनीतिक लाभ भी उठा सकते हैं. लेकिन अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है और लंबे समय तक ऊर्जा बाज़ारों को अस्थिर बनाए रखता है, तो इसका नतीजा कई छोटे-छोटे परिणामों के योग के रूप में सामने आ सकता है—एक कमजोर ईरान, मध्य-पूर्व में अमेरिका के नाराज़ और थके-हारे सहयोगी, वहीं दूसरी ओर अधिक मजबूत रूस और रणनीतिक रूप से पहले से बेहतर स्थिति में चीन.
इस पूरे घटनाक्रम के कुछ और पहलू भी हैं. अमेरिका–इज़राइल का यह एकतरफा अभियान रूस और चीन को उनकी सैन्य कार्रवाइयों के लिए कुछ मजबूत तर्क भी दे सकता है. अब मॉस्को यूक्रेन पर अपने आक्रमण की तुलना ईरान में चल रही अमेरिकी सैन्य कार्रवाई से कर सकता है. बीजिंग भी अगर कभी ताइवान के मामले में कुछ करता है, तो उसे यह कहकर सही ठहराने की कोशिश कर सकता है कि जब अपने हितों की रक्षा के लिए ईरान के साथ युद्ध किया जा सकता है, तो चीन, ताइवान के साथ ऐसा क्यों नहीं कर सकता.
इसके अलावा मध्य-पूर्व में अमेरिका की बढ़ती उलझन उसका ध्यान और संसाधन यूक्रेन युद्ध से और दूर कर सकती है. उधर होर्मुज़ संकट के कारण बढ़ती तेल की कीमतें रूस की आर्थिक स्थिति बेहतर कर सकती हैं, जिसका इस्तेमाल वह यूक्रेन के खिलाफ कर सकता है.
आखिर में सबसे अहम सवाल यह नहीं है कि इस संघर्ष में ईरान का क्या होता है. असली सवाल यह है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि एक सैन्य ‘जीत’ हासिल करने की कोशिश में अमेरिका ने दुनिया के दूसरे हिस्सों में अपने बड़े रणनीतिक लक्ष्यों को दांव पर लगा दिया है.

