पंचम कई लोगों के लिए नालंदा थे तो कइयों के लिए आईआईटी और आईआईएम
आरडी बर्मन न तो अपने पिता एसडी बर्मन के रास्ते पर चले और न ही दूसरे स्थापित संगीतकारों के. उन्होंने अपने लिए संगीत की एक नई और उन्मुक्त पगडंडी खोजी
शुभम उपाध्याय
राहुल देव बर्मन को आप संगीतकारों की दुनिया का गुलज़ार भी कह सकते हैं. इसलिए नहीं कि विशाल भारद्वाज से कई दशक पहले एक सार्थक गीतकार और प्रयोगधर्मी संगीतकार की सर्वश्रेष्ठ जुगलबंदी का उदाहरण पंचम और गुलज़ार ही हुआ करते थे, बल्कि इसलिए क्योंकि पंचम में बतौर संगीतज्ञ एक गुलज़ार भी रहा करता था.
गुलज़ार ने जिस तरह फ़िल्मी गीतों के व्याकरण को बदला, उनमें नए बिंब तलाशे और दर्शकों के मिज़ाज को अपनी लेखनी से बदला, ठीक वैसा ही आरडी बर्मन ने हिंदी फिल्म संगीत के साथ किया. वे न सिर्फ अपने पिता एसडी बर्मन की छाया से बाहर निकले, बल्कि सलिल चौधरी, नौशाद, कल्याणजी-आनंदजी और शंकर-जयकिशन जैसे दूसरे स्थापित संगीतकारों के रास्तों पर भी नहीं चले. उन्होंने अपने लिए प्रयोगधर्मिता की एक नई और उन्मुक्त पगडंडी खोजी.
पंचम दा के संगीत की सफलता का श्रेय उस दौर के सुपरस्टार राजेश खन्ना को भी दिया जाता है, जिन्होंने उनके गानों पर अपने ही अंदाज़ में लिप-सिंक कर उन्हें लोकप्रिय बनाया. लेकिन वे शायद ऐसा इसलिए कर सके क्योंकि आरडी का संगीत उन्हें वैसा करने की आज़ादी देता था. अपने लंबे करियर में व्यावसायिक सफलता की लत से बचते हुए पंचम ने न सिर्फ हिंदी फिल्मों के संगीत का मिज़ाज बदला, बल्कि थोड़ा सा फिल्मों और उनके दर्शकों को भी बदल दिया. उन्होंने लगातार नए-नए प्रयोग करके दर्शकों को हरदम नए स्वाद वाले संगीत का चस्का लगाया.
उनके बाद आए संगीत निर्देशकों ने अगर अपने संगीत में पश्चिमी प्रभाव का प्रयोग बहुत ज़्यादा किया, तो पंचम वह अलहदा संगीतकार रहे जिन्होंने भारतीयों की पसंदीदा मेलोडी में पश्चिमी संगीत के संतुलन को कभी बिगड़ने नहीं दिया. आप हिंदी फिल्म संगीत का विभाजन आरडी से पहले और आरडी के बाद वाले दौर में आसानी से कर सकते हैं. दोनों ही दौर के कुछ गीत सुनने पर ही गानों के स्ट्रक्चर से लेकर धुनों तक में आए बदलाव आसानी से पकड़ में आ सकते हैं.
संगीत में पंचम की शुरुआती तालीम अपने पिता एसडी बर्मन की देखरेख में उनके मिज़ाज वाले हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में ही हुई. लेकिन उनका झुकाव हमेशा से वेस्टर्न म्यूजिक की तरफ रहा. उन्होंने अपने समय के उन विदेशी संगीतकारों को खूब सुना जो पश्चिमी संगीत के विभिन्न जॉनर्स में माहिर माने जाते थे. रॉक बैंड्स से लेकर जैज़, लैटिन, स्पैनिश और हर उस धरती का संगीत जो हिंदुस्तान पहुंच सकता था, उसका पंचम ने गहराई से अध्ययन किया.
