लघुकथा: "मेनू जलियांवाला बाग वेखना सी"
13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में जो हुआ, शायद ऐसे हुआ होगा
13 अप्रैल 1919. बैसाखी के मौके पर पूरा पंजाब झूम रहा था. गुरमेल सिंह अपनी पत्नी और बच्चे के साथ गांव से अमृतसर आया था. स्वर्ण मंदिर में मत्था टेकने के बाद उसका पांच साल का बेटा बोला, ‘बापू, मेनू जलियांवाला बाग ले ‘चलो. ओ मेनू वेखना सी.’
गुरमेल उसकी बातों में आ गया… ‘चल पुत्तर, हुन चल’… उसकी पत्नी सुखप्रीत कौर मंदिर में महिलाओं के बीच बैठी बातें कर रही थी. ‘ओ सुखप्रीते, छेती कर. नोने (छोटे बच्चे) नू जलियांवाला बाग ले चलना है.’ नोना गुरमेल सिंह और मां की उंगली थामे ख़ुशी-ख़ुशी चल दिया.
मंदिर से बाग बमुश्किल आधा मील रहा होगा. बाग के चारों तरफ मकान, ऊंची दीवारें और अंदर जाने का सिर्फ एक ही रास्ता. बाग के अंदर लोग जमा हो रहे थे. सुखप्रीत ने भीड़ में किसी से पूछ लिया तो उसने बताया कि एक सभा होनी है. छह फुट ऊंचे और बरगद जैसे चौड़े अपने पिता के कंधे पर बैठे नोने को बाग में बहुत मज़ा आ रहा था.
सभा का नाम सुनते ही गुरमेल के कान खड़े हो गए. उसने पढ़ा था कि पांच महीने पहले ख़त्म हुए विश्वयुद्ध के बाद अंग्रेजों ने हिंदुस्तान पर बहुत सारे टैक्स बढ़ा दिए थे. इससे महंगाई बढ़ गई थी. मोहनदास करमचंद गांधी देश में सत्याग्रह की बात कर रहे थे. सन 1916 में लखनऊ में इंडियन नेशनल कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने समझौता कर लिया था. और कांग्रेस के गरम दल व नरम दल में भी मेल हो गया था. सबने मिलकर अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने की कसम खा ली थी.
‘…बापू, मेनू झंडा लेके दयीं…’ नज़दीक से गुजरते हुए खिलौने वाले को देखकर नोने ने गुरमेल से कहा. गुरमेल का ध्यान टूटा. उसने इकन्नी में कांग्रेस का झंडा खरीद लिया. बच्चे को तो मानो जादू का खिलौना मिल गया! सुखप्रीत कौर ने यहां भी महिलाओं से बातचीत शुरू कर दी थी. पूरा माहौल खुशनुमा था.
पास खड़े लोगों की बातचीत से गुरमेल पूरा माज़रा समझ गया. लोग एक महीने पहले पारित हुए रॉलेट एक्ट के विरोध में जमा हुए थे. इसे ‘न वकील, न दलील, न अपील’ के नाम से जाना जाता था. पुलिस जिसकी चाहे तलाशी ले सकती थी और बिना किसी कारण के दो साल की जेल हो सकती थी. पर उसे यह समझ नहीं आया कि यह कानून क्यों बनाया गया है. उसने बगल में खड़े आदमी से पूछा तो उसने बताया कि अंग्रेज़ सरकार ने देश में आतंक रोकने के लिए इसे बनाया है. उसे डर है कि कहीं मार्क्सवादी और लेनिनवादी देश में क्रांति न कर दें, खासकर बंगाल और पंजाब में. सरकार को यह भी डर है कि हिंदुस्तान में फिर से सैनिक बगावत न हो जाए. इसलिए देश में ऐसे कानून बनाए जा रहे हैं ताकि कोई सिर न उठा सके. गुरमेल को तब मालूम हुआ कि गांधीजी ने दिल्ली में 30 मार्च, 1918 को इसके ख़िलाफ़ ही हड़ताल की थी जिसमें बड़े सारे लोग शामिल हुए थे. हालांकि इसमें गोलीबारी हुई और छह लोग मारे गए थे.
