हाल में हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इंडिया टुडे की पत्रकार मौसमी सिंह ने राहुल गांधी से सीधा सवाल किया: “सर, क्या कभी ऐसी स्थिति आ सकती है जब आप चुनावों का बहिष्कार कर दें? क्या बात वहां तक जा सकती है?”
गांधी ने इस संभावना पर विचार करने में एक पल भी नहीं गंवाया और तुरंत मौसमी के सवाल को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि “मैं उस डिस्ट्रैक्शन में नहीं जाऊंगा... मैं इस डिस्ट्रैक्शन से बचूंगा. लेकिन शुक्रिया.”
लेकिन बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्हें यह सवाल भटकाने वाला नहीं लगता. कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने हाल ही में सोशल मीडिया पर पूरे विपक्ष से यह अपील की कि वह चुनावी मैदान छोड़ दे.
उनका तर्क सीधा था. अगर विपक्ष उन चुनावों में हिस्सा लेता है जिन्हें वह खुद “धांधली” मानता है, तो वह इस प्रक्रिया को वैधता देता है और यह भ्रम बनाए रखने में मदद करता है कि भारतीय लोकतंत्र ठीक से काम कर रहा है.
दिपके का कहना था कि जब पार्टियां लगातार तोड़ी जा रही हों, विधायकों और सांसदों को अपने पाले में किया जा रहा हो और वोटों में हेरफेर हो रहा हो, तो सिर्फ अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाए रखने के लिए चुनाव लड़ते रहना खुद को धोखा देने जैसा है.
उन्होंने इसकी तुलना एक ऐसे फिक्स्ड क्रिकेट मैच से की जिसमें कुछ कैच जानबूझकर पकड़ लिये जाते हैं ताकि मुकाबला असली लगे. दिपके के मुताबिक विपक्ष की इक्का-दुक्का जीतें ऐसे कुछ “टुकड़े” हैं जो उसे खेल में फंसाए रखने के लिए फेंके जाते हैं.
चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर लगातार उठते विवादों के बीच बहुत से लोगों को उनकी यह बात सही लग सकती है. लेकिन राहुल गांधी का इस विचार को एक झटके में खारिज कर देना और तृणमूल कांग्रेस के नेता डेरेक ओ’ब्रायन का दिपके की अपील का विरोध करना एक बहुत गहरी खाई की ओर इशारा करता है.
इसके एक तरफ यह सोच है कि अगर खेल ही बेईमानी का है तो उसमें हिस्सा क्यों लिया जाए. दूसरी तरफ चुनावी राजनीति की वह बेरहम सच्चाई है जिसके मुताबिक चुनाव में हिस्सा न लेने का मतलब संवैधानिक व्यवस्था का रुक जाना नहीं है.
किसी कंपनी के बोर्ड-रूम या अंतरराष्ट्रीय संगठन में मतदान के लिए अक्सर एक तय कोरम जरूरी होता है. आधे सदस्य उठकर चले जाएं तो काम रुक सकता है. लेकिन भारतीय संसदीय लोकतंत्र को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि 80 फीसदी लोगों ने वोट डाला या सिर्फ आठ फीसदी ने. और अगर किसी सीट पर सिर्फ एक ही उम्मीदवार हो तो बिना मतदान के ही उसे चुन लिया जाता है.
डेरेक ओ’ब्रायन ने दिपके को जवाब देते हुए इसी खतरे की ओर इशारा किया था:
“विपक्ष ने चुनावों का बहिष्कार किया = बीजेपी की सारी सीटों पर जीत. और उसके बाद वह संविधान बदलकर अपने सारे अपराधों को कानूनी बना देगी.”
अगर लोकसभा में विपक्ष ही न हो तो सत्तारूढ़ गठबंधन को सामान्य कानून बनाने के लिए खुला मैदान मिल जाएगा. हालांकि संविधान संशोधन के लिए उसे राज्यसभा में विशेष बहुमत की जरूरत फिर भी रहेगी. लेकिन अगर विपक्ष विधानसभा चुनावों का भी बहिष्कार करने लगे तो समय के साथ यह रुकावट भी खत्म हो जाएगी, क्योंकि इससे बीजेपी और उसके सहयोगियों की सीटें राज्यसभा में भी बढ़ जाएंगी.
कुछ संवैधानिक संशोधनों को कम से कम आधे राज्यों की मंजूरी भी चाहिए. लेकिन भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए पहले ही 20 से ज्यादा राज्यों में सत्ता में है. यानी चुनाव बहिष्कार से मौजूदा सरकार का काम नहीं रुकता. उलटा, बहिष्कार जितना व्यापक होता जाएगा, विपक्ष उतनी ही ज्यादा संस्थागत जमीन खोता जाएगा.