राहुल देव बर्मन का नाम पंचम कैसे पड़ा, इस बारे में कई किस्से प्रचलित हैं. कुछ का मानना है कि बचपन में वे कई अलग-अलग नोट्स (सुरों) में रोते थे, इसलिए घर वालों ने उनका नाम पंचम रख दिया! कुछ कहते हैं कि जब बचपन में अशोक कुमार ने उन्हें बार-बार ‘पा’ कहते हुए सुना, तो उनका नामकरण पंचम कर दिया. लेकिन मन्ना डे कहते थे कि जब उन्होंने एसडी बर्मन से इस बारे में पूछा, तो वे बोले, ‘अपनी पैदाइश के वक्त वो जब रो रहा था तो पांचवें (पंचम) सुर में रो रहा था, यानी कि ‘पा’, इसलिए मैंने उसका नाम पंचम रख दिया.’
पंचम ने अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत पिता एसडी के सहायक के तौर पर ही की. तबला और आवाज़ का रियाज़ पंडित ब्रजेन बिश्वास के साथ किया और उस्ताद अली अकबर खान से सरोद सीखा. वे माउथ ऑर्गन भी बेहद उम्दा बजाते थे. देव आनंद पर फिल्माए और हेमंत कुमार के गाए ‘है अपना दिल तो आवारा’ का माउथ ऑर्गन पीस उनका ही बजाया हुआ था. तब तक वे अपने उन पिता के सहायक नहीं बने थे जिन्होंने न सिर्फ उनके संगीत को आधारशिला दी, बल्कि उनके निजी जीवन की नींव भी एसडी के स्टूडियो में ही पड़ी. अपनी दूसरी पत्नी आशा भोंसले से पंचम की पहली मुलाकात पिता की एक म्यूजिक सिटिंग में ही हुई, जब 1953 में ‘अरमान’ फिल्म के लिए आशा भोंसले गीत गाने स्टूडियो आईं. वहीं पहली बार एसडी ने आशा को मैट्रिक में पढ़ रहे बेहद दुबले-पतले पंचम से मिलवाया.
पंचम मैट्रिक पास नहीं कर पाए और पढ़ाई छोड़कर हमेशा के लिए संगीत में रम गए. आशा से उनकी दूसरी मुलाकात 1957 में एसडी के ही संगीत से सजी ‘नौ दो ग्यारह’ के वक्त हुई, जब आशा गाने का अभ्यास करने स्टूडियो आईं और वहीं उन्होंने जमीन पर बैठकर वाद्य यंत्र बजाते पंचम को दूसरी बार देखा. कुछ सालों बाद 1966 में पंचम ने रीता पटेल से शादी कर ली, लेकिन यह विवाह सिर्फ 1971 तक चला. वजह फिल्मों में उनकी अत्यधिक व्यस्तता रही. पंचम के संगीत की मुरीद बनकर जिस लड़की ने उनसे शादी की थी, वह उसी संगीत से अत्यधिक जुड़ाव की वजह से उन्हें छोड़कर चली गई.
कुछ सालों की नज़दीकियों के बाद 1980 में पंचम और आशा भोंसले ने एक-दूसरे को अपना जीवनसाथी बना लिया. भले ही दोनों की जुगलबंदी निजी जीवन में आखिरी वक्त तक एक-दूसरे का साथ न दे पाई हो, लेकिन संगीत के क्षेत्र में यह जुगलबंदी न सिर्फ अमर हुई, बल्कि दोनों एक-दूसरे के ऐसे पूरक बने कि आशा ने पंचम के लिए 800 से ज्यादा फ़िल्मी गीत गाए.