नोने ने फिर नई फ़रमाइश कर दी. गुरमेल सिंह पूरा किस्सा जानने को बेचैन हो रहा था. उसने बच्चे को कंधे से उतारा और सुखप्रीत के हवाले कर दिया. अब तक ज्यादातर मैदान भर गया था. एक नेता बोल रहा था – ‘सरदारों ने अंग्रेजों की तरफ से लड़ाई में जर्मनी और इटली की सेना के ख़िलाफ़ जितना लहू बहाया है, उतना किसी ने भी नहीं. लेकिन ये गोरे हमें सम्मान देने के बजाय तकलीफ़ दे रहे हैं. आपको पता है, पिछले साल बरसात कम हुई थी. रबी की फ़सल कम ही कटी है और उस पर टैक्स 100 फीसदी बढ़ा दिया गया है. आपको मालूम है न इन्फ्लुएंजा की महामारी में एक लाख पंजाबी हलाक़ हो गए हैं? ऐसे माहौल में सरकार मदद की जगह हम पर जुल्म कर रही है. आपको बता दूं, हमारे नेता डॉक्टर सैफ़ुद्दीन किचलु और डॉक्टर सत्यपाल को इन अंग्रेजों ने कैदी बना लिया है और उन्हें किसी अनजान जगह पर ले गए हैं. जब हमने डिप्टी कमिश्नर के बंगले के बाहर इसके ख़िलाफ़ धरना दिया, तो हमारे छह लोग मार दिए गए और 30 लोग घायल हो गए.’
तभी आसमान में शोर सुनाई दिया और सबने देखा कि एक जहाज ठीक उनके सिर के ऊपर से गुजर कर गया है. गुरमेल की बेचैनी बढ़ गई. इतने में दूसरा नेता बोलने लगा – ‘सुना है जालंधर से कोई ब्रिगेडियर जनरल डायर कुछ सैनिक और बख्तरबंद गाड़ियां लेकर अमृतसर आया है. उसने अमृतसर में इमरजेंसी लागू करके प्रभात फेरी और मीटिंगों को ग़ैरक़ानूनी घोषित कर दिया है. कांग्रेस ने इस सबके विरोध में आज यहां मीटिंग बुलाई है. हम शांतिपूर्वक अपनी बात सरकार के सामने रखना चाहते हैं. हमारी मांगें हैं कि रॉलेट एक्ट वापस लिया जाए और डॉक्टर किचलू तथा सत्यपाल साहब को फ़ौरन बिना शर्त रिहा किया जाए.’
शहर में इमरजेंसी और जनरल डायर के फौज लाने की बात सुनकर गुरमेल सन्न रह गया था. उसने घबराहट में सुखप्रीत का हाथ थाम लिया. नोना दिन भर की दौड़-धूप से थक गया था और मां के कंधे से लगकर सो गया. गुरमेल ने अपनी वोटी की तरफ देखा तो वह समझ गई थी कि क्या करना है. वे जल्द से जल्द वहां से बाहर निकलने की कोशिश करने लग गए. 6-7 एकड़ के बाग में पच्चीस-तीस हज़ार लोग थे. सबका एक साथ निकलना मुश्किल तो होना ही था. वे फंस गए थे.
तकरीबन साढ़े चार बजे होंगे. जनरल डायर गोरखा रेजिमेंट के 90 सिपाहियों के साथ बाग के अंदर दाखिल हो गया. बाग का दरवाज़ा छोटा होने की वजह से बख्तरबंद गाड़ियां बाहर ही रह गई थीं. नेता बदस्तूर बोले जा रहे थे, लोग सुने जा रहे थे, गुरमेल निकलने की कोशिश कर रहा था, सुखप्रीत कौर भी उसका हाथ थामे भीड़ में धक्का-मुक्की करके आगे निकलने की जगह बना रही थी, नोना बच्चा अभी भी सो रहा था. वे बड़ी मुश्किल से बाग में बने कुएं के पास तक ही आ पाए थे. आगे आदमियों का समंदर था. निकलना लगभग नामुमकिन. गुरमेल ने अब पूरी जान लगा दी, पर रास्ता नहीं बना.
डायर ने सिपाहियों को पोजीशन लेने का हुक्म दे दिया. आगे की पंक्ति के सैनिक नीचे बैठ गए और पीछे वाले खड़े रहे. लोग अब तक हरकत में आ गए थे और धक्का-मुक्की शुरू हो गई थी. गुरमेल का परिवार अभी भी कुएं के पास ही फंसा हुआ था.
जनरल डायर ने पूरे बाग में नज़र घुमाई. उसे पश्चिम की तरफ लोगों की भीड़ ज़्यादा लगी. उसने कुछ सेकंड उधर देखा और उंगली पश्चिम की तरफ करके कहा – ‘…फ़ायर…’ कुआं पश्चिम की तरफ़ ही था.