कुछ रणनीतिकार मानते हैं कि विपक्ष को सचमुच चुनाव छोड़ने की जरूरत नहीं है. सिर्फ बहिष्कार की धमकी भी एक बेहद ताकतवर राजनीतिक हथियार हो सकती है.
अगर पूरा विपक्ष अनुशासित और एकजुट होकर सरकार को अल्टीमेटम दे, तो यह सौदेबाजी का मजबूत जरिया बन सकता है. लेकिन इस दांव के साथ एक बहुत बड़ा जोखिम भी जुड़ा हुआ है. मान लीजिए विपक्ष कहता है कि उसकी मांगें नहीं मानी गईं तो वह चुनाव नहीं लड़ेगा और सरकार उसकी बात अनसुनी कर देती है.
तब विपक्ष दोनों तरफ से फंस जाएगा. अगर वह चुनाव का बहिष्कार करता है तो सत्तारूढ़ दल को लगभग पूरा चुनावी मैदान सौंप देगा. और वह चुनाव लड़ता है तो उसकी धमकी गीदड़-भभकी साबित हो जाएगी.
यही वह राजनीतिक जाल है जिसकी वजह से राहुल गांधी इस दरवाजे को जरा सा भी खोलना नहीं चाहते. राजनीति की कठोर दुनिया में ऐसी धमकियां देने से बचा जाता है जिन्हें पूरा करने की कीमत चुका पाना संभव न हो.
आधुनिक राजनीतिक इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जब चुनावों का बहिष्कार करने वाली पार्टियां मजबूत होने के बजाय और कमजोर हो गईं. अलग-अलग देशों और अलग-अलग दौर में सत्ताओं ने विपक्ष के चुनाव से हटने को नैतिक संकट नहीं, बल्कि अपने लिए राजनीतिक तोहफे की तरह लिया है.
पंजाब, 1992
पांच साल के राष्ट्रपति शासन और भीषण उग्रवाद के बाद केंद्र सरकार ने फरवरी 1992 में पंजाब विधानसभा चुनाव कराने का फैसला किया. उग्रवादी संगठनों की धमकियों और कई राजनीतिक मांगों के बीच शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख धड़ों ने चुनावों का बहिष्कार करने का फैसला किया. उनका मकसद यह दिखाना था कि पंजाब की चुनावी प्रक्रिया को वहां की जनता का समर्थन हासिल नहीं है.
बहिष्कार का असर मतदान पर पड़ा. सिर्फ 23.8 फीसदी लोगों ने वोट डाला और ग्रामीण इलाकों में मतदान इससे भी कम रहा. लेकिन चुनावी नतीजों पर इसका असर सिर्फ इतना हुआ कि कांग्रेस ने 117 में से 87 सीटें जीत लीं और पंजाब में इतने भारी बहुमत वाली बेअंत सिंह की सरकार बन गई.
अगले पांच साल तक अकाली दल विधानसभा से बाहर रहा. और एक ऐसे दौर में जब राज्य में उग्रवाद-विरोधी अभियान चल रहा था, राज्य की नीतियों पर उसका असर न के बराबर भी नहीं था.
1997 तक अकालियों को अपनी रणनीतिक गलती की गंभीरता समझ आ चुकी थी. वे वापस चुनावी मैदान में लौट आए.
वेनेजुएला, 2005
दिसंबर 2005 के संसदीय चुनावों से पहले वेनेजुएला की मुख्य विपक्षी पार्टियों ने राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज़ पर राष्ट्रीय चुनाव परिषद को अपने समर्थकों से भरने और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में हेरफेर करने के आरोप लगाए.
विपक्ष का मानना था कि ऐसी चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लेना उसे वैधता देने जैसा होगा. मतदान से कुछ ही दिन पहले विपक्ष ने अपने उम्मीदवार वापस ले लिए.
मतदान लगभग 25 फीसदी तक गिर गया. लेकिन कानूनी नतीजा बिल्कुल साफ था. शावेज़ और उनके समर्थक दलों ने नेशनल असेंबली की सभी 167 सीटें जीत लीं.
संसद में विरोध दर्ज कराने वाला कोई विपक्ष नहीं बचा. शावेज़ को बहुत व्यापक राजनीतिक शक्ति मिल गई जिसके दम पर उन्होंने वेनेज़ुएला में जैसा चाहा, वैसा किया. इसके बाद विपक्ष को वह संस्थागत जमीन वापस पाने में वर्षों लग गए जिसे उसने खुद छोड़ दिया था.
बांग्लादेश, 2014
2011 में प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार ने चुनावों के दौरान निष्पक्ष “केयरटेकर सरकार” की व्यवस्था खत्म कर दी.
खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी इसे वापस लाने की मांग करती रही. आखिरकार उसने 2014 के आम चुनाव का बहिष्कार कर दिया. उसका कहना था कि अवामी लीग की सरकार के रहते निष्पक्ष चुनाव होना संभव ही नहीं है.