पिता के संगीत सहायक से स्वतंत्र संगीत निर्देशक बनने का इत्तेफ़ाक भी पंचम के पास खुद ही चलकर एसडी के स्टूडियो में आया. महमूद अपनी फिल्म ‘छोटे नवाब’ के लिए एसडी को लेने उनके स्टूडियो गए थे, लेकिन पंचम को तबला बजाते देखने के बाद (एसडी ने इस फिल्म में संगीत देने से इनकार कर दिया था) महमूद ने वहीं के वहीं पंचम को साइन कर लिया. 1961 में रिलीज़ हुई अपनी इस पहली फिल्म के ‘मतवाली आंखों वाले’ गाने से उन्होंने वेस्टर्न प्रभाव वाले संगीत का जलवा बिखेरना शुरू कर दिया. इसी फिल्म में लता मंगेशकर की आवाज में मेलोडी की कड़क पकड़ रखने वाला शुद्ध हिंदुस्तानी गाना ‘घर आजा घिर आए बदरा’ भी था. इसे सुनकर समझा जा सकता है कि बाद के सालों में कमाल संगीत देने वाला यह संगीतकार अपनी पहली फिल्म के वक्त भी संगीत की कितनी गहरी समझ रखता था.
इस बात पर हमेशा बहस होती रही है कि एसडी पंचम के लिए गीत बनाकर दिया करते थे या पंचम एसडी के अस्वस्थ होने पर उनके गीतों को पूरा किया करते थे. इंडस्ट्री में कुछ लोग मानते हैं कि कई गीत ऐसे हैं जिनका मुखड़ा पंचम ने तैयार किया तो बाकी का गीत एसडी ने, और इसका उल्टा भी हुआ. कई किस्से साफ-साफ कहते हैं कि एसडी के कई हिट गीतों को मूल रूप से आरडी ने ही तैयार किया लेकिन क्रेडिट सहायक का लिया. ‘गाइड’ का ‘गाता रहे मेरा दिल’ और ‘आराधना’ का ‘कोरा कागज’ ऐसे ही कुछ गीत हैं जिनमें संगीत तो एसडी बर्मन का था, लेकिन उनकी धुन पंचम ने बनाई थी.
पंचम को कई बार गुलज़ार के लिखे शब्दों को सुर देने में थोड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता था. उनकी लिखाई पारंपरिक मानकों पर खरी नहीं उतरती थी और पंचम के सहयोगियों के किस्से बताते हैं कि गुलज़ार के गीतों को संगीतबद्ध करने में वे हमेशा ही अतिरिक्त मेहनत किया करते थे. ‘मेरा कुछ सामान’ गीत से जुड़ा वह किस्सा तो अब जगजाहिर है ही; जब गुलज़ार अपना लिखा यह गीत उनके पास लेकर गए, तो पंचम ने नाराज़ होकर उनसे कहा कि कल को टाइम्स ऑफ़ इंडिया भी लेकर आओगे और कहोगे कि इसकी भी ट्यून बना दो, तो क्या मैं वो भी बना दूंगा! बाद में आशा भोंसले के साथ संगत बिठाकर पंचम ने सिर्फ दस-पंद्रह मिनट में यह अमर गीत तैयार कर दिया.
‘इजाज़त’ हो या ‘आंधी’ या फिर ‘परिचय’, ‘किताब’, ‘किनारा’, ‘मासूम’ और ‘दिल पड़ोसी है’—गुलज़ार और पंचम की जुगलबंदी वाले गीत हमेशा अजर-अमर तो रहेंगे ही, वे एक गीतकार और संगीतकार की मरते दम तक निभाई गई दोस्ती के गवाह भी रहेंगे. यह बात आप पंचम पर लिखी गुलज़ार की नज़्में पढ़कर भी समझ सकते हैं और तब भी, जब हर बार पंचम पर बात करते हुए गुलज़ार की आंखें नम हो जाया करती हैं.