गोलियां चलने के साथ लोग तितर-बितर होने लग गए. बाग में क़त्लेआम शुरू हो चुका था. गुरमेल को कुछ समझ नहीं आया तो उसने बीवी को धक्का दे दिया. वह नोने को लेकर कुएं की दीवार से जा भिड़ी और नीचे गिर गई. उसके गिरते ही छह फुट का गुरमेल उन दोनों के ऊपर जा गिरा. उसने अपने शरीर की आड़ में बीवी और बच्चे को दबा लिया था. लोग चारों तरफ भाग रहे थे. कुछ लोग दीवार चढ़कर भागना चाह रहे थे, पर नहीं… गोलियां तड़ातड़ चल रही थीं, लोग यहां-वहां गिर रहे थे. हर तरफ़ चीख़-चिल्लाहट और रोने-धोने की आवाज़ें इतनी तेज़ थीं कि मानो आसमान फट पड़ा हो. गुरमेल को इस शोर-शराबे के बीच गोलियों की आवाज़ें साफ़ सुनाई दे रही थीं और साथ ही सुनाई दे रहा था सुखप्रीत का ‘जप-साहिब.’ वह ज़ोर-ज़ोर से बोलने लग गया – ‘वाहे गुरुजी का खालसा, वाहे गुरुजी की फ़तेह.’
लोगों को जब भागने की जगह नहीं मिली तो वे कुएं में कूद पड़े. एक के बाद एक कई लोग उनके ऊपर पैर रखकर कूदे. जब भी कोई उस पर पैर रखता, तो झटके से बचने के लिए उसके मुंह से निकलता – ‘वाहे गुरुजी का खालसा…’ पहाड़ जैसा गुरमेल आज दीवार बनकर गोलियों और अपने परिवार के बीच आ गया था. गुरमेल ने नोने की पीठ पर जैसे-तैसे अपना हाथ रखा तो उसे उसकी सांसें महसूस हुईं. अभी वह खैर मना ही रहा था कि तभी उसे अपनी पीठ पर ज़ोर से झटका लगा. उसने उतने ही ज़ोर से कहा – ‘वाहे गुरुजी का खालसा, वाहे गुरुजी की फ़तेह.’
लगभग दस मिनट तक गोलियां उगलने के बाद बंदूकें ख़ामोश हो गईं. लोग चीख़-चिल्ला रहे थे. गुरमेल ने अपनी वोटी से पूछा – ‘तू ठीक तो है?’ सुखप्रीत ने रोते-रोते अपने और बच्चे की सलामती बताई और गुरमेल से पूछा – ‘तुस्सी ते ठीक हो?’ गोली उसकी कमर में लगी थी. वह लुढ़क गया.
वहां मौजूद ज़्यादातर लोगों की कुछ-कुछ ऐसी ही कहानी थी. जलियांवाला बाग में उस दिन 1650 राउंड फायर हुए थे. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ 379 लोग मारे गए थे और 1500 घायल हुए थे, हालांकि मरने वालों की असली संख्या 1000 के आसपास थी. इसके बाद हंटर आयोग बिठाया गया था. आयोग की रिपोर्ट में ब्रिगेडियर जनरल डायर को दोषी क़रार दिया गया और उसे बर्ख़ास्त करने की सिफ़ारिश की गई थी.
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने इस नरसंहार के विरोध में अपना नोबेल पुरस्कार वापस कर दिया था. महात्मा गांधी ने अपना असहयोग आंदोलन तेज़ कर दिया था. इतिहासकार बिपिन चंद्र लिखते हैं – ‘भारत के साथ उनके प्रयोग शुरू हो गए थे’.
कहा जाता है कि 20 साल के सरदार उधम सिंह भी उस दिन जलियांवाला बाग में ही थे. बाद में उन्होंने पंजाब के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’डायर को लंदन में गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया था. ओ’डायर ने जलियांवाला बाग में जनरल डायर की कार्रवाई का समर्थन किया था.
विंस्टन चर्चिल ने इस घटना के बारे में कहा था कि ‘ब्रिटेन के इतिहास में इससे बड़ी दानवीय घटना नहीं हो सकती. इसका कोई सानी नहीं है.’ कुछ समय पहले तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री टेरेसा मे और उससे पहले डेविड कैमरन ने भी भारत आकर इस हादसे पर गहरा अफ़सोस जताया था. हालांकि आधिकारिक रूप से ब्रिटेन ने इस नरसंहार के लिए कभी माफ़ी नहीं मांगी. कोई बात नहीं, वह वक़्त भी आएगा.
और हां, नोना और उसकी मां उस दिन गोलियों से बच गए थे!
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