नतीजा यह हुआ कि 300 में से 153 संसदीय सीटों का फैसला किसी नागरिक के एक भी वोट डालने से पहले हो गया, क्योंकि वहां कोई मुकाबला ही नहीं बचा था.
अवामी लीग और उसके सहयोगियों ने संसद में भारी बहुमत हासिल कर लिया. दूसरी तरफ बीएनपी संसद से बाहर हो गई और उसने संस्थागत प्रतिरोध का सबसे बड़ा मंच भी खो दिया. इस वजह से पार्टी और उसके नेताओं को तमाम तरह की दुश्वारियों का सामना करना पड़ा.
चुनावों का बहिष्कार तभी सफल हो सकता है जब वह किसी बड़े और लगातार चलने वाले जन आंदोलन की शुरुआत हो.
महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने औपनिवेशिक शासन के खिलाफ बहिष्कार का इस्तेमाल इसी तरह किया था. उसके पीछे देशव्यापी असहयोग आंदोलन की ताकत थी.
लेकिन सवाल यह है कि क्या आज के भारतीय विपक्ष के पास ऐसी क्षमता है?
हाल के वर्षों में इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण 2020-21 का किसान आंदोलन था जिसने केंद्र सरकार को तीन कृषि कानून वापस लेने के लिए मजबूर कर दिया. लेकिन उस आंदोलन की ताकत राजनीतिक पार्टियों से नहीं आई थी. बल्कि आंदोलन के नेताओं ने जानबूझकर राजनीतिक पार्टियों को अपने मंचों से दूर रखा, ताकि सरकार उसे विपक्ष की चुनावी साजिश बताकर खारिज न कर सके.
अभिजीत दिपके की कॉकरोच जनता पार्टी ने भी हाल ही में ऐसा ही कुछ किया है. परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक के खिलाफ जंतर-मंतर पर उसका धरना केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की वजह बना. लेकिन किसी साफ दिखाई देने वाली प्रशासनिक गड़बड़ी को लेकर एक केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा करवाना और पूरे उपमहाद्वीप की राजनीतिक व्यवस्था को ठप कर देना दो बिल्कुल अलग बातें हैं.
चुनाव बहिष्कार की अपीलें जमीनी राजनीति की इंसानी हकीकत को भी नजरअंदाज करती दिखती हैं.
कोई राजनीतिक पार्टी टीवी स्टूडियो या सोशल मीडिया फीड में नहीं जीती है. उसका असली जीवन नगर पालिका के वार्डों, गांव के बूथों और जिला अदालतों के इर्द-गिर्द होता है.
डेरेक ओ’ब्रायन भी अपनी पोस्ट में इसी बात की ओर ध्यान दिलाते हैं.
हजारों पार्टी कार्यकर्ता अलग-अलग स्तरों पर चुनाव लड़ते हैं. उनके पीछे करोड़ों समर्थक होते हैं. पुलिस की निगरानी, प्रशासनिक दबाव और कई बार अपनी जान और रोजी-रोटी को खतरे में डालकर वे राजनीति करते हैं.
चुनाव लड़ना इस पूरे नेटवर्क को जिंदा रखने वाली ऑक्सीजन है. इससे स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को पहचान, राजनीतिक संरक्षण और कुछ असर मिलता है.
अगर पार्टी नेतृत्व कह दे कि अगले पांच साल वह चुनाव ही नहीं लड़ेगा, तो इन कार्यकर्ताओं के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो सकता है. सत्ताधारी व्यवस्था का दबाव और अपनी पार्टी का सत्ता से अलगाव उन्हें या तो सत्तारूढ़ दल से ही जुड़ जाने के लिए मजबूर कर सकता है या राजनीति छोड़ देने को.
यही एक और वजह है कि राहुल गांधी ने चुनाव बहिष्कार के सवाल को “डिस्ट्रैक्शन” कहकर खारिज कर दिया. विपक्ष का कोई बड़ा नेता जैसे ही इस विचार को गंभीरता से लेगा, उसी क्षण राजनीतिक बहस की दिशा बदल सकती है.
फिर चर्चा चुनावी हेरफेर के आरोपों, संस्थाओं के मनमाने व्यवहार या आर्थिक परेशानियों पर नहीं होगी. कहानी यह बन सकती है कि विपक्ष ने हार मान ली है और वह मैदान छोड़कर भाग रहा है.
लेकिन चुनाव बहिष्कार न करना भी कोई आकर्षक विकल्प नहीं है.
तब पार्टियों और उनके शीर्ष नेतृत्व को गड़बड़ियों की जांच करते रहना होगा, लोगों को लामबंद करना होगा, सड़कों और अदालतों में लड़ना होगा, मतदाता सूचियों के हर नाम पर नजर रखनी होगी, मतदान केंद्रों की निगरानी करनी होगी और तमाम मुश्किलों के बावजूद चुनावी मैदान में बने रहना होगा.
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