पंचम दा कई लोगों के लिए संगीत का नालंदा थे, तो कइयों के लिए आईआईटी और आईआईएम. वे संगीत का एक ऐसा विद्यालय रहे जिनसे न सिर्फ उनके तुरंत बाद और उसके बाद वाली पीढ़ी (बप्पी लहरी, अनु मलिक) ने सीखा, बल्कि विशाल-शेखर, शंकर-एहसान-लॉय, शांतनु मोइत्रा, विशाल भारद्वाज जैसे बेहद सफल संगीतकारों का संगीत भी अभी तक उनके गीतों से प्रेरणा लेता रहता है. यहां तक कि अमित त्रिवेदी के गीत-संगीत में भी पंचम की छाप साफ नजर आती है. सुजॉय घोष की शुरुआती और एकदम धमाल फिल्म ‘झंकार बीट्स’ संगीत के इसी ‘बॉस’ को ट्रिब्यूट दे चुकी है. इसमें पंचम से मिलकर आज भी दिल खुश हो जाता है – ‘बॉस कौन था, मालूम है क्या?’
पंचम ने अपनी खुद की आवाज़ और वाद्य यंत्रों के साथ भी कई प्रयोग किए. ऐसे प्रयोग जो वह अलहदा साउंड पैदा करते थे जो उस वक्त तक हिंदी फिल्मों में कभी सुने नहीं गए थे. राजेश खन्ना की फिल्म ‘अपना देश’ का ‘दुनिया में लोगों को’ गीत याद करें. आपको सबसे पहले सांसों के गज़ब के कंट्रोल के साथ ‘हाहा..हा..हाहाहा’ और ऊंची खराश भरी आवाज के साथ ‘तरा तरा तरा तरा तरा’ याद आएगा. जिस तरह एआर रहमान के दौर की पीढ़ी उनके शुरुआती गीतों को सुनकर भौचक्की रह गई थी, उसी तरह पंचम के दौर के श्रोता उनकी ये आवाज़ें सुनकर अविश्वास से भर गए थे, कि कोई संगीतकार इस तरह भी गीत बना सकता है, जिसमें गायकी और वाद्य यंत्रों से ज्यादा आवाज और सांसों के अजब खेल से गीत में निखार आता हो!
इस तरह के अनूठे प्रयोग आरडी बर्मन के संगीत में अक्सर देखने को मिलते हैं. गरारे करती फीमेल आवाज को उन्होंने मशीन में ऐसा मथा कि ‘सत्ते पे सत्ता’ के दूसरे वाले अमिताभ की एंट्री ट्यून बना दी. कभी रेगमाल के दो टुकड़ों को आपस में घिसकर साउंड निकाला तो कभी छोटी कंधी को किसी सतह पर चलाकर. नई-नई आवाजों को ‘साउंड ट्रिपिंग’ में ढूंढकर स्नेहा खानवलकर ने तो हमें बहुत बाद में खुश किया, यह काम पंचम बहुत पहले से किया करते थे. कभी रात भर बैठकर बरसते पानी की आवाज को रिकॉर्ड करते तो कभी झींगुरों की आवाज को. कभी कांच की बोतल में फूंक मार-मारकर ‘शोले’ के ‘महबूबा महबूबा’ के लिए साउंड तैयार करते, तो कभी ढोलक से नई साउंड निकालने के लिए किसी सहायक की नंगी पीठ पर ही हाथ चलवा देते.
लेकिन संगीत के प्रति इस कदर जुनूनी यह संगीतकार भी असफलता के भंवर में फंसने से खुद को रोक नहीं सका. 1985 के बाद उनके जीवन में वह दौर शुरू हुआ जो किसी की जिंदगी में नहीं आना चाहिए, लेकिन उगते सूरज को सलाम करने वाली हमारी फिल्म इंडस्ट्री में हर किसी का आता है. वह लंबा वक्त जब आपका काम हिट नहीं होता और ढलता सूरज अकेला रह जाता है. आरडी भी लंबे वक्त तक अकेले रहे और यार-दोस्त व इंडस्ट्री के शुभचिंतक उनकी असफलताओं की आड़ लेकर उनसे दूर होते गए.
1985 तक सुपरहिट कहलाए जाने वाले इस कंपोज़र की अगली 27 फिल्मों का संगीत नाकामयाब रहा और इस असफलता ने उन्हें बुरी तरह तोड़ा. भले ही इस दौरान आई ‘इजाज़त’, ‘परिंदा’, ‘गर्दिश’, ‘लिबास’ जैसी फिल्मों के गीत बाद के सालों में महान से लेकर बेहद उम्दा की श्रेणी में रखे गए, लेकिन आज के समय में जिस संगीतकार को हर कोई जीनियस कहता है, वह आरडी बर्मन अपने आखिरी दिनों में असफल होने के साथ-साथ उपेक्षित भी खूब हुआ. सुभाष घई ने ‘राम-लखन’ (1989) के लिए उन्हें साइन करने के बाद एक दिन अचानक लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को अपनी फिल्म में ले लिया और पंचम को स्वयं यह जानकारी देना जरूरी भी नहीं समझा. इससे पहले 1988 में पंचम एक हार्ट-अटैक झेल चुके थे और कहते हैं कि राम-लखन की घटना के बाद वे कहा करते थे, ‘मैं बायपास के लिए क्या गया, उसने मुझे ही बायपास कर दिया’.
इस गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली घटना का सदमा पंचम को गहरा लगा. वे न तो इसे बर्दाश्त कर पाए और न ही अपने एक करीबी सहायक की धोखेबाजी को. कई फ़िल्मी हस्तियां उन्हें उनके आखिरी दिनों में एक उदास और बेहद अकेले आदमी के तौर पर याद करती हैं और कुछ तो हृदयाघात से हुई उनकी मृत्यु का कारण उनके इसी अकेलेपन और अवसाद को मानती हैं.
मगर बिरले वे होते हैं जो अपनी सारी असफलताओं और अपमान का जवाब अपने काम से ही देते हैं. आरडी बर्मन ने भी अपने आखिरी फ़िल्मी एल्बम से ऐसा ही करारा जवाब दुनिया को दिया. कहानी है कि निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा 1994 में रिलीज हुई अपनी फिल्म ‘1942 अ लव स्टोरी’ के लिए आरडी बर्मन को ही लेना चाहते थे, लेकिन फिल्म के म्यूजिक राइट्स खरीदने वाली कंपनी नहीं चाहती थी कि आरडी जैसा बुझा हुआ सितारा उनकी इस फिल्म का संगीत दे. विधु नहीं माने — जैसे कि वे कभी नहीं मानते. ‘1942 अ लव स्टोरी’ ने न सिर्फ श्रोताओं को जावेद अख्तर के लिखे रुमानियत में डूबे अजर-अमर गीत दिए, बल्कि 1960 से लेकर 1980 के दशक तक फैले अपने लंबे फ़िल्मी करियर में सिर्फ दो बार फिल्मफेयर जीतने वाले आरडी बर्मन को सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक का तीसरा फिल्मफेयर पुरस्कार भी दिया... मरणोपरांत.
किसी और के लिए लिखा जावेद अख्तर का एक गीत मानो उन्हीं के लिए लिखा गया था — ‘जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया, उम्र भर दोहराऊंगा ऐसी कहानी दे गया’.
(पंचम दा को जल्दी और बेहतर जानने-समझने के लिए ब्रह्मानंद सिंह की बनाई दो डॉक्यूमेंट्री ‘नोइंग पंचम’ और ‘पंचम अनमिक्सड’ ज़रूर देखिए. हमारी भी जानकारी का दायरा इन्हीं से बढ़ा है, और इस लेख का भी.)
अपडेट पाने, बुकमार्क या कॉमेंट करने के लिए सब्सक्राइब करें